नहीं बोलती नहीं बोलती

नहीं बोलती नहीं बोलती ,

जा जा अब मैं नहीं बोलती,

जब देखो सब मुझको गुस्‍सा करते।

दादी कहती छोरी है री,

कम बोला कर कम बोला कर।

मां कहती है पढ़ ले पढ़ ले।

भाई बोला छोटा हूं तो क्‍या,

तू लड़की है मैं लड़का।

मैं तेरा रक्षक।

क्‍या करना है मुझसे पूछ।

क्‍या कहना है मुझसे पूछ।

न कर बकबक न कर झकझक।

पापा कहते दुनिया बुरी,

सम्‍हलकर रहना ,

सोच-समझकर कहना,

रखना ज़बान छोटी ।

 

दिन भर चिडि़या सी चींचीं करती।

कोयल कू कू कू कू करती।

कौआ कां कां कां कां करता।

टामी भौं भौं भौं भौं  करता।

उनको कोई कुछ नहीं कहता।

मुझको ही सब डांट पिलाते।

मैं पेड़ पर चढ़ जाउंगी।

चिडि़या संग रोटी खाउंगी।

वहीं कहीं सो जाउंगी।

फिर मुझसे मिलने आना,

गीत मधुर सुनाउंगी।

 

 

सोने की  हैं ये कुर्सियां

सरकार अपनी आ गई है चल अब तोड़ाे जी ये कुर्सियां

काम-धाम छोड़-छाड़कर अब सोने की  हैं जी ये कुर्सियां

पांच साल का टिकट कटा है हमरे इस आसन का

कई पीढ़ियों का बजट बनाकर देंगी देखो जी ये कुर्सियां

मन से मन मिले हैं

यूं तो

मेरा मन करता है

नित्य ही

पूजा-आराधना करुँ।

किन्तु

पूजा के भी

बहुत नियम-विधान हैं

इसलिए

डरती हूं पूजा करने से।

ऐसा नहीं

कि मैं

नियमों का पालन करने में

असमर्थ हूँ

किन्तु जहाँ भाव हों

वहाँ विधान कैसा ?

जहाँ नेह हो

वहां दान कैसा ?

जहाँ भरोसा हो

वहाँ प्रदर्शन कैसा ?

जब

मन से मन मिले हैं

तो बुलावा कैसा ?

जब अन्तर्मन से जुड़े हैं

तो दिनों का निर्धारण कैसा ?

 

 

 

कवियों की पंगत लगी

  कवियों की पंगत लगी, बैठे करें विचार

तू मेरी वाह कर, मैं तेरी, ऐसे करें प्रचार

भीड़ मैं कर लूंगा, तू अनुदान जुटा प्यारे

रचना कैसी भी हो, सब चलती है यार

अवसान एवं उदित

यह कैसा समय है,

अंधेरे उजालों को

डराने में लगे हैं,

अपने पंख फैलाने में लगे हैं।

दूर जा रही रोशनियां,

अंधेरे निकट आने में लगे हैं।

 

अक्सर मैंने पाया है,

अवसान एवं उदित में

ज़्यादा अन्तर नहीं होता।

दोनों ही तम-प्रकाश से

जूझते प्रतीत होते हैं मुझे।

 

एक रोशनी-रंगीनियां समेटकर

निकल लेता है,

किसी पथ पर,

किसी और को

रोशनी बांटने के लिए।

और दूसरा

बिखरी रोशनी-रंगीनियों को

एक धुरी में बांधकर

फिर बिखेरता है

धरा पर।

चलो, आज एक नई कोशिश करें,

दोनों में ही रंगीनियां-रोशनी ढूंढे।

अंधेरे सिमटने लगेंगें

रोशनियां बिखरने लगेंगी।

 

मन में बजे सरगम
मस्ती में मनमौजी मन

पायल बजती छन-छनछन

पैरों की अनबन

बूँदों की थिरकन

हाथों से छल-छल

जल में

बनते भंवर-भंवर

हल्की-हल्की छुअन

बूँदों की रागिनी

मन में बजती सरगम।

अतिक्रमणः एक पक्ष
अतिक्रमण विरोधी दस्ते, नगर निगम अथवा प्रशासन जब लोगों के घर उजाड़ते हैं तो दुःख होता है। समाचार-पत्रों एवं टी.वी. चैनलों की भाषा में बात करें तो किसी का आशियाना उजड़ गया कोई बेघर हो गया, किसी के बर्तन सड़क पर बिखरे नज़र आये तो किसी के सिर से छत चली गई। सड़क पर बैठीं, घरों का बिखरा सामान समेटती रोती औरतों और भूख से बिलखते बच्चों को देखकर किसी का भी मन भर आता है। प्रशासन किसी का दुःख नहीं देखता।

            अब इसी समस्या को दूसरी दृष्टि से देखें। ‘अतिक्रमण’ का क्या अर्थ है? किसी दूसरे की सम्पत्ति पर अनधिकार कब्ज़ा। दूसरे शब्दों में हम इसे सरकारी ज़मीन की चोरी कह सकते हैं। जब  किसी व्यक्ति की निजी ज़मीन पर अतिक्रमण होता है अथवा उसकी किसी वस्तु की चोरी होती है तो वह प्रायः दो-तीन उपाय करता है। अपनी सम्पत्ति की वापसी के लिए व्यक्तिगत प्रयास, पुलिस में रिपोर्ट एवं न्यायालय के माध्यम से; अर्थात् प्रशासन का सहयोग प्राप्त करता है। किन्तु यदि आम आदमी प्रशासन की ही सम्पत्ति की चोरी करता हो तो प्रशासन किसके पास जाये?

            वस्तुतः अतिक्रमण एक चोरी है। और एक कड़वा सत्य यह कि यह चोरी प्रायः सामूहिक होती है। सड़क के किनारे बनी दुकानें एक ही पंक्ति में सड़कों पर निमार्ण बढ़ा लेती हैं और बीच में जो नहीं बढ़ाते हैं उनकी स्थिति गेहूं के साथ घुन पिसने जैसी होती है। फिर इन बढ़ी हुई दुकानों-मकानों के आगे छोटे खोखे और उनके आगे रेहड़ियां। सड़क तो नाम-मात्र की रह जाती है।  हम अपनी भूमि अथवा सम्पत्ति के एक-एक इंच के लिए प्राण तक देने के लिए तैयार हो जाते हैं किन्तु सरकारी सम्पत्ति पर अनाधिकार कब्ज़ा करने में एक पल भी नहीं हिचकते। वर्तमान में सरकारी सम्पत्ति के हनन की एक मानसिकता बन चुकी है जिसका कोई बुरा भी नहीं मानता। कोई भी इसे हेय दृष्टि से नहीं देखता। न ही इसे चोरी अथवा अपराध का नाम दिया जाता है। घर के आगे सड़क पर बरामदे और साढ़ियां बनाना, छतें बढ़ाना, छज्जे बढ़ाना तो जनता का सार्वजनिक एवं सार्वजनीन अधिकार है। इसके अतिरिक्त सरकारी खाली पड़ी ज़मीन पर छोटा-सा मकान अथवा झोंपड़-पट्टियों का जाल फैलना तो एक आम-सी ही बात हो चुकी है। इस अतिक्रमण का यह कहकर समर्थन किया जाता है कि बेचारा गरीब आदमी क्या करे !

            देश की आधी सड़कें तो इस अतिक्रमण की ही भेंट चढ़ चुकी हैं जो देश में ट्रैफ़िक जाम, गंदगी आदि का सबसे बढ़ा कारण हैं। नालों के उपर मकान अथवा दुकानें बढ़ा दी जाती हैं। परिणामस्वरूप नालों की सफाई नहीं हो पाती, जिस कारण धरती के भीतर और बाहर प्रदूषण बढ़ता है। पानी की निकासी नहीं होती, नालियां  रुकती हैं और गंदगी एवं कूड़ा-कर्कट सड़कों पर स्थान बनाने लगते हैं। रोग पनपते हैं, पीने का पानी प्रदूषित हो जाता है, सड़क निमार्ण एवं अन्य विकास-कार्यों में बाधा उत्पन्न होती है। वर्षा ऋतु में सड़कें नदियाँ बन जाती हैं। ये सारी समस्याएं परस्पराश्रित हैं जिनके लिए हम प्रशासन को दोषी मानते हैं। यदि किसी विकास-कार्य अथवा निमार्ण के लिए प्रशासन के मार्ग में किसी की व्यक्तिगत एक इंच भूमि भी आ रही हो तो लोग देने के लिए तैयार नहीं होते। यदि सरकार किसी की भूमि लेती है तो बदले में लाखों -करोड़ों की प्रतिपूर्ति भी देती है और प्रायः बदले में ज़मीन अथवा अन्य सुविधाएं भी। किन्तु लोग फिर भी सन्तुष्ट नहीं होते।

            अतिक्रमण एक अधिकार मान लिया गया है और इसके विरुद्ध कार्यवाही का अर्थ है सरकार की आम आदमी के प्रति दमन-नीति।  तोड़-फोड़ करने से पूर्व प्रायः नोटिस दिये जाते हैं, चेतावनियां दी जाती है एवं समय भी। लोगों को यह अवसर भी दिया जाता है कि वे अपना सामन हटाकर स्वयं ही अनधिकृत निमार्ण तोड़ दें। किन्तु लोग अधिक समझदारी का प्रयोग करते हैं। समितियां बना ली जाती हैं संगठन खड़े कर लिए जाते हैं ओर लोग अपने बचाव में रैलियां, धरने, भूख-हड़ताल आदि करने लगते हैं। धरनों ओर रैलियों में महिलाओं और बच्चों को आगे कर दिया जाता है। महिलाओं की रोती सूरतें, बिलखते-भूखे बच्चों को दिखा-दिखाकर वे अपनी इस चोरी को मासूमियत के नीचे ढंकना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त लोगों के पास अपने इस अपराध को उचित ठहराने का सबसे बड़ा आधार है धर्म। घर के आस-पास अथवा दुकानों के बाहर धार्मिक स्थलों का अथवा प्रतीकों का निर्माण कर लिया जाता है। फिर इन स्थानों की तोड़-फोड़ को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया जाता है। महिलाएँ और बच्चे तो पहले ही अग्रिम पंक्ति में होते हैं। अंततः  प्रशाासन को पुलिस बल का सहारा लेकर कार्यवाही करनी पड़ती है। जनता अपनी अनधिकृत सम्पत्ति पर अपने अधिकार को बचाये रखने के लिए प्रत्येक प्रयास करती है। परिणामस्वरूप लाठी चार्ज, आंसू गैस, बल-प्रयोग किया जाता है, जिस कारण लोगों का घायल होना एवं नुकसान होना स्वाभाविक ही है।  तब पुलिस एवं प्रशाासन की निर्ममता की खूब चर्चा होती है। फिर नगर-निगम आज अनधिकृत निर्माण को तोड़कर जाता है, दो दिन बाद वहां फिर वही ढांचे दिखाई देने लगते हैं। इसके अतिरिक्त लोग संगठन बनाकर न्यायालय की शरण में चले जाते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि देश में न्याय की प्रक्रिया धीमी है और न्यायालय स्थगन आदेश तो दे ही देता है। इस प्रकार मामले वर्षों तक लटके रहते हैं। वैसे भी प्रशासनिक कार्यवाही एक लम्बी प्रक्रिया होती है जिसका लाभ सदा विरोधी पक्ष को ही मिलता है।

            किन्तु इस अतिक्रमण रूपी चोरी की सीमा इतनी ही नहीं है। ‘सरकारी सम्पत्ति आपकी अपनी सम्पत्ति है’ यह वाक्य हम अनेक सार्वजनिक स्थानों पर पढ़ते हैं। जिसका अभिप्राय है कि  सरकारी सम्पत्ति पर देश के प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार है। अर्थात् यदि एक व्यक्ति सरकारी ज़मीन पर अनाधिकृत कब्ज़ा करता है तो वह देश के प्रत्येक नागरिक के अधिकारों का हनन करता है, प्रत्येक नागरिक की सम्पत्ति का अनाधिकार प्रयोग करता है। जो सड़क एक सौ चालीस करोड़  लोगों की है उस पर एक व्यक्ति अधिकार कर लेता है और हम एक सौ चालीस करोड़   लोगों को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता, हम देखकर चुपचाप निकल जाते हैं, कभी कोई आपत्ति नहीं करता। विपरीत प्रशासन द्वारा उसके विरुद्ध कार्यवाही करने पर हम प्रशासन की ही निन्दा करते हैं।

इस समस्या का एक ही समाधान है और वह है प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक होना। प्रचार-प्रसार माध्यमों द्वारा जन-जागरण अभियान। इसके अतिरिक्त बिजली, पानी एवं भूमि-चोरी को दण्डनीय अपराध घोषित किया जाना चाहि

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अपनी ही प्रतिच्‍छाया को नकारते हैं हम

अपनी छाया को अक्‍सर नकार जाते हैं हम।

कभी ध्‍यान से देखें

तो बहुत कुछ कह जाती है।

डरते हैं हम अपने अकेलेपन से।

किन्‍तु साथ-साथ चलते-चलते

न जाने क्‍या-क्‍या बता जाती है।

अपनी अन्‍तरात्‍मा को तो

बहुत पुकारते हैं हम,

किन्‍तु अपनी ही प्रतिच्‍छाया को

नकारते हैं हम।

नि:शब्‍द साथ-साथ चलते,

बहुत कुछ समझा जाती है।

हम अक्‍सर समझ नहीं पाते,

किन्‍तु अपने आकार में छाया

बहुत कुछ बोल जाती है।

कदम-दर-कदम,

कभी आगे कभी पीछे,

जीवन के सब मोड़ समझाती है।

छोटी-बड़ी होती हुई ,

दिन-रात, प्रकाश-तम के साथ,

अपने आपको ढालती जाती है।

जीवन परिवर्तन का नाम है।

कभी सुख तो कभी दुख,

जीवन में आवागमन है।

समस्‍या बस इतनी सी

क‍ि हम अपना ही हाथ

नहीं पकड़ते

ज़माने भर का सहारा ढूंढने निकल पड़ते हैं।

 

तिनके का सहारा

कभी किसी ने  कह दिया

एक तिनके का सहारा भी बहुत होता है,

किस्मत साथ दे

तो सीखा हुआ

ककहरा भी बहुत होता है।

लेकिन पुराने मुहावरे

ज़िन्दगी में साथ नहीं देते सदा।

यूं तो बड़े-बड़े पहाड़ों को

यूं ही लांघ जाता है आदमी,

लेकिन कभी-कभी एक तिनके की चोट से

घायल मन

हर आस-विश्वास खोता है।

रंगों में बहकता है

यह अनुपम सौन्दर्य

आकर्षित करता है,

एक लम्बी उड़ान के लिए।

रंगों में बहकता है

किसी के प्यार के लिए।

इन्द्रधनुष-सा रूप लेता है

सौन्दर्य के आख्यान के लिए।

तरू की विशालता

संवरती है बहार के लिए।

दूर-दूर तम फैला शून्य

समझाता है एक संवाद के लिए।

परिदृश्य से झांकती रोशनी

विश्वास देती है एक आस के लिए।

समाचार पत्रों के समाचार पर विचार

14.3.2021

आज के एक समाचार पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर एक आलेख बताता है कि देश में अधिकांश राज्यों में निर्धनों के लिए सस्ता भोजन उपलब्ध करवाया जा रहा है। उड़ीसा के 30 ज़िलों एवं मध्य प्रदेश, राजस्थान में 5  में भोजन, तमिलनाडु में अम्मा कैंटीन में दस रुपये में भोजन, आन्ध्र प्रदेश में एन टी आर अन्ना कैंटीन, एवं दिल्ली, बेंगलुरू आदि और भी शहरों में निर्धनों के लिए सस्ते भोजन की व्यवस्था की जा रही है। किन्तु वास्तव में देश की 25 प्रतिशत जनसंख्या आज भी भूखे पेट सोती है। भूखे देशों की श्रेणी में 118 देशों में भारत  97 स्थान पर है।

दूसरी ओर किसी उत्सव पर हज़ारों किलो का मोदक, केक, मिठाईयां बनती हैं। हमारे आराध्य करोड़ों के आभूषण पहनते हैं, उनका अरबों का बीमा होता है। यह धन कहां से आता है और इनके निवेश का क्या मार्ग है।

इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सस्ते भोजन का लाभ उठाने वाली जनता एवं 25 प्रतिशत भूखे पेट सोने वाली जनता का भी इस अमीरी में योगदान होता है। आज सस्ता भोजन उपलब्ध करवाने के नाम पर एक नाकारा पीढ़ी तैयार की जा रही है, जिसे बिना काम किये भोजन मिल जाता है, फिर वह काम की खोज क्यों करे और काम ही क्यों करे। बेहतर है वह किसी के साथ जुड़ जाये, आराधना करे, वन्दना करे और मुफ़्त भोजन पाये। परिश्रम और  शिक्षा से ऐसा क्या मिलेगा जो यहां नहीं मिलता। और एक समय बाद यदि निःशुल्क सुविधाएँ जब बन्द हो जायेंगी तो आप समझ ही सकते हैं कि एक अपराधी पीढ़ी की भूमिका लिखी जा रही है, नींव डाली जा रही है।

  

 

सावन नया

 

रात -दिन अंखियों में बसता दर्द का सावन नया

बाहर बरसे, भीतर बरसे, मन भरमाता सावन नया

कभी मिलते, कभी बिछुड़ते, दर्द का सागर मिला

भावों की नदिया सूखी, कहने को है सावन नया

 

 

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति

हिन्‍दी को वे नाम दे गये, हिन्‍दी को पहचान दे गये

अटल वाणी से वे जग में अपनी अलग पहचान दे गये

शत्रु से हाथ मिलाकर भी ताकत अपनी दिखलाई थी ,

विश्‍व-पटल पर अपनी वाणी से भारत को पहचान दे गये

रसते–बसते घरों में खुशियां

रसतेबसते घरों में खुशियां चकले-बेलने की ताल पर बजती हैं।

मां रोटी पकाती है, घर महकता है, थाली-कटोरी सजती है।

देर शाम घर लौटकर सब साथ-साथ बैठते, हंसते-बतियाते,

निमन्त्रण है तुम्हें, देखना घर की दीवारें भी गुनगुनाने लगती हैं।

बड़ी याद आती है शिमला तुम्हांरी
एक संस्मरण

*-*-*-*-*-*-*

आज जाने कौन-सी स्मृतियों में खींच कर ले गया मुझे मेरा मन। । शिमला का माल-रोड, वहां खड़ी फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ी, बर्फ से ढके दूर-दूर तक फैले चीड़-देवदार के वृक्ष। अनायास बिछी एक सफ़ेद चादर। कभी रूईं के फ़ाहों सी, कभी श्वेत रजत-सी, जैसे कहीं दूर से दौड़ती आती और सब कुछ ढककर चली जाती। धरा से आकाश तक। एक स्वर्गिक अनुभव जिसकी अभिव्यक्ति के लिए शब्द नहीं होते।

 शिमला में बर्फ़ क्या पड़ी] न जाने कौन-सी स्मृतियों में खींच कर ले गई मुझे। हरीतिमा को अद्भुत सौन्दर्य प्रदान करती एक श्वेत आभा।

शीत ऋतु से लड़ाई के लिए सब तैय्यार रहते थे।नवम्बर आरम्भ होते ही सर्दी की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। चार-पांच महीने का राशन, कोयला-लकड़ी भरवानी है, अंगीठियां तैयार रहें, रजाईयां और रजाईयां ही रजाईयां। परिवार में जितने सदस्‍य उतनी गर्म पानी की बोतलें, वह भी गिलाफ़ चढ़ाकर, कोट, मोटे स्वेटर, छाते, बरसाती यानी रेनकोट, टोपी, मफलर, स्कार्फ, दस्ताने, गर्म जुराबें, गमबूट और न जाने क्या क्या।

प्रायः दिसम्बर में बर्फ पड़ जाती थी किन्तु कभी किसी ने छुट्टी लेने का सोचा ही नहीं। तीन-तीन चार-चार फुट बर्फ में भी सभी प्रायः चार-पांच किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल, कालेज, कार्यालयों में पहुंचा करते थे। हर दफ्तर में स्टीम कोयले की अंगीठियां जला करती थीं जिन्हे महाम कहा जाता था। बाद में हीटर भी मिलने लगे। घरों में भी ऐसी ही अंगीठियां जलाते थे जिन पर साथ ही पानी भी गर्म हो सके। और पानी ! न जी न! पानी कहां। शून्य से नीचे के तापमान में पानी नलों में जम जाता था।  पानी की पाईप फ़ट जाती थीं। पानी भरकर रखना पड़ता था और  बर्तनों में भरकर रखे पानी में भी स्लेट जम जाती थी। सबसे आनन्द की बात तो यह होती थी कि न पानी आयेगा, न गर्म होगा न नहाना पड़ेगा।

 25  दिसम्बर से 28 फरवरी तक सर्दी की छुट्टियां। दिन-रात अंगीठियां जली रहतीं। सारा दिन या तो अंगीठियों को घेरकर कम्बल-रजाईयां लपेटे बैठे रहते, खूब खाते। दिन भर में 12-15 चाय तो आम बात होती और वह भी आज के शब्दों में लार्ज। और बस मूंगफली।  अथवा बिस्तरों में ही दुबके बैठे । आज सोचती हूं तो देखती हूं 8 सदस्यों के परिवार में 12-15 चाय अर्थात दिन-भर में 100 से अधिक चाय। काश! तब ठीक से सोचा होता तो परिवार से कोई तो प्रधानमंत्री बन सकता था। तभी तो दादी मां से कहती थी ‘’लाड़ी, पाणिये दी टांकिया बिच ही चीनी-पत्ती पाई देया कर, सारा दिन चाई दा  डबरू इ चढ़ी रहंदा।‘’ (बहू, पानी की टांकी में ही चीनी-पत्ती डाल दिया कर, सारा दिन चाय का पतीला चढ़ा रहता है।) और बस मूंगफली और गुड़-शक्कर। 

बर्फ को गिरते देखना, महसूस करना, हर बार एक  नया आनन्द और अनुभव होता। बर्फ को हाथों से छूते, गोले बनाते, बर्फ के बुत बनाते, खाते और घर के अन्दर लाकर बर्तनों में भी रख देते। आश्चर्य होता था कि कैसे एक-एक पत्ती, कण-कण ढक जाता, एक कोमल श्वेत आभा से। टेढ़ी टीन की छतों पर से बर्फ धीरे-धीरे फ़िसलती, मानों कोई शरारत कर रहा हो। और हम नीचे खड़े प्रतीक्षा करते कि अब गिरी और तब गिरी।  कभी धीरे-धीरे तो कभी धड़ाम से धमाका करती गिरती। ऐसे पलों की मानों हम प्रतीक्षा करते थे। जब बर्फ पिघलती, तो छत से टपकती बूंदों का स्वर आनन्दिन करता। तापमान शून्य से नीचे रहने पर छतों से टपकती बूंदे हवा में ही जमने लगतीं, और छतों से लटकती, लम्बी-लम्बी, मोटी पारदर्शी नलियाँ सुन्दर आकार ले लेंतीं, जिन्हें  हम  नलपियां कहते थे। उनका सौन्दर्य अद्भुत होता था। जब सूरज चमकता तो उनके भीतर से रंग-बिरंगी धाराएं दिखतीं। उन्हें तोड़-तोड़कर खाने का आनन्द लेते। वे इतनी सख्त और नुकीलीं होती थीं कि किसी को चुभ जाये अथवा मारी जाये तो गहरी चोट लग सकती थी।

और बर्फ में बनी कुल्फी ! जब रात को मौसम साफ होता था तो लोटे में चीनी मिश्रित गर्म दूध ढककर बर्फ में दबा देते थे और उसके चारों ओर नमक डाला जाता था। वाह ! क्या आनन्द था उस स्वाद का।

जब बर्फ गिरने लगती तो बाहर बरामदे में आकर बैठ जाते। मां चिल्लाती रह जाती, पर कौन सुनता। हाथों से छूते, गोले बनाते, बर्फ के बुत बनाते, खाते और घर के अन्दर लाकर बर्तनों में भी रख देते।

आज जब सब याद करती हूं तो देखती हूं कि कितनी भी समस्याएं होती थीं कभी समस्या लगी ही नहीं। बिजली नहीं, पानी नहीं, आवागमन का कोई साधन  नहीं, किन्तु कभी इस बारे में सोचते ही नहीं थे, बस आनन्द ही लेते थे। कैसा भी मौसम हो शाम को माल-रोड के तीन चक्कर तो लगाने ही हैं स्कैंडल-प्वाईंट से लेडीज़ पार्क तक। और हाथ में बालज़ीस की आईसक्रीम-कोण।

बड़ी याद आती है शिमला तुम्‍हारी ।।।

इस ऋतु के लिए तैय्यारियां तो पूरा वर्ष ही चली रहती थीं। स्वेटर, गर्म जुराबें ,दस्ताने , मफ़लर तो घर पर ही बुने जाते थे।  शिमला की महिलाएं इस बात के लिए बहुत प्रसिद्ध रही हैं कि उनके हाथ में सदैव उन-सिलाईयां रहती थीं। 

प्रायः दिसम्बर में बर्फ पड़ जाती थी किन्तु कभी किसी ने छुट्टी लेने का सोचा ही नहीं। और वैसे कभी छुट्टी लें भी लें, किन्‍तु बर्फ में तो जाना ही है। और यदि छुट्टी है तो पहली बर्फ़ का आनन्द लेने तो माल-रोड जाना ही होगा।  तीन-तीन चार-चार फुट बर्फ में भी सभी प्रायः चार-पांच यहां तक कि आठ-दस  किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल, कालेज, कार्यालयों में पहुंचा करते थे और वह भी समय से। उस समय वाहन की सुविधाएं न के बराबर थीं। हम शिमला में लोअर कैथू रहते थे, स्कूल था छोटा-शिमला में ,लगभग पांच किलोमीटर। पांच वर्ष से 17 वर्ष तक हज़ारों किलोमीटर सफ़र तो इसी रूट पर तय कर लिया होगा  आज सोचती हूं। बाद में कालेज, विश्‍वविद्यालय, बैंक। चढ़ाई-उतराई कुछ न महसूस होती। प्रतिदिन इतनी लम्बी यात्रा का भरपूर आनन्द उठाते थे। बर्फ गिरने के बाद जब दिन भर धूप रहती अथवा बादल, तो बर्फ़ पिघलने लगती। और यदि रात को मौसम साफ़ हो तो सड़कों पर पानी की अदृश्य स्लेटें जम जातीं। खूब फ़िसलन होती,  लोगों को गिरते देखने में बड़ा आनन्द आता था।

 

आज जब सब याद करती हूं तो देखती हूं कि कितनी भी समस्याएं होती थीं कभी समस्या लगी ही नहीं। बिजली नहीं, पानी नहीं, आवागमन का कोई साधन  नहीं,  किन्तु कभी इस बारे में सोचते ही नहीं थे, बस आनन्द ही लेते थे। कैसा भी मौसम हो शाम को माल-रोड के तीन चक्कर तो लगाने ही हैं स्कैंडल-प्वाईंट से लेडीज पार्क तक। और आकाश से गिरती बर्फ़ और  हाथ में बालजीस की आईसक्रीम-कोण।

बड़ी याद आती है शिमला तुम्हांरी ।।।

  

कदम रखना सम्भल कर

इन राहों पर कदम रखना सम्भल कर, फ़िसलन है बहुत

मन को कौन समझाये इधर-उधर तांक-झांक करे है बहुत

इस श्वेताभ नि:स्तब्धता के भीतर जीवन की चंचलता है

छूकर देखना, है तो शीतल, किन्तु जलन देता है बहुत

ऐसा अक्सर होता है
ऐसा अक्सर होता है जब हम रोते हैं जग हंसता है

ऐसा अक्सर होता है हम हंसते हैं जग ताने कसता है

न हमारी हंसी देख सकते हो न दुख में साथ होते हो

दुनिया की बातों में आकर मन यूँ ही फ़ँसता है।

 

 

कौन से रिश्ते अपने, कौन से पराये

हम रह-रहकर मरम्मत करवाते रहे

लोग टूटी छतें आजमाते रहे।

दरारों से झांकने में

ज़माने को बड़ा मज़ा आता है

मौका मिलते ही दीवारें तुड़वाते रहे।

छत  तक जाने के लिए

सीढ़ियां चिन दी

पर तरपाल डालने से कतराते रहे।

कब आयेगी बरसात, कब उड़ेंगी आंधियां

ज़िन्दगी कभी बताती नहीं है

हम यूं ही लोगों को समझाते रहे।

कौन से रिश्ते अपने, कौन से पराये

उलझते रहे हम यूं ही इन बातों में

पतंग के उलझे मांझे सुलझाते रहे

अपनी उंगलियां यूं ही कटवाते रहे।

निडर भाव रख

राही अपनी राहों पर चलते जाते

मंज़िल की आस लिए बढ़ते जाते

बाधाएँ तो आती हैं, आनी ही हैं

निडर भाव रख मन की करते जाते।

 

ये चिड़िया क्या स्कूल नहीं जाती

मां मुझको बतलाना

ये चिड़िया

क्या स्कूल नहीं जाती ?

सारा दिन  बैठी&बैठी,

दाना खाती, पानी पीती,

चीं-चीं करती शोर मचाती।

क्या इसकी टीचर

इसको नहीं डराती।

इसकी मम्मी कहां जाती ,

होमवर्क नहीं करवाती।

सारा दिन गाना गाती,

जब देखो तब उड़ती फिरती।

कब पढ़ती है,

कब लिखती है,

कब करती है पाठ याद

इसको क्यों नहीं कुछ भी कहती।

 

अपने आकर्षण से बाहर निकल

अपने आकर्षण से बाहर निकल।

देख ज़रा

प्रतिच्छाया धुंधलाने लगी है।

रंगों से आभा जाने लगी है।

नृत्य की गति सहमी हुई है

घुंघरूओं की थाप बहरी हुई है।

गति विश्रृंखलित हुई है।

मुद्रा तेरी थकी हुई है।

वन-कानन में खड़ी हुई है।

पीछे मुड़कर देख।

सच्चाईयों से मुंह न मोड़।

भेड़िए बहके हुए हैं।

चेहरों पर आवरण पहने हुए हैं।

पहचान कहीं खो गई है।

सम्हलकर कदम रख।

अपनी हिम्मत को परख।

सौन्दर्य में ही न उलझ।

झूठी प्रशंसाओं से निकल।

सामने वाले की सोच को परख।

तब अपनी मुद्रा में आ।

अस्त्र उठा या

नृत्य से दिल बहला।

 

जीवन की कहानियां बुलबुलों-सी नहीं होतीं

 कहते हैं

जीवन पानी का बुलबुला है।

किन्तु कभी लगा नहीं मुझे,

कि जीवन

कोई छोटी कहानी है,

बुलबुले-सी।

सागर की गहराई से भी

उठते हैं बुलबुले।

और खौलते पानी में भी

बनते हैं बुलबुले।

जीवन में गहराई

और जलन का अनुभव

अद्भुत है,

या तो डूबते हैं,

या जल-भुनकर रह जाते हैं।

जीवन की कहानियां

बुलबुलों-सी नहीं होतीं

बड़े गहरे होते हैं उनके निशान।

वैसे ही जैसे

किसी के पद-चिन्हों पर,

सारी दुनिया

चलना चाहती है।

और किसी के पद-चिन्ह

पानी के बुलबुले से

हवाओं में उड़ जाते हैं,

अनदेखे, अनजाने,

अनपहचाने।

 

कांटों से मुहब्बत हो गई

समय बदल गया हमें कांटों से मुहब्बत हो गई

रंग-बिरंगे फूलों से चाहत की बात पुरानी हो गई

कहां टिकते हैं अब फूलों के रंग और अदाएं यहां

सदाबहार हो गये अब कांटें, बस इतनी बात हो गई