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मौत की दस्तक

कितनी

सरल-सहज लगती थी ज़िन्दगी।

खुली हवाओं में सांस लेते,

जैसी भी मिली है

जी रहे थे ज़िन्दगी।

कभी ठहरी-सी,

कभी मदमाती, हंसाती,

छूकर, मस्ती में बहती,

कभी रुलाती,

हवाओं संग

लहराती, गाती, मुस्काती।

.

पर इधर

सांसें थमने लगी हैं।

हवाओं की

कीमत लगने लगी है।

आज हवाओं ने

सांसों की कीमत बताई है।

जिन्दगी पर

पहरा बैठा दिया है हवाओं ने।

मौत की दस्तक सुनाने लगी हैं।

रुकती हैं सांसें, बिंधती हैं सांसें,

कीमत मांगती हैं सांसें।

अपनों की सांसें  चलाने के लिए

हवाओं से जूझ रहे हैं अपने।

.

शायद हम ही

बदलती हवाओं का रुख

पहचान नहीं पाये,

इसीलिए हवाएं

आज

हमारी परीक्षा ले रही हैं।

 

मेरा नाम श्रमिक है

कहते हैं

पैरों के नीचे

ज़मीन हो

और सिर पर छत

तो ज़िन्दगी

आसान हो जाती है।

किन्तु

जिनके पैरों के नीचे

छत हो

और सिर पर

खुला आसमान

उनका क्या !!!

 

 

 

 

घर की पूरी खुशियां बसती थी

आंगन में चूल्हा जलता था, आंगन में रोटी पकती थी,

आंगन में सब्ज़ी उगती थी, आंगन में बैठक होती थी

आंगन में कपड़े धुलते थे, आंगन में बर्तन मंजते थे

गज़ भर के आंगन में घर की पूरी खुशियां बसती थी

भाग-दौड़ में  बीतती ज़िन्दगी

 कभी अपने भी यहां क्यों अनजाने लगे

जीवन में अकारण बदलाव आने लगे

भाग-दौड़ में कैसे बीतती रही ज़िन्दगी

जी चाहता है अब तो ठहराव आने लगे

भीड़-तन्त्र

आज दो किस्से हुए।

एक भीड़-तन्त्र स्वतन्त्र हुआ।

मीनारों पर चढ़ा आदमी

आज मस्त हुआ।

28 वर्ष में घुटनों पर चलता बच्चा

युवा हो जाता है,

अपने निर्णय आप लेने वाला।

लेकिन उस भीड़-तन्त्र को

कैसे समझें हम

जो 28 वर्ष पहले दोषी करार दी गई थी।

और आज पता लगा

कितनी निर्दोष थी वह।

हम हतप्रभ से

अभी समझने की कोशिश कर ही रहे थे,

कि ज्ञात हुआ

किसी खेत में

एक मीनार और तोड़ दी

किसी भीड़-तन्त्र ने।

जो एक लाश बनकर लौटी

और आधी रात को जला दी गई।

किसी और भीड़-तन्त्र से बचने के लिए।

28 वर्ष और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

यह जानने के लिए

कि अपराधी कौन था,

भीड़-तन्त्र तो आते-जाते रहते हैं,

परिणाम कहां दे पाते हैं।

दूध की तरह उफ़नते हैं ,

और बह जाते हैं।

लेकिन  कभी-कभी

रौंद भी दिये जाते हैं।

 

इंसानियत के मीत

अपने भीतर झांककर इंसानियत को जीत

कर सके तो कर अपनी हैवानियत पर जीत

पूजा, अर्चना, आराधना का अर्थ है बस यही

कर ऐसे कर्म बनें सब इंसानियत के मीत

आपको चाहिए क्या पारिजात वृक्ष

कृष्ण के स्वर्ग पहुंचने से पूर्व

इन्द्र आये थे मेरे पास

इस आग्रह के साथ

कि स्वीकार कर लूं मैं

पारिजात वृक्ष, पुष्पित पल्लवित

जो मेरी सब कामनाएं पूर्ण करेगा।

स्वर्ग के लिए प्रस्थान करते समय

कृष्ण ने भी पूछा था मुझसे

किन्तु दोनों का ही

आग्रह अस्वीकार कर दिया था मैंने।

लौटा दिया था ससम्मान।

बात बड़ी नहीं, छोटी-सी है।

पारिजात आ जाएगा

तब जीवन रस ही चुक जायेगा।

सब भाव मिट जायेंगे,

शेष जीवन व्यर्थ हो जायेगा।

 

जब चाहत न होगी, आहत न होगी

न टूटेगा दिल, न कोई दिलासा देगा

न श्रम का स्वेद होगा

न मोतियों सी बूंदे दमकेंगी भाल पर

न सरस-विरस होगा

न लेन-देन की आशाएं-निराशाएं

न कोई उमंग-उल्लास

न कभी घटाएं तो न कभी बरसात

रूठना-मनाना, लेना-दिलाना

जब कभी तरसता है मन

तब आशाओं से सरस होता है मन

और जब पूरी होने लगती हैं आशाएं-आकांक्षाएं

तब

पारिजात पुष्पों के रस से भी अधिक

सरस-सरस होता है मन।

मगन-मगन होता है मन।

बस

बात बड़ी नहीं, छोटी-सी है।

चाहत बड़ी नहीं, छोटी-सी है।

गूंगी,बहरी, अंधी दुनिया

कान तो हम
पहले ही बन्द किये बैठे थे,
चलो आज आंख भी मूंद लेते हैं।
वैसे भी हमने अपने दिमाग से तो
कब का
काम लेना बन्द कर दिया है
और  दिल से सोचना-समझना।
हर बात के लिए
दूसरों की ओर  ताकते हैं।
दायित्वों से बचते हैं
एक ने कहा
तो किसी दूसरे से सुना।
किसी तीसरे ने देखा
और किसी चौथे ने दिखाया।
बस इतने से ही
अब हम
अपनी दुनिया चलाने लगे हैं।
अपने डर को
औरों के कंधों पर रखकर
बंहगी बनाने लगे हैं।
कोई हमें आईना न दिखाने लग जाये
इसलिए
काला चश्मा चढ़ा लिया है
जिससे दुनिया रंगीन दिखती है,
और हमारी आंखों में झांककर
कोई हमारी वास्तविकता
परख नहीं सकता।
या कहीं कान में कोई फूंक न मार दे
इसलिए “हैड फोन” लगा लिए हैं।
अब हम चैन की नींद सोते हैं,
नये ज़माने के गीत गुनगुनाते हैं।
हां , इतना ज़रूर है
कि सब बोल-सुन चुकें
तो जिसका पलड़ा भारी हो
उसकी ओर हम हाथ बढ़ा देते हैं।
और फिर चश्मा उतारकर
हैडफोन निकालकर
ज़माने के विरूद्ध
एक लम्बी तकरीर देते हैं
फिर एक लम्बी जम्हाई लेकर
फिर अपनी पुरानी

मुद्रा में आ जाते हैं।

भीड़ पर भीड़-तंत्र
एक लाठी के सहारे

चलते

छोटे कद के

एक आम आदमी ने

कभी बांध ली थी

सारी दुनिया

अपने पीछे

बिना पुकार के भी

उसके साथ

चले थे

लाखों -लाखों लोग

सम्मिलित थे

उसकी तपस्या में

निःस्वार्थ, निःशंक।

वह हमें दे गया

एक स्वर्णिम इतिहास।

 

आज वह न रहा

किन्तु

उसकी मूर्तियाँ

हैं  हमारे पास

लाखों-लाखों।

कुछ लोग भी हैं

उन मूर्तियों के साथ

किन्तु उसके

विचारों की भीड़

उससे छिटक कर

आज की भीड़ में

कहीं खो गई है।

दीवारों पर

अलंकृत पोस्टरों में

लटक रही है

पुस्तकों के भीतर कहीं

दब गई है।

आज

उस भीड़ पर

भीड़-तंत्र हावी हो गया है।

.

अरे हाँ !

आज उस मूर्ति पर

माल्यार्पण अवश्य करना।

 

सत्य को नकार कर

झूठ, छल-कपट से नहीं चलती है ज़िन्दगी

सत्य को नकार कर नहीं बढ़ती है ज़िन्दगी

क्यों घोलते हो विषबेल अकारण ही शब्दों की

तुम्हारे इस बुरे व्यवहार से टूटती है ज़िन्दगी

हिंदी दिवस की आवश्यकता क्यों

 

14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को संविधान में राष्ट््रभाषा के रूप में मान्यता दी गई और हम इस दिन हिन्दी दिवस मनाने लगे। क्यों मनाते हैं हम हिन्दी दिवस? हिन्दी के लिए क्या करते हैं हम इस दिन? कितना चिन्तन होता है इस दिन हिन्दी के बारे में। हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर सरकारी, गैर सरकारी हिन्दी संस्थाएं कितनी योजनाएं बनती हैं? अखिल भारतीय स्तर के हिन्दी संस्थान हिन्दी की स्थिति पर क्या चिन्तन करते हैं? क्या कभी इस बात पर किसी भी स्तर पर चिन्तन किया जाता है कि वर्तमान में हिन्दी की देश में स्थिति क्या है और भविष्य के लिए क्या योजना होना चाहिए? शिक्षा में हिन्दी का क्या स्तर है, क्या इस बात पर कभी चर्चा होती है?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर नहीं में हैं।

प्रत्येक कार्यालय में हिन्दी दिवस मनाया जाता है। भाषण-प्रतियोगिताएं, लेखन प्रतियोगिताएं, कवि-सम्मेलन, कुछ सम्मान और पुरस्कार, और अन्त में समोसा, चाय, गुलाबजामुन के साथ हिन्दी दिवस सम्पन्न।  तो इसलिए मनाते हैं हम हिन्दी दिवस।

नाम हिन्दी में लिख लिए, नामपट्ट हिन्दी में लगा लिए, जैसे छोटे-छोटे प्रचारात्मक प्रयासों से हिन्दी का क्या होगा?

हम चाहते हैं कि हिन्दी का प्रचार-प्रसार हो, हिन्दी शिक्षा का माध्यम बने, किन्तु क्या हम कोई प्रयास करते हैं? क्या आज तक किसी संस्था ने हिन्दी दिवस के दिन सरकार को कोई ज्ञापन दिया है कि हिन्दी को देश में किस तरह से लागू किया जाना चाहिए। हिन्दी संस्थानों का कार्य केवल हिन्दी की कुछ तथाकथित पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित करना, पुरस्कार बांटना और कुछ छात्रवृत्तियां देने तक ही सीमित है। हां, हिन्दी सरल होनी चाहिए, दूसरी भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में लिया जाना चाहिए, हिन्दी बोलचाल की भाषा बननी चाहिए, अंग्रेज़ी का विरोध किया जाना चाहिए, बस हमारी इतनी ही सोच है।

वर्तमान में भारतीय भाषा वैभिन्नय एवं वैश्विक स्तर से यदि देखें तो हिन्दी में] हिन्दी माध्यम में एवं प्रत्येक विधा, ज्ञान का अध्ययन असम्भव प्रायः है, यह बात हमें ईमानदारी से मान लेनी चाहिए। हिन्दी को अपना स्थान चाहिए न कि अन्य भाषाओं का विरोध।

आज हिन्दी वर्णमाला का कोई एक मानक रूप नहीं दिखाई देता। दसवीं कक्षा तक विवशता से हिन्दी पढ़ाई और पढ़ी जाती है। किन्तु यदि हिन्दी विषय को, भाषा, साहित्य, इतिहास को प्रत्येक स्तर पर अनिवार्य कर दिया जाये तब हिन्दी को सम्भवतः उसका स्थान मिल सकता है। उच्च शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर हिन्दी की एक परीक्षा, अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए, हिन्दी साहित्येतिहास, अनिवार्य कर दिया जाये, तब हिन्दी की स्थिति में सुधार आ सकता है।

आज हम बच्चों के लिए अपनी संस्कृति,परम्पराओं की बात करते हैं। यदि हम हिन्दी पढ़ते हैं तब हम अपनी संस्कृति, सभ्यता, प्राचीन साहित्य, कलाओं, परम्पराओं , सभी का अध्ययन कर सकते हैं। और इसके लिए एक बड़े अभियान की आवश्यकता है न कि हम यह सोच कर प्रसन्न हो लें कि अब तो फ़ेसबुक पर भी सब हिन्दी लिखते हैं।

अतः किसी एक दिन हिन्दी दिवस मनाने की आवश्यकता नहीं है, दीर्घकालीन योजना की आवश्यकता है।

औरत का गुणगान करें

चलो,

आज फिर

औरत का गुणगान करें।

चूल्हे पर

पकती रोटी का

रसपान करें।

कितनी सरल-सीधी

संस्कारी है ये औरत

घूँघट काढ़े बैठी है

आधुनिकता से परे

शील की चादर ओढ़े बैठी है।

लकड़ी का धुआँ

आँखों में चुभता है

मन में घुटता है।

पर तुमको

बहुत भाता है

संसार भर में

मेरी मासूमियत के

गीत गाता है।

आधुनिकता में जीता है

आधुनिकता का खाता है

पर समझ नहीं पाती

कि तुमको

मेरा यही रूप क्यों सुहाता है।

 

वरदान और श्राप

किसी युग में

वरदान और श्राप

साथ-साथ चलते थे।

वरदान की आशा में

भक्ति

और कठोर तपस्या करते थे

किन्तु सदैव

कोई भूल

कोई  चूक

ले डूबती थी

सब अच्छे कर्मों को

और वरदान से पहले

श्राप आ जाता था।

और कभी-कभी

इतनी बड़ी गठरी होती थी

भूल-चूक की

कि वरदान तक

बात पहुँच ही नहीं पाती थी

मानों कोई भारी

बैरीकेड लगा हो।

श्राप से वरदान टूटता था

और वरदान से श्राप,

काल की सीमा

अन्तहीन हुआ करती थी।

और एक खतरा

यह भी रहता था

कि पता नहीं कब वरदान

श्राप में परिवर्तित हो जाये

और श्राप वरदान में

और दोनों का घालमेल

समझ ही न आये।

-

बस

इसी डर से

मैं वरदान माँगने का

साहस ही नहीं करती

पता नहीं

भूल-चूक की

कितनी बड़ी गठरी खुल जाये

या श्राप की लम्बी सूची।

-

जो मिला है

उसमें जिये जा

मज़े की नींद लिए जा।

 

दो घूंट

छोड़ के देख

एक बार

बस एक बार

दो घूंट

छोड़ के देख

दो घूंट का लालच।

 

शाम ढले घर लौट

पर छोड़ के

दो घूंट का लालच।

फिर देख,

पहली बार देख

महकते हैं

तेरी बगिया में फूल।

 

पर एक बार

 

 

बस एक बार

छोड़ के देख

दो घूंट का लालच।

 

देख

फिर देख

जिन्दगी उदास है।

द्वार पर टिकी

एक मूरत।

निहारती है

सूनी सड़क।

रोज़

दो आंखें पीती हैं।

जिन्हें, देख नहीं पाता तू।

क्योंकि

पी के आता है

तू

दो घूंट।

डरते हैं,

रोते भी हैं

फूल।

और सहमकर

बेमौसम ही

मुरझा भी जाते हैं ये फूल।

कैसे जान पायेगा तू ये सब

पी के जो लौटता है

दो घूंट।

 

एक बार, बस एक बार

छोड़ के देख दो घूंट।

 

चेहरे पर उतर आयेगी

सुबह की सुहानी धूप।

बस उसी रोज़, बस उसी रोज़

जान पायेगा

कि महकते ही नहीं

चहकते भी हैं फूल।

 

जिन्दगी सुहानी है

हाथ की तेरे बात है

बस छोड़ दे, बस छोड़ दे

दो घूंट।

 

बस एक बार, छोड़ के देख

दो घूंट का लालच ।

सर्वगुण सम्पन्न कोई नहीं होता

जान लें हम सर्वगुण सम्पन्न तो यहां कोई नहीं होता

अच्छाई-बुराई सब साथ चले, मन यूं ही दुख में रोता

राम-रावण जीवन्त हैं यहां, किस-किस की बात करें

अन्तद्र्वन्द्व में जी रहे, नहीं जानते, कौन कहां सजग होता

मन के सच्चे
कानों के तो कच्चे हैं

लेकिन मन के सच्चे हैं

जो सुनते हैं कह देते हैं

मन में कुछ न रखे हैं।

शुष्कता को जीवन में रोपते  हैं

भावहीन मन,

उजड़े-बिखरे रिश्ते,

नेह के अभाव में

अर्थहीन जीवन,

किसी निर्जन वन-कानन में

अन्तिम सांसे गिन रहे

किसी सूखे वृक्ष-सा

टूटता है, बिखरता है।

बस

वृक्ष नहीं काटने,

वृक्ष नहीं काटने,

सोच-सोचकर हम

शुष्कता को जीवन में

रोपते रहते हैं।

रसहीन ठूंठ को पकड़े,

अपनी जड़ें छोड़ चुके,

दीमक लगी जड़ों को

न जाने किस आस में

सींचते रहते हैं।

 

समय कहता है,

पहचान कर

मृत और जीवन्त में।

नवजीवन के लिए

नवसंचार करना ही होगा।

रोपने होंगे  नये वृ़क्ष,

जैसे सूखे वृक्षों पर फल नहीं आते

पक्षी बसेरा नहीं बनाते

वैसे ही मृत आकांक्षाओं पर

जीवन नहीं चलता।

भावुक न बन।

 

 

 

बचपन-बचपन खेलें

हमने फ़ोन बनाया

न बिल आया

न हैंग हुआ।

न पैसे लगे

न टैंग हुआ।

न टूटे-फ़ूटे,

न सिग्नल की चिन्ता

न चार्ज किया।

न लड़ाई

न बहस-बसाई।

जब तक

चाहे बात करो

कोई न रोके

कोई न टोके।

हम भी लें लें

तुम भी ले लो

आओ आओ

बचपन-बचपन खेलें।

 

कहां किस आस में

सूर्य की परिक्रमा के साथ साथ ही परिक्रमा करता है सूर्यमुखी

अक्सर सोचती हूं रात्रि को कहां किस आस में रहता है सूर्यमुखी

सम्भव है सिसकता हो रात भर कहां चला जाता है मेरा हमसफ़र

शायद इसीलिए प्रात में अश्रुओं से नम सुप्त मिलता है सूर्यमुखी

जीवन में सदैव अमावस नहीं होता

जैसे इन्द्रधनुषी रंगों में स्याह रंग नहीं होता              

वैसे जीवन में सदैव अमावस ही नहीं होता
रिमझिम बूंदों को जब गुनगुनी धूप निखारती है
आशा के पुष्पों पर कभी तुषारापात नहीं होता। 

किरचों से नहीं संवरते मन और दर्पण

किरचों से नहीं संवरते मन और दर्पण 

कांच पर रंग लगा देने से

वह दर्पण बन जाता है।

इंसान मुखौटे ओढ़ लेता है,

सज्जन कहलाता हैं।

किरचों से नहीं संवरते

मन और दर्पण,

छोटी-छोटी खुशियां समेट लें,

जीवन संवर जाता है।

मन बहक-बहक जाये

इन फूलों को देखकर

अकारण ही मन मुस्काए।

न जाने

किस की याद आये।

तब, यहां

गुनगुनाती थी चिड़ियां।

तितलियां पास आकर पूछती थीं,

क्यों मन ही मन शरमाये।

उलझी-उलझी सी डालियां,

मानों गलबहियां डाले,

फूलों की ओट में छुप जायें।

हवाओं का रूख भी

अजीब हुआ करता था,

फूलों संग लाड़ करती

शरारती-सी

महक-महक जाये।

खिली-खिली-सी धूप,

बादलों संग करती अठखेलियां,

न जाने क्या कह जाये।

झरते फूलों को

अंजुरि में समेट

मन बहक-बहक जाये।

अपने आकर्षण से बाहर निकल

अपने आकर्षण से बाहर निकल।

देख ज़रा

प्रतिच्छाया धुंधलाने लगी है।

रंगों से आभा जाने लगी है।

नृत्य की गति सहमी हुई है

घुंघरूओं की थाप बहरी हुई है।

गति विश्रृंखलित हुई है।

मुद्रा तेरी थकी हुई है।

वन-कानन में खड़ी हुई है।

पीछे मुड़कर देख।

सच्चाईयों से मुंह न मोड़।

भेड़िए बहके हुए हैं।

चेहरों पर आवरण पहने हुए हैं।

पहचान कहीं खो गई है।

सम्हलकर कदम रख।

अपनी हिम्मत को परख।

सौन्दर्य में ही न उलझ।

झूठी प्रशंसाओं से निकल।

सामने वाले की सोच को परख।

तब अपनी मुद्रा में आ।

अस्त्र उठा या

नृत्य से दिल बहला।

 

विरोध के स्वर

आंख मूंद कर बैठे हैं, न सुनते हैं न गुनते हैं

सुनी-सुनाई बातों का ही पिष्ट पेषण करते हैं

दूर बैठै, नहीं जानते, कहां क्या घटा, क्यों घटा

विरोध के स्वर को आज हम देश-द्रोह मान बैठे हैं

घर की पूरी खुशियाँ

आंगन में चरखा चलता था

आंगन में मंजी बनती थी

पशु पलते थे आंगन में

आँगन  में कुँआ होता था

आँगन  में पानी भरते थे

आँगन  में चूल्हा जलता था

आँगन  में रोटी पकती थी

आँगन में सब्ज़ी उगती थी

आँगन में बैठक होती थी

आँगन में कपड़े धुलते थे

आँगन में बर्तन मंजते थे।

गज़ भर के आँगन  में

सब हिल-मिल रहते थे

घर की पूरी खुशियाँ

इस छोटे-से आँगन में बसती थीं

पूरी दुनिया रचती थीं।

छोड़ के देख घूंट

कभी शाम ढले घर लौट, पर छोड़ के लालच के दो घूंट

द्वार पर टिकी निहारती दो आंखें हर पल पीती हैं दो घूंट

डरते हैं, रोते भी हैं पर  महकते भी हैं तेरी बगिया में फूल।

जिन्दगी सुहानी है हाथ की तेरे बात है बस छोड़ के देख घूंट।

 

धन-दौलत जीवन का आधार
धन-दौलत पर दुनिया ठहरी, धन-दौलत से चलती है

जीवन का आधार है यह, सुच्ची रोटी इसी से बनती है

छल है, मोह-माया है, चाह नहीं, कहने की बातें हैं

नहीं हाथ की मैल है यह, श्रम से सबको फलती है।

पुरानी कथाओं से सीख नहीं लेते

 

पता नहीं

कब हम इन

कथा-कहानियों से

बाहर निकलेंगे।

पता नहीं

कब हम वर्तमान की

कड़वी सच्चाईयों से

अपना नाता जोड़ेंगे।

पुरानी कथा-कहानियों को

चबा-चबाकर,

चबा-चबाकर खाते हैं,

और आज की समस्याओं से

नाता तोड़ जाते हैं।

प्रभु से प्रेम की धार बहाईये,

किन्तु उनके मोह के साथ

मानवता का नाता भी जोड़िए।

पुस्तकों में दबी,

कहानियों को ढूंढ लेते हैं,

क्यों उनके बल पर

जाति और गरीबी की

बात उठाते हैं।

राम हों या कृष्ण

सबको  पूजिए,

पर उनके नाम से आज

बेमतलब की बातें मत जोड़िए।

उनकी कहानियों से

सीख नहीं लेते,

किसी के लिए कुछ

नया नहीं सोचते,

बस, चबा-चबाकर,

चबा-चबाकर,

आज की समस्याओं से

मुंह मोड़ जाते हैं।

नकारने के लिए अपने आप को ही

कमरे और बरामदे के बीच

दरवाज़ा और दहलीज

दरवाज़े आड़ हुआ करते हैं

और दहलीज सीमा।

आड़ यानी दरवाज़े

सुविधानुसार हटाये जा सकते हैं।

दहलीज स्थायी है।

नये मकानों में, सुविधा की दृष्टि से

दहलीज हटा दी गई है

और हम सीमा मुक्त हो गये हैं।

अब कमरे की सफ़ाई करते समय

यह ज़रूरी नहीं है

कि दरवाज़ा खोला ही जाये।

अब हर किसी ने

अपने अपने घर का

कूड़ा कचरा बाहर कर दिया है

दरवाज़ा बन्द रखकर ही।

जिससे किसी को पहचान न होने पाये।

और इस सफ़ाई अभियान के बाद

बाहर आकर, दरवाज़ों पर ताला जड़कर

अपने अपने घरों को कठघरों में बन्द करके

सब लोग बाहर आ गये हैं

कूड़े के ढेर पर

अपने अपने कूड़े को  नकारने के लिए।

या फिर

नकारने के लिए

अपने आप को ही।

 

सबको बहकाते

पुष्प निःस्वार्थ भाव से नित बागों को महकाते

पंछी को देखो नित नये राग हमें मधुर सुनाते

चंदा-सूरज दिग्-दिगन्त रोशन करते हर पल

हम ही क्यों छल-कपट में उलझे सबको बहकाते