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सपने अपने - अपने सपने

रेत के घर बनाने की एक कोशिश तो ज़रूर करना।

आकाश पर कसीदे काढ़ने की एक कोशिश तो ज़रूर करना।

जितनी चादर हो उतने पैर फैलाकर तो सभी सो लेते हैं,

आकाश पैरों पर थाम एक बार सोने की कोशिश ज़रूर करना।

 

बिना बड़े सपनों के जीता हूं

कंधों पर तुम्‍हारे भी

बोझ है मेरे भी।

तुम्‍हारा बोझ  

तुम्‍हारे कल के लिए है

एक डर के साथ ।

मेरा बोझ मेरे आज के लिए है

निडर।

तुम अपनों के, सपनों के

बोझ के तले जी रहे हो।

मैं नि:शंक।

डर का घेरा बुना है

तुम्‍हारे चारों ओर 

इस बोझ को सही से

न उठा पाये तो

कल क्‍या होगा।

कल, आज और कल

मैं नहीं जानता।

बस केवल

आज के लिए जीता हूं

अपनों के लिए जीता हूं।

नहीं जानता कौन ठीक है

कौन नहीं।

पर बिना बड़े सपनों के जीता हूं

इसलिए रोज़

आराम की नींद सोता हूं

मेरी वीणा के तारों में ऐसी झंकार

काल की रेखाओं में

सुप्त होकर रह गये थे

मेरे मन के भाव।

दूरियों ने

मन रिक्त कर दिया था

सिक्त कर दिया था

आहत भावनाओं ने।

बसन्त की गुलाबी हवाएँ

उन्मादित नहीं करतीं थीं

न सावन की घटाएँ

पुकारती थीं

न सुनाती थीं प्रेम कथाएँ।

कोई भाव

नहीं आता था मन में

मधुर-मधुर रिमझिम से।

अपने एकान्त में

नहीं सुनना चाहती थी मैं

कोई भी पुकार।

.

किन्तु अनायास

मन में कुछ राग बजे

आँखों में झिलमिल भाव खिले

हुई अंगुलियों में सरसराहट

हृदय प्रकम्पित हुआ,

सुर-साज सजे।

तो क्या

वह लौट आया मेरे जीवन में

जिसे भूल चुकी थी मैं

और कौन देता

मेरी वीणा के तारों में

ऐसी झंकार।

 

 

जिन्दगी का एक नया गीत

चलो

आज जिन्दगी का

एक नया गीत गुनगुनाएं।

न कोई बात हो

न हो कोई किस्सा

फिर भी अकारण ही मुस्कुराएं

ठहाके लगाएं।

न कोई लय हो न धुन

न करें सरगम की चिन्ता

ताल सब बिखर जायें।

कुछ बेसुरी सी लय लेकर

सारी धुनें बदल कर

कुछ बेसुरे से राग नये बनाएं।

अलंकारों को बेसुध कर

तान को बेसुरा गायें।

न कोई ताल हो न कोई सरगम

मंद्र से तार तक

हर सप्तक की धज्जियां उड़ाएं

तानों को खींच खींच कर

पुरज़ोर लड़ाएं

तारों की झंकार, ढोलक की थाप

तबले की धमक, घुंघुरूओं की छनक

बेवजह खनकाएं।

मीठे में नमकीन और नमकीन में

कुछ मीठा बनायें।

चाहने वालों को

ढेर सी मिर्ची खिलाएं।

दिन भर सोयें

और रात को सबको जगाएं।

पतंग के बहाने छत पर चढ़ जाएं

इधर-उधर कुछ पेंच लड़ाएं

कभी डोरी खींचे

तो कभी ढिलकाएं।

और, इस आंख का क्या करें

आप ही बताएं।

इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे

नीली चादर तान कर अम्बर देर तक सोया पाया गया

चंदा-तारे निर्भीक घूमते रहे,प्रकाश-तम कहीं आया-गया

प्रात हुई, भागे चंदा-तारे,रवि ने आहट की,तब उठ बैठा,

इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे, देखो तो, फिर मुस्काता पाया गया

सुना है अच्छे दिन आने वाले हैं

सुना है

किसी वंशी की धुन पर

सारा गोकुल

मुग्ध हुआ करता था

ग्वाल-बाल, राधा-गोपियां

नृत्य-मग्न हुआ करते थे।

वे

हवाओं से बहकने वाले

वंशी के सुर

आज लाठी पर अटक गये

जीवन की धूप में

स्वर बहक गये

नृत्य-संगीत की गति

ठहर-ठहर-सी गई

खिलखिलाती गति

कुछ रूकी-सी

मुस्कानों में बदल गई

दूर कहीं भविष्य

देखती हैं आंखें

सुना है

कुछ अच्छे दिन आने वाले हैं

क्यों इस आस में

बहकती हैं आंखें

 

 

किसी के मन न भाती है
पुस्तकों पर सिर रखकर नींद बहुत अच्छी आती है

सपनों में परीक्षा देती, परिणाम की चिन्ता जाती है

सब कहते हैं पढ़-पढ़ ले, जीवन में कुछ अच्छा कर ले

कुछ भी कर लें, बन लें, तो भी किसी के मन न भाती है

क्षणिक तृप्ति हेतु

घाट घाट का पानी पीकर पहुंचे हैं इस ठौर

राहों में रखते थे प्याउ, बीत गया वह दौर

नीर प्रवाह शुष्क पड़े, जल बिन तरसे प्राणी

क्षणिक तृप्ति हेतु कृत्रिम सज्जा का है दौर

मैं बहुत बातें करता हूं

मम्मी मुझको गुस्सा करतीं

पापा भी हैं डांट पिलाते

मैं बहुत बातें करता हूं

कहते-कहते हैं थक जाते

चिड़िया चीं-चीं-ची-चीं करती

कौआ कां-कां-कां-कां करता

टाॅमी दिन भर भौं-भौं करता

उनको क्यों नहीं कुछ भी कहते

 

 

कोयल और कौए दोनों की वाणी मीठी होती है

बड़ी मौसमी,

बड़ी मूडी होती है कोयल।

अपनी कूक सुनाने के लिए

एक मौसम की प्रतीक्षा में

छिपकर बैठी रहती है।

पत्तों के झुरमुट में,

डालियों के बीच।

दूर से आवाज़ देती है

आम के मौसम की प्रतीक्षा में,

बैठी रहती है, लालची सी।

कौन से गीत गाती है

मुझे आज तक समझ नहीं आये।

 

मुझे तो आनन्द देती है

कौए की कां कां भी।

आवाज़ लगाकर,

कितने अपनेपन से,

अधिकार से आ बैठता है

मुंडेर पर।

बिना किसी नाटक के

आराम से बैठकर

जो मिल जाये

खाकर चल देता है।

हर मौसम में

एक-सा भाव रखता है।

 

बस कुछ धारणाएं

बनाकर बैठ जाते हैं हम,

नहीं तो, बेचारे पंछी

तो सभी मधुर बोलते हैं,

मौसम की आहट तो

हमारे मन की है

फिर वह बसन्त हो

अथवा पतझड़।

 

अंदाज़ उनका

उलझा कर गया अंदाज़ उनका

बहका कर गया अंदाज़ उनका

अंधेरे में रोशनियाँ हैं चमक रही

पराया कर गया अंदाज़ उनका

कंधों पर सिर लिए घूमते हैं

इस रचना में पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग किया गया है, पर्यायवाची शब्दों में भी अर्थ भेद होता है, इसी अर्थ भेद के कारण मुहावरे बनते हैं, ऐसा मैं समझती हूं, इसी दृष्टि से इस रचना का सृजन हुआ है

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सुनते हैं

अक्ल घास चरने गई है

मति मारी गई है

और समझ भ्रष्ट हो गई है

विवेक-अविवेक का अन्तर

भूल गये हैं

और मनीषा, प्रज्ञा, मेधा 

हमारे ऋषि-मुनियों की

धरोहर हुआ करती थीं

जिन्हें हम सम्हाल नहीं पाये

अपनी धरोहर को।

 बुद्धि-विवेक कहीं राह में छूट गये

और हम

यूं ही

कंधों पर सिर लिए घूमते हैं।

 

 

न समझना हाथ चलते नहीं हैं

हाथों में मेंहदी लगी,

यह न समझना हाथ चलते नहीं हैं

केवल बेलन ही नहीं

छुरियां और कांटे भी

इन्हीं हाथों से सजते यहीं हैं

नमक-मिर्च लगाना भी आता है

और यदि किसी की दाल न गलती हो,

तो बड़ों-बड़ों की

दाल गलाना भी हमें आता है।

बिना गैस-तीली

आग लगाना भी हमें आता है।

अब आपसे क्या छुपाना

दिल तो बड़ों-बड़ों के जलाये हैं,

और  न जाने

कितने दिलजले तो  आज भी

आगे-पीछे घूम रहे हैं ,

और जलने वाले

आज भी जल रहे हैं।
तड़के की जैसी खुशबू हम रचते हैं,

बड़े-बड़े महारथी

हमारे आगे पानी भरते हैं।

मेंहदी तो इक बहाना है

आज घर का सारा काम

उनसे जो करवाना है।

 

 

जीवन चक्र तो चलता रहता है

जीवन चक्र तो चलता रहता है 

अच्छा लगा

तुम्हारा अभियान।

पहले

वंशी की मधुर धुन पर

नेह दिया,

सबको मोहित किया,

प्रेम का संदेश दिया।

.

उपरान्त

शंखनाद किया,

एक उद्घोष, आह्वान,

सत्य पर चलने का,

अन्याय का विरोध,

अपने अधिकारों के लिए

मर मिटने का,

चक्र थाम।

.

और एक संदेश,

जीवन-चक्र तो चलता रहता है,

तू अपना कर्म किये जा

फल तो मिलेगा ही।

 

 

चूड़ियां उतार दी मैंने

चूड़ियां उतार दी मैंने, सब कहते हैं पहनने वाली नारी अबला होती है

यह भी कि प्रदर्शन-सजावट के पीछे भागती नारी कहां सबला होती है

न जाने कितनी कहावतें, मुहावरे बुन दिये इस समाज ने हमारे लिये

सहज साज-श्रृंगार भी यहां न जाने क्यों बस उपहास की बात होती है

चूड़ी की हर खनक में अलग भाव होते हैं,कभी आंसू,  कभी  हास होते हैं

कभी न समझ सका कोई, यहां तो नारी की हर बात उपहास होती है

जलने-बुझने के बीच

न इस तरह जलाओ कि सिलसिला बन जाये।

न इस तरह बुझाओ कि राख ही नज़र जाये।

जलने-बुझने के बीच बहुत कुछ घट जाता है,

न इस तरह तम हटाओ कि आंख ही धुंधला जाये।

 

नहीं चाहते हम हमारी अमरता से कोई घटना घटे

कहीं नोट पर चित्र छपेगा, कहीं सड़क, पुल पर नाम होगा

कोई कहेगा अवकाश कीजिए, कहीं पुस्तकों में एक पाठ होगा

नहीं चाहते हम हमारी अमरता से कोई घटना घटे, दुर्घटना घटे

कहीं झण्डे उठेंगे,डण्डें भिड़ेगें, कहीं बन्द का आह्वान होगा

हिम्मत लेकर जायेगी शिखर तक

किसी के कदमों के छूटे निशान न कभी देखना

अपने कदम बढ़ाना अपनी राह आप ही देखना

शिखर तक पहुंचने के लिए बस चाहत ज़रूरी है

अपनी हिम्मत लेकर जायेगी शिखर तक देखना

पूछूं चांद से

अक्सर मन करता है

पूछूं चांद से

औरों से मिली रोशनी में

चमकने में

यूं कैसे दम भरता है।

मत गरूर कर

कि कोई पूजता है,

कोई गणनाएं करता है।

शायद इसीलिए

दाग लिये घूमता है,

इतना घटता-बढ़ता है,

कभी अमावस

तो कभी ग्रहण लगता है।

 

कल किसने देखा है

इस सूनेपन में

मन बहक गया।

धुंधलेपन में

मन भटक गया।

छोटी-सी रोशनी

मन चहक गया।

गहन, बीहड़ वन में

मन अटक गया।

आकर्षित करती हैं,

लहकी-लहकी-सी डालियां

बुला रहीं,

चल आ झूम ले।

दुनियादारी भूल ले।

कल किसने देखा है

आजा,

आज जी भर घूम ले।

ले जीवन का आनन्द

सपनों की सीढ़ी तानी

चलें गगन की ओर

लहराती बदरियां

सागर की लहरियां

चंदा की चांदनी

करती उच्छृंखल मन।

लरजती डालियों से

झांकती हैं रोशनियां

कहती हैं

ले जीवन का आनन्द।

 

मंजी दे जा मेरे भाई

भाई मेरे

मंजी दे जा।

बड़े काम की है यह मंजी।

 -

सर्दी के मौसम में,

प्रात होते ही

यह मंजी

धूप में जगह बना लेती है।

सारा दिन

धीरे-धीरे खिसकती रहती है

सूरज के साथ-साथ।

यहीं से

हमारे दिन की शुरूआत होती है,

और यहीं शाम ढलती है।

पूरा परिवार समा जाता है

इस मंजी पर।

कोई पायताने, कोई मुहाने,

कोई बाण पर, कोई तान पर,

कोई नवार पर,

एक-दूसरे की जगह छीनते।

बतंगड़बाजी करते ]

निकलता है पूरा दिन

इसी मंजी पर।

सुबह का नाश्ता

दोपहर की रोटी,

दिन की झपकी,

शाम की चाय,

स्वेटर की बुनाई,

रजाईयों की तरपाई,

कुछ बातचीत, कुछ चुगलाई,

पापड़-बड़ियों की बनाई,

मटर की छिलकाई,

साग की छंटाई,

बच्चों की पढ़ाई,

आस-पड़ोस की सुनवाई।

सब इसी मंजी पर।

-

भाई मेरे, मंजी दे जा।

दे जा मंजी मेरे भाई।

 

कवियों की पंगत लगी

  कवियों की पंगत लगी, बैठे करें विचार

तू मेरी वाह कर, मैं तेरी, ऐसे करें प्रचार

भीड़ मैं कर लूंगा, तू अनुदान जुटा प्यारे

रचना कैसी भी हो, सब चलती है यार