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साथ समय के चलना होगा

तुमको क्यों ईर्ष्या होती है मैंने भी आई-फोन लिया है
साथ समय के चलना होगा इतना मैंने समझ लिया है।
चिट्ठियां-विट्ठियां पीछे छूटीं, इतना ज्ञान मिला है मुझको,
-मेल, फेसबुक, ट्विटर सब कुछ मैंने खोल लिया है।

मैंने तो बस यूं बात की

न मिलन की आस की , न विरह की बात की

जब भी मिले बस यूं ही ज़रा-सी बात ही बात की

ये अच्‍छा रहा, न चिन्‍ता बनी, न मन रमा कहीं

कुछ और न समझ लेना मैंने तो बस यूं बात की

मन के भाव देख प्रेयसी

रंग रूप की ऐसी तैसी

मन के भाव देख प्रेयसी

लीपा-पोती जितनी कर ले

दर्पण बोले दिखती कैसी

लौट गये वे भटके-भटके

जिनको समझी थी मैं भूले-भटके, वे सब निकले हटके-हटके
ज्ञान-ध्यान वे बांट रहे थे, हम अज्ञानी रह गये अटके-अटके
पोथी बांची, कथा सुनाई, फिर दान-धर्म की बात समझाई
हमने भी अपनी कविता कह डाली, लौट गये वे भटके-भटके

जीवन आशा प्रत्याशा या निराशा

 

हमारे बड़े-बुज़ुर्ग

सुनाया करते थे कहानियां,

चेचक, हैज़ा,

मलेरिया, डायरिया की,

जब महामारी फैलती थी,

तो सैंकड़ों नहीं

हज़ारों प्राण लेकर जाती थी।

गांव-गांव, शहर-शहर

लील जाती थी।

सूने हो जाते थे घर।

संक्रामक माना जाता था

इन रोगों को,

अलग कोठरी में

डाल दिया जाता था रोगी को,

और वहीं मर जाता था,

या कभी भाग्य अच्छा रहे,

तो बच भी जाया करता था।

और एक समय बाद

सन्नाटे को चीरता,

आप ही गायब हो जाता था रोग।

देसी दवाएं, हकीम, वैद्य

घरेलू काढ़े, हवन-पूजा,

बस यही थे रोग प्रतिरोधक उपाय।

 

और आज,

क्या वही दिन लौट आये हैं?

किसी और नाम से।

विज्ञान के चरम पर बैठे,

पर फिर भी हम बेबस,

हाथ बांधे।

उपाय तो बस दूरियां हैं

अपनों से अपनी मज़बूरियां हैं।

काल काल बनकर खड़ा है,

उपाय न कोई बड़ा है।

रोगी को अलग कर,

हाथ बांधे बस प्रतीक्षा में

बचेगा या पता नहीं मरेगा।

 

निर्मम, निर्मोही

 जीवन-आशा,

जीवन-प्रत्याशा

या जीवन-निराशा ?

जल-विभाग इन्द्र जी के पास

मेरी जानकारी के अनुसार

जल-विभाग

इन्द्र जी के पास है।

कभी प्रयास किया था उन्होंने

गोवर्धन को डुबाने का

किन्तु विफ़ल रहे थे।

उस युग में

कृष्ण जी थे

जिन्होंने

अपनी कनिष्का पर

गोवर्धन धारण कर

बचा लिया था

पूरे समाज को।

.

किन्तु इन्द्र जी,

इस काल में कोई नहीं

जो अपनी अंगुली दे

समाज हित में।

.

इसलिए

आप ही से

निवेदन है,

अपने विभाग को

ज़रा व्यवस्थित कीजिए

काल और स्थान देखकर

जल की आपूर्ति कीजिए,

घटाओं पर नियन्त्रण कीजिए

कहीं अति-वृष्टि

कहीं शुष्कता को

संयमित कीजिए

न हो कहीं कमी

न ज़्यादती,

नदियाँ सदानीरा

और धरा शस्यश्यामला बने,

अपने विभाग को

ज़रा व्यवस्थित कीजिए।

 

 

ज़िन्दगी लगती बेमानी है

जन्म की अजब कहानी है, मरण से जुड़ी रवानी है।

श्मशान घाट में जगह नहीं, खो चुके ज़िन्दगानी हैं।

पंक्तियों में लगे शवों का टोकन से होगा संस्कार,

फ़ुटपाथ पर लगी पंक्तियां, ज़िन्दगी लगती बेमानी है।

कुछ सपने कुछ सच्चे कुछ झूठे

कागज़ की नाव में

जितने सपने थे

सब अपने थे।

छोटे-छोटे थे, पर मन के थे

न डूबने की चिन्ता

न सपनों के टूटने की चिन्ता।

तिरती थी, पलटती थी

टूट-फूट जाती थी, भंवर में अटकती थी।

रूक-रूक जाती थी।

एक जाती थी, एक और आ जाती थी।

पर सपने तो सपने थे,

सब अपने थे।

न टूटते थे न फूटते थे

जीवन की लय यूं ही बहती जाती थी

फिर एक दिन हम बड़े हो गये

सपने भारी-भारी हो गये

अपने ही नहीं, सबके हो गये

पता ही नहीं लगा

वह कागज़ की नाव कहां खो गई

कभी अनायास यूं ही

याद आ जाती है,

तो ढूंढने निकल पड़ते हैं

किन्तु भारी सपने कहां

पीछा छोड़ते हैं,

सपने सिर पर लादे घूम रहे हैं

अब नाव नहीं बनती।

मेरी कागज़ की नाव

न जाने कहां खो गई,

मिल जाये तो लौटा देना

 

मानसिकता कहां बदली है

मांग भर कर रखना बेटी, सास ससुर की सब सहना बेटी
शिक्षा, स्वाबलम्बन भूलकर बस चक्की चूल्हा देखना बेटी
इस घर से डोली उठे, उस घर से अर्थी, मुड़कर न देखना कभी
कहने को इक्कीसवीं सदी है, पर मानसिकता कहां बदली है बेटी

जो मिला बस उसे संवार

कहते हैं जीवन छोटा है, कठिनाईयां भी हैं और दुश्वारियां भी

किसका संग मिला, कौन साथ चला, किसने निभाई यारियां भी

आते-जाते सब हैं, पर यादों में तो कुछ ही लोग बसा करते हैं

जो मिला बस उसे संवार, फिर देख जीवन में हैं किलकारियां भी

बड़ा मुश्किल है  Very Difficult
बड़ा मुश्किल है नाम कमाना

मेहनत का फल किसने जाना

बाधाएँ आती हैं आनी ही हैं

किसने राहें रोकी, भूल जाना

डर ज़िन्दगी से नहीं लगता

डर ज़िन्दगी से नहीं लगता

ज़िन्दगी जीने के

तरीके से लगता है।

 

एहसास मिटने लगे हैं

रिश्ते बिखरने लगे हैं

कौन अपना,

कौन पराया,

समझ से बाहर होने लगे हैं।

सड़कों पर खून बहता है

हाथ फिर भी साफ़ दिखने लगे हैं।

कहने को हम हाथ जोड़ते हैं,

पर कहां खुलते हैं,

कहां बांटते हैं,

कहां हाथ साफ़ करते हैं,

अनजाने से रहने लगे हैं।

क्या खोया , क्या पाया

इसी असमंजस में रहने लगे हैं।

पत्थरों को चिनने के लिए

अरबों-खरबों लुटाने के लिए

तैयार बैठे हैं,

पर भीतर जाने से कतराने लगे हैं।

पिछले रास्ते से प्रवेश कर,

ईश्वर में आस्था जताने लगे हैं।

प्रसाद की भी

कीमत लगती है आजकल

हम तो, यूं ही

आपका स्वाद

कड़वा करने में लगे हैं।

शायद यही जीवन है

इन राहों पर

खतरनाक अंधे मोड़

होते हैं

जो दिखते तो नहीं

बस अनुभव की बात होती है

कि आप जान जायें

पहचान जायें

इन अंधों मोड़ों को

नहीं जान पाते

नहीं देख पाते

नहीं समझ पाते

कि उस पार से आने वाला

जीवन लेकर आ रहा है

या मौत।

इधर ऊँचे खड़े पहाड़

कभी  छत्रछाया-से लगते हैं

और कभी दरकते-खिसकते

जीवन लीलते।

उधर गहरी खाईयां डराती हैं

मोड़ों पर।

.

फिर

बादलों के घेरे

बरसती बूंदें

अनुपम, अद्भुत,

अनुभूत सौन्दर्य में

उलझता है मन।

.

शायद यही जीवन है। 

 

जीवन महकता है

जीवन महकता है

गुलाब-सा

जब मनमीत मिलता है

अपने ख्वाब-सा

रंग भरे

महकते फूल

जीवन में आस देते हैं

एक विश्वास देते हैं

अपनेपन का आभास देते हैं।

सूखेंगे कभी ज़रूर

सूखने देना।

पत्ती –पत्ती सहेजना

यादों की, वादों की

मधुर-मधुर भावों से

जीवन-भर यूं ही मन हेलना ।

 

रिश्ते ऑनलाइन या ऑफलाइन

क्या ऑनलाइन रिश्ते ऑफलाइन रिश्तों पर हावी हो रहे हैं

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मेरी दृष्टि में ऑनलाइन रिश्ते ऑफलाइन रिश्तों पर हावी नहीं हो रहे हैंए दोनों का आज हमारे जीवन में अपना.अपना महत्व है। हर रिश्ते को साधकर रखना हमें आना चाहिएए फिर वह ऑनलाइन हो अथवा ऑफलाइन ।

वास्तव में ऑनलाइन रिश्तों ने हमारे जीवन को एक नई दिशा दी है जो कहीं भी ऑफलाइन रिश्तों पर हावी नहीं है।

अब वास्तविकता देखें तो ऑफलाइन रिश्ते रिश्तों में बंधे होते हैंए कुछ समस्याएंए कुछ विवशताएंए कुछ औपचारिकताएं, कुछ गांठें। यहां हर रिश्ते की सीमाएं हैंए बन्धन हैंए लेनदारीए देनदारी हैए आयु.वर्ग के अनुसार मान.सम्मान हैए जो बहुत बार इच्छा न होते हुए भीए मन न होते हुए भी निभानी पड़ती हैं। और कुछ स्वार्थ भी हैं। यहां हर रिश्ते की अपनी मर्यादा हैए जिसे हमें निभाना ही पड़ता है। ऐसा बहुत कम होता है कि ये रिश्ते बंधे रिश्तों से हटकर मैत्री.भाव बनते हों।

जीवन में कोई तो एक समय आता है जब हमारे पास अपने नहीं रहते, एक अकेलापन, नैराश्य घेर लेता है। और जो हैं, कितने भी अपने हों, हम उनसे मन की बात नहीं बांट पाते। यह सब मानते हैं कि हम मित्रों से जो बात कह सकते हैं बहुत बार बिल्कुल अपनों से भी शेयर नहीं कर पाते। ऐसा ही रिश्ता कभी-कभी कहीं दूर बैठे अनजाने रिश्तों में मिल जाता है। और वह मिलता है ऑनलाईन रिश्ते में।

किन्तु ऑनलाइन रिश्तों में कोई किसी भी प्रकार का बन्धन नहीं है। एक नयापन प्रतीत होता हैए एक सुलझापनए जहां मित्रता में आयुए वर्ग का बन्धन नहीं होता। बहुत बार हम समस्याओं से घिरे जो बात अपनों से नहीं कर पातेए इस रिश्ते में बात करके सुलझा लेते हैं। एक डर नहीं होता कि मेरी कही बात सार्वजनिक हो जायेगी।

हांए इतना अवश्य है कि रिश्ते चाहे ऑनलाइन हों अथवा ऑफलाइनए सीमाएं दोनों में हैंए अतिक्रमण दोनों में ही नहीं होना चाहिए।

  

दोराहों- चौराहों  को सुलझाने बैठी हूं

छोटे-छोटे कदमों से

जब चलना शुरू किया,

राहें उन्मुक्त हुईं।

ज़िन्दगी कभी ठहरी-सी

कभी भागती महसूस हुई।

अनगिन सपने थे,

कुछ अपने थे,

कुछ बस सपने थे।

हर सपना सच्चा लगता था।

हर सपना अच्छा लगता था।

मन की भटकन थी

राहों में अटकन थी।

हर दोराहे पर, हर चौराहे पर,

घूम-घूमकर जाते।

लौट-लौटकर आते।

जीवन में कहीं खो जाते।

समझ में ही थी तकरार

दुविधा रही अपार।

सब पाने की चाहत थी,

पर भटके कदमों की आहट थी।

क्या पाया, क्या खोया,

कभी कुछ समझ न आया।

अब भी दोराहों- चौराहों  को

सुलझाने बैठी हूं,

न जाने क्यों ,

अब तक इस में उलझी बैठी हूं।

जब चाहिए वरदान तब शीश नवाएं

जब-जब चाहिए वरदान तब तब करते पूजा का विधान

दुर्गा, चण्डी, गौरी सबके आगे शीश नवाएं करते सम्मान

पर्व बीते, भूले अब सब, उठ गई चौकी, चल अब चौके में

तुलसी जी कह गये,नारी ताड़न की अधिकारी यह ले मान।।

ज़िन्दगी बहुत झूले झुलाती है

ज़िन्दगी बहुत झूले झुलाती है

कभी आगे,कभी पीछे ले जाती है

जोश में कभी ज़्यादा उंचाई ले लें

तो सीधे धराशायी भी कर जाती है

काहे तू इठलाय

 

हाथों में कमान थाम, नयनों से तू तीर चलाय।

हिरणी-सी आंखें तेरी, बिन्दिया तेरी मन भाय।

प्रत्यंचा खींच, देखती इधर है, निशाना किधर है,

नाटक कंपनी की पोशाक पहन काहे तू इठलाय।

मन में विषधर पाले

विषधर तो है !

लेकिन देखना होगा,

विष कहां है?

आजकल लोग

परिपक्व हो गये हैं,

विष निकाल लिया जाता है,

और इंसान के मुख में

संग्रहीत होता है।

तुम यह समझकर

नाग को मारना,

कुचलना चाहते हो,

कि यही है विषधर

जो तुम्हें काट सकता है।

अब न तो

नाग पकड़ने वाले रह गये,

कि नाग का नृत्य दिखाएंगे,

न नाग पंचमी पर

दुग्ध-दहीं से अभिषेक करने वाले।

मन में विषधर पाले

ढूंढ लो चाहे कितने,

मिल जायेंगे चाहने वाले।

स्थायी समाधान की बात मत करना
हर रोज़ नहीं करते हम

चिन्ता किसी भी समस्या की,

जब तक विकराल न हो जाये।

बात तो करते हैं

किन्तु समाधान ढूँढना

हमारा काम नहीं है।

हाँ, नौटंकी हम खूब

करना जानते हैं।

खूब चिन्ताएँ परोसते हैं

नारे बनाते हैं

बातें बनाते हैं।

ग्रीष्म ऋतु में ही

हमें याद आता है

जल संरक्षण

शीत ऋतु में आप

स्वतन्त्र हैं

बर्बादी के लिए।

जल की ही क्यों,

समस्या हो पर्यावरण की

वृक्षारोपण की बात हो

अथवा वृक्षों को बचाने की

या हो बात

पशु-पक्षियों के हित की

याद आ जाती है

कभी-कभी,

खाना डालिए, पानी रखिए,

बातें बनाईये

और कोई नई समस्या ढूँढिये

चर्चा के लिए।

बस

स्थायी समाधान की बात मत करना।

 

आशाओं की चमक

मन के गलियारों में रोशनी भी है और अंधेरा भी
कुछ आवाज़ें रात की हैं और कुछ दिखाती सवेरा भी
कभी सूरज चमकता है और कभी लगता है ग्रहण
आशाओं की चमक से टूटता है निराशाओं का घेरा भी

अभिनन्दन करते मातृभूमि का

 

वन्दन करते, अभिनन्दन करते मातृभूमि का जिस पर हमने जन्म लिया

लोकतन्त्र देता अधिकार असीमित, क्या कर्त्तव्यों की ओर कभी ध्यान दिया

देशभक्ति के नारों से, कुछ गीतों, कुछ व्याखानों से, जय-जय-जयकारों से ,

पूछती हूं स्वयं से, इससे हटकर देशहित में और कौन-कौन-सा कर्म किया

तुमसे ही करते हैं तुम्हारी शिकायत

क्षणिक आवेश में कुछ भी कह देते हैं

शब्द तुम्हारे लौटते नहीं, सह लेते हैं

तुमसे ही करते हैं तुम्हारी शिकायत

इस मूर्खता को आप क्या कहते हैं

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

इधर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

अभियान ज़ोरों पर है।

विज्ञापनों में भरपूर छाया है

जिसे देखो वही आगे आया है।

भ्रूण हत्याओं के विरूद्ध नारे लग रहे हैं

लोग इस हेतु

घरों से निकलकर सड़कों पर आ रहे हैं,

मोमबत्तियां जला रहे हैं।

लेकिन क्या सच में ही

बदली है हमारी मानसिकता !

प्रत्येक नवजात के चेहरे पर

बालक की ही छवि दिखाई देती है

बालिका तो कहीं

दूर दूर तक नज़र नहीं आती है।

इस चित्र में एक मासूम की यह छवि

किसी की दृष्टि में चमकता सितारा है

तो कहीं मसीहा और जग का तारणहार।

कहीं आंखों का तारा है तो कहीं राजदुलारा।

एक साधारण बालिका की चाह तो

हमने कब की त्याग दी है

अब हम लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा

की भी बात नहीं करते।

कभी लक्ष्मीबाई की चर्चा हुआ करती थी

अब तो हम उसको भी याद नहीं करते।

पी. टी. उषा, मैरी काम, सान्या, बिछेन्द्री पाल

को तो हम जानते ही नहीं

कि कहें

कि ईश्वर इन जैसी संतान देना।

कोई उपमाएं, प्रतीक नहीं हैं हमारे पास

अपनी बेटियों के जन्म की खुशी मनाने के लिए।

शायद आपको लग रहा होगा

मैं विषय-भ्रम में हूं।

जी नहीं,

इस नवजात को मैं भी देख रही हूं

एक चमकते सितारे की तरह

रोशनी से भरपूर।

किन्तु मैं यह नहीं समझ पा रही हूं

कि इस चित्र में सबको

एक नवजात बालक की ही प्रतीति

क्यों है

बालिका की क्यों नहीं।

ऐसा नहीं होता मेरे मालिक

 

कर्म न करना,

परिश्रम न करना,

धर्म न निभाना

बस राम-नाम जपना।

.

आंखें बन्द कर लेने से

बिल्ली नहीं भाग जाती।

राम-नाम जपने से

समस्या हल नहीं हो जाती।

.

कुछ चरित्र हमें राह दिखाते हैं।

सन्मार्ग पर चलाते हैं।

किन्तु उनका नाम लेकर

हाथ पर हाथ धरे

बैठने को नहीं कहते हैं।

.

बुद्धि दी, समझ दी,

दी हमें निर्माण-विध्वंस की शक्ति।

दुरुपयोग-सदुपयोग हमारे हाथ में था।

.

भूलें करें हम,

उलट-पुलट करें हम,

और जब हाथ से बाहर की बात हो,

तो हे राम ! हे राम!

.

ऐसा नहीं होता मेरे मालिक।

हमारी राहें ये संवारते हैं

यह उन लोगों का

स्वच्छता अभियान है

जो नहीं जानते

कि राजनीति क्या है

क्या है नारे

कहां हैं पोस्टर

जहां उनकी तस्वीर नहीं छपती

छपती है उन लोगों की छवि

जिनकी

छवि ही नहीं होती

कुछ सफ़ेदपोश

साफ़ सड़कों पर

साफ़ झाड़ू लगाते देखे जाते रहे

और ये लोग उनका मैला ढोते रहे।

प्रकृति भी इनकी परीक्षा लेती है,

तरू अरू पल्लव झरते हैं

एक नये की आस में

हम आगे बढ़ते हैं

हमारी राहें ये

संवारते हैं

और हम इन्हीं को नकारते हैं।

बिखरती है ज़िन्दगी

अपनों के बीच

निकलती है ज़िन्दगी,

न जाने कैसे-कैसे

बिखरती है ज़िन्दगी।

बहुत बार रोता है मन

कहने को कहता है मन।

किससे कहें

कैसे कहें

कौन समझेगा यहां

अपनों के बीच

जब बीतती है ज़िन्दगी।

शब्दों को शब्द नहीं दे पाते

आंखों से आंसू नहीं बहते

किसी को समझा नहीं पाते।

लेकिन

जीवन के कुछ

अनमोल संयोग भी होते हैं

जब बिन बोले ही

मन की बातों को

कुछ गैर समझ लेते हैं

सान्त्वना के वे पल

जीवन को

मधुर-मधुर भाव दे जाते हैं।

अपनों से बढ़कर

अपनापन दे जाते हैं।

 

सुन्दर है संसार

जीवन में

बहुत कुछ अच्छा मिलता है,

तो बुरा भी।

आह्लादकारी पल मिलते हैं,

तो कष्टों को भी झेलना पड़ता है।

सफ़लता आंगन में

कुलांचे भरती है,

तो कभी असफ़लताएं

देहरी के भीतर पसरी रहती हैं।

छल और प्रेम

दोनों जीवन साथी हैं।

कभी मन में

डर-डर कर जीता है,

तो कभी साहस की सीढ़ियां

हिमालय लांघ जाती हैं।

जीवन में खट्टा-मीठा सब मिलता है,

बस चुनना पड़ता है।

और प्रकृति के अद्भुत रूप तो

पल-पल जीने का

संदेश दे जाते हैं,

बस समझने पड़ते हैं।

एक सौन्दर्य

हमारे भीतर है,

एक सौन्दर्य बाहर।

दोनों को एक साथ जीने में

सुन्दर है संसार।

कामना मेरी

और सुन्दर हो संसार।

 

 

आई दुल्हन

 

पायल पहले रूनझुन करती आई दुल्हन।

कंगन बजते, हार खनकते, आई दुल्हन।

श्रृंगार किये, सबके मन में रस बरसाती]

घर में खुशियों के रंग बिखेरे आई दुल्हन।