मौसम की आहट

कुहासे की चादर ओढ़े आज सूरज देर तक सोया रहा

ढूंढती फिर रही उसे न जाने अब तक कहां खोया रहा

दे रोशनी, जीवन की आस दे, दिन का भास दे, उजास दे

आवाज़ दी मैंने उसे, उठ ज़रा अब, रात भर सोया रहा

एक पंथ दो काज

आजकल ज़िन्दगी

न जाने क्यों

मुहावरों के आस-पास

घूमने लगी है

न तो एक पंथ मिलता है

न ही दो काज हो पाते हैं।

विचारों में भटकाव है

जीवन में टकराव है

राहें चौराहे बन रही हैं

काज कितने हैं

कहाँ सूची बना पाते हैं

कब चयन कर पाते हैं

चौराहों पर खड़े ताकते हैं

काज की सूची

लम्बी होती जाती है

राहें बिखरने लगती हैं।

जो राह हम चुनते हैं

रातों-रात वहां

नई इमारतें खड़ी हो जाती हैं

दोराहे

और न जाने कितने चौराहे

खिंच जाते हैं

और हम जीवन-भर

ऊपर और नीचे

घूमते रह जाते हैं।

 

 

असमंजस में नई पीढ़ी

आज हमारी पीढ़ी तीन कालखण्डों में जी रही है।

एक वह जो हमारे पूर्वज हमें सौंप गये। दूसरा हमारा स्वयं का विकसित वर्तमान और  तीसरा हमारी भावी पीढ़ी  जिसमें हम अपना भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों खोजते हैं।

वर्तमान समाज की सबसे कठिन समस्या है इन तीनों के मध्य सामंजस्य बिठाना। अतीत हमें छोड़ता नहीं, वर्तमान हमारी आवश्यकता है। और  भविष्य हमें अपने हाथ से निकलता दिखाई दे रहा है।

एक असमंजस की स्थिति है। धर्म, परम्परा, संस्कृति, रीति रिवाज़, संस्कार, व्यवहार, जो हमें पूर्वजों से मिले हैं उनकी गठरी अपनी पीठ पर बांधे हम विवश से घूम रहे हैं। न ढोने की स्थिति में हैं और  न परित्याग कर सकते हैं क्योंकि हमारी कथनी और  करनी में अन्तर है। हम उस गठरी का परित्याग करना तो चाहते हैं किन्तु समाज से डरते हैं। और  इस चिन्ता में भी रहते हैं कि इसमें न जाने कब कुछ काम का मिल जाये। अपनी आवश्यकतानुसार, सुविधानुसार उसमें कांट छांट कर लेते हैं। अपनी जीवन शैली को सरल सहज, सुविधाजनक बनाने के लिए कुछ जोड़ लेते हैं कुछ छोड़ देते हैं। और  जो मनभावन प्रतीत नहीं होता उसे तिरोहित कर देते हैं। उनका गुणगान तो करते हैं किन्तु निभा नहीं पाते।

इसका दुष्परिणाम हमारी भावी पीढ़ी भुगत रही है। हमने अपनी पीठ की गठरी के साथ साथ अपने समय की भी एक गठरी भी तैयार कर ली है और  हम चाहते हैं कि हमारी भावी पीढ़ी अपनी नवीन जीवन शैली के साथ इन दोनों के बीच संतुलन एवं सामंजस्य स्थापित करे। उसका अपना एक नवीन, आधुनिक, विकसित, वैज्ञानिक समाज है जहां हमने स्वयं उसे भेजा है। किन्तु उसे हम स्वतन्त्रतापूर्वक आगे बढ़ने नहीं दे रहे, अपनी तीनों गठरियों का बोझ उनके कंधे पर लाद कर चले हैं।

  

बेटी दिवस पर एक रचना

 

बेटियों के बस्तों में

किताबों के साथ

रख दी जाती हैं कुछ सतर्कताएं,

कुछ वर्जनाएं,

कुछ आदेश, और कुछ संदेश।

डर, चिन्ता, असुरक्षा की भावना,

जिन्हें

पैदा होते ही पिला देते हैं

हम उन्हें

घुट्टी की तरह।

बस यहीं नहीं रूकते हम।

और बोझा भरते हैं हम,

परम्पराओं, रीति-रिवाज़

संस्कार, मान्यताओं,

सहनशीलता और चुप्पी का।

 

इनके बोझ तले

दब जाती हैं

उनकी पुस्तकें।

कक्षाएं थम जाती हैं।

हम चाहते हैं

बेटियां आगे बढ़ें,

बेटियां खूब पढें,   

बेबाक, बिन्दास।

पर हमारा नज़र रहती है

हर समय

बेटी की नज़र पर।

 

जैसे ही कोई घटना

घटती है हमारे आस-पास,

हम बेटियों का बस्ता

और भारी कर देते हैं,

और भारी कर देते हैं।

कब दब जाती हैं,

उस भार के नीचे,

सांस घुटती है उनकी,

कराहती हैं,

बिलखती हैं

आज़ादी के लिए

पर हम समझ ही नहीं पाते

उनका कष्ट,

इस अनचाहे बोझ तले,

 कंधे झुक जाते हैं उनके,

और हम कहते हैं,

देखो, कितनी विनम्र

परम्परावदी है यह।

मैं भी तो

यहां

हर आदमी की ज़ुबान

एक धारदार छुरी है

जब चाहे, जहां चाहे,

छीलने लगती है

कभी कुरेदने तो कभी काटने।

देखने में तुम्हें लगेगी

एकदम अपनी सी।

विनम्र, झुकती, लचीली

तुम्हारे पक्ष में।

लेकिन तुम देर से समझ पाते हो

कि सांप की गति भी

कुछ इसी तरह की होती है।

उसकी फुंकार भी

आकर्षित करती है तुम्हें

किसी मौके पर।

उसका रंग रूप, उसका नृत्य _

बीन की धुन पर उसका झूमना

तुम्हें मोहने लगता है।

तुम उसे दूध पिलाने लगते हो

तो कभी देवता समझ कर

उसकी पूजा करते हो।

यह जानते हुए भी

कि मौका मिलते ही

वह तुम्हें काट डालेगा।

और  तुम भी

सांप पाल लेते हो

अपनी पिटारी में।

युग प्रदर्शन का है

मैं आज तक

समझ नहीं पाई

कि मोर शहर में

क्यों नहीं नाचते।

जंगल में नाचते हैं

जहां कोई देखता नहीं।

 

सुना है

मोरनी को लुभाने के लिए

नृत्य करते हो तुम।

बादल-वर्षा की आहट से

इंसान का मन-मयूर नाच उठता है,

तो तुम्हारी तो बात ही क्या।

तुम्हारी पायल से मुग्ध यह संसार

वन-वन ढूंढता है तुम्हें।

अद्भुत सौन्दर्य का रूप हो तुम।

रंगों की निराली छटा

मनमोहक रूप हो तुम।

पर कहां

जंगल में छिपे बैठे तुम।

कृष्ण अपने मुकुट में

पंख तुम्हारा सजाये बैठे हैं,

और तुम वहां वन में

अपना सौन्दर्य छिपाये बैठे हो।

 

युग प्रदर्शन का है,

दिखावे और चढ़ावे का है,

काक और उलूव

मंचों पर कूकते हैं यहां,

गर्धभ और सियार

शहरों में घूमते हैं यहां।

मांग बड़ी है।

एक बार तो आओ,

एक सिंहासन तुम्हें भी

दिलवा देंगे।

राष्ट््र पक्षी तो हो

दो-चार पद और दिलवा देंगे।

 

अनछुए शब्द

 कुछ भाव

चेहरों पर लिखे जाते हैं

और कुछ को शब्द दिये जाते हैं

शब्द कभी अनछुए

एहसास दे जाते हैं ,

कभी बस

शब्द बनकर रह जाते हैं।

किन्तु चेहरे चाहकर भी

झूठ नहीं बोल पाते।

चेहरों पर लिखे भाव

कभी कभी

एक पूरा इतिहास रच डालते हैं।

और यही

भावों का स्पर्श

जीवन में इन्द्र्धनुषी रंग भर देता है।

 

साहस है मेरा

साहस है मेरा, इच्छा है मेरी, पर क्यों लोग हस्तक्षेप करने चले आते हैं

जीवन है मेरा, राहें हैं मेरी, पर क्यों लोग “कंधा” देने चले आते हैं

अपने हैं, सपने हैं, कुछ जुड़ते हैं बनते हैं, कुछ मिटते हैं, तुमको क्या

जीती हूं अपनी शर्तों पर, पर पता नहीं क्यों लोग आग लगाने चले आते हैं

बस एक हिम्मत की चाह

जीवन बोझ-सा

समस्याएं नाग-सी

तब चाहिए

तुम्हारा साथ

हाथ पकड़ा है

मैं तुम्हें समस्याओं से बचाउं

तुम मेरे साथ

तो जीवन भी बोझ-सा नहीं

बस एक हिम्मत की चाह

होंगे हम साथ-साथ

ज़िन्दगी मिली है आनन्द लीजिए

ज़िन्दगी मिली है आनन्द लीजिए, मौत की क्यों बात कीजिए

मन में कोई  भटकन हो तो आईये हमसे दो बात कीजिए

आंख खोलकर देखिए पग-पग पर खुशियां बिखरी पड़ी हैं

आपके हिस्से की बहुत हैं यहां, बस ज़रा सम्हाल कीजिए

हाथों से मिले नेह-स्पर्श

 पत्थरों में भाव गढ़ते हैं,

जीवन में संवाद मरते हैं।

हाथों से मिले नेह-स्पर्श,

बस यही आस रखते है।

 

जीवन महकता है

जीवन महकता है

गुलाब-सा

जब मनमीत मिलता है

अपने ख्वाब-सा

रंग भरे

महकते फूल

जीवन में आस देते हैं

एक विश्वास देते हैं

अपनेपन का आभास देते हैं।

सूखेंगे कभी ज़रूर

सूखने देना।

पत्ती –पत्ती सहेजना

यादों की, वादों की

मधुर-मधुर भावों से

जीवन-भर यूं ही मन हेलना ।

 

औरत की दुश्मन औरत
एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है कि औरत औरत की दुश्मन होती है। बड़ी सरलता से हमारे समाज में, व्यवहार में, परिवारों में, महिलाओं का उपहास करने के लिए इस वाक्य का प्रयोग किया जाता है।

कारण प्रायः केवल सास-बहू के बनते-बिगड़ते सम्बन्धों के आधार पर सत्यापित किया जाता है। अथवा कभी-कभी ननद-भाभी की परस्पर अनबन को लेकर।

किन्तु जितनी कहानियाँ हमारे समाज में इस तरह की बुनी जाती रही हैं और महिलाओं को इन कहानियों द्वारा अपमानित किया जाता है वे सत्य में कितनी हैं? क्या हम ही अपने परिवारों में देखें तो कितनी महिलाएँ परिवारों में दुश्मनों की तरह रह रही हैं। और केवल परिवारों में ही नहीं, समाज में, कार्यस्थलों में, राहों में , कहीं भी इस वाक्य को सुनाकर महिलाओं का अपमान कर दिया जाता है।

अनबन पिता-पुत्र में भी होती है, भाईयों में भी होती है, विशेषकर कार्यस्थलों में तो बहुत ही गहन ईर्ष्या-द्वेष भाव होता है किन्तु कोई नहीं कहता कि आदमी आदमी का दुश्मन है।

ऐसा क्यों ? क्यों महिलाओं के विरुद्ध इस तरह की कहावतें, मुहावरे बने हैं?

 कहने को कुछ भी कह लें कि समाज बदल गया है, परिवारों में अब लड़का-लड़की समान हैं किन्तु कहीं एक क्षीण रेखा है जो भेद-भाव बताती है।

एक युवती अपना वह घर छोड़कर जाती है जहां उसने परायों की तरह  बीस पच्चीस वर्ष बिताये हैं कि यह उसका घर नहीं है। और  जिस घर में प्रवेश करती है वहां उसके लिए नये नियम.कानून पहले ही निर्धारित होते हैं जिनको उसे तत्काल भाव से स्वीकार करना होता है, मानों बिजली का बटन है वह, कि इस कमरे की बत्ती बुझाई और  उस कमरे की जला दी। उसे अपने आपको नये वातावरण में स्थापित करने में जितना अधिक समय लगता है उतनी ही वह बुरी होती जाती है।

वास्तव में यदि सास-बहू अथवा ननद-भाभी की अनबन देखें तो वह वास्तव में अधिकार की लड़ाई है। एक युवती को मायके में अधिकार नहीं मिलते, वहाँ भाई और पिता ही सर्वोपरि होते हैं। ससुराल में वह इस आशा के साथ प्रवेश करती है कि यह उसका घर है और यहाँ उसके पास अधिकार होंगे। किन्तु उसके प्रवेश के साथ ही सास और ननद के मन में भय समा जाता है कि उनके अधिकार जाते रहेंगे। और उनकी इस मनोवैज्ञानिक समस्या में परिवार के पुरुषों का व्यवहार प्रायः आग में घी का काम करता है। वे न किसी का सहयोग देते हैं, न उचित पक्ष लेते हैं, न राह दिखाते हैं, बस औरतें तो होती ही ऐसी हैं कह कर पतली गली से निकल लेते हैं।

कभी आपने सुना कि माँ ने बेटी को घर से निकाल दिया अथवा इसके विपरीत। अथवा बेटी ने सम्पत्ति के लिए माँ के विरुद्ध कार्य किया। किन्तु पुरुषों में आप नित्य-प्रति कथाएँ सुनते हैं कि भाई भाई को मार डालता है, बेटा सम्पत्ति के लिए पिता की हत्या कर देता है। चाचे-भतीजे की लड़ाईयाँ। ज़रा-सा पढ़-लिख जाता है तो उसे अपने माता-पिता पिछड़े दिखाई देने लगते हैं ऐसी सत्य अनगिनत कथाएं हम जानते हैं, किन्तु कोई नहीं कहता कि आदमी आदमी का दुश्मन होता है। आज भी नारी: पुरूष अथवा परिवार की पथगामिनी ही है, वह अपने चुने मार्ग पर कहां चल पाती है। हां, परिवार में कुछ भी गलत हो तो आरोपी वही होती है। मां-बेटे, पिता-पुत्र, अन्य सम्बन्धियों के साथ कुछ भी बिगड़े, दोषारोपण नारी पर ही आता है।

दुख इस बात का कि हम स्वयं ही अपने विरूद्ध सोचने लगे हैं क्योंकि हमारा समाज हमारे विरूद्ध सोचता है।

  

जीवन संवर जायेगा

जब हृदय की वादियों में

ग्रीष्म ऋतु हो

या हो पतझड़,

या उलझे बैठे हों

सूखे, सूनेपन की झाड़ियों में,

तब

प्रकृति के

अपरिमित सौन्दर्य से

आंखें दो-चार करना,

फिर देखना

बसन्त की मादक हवाएँ

सावन की झड़ी

भावों की लड़ी

मन भीग-भीग जायेगा

अनायास

बेमौसम फूल खिलेंगे

बहारें छायेंगी

जीवन संवर जायेगा।

 

करते रहते हैं  बातें
बढ़ती आबादी को रोक नहीं पाते

योजनाओं पर अरबों खर्च कर जाते

शिक्षा और जानकारियों की है कमी

बैठे-बैठे बस करते रहते हैं हम बातें

हमारा बायोडेटा

हम कविता लिखते हैं।
कविता को गज़ल, गज़ल को गीत, गीत को नवगीत, नवगीत को मुक्त छन्द, मुक्त छन्द को मुक्तक,

मुक्तक को चतुष्पदी बनाना जानते हैं और  ज़रूरत पड़े तो इन सब को गद्य की सभी विधाओं में भी

परिवर्तित करना जानते हैं। 
जैसे कृष्ण ने गीता में लिखा है कि वे ही सब कुछ हैं, वैसे ही मैं ही लेखक हूँ ,

मैं ही कवि, गीतकार, गज़लकार, साहित्यकार, गद्य पद्य की रचयिता,

कहानी लेखक, प्रकाशक , मुद्रक, विक्रेता, क्रेता, आलोचक,

समीक्षक भी मैं ही हूँ ,मैं ही संचालक हूँ , मैं ही प्रशासक हूँ ।
अहं सर्वत्र रचयिते

एक साल और मिला

अक्सर एक एहसास होता है

या कहूं

कि पता नहीं लग पाता

कि हम नये में जी रहे हैं

या पुराने में।

दिन, महीने, साल

यूं ही बीत जाते हैं,

आगे-पीछे के

सब बदल जाते हैं

किन्तु हम अपने-आपको

वहीं का वहीं

खड़ा पाते हैं।

**    **    **    **

अंगुलियों पर गिनती रही दिन

कब आयेगा वह एक नया दिन

कब बीतेगा यह साल

और सब कहेंगे

मुबारक हो नया साल

बहुत-सी शुभकामनाएं

कुछ स्वाभाविक, कुछ औपचारिक।

**    **    **    **

वह दिन भी

आकर बीत गया

पर इसके बाद भी

कुछ नहीं बदला

**    **    **    **

कोई बात नहीं,

नहीं बदला तो न सही।

पर  चलो

एक दिन की ही

खुशियां बटोर लेते हैं

और खुशियां मनाते हैaa

कि एक साल और मिला

आप सबके साथ जीने के लिए।

   

 

क्रांति

क्रांति उस चिड़िया का नाम है

जिसे नई पीढ़ी ने जन्म दिया।

पुरानी पीढ़ी उसके पैदा होते ही

उसके पंख काट देना चाहती है।

लेकिन नई पीढ़ी उसे उड़ना सिखाती है।

जब वह उड़ना सीख जाती है

तो पुरानी पीढ़ी

उसके लिए,

एक सोने का पिंजरा बनवाती है

और यह कहकर उसे कैद कर लेती है

कि नई पीढ़ी तो उसे मार ही डालती।

यह तो उसकी सुरक्षा सुविधा का प्रबन्ध है।

 

वर्षों बाद

जब वह उड़ना भूल जाती है

तो पिंजरा खोल दिया जाता है

क्योंकि

अब तक चिड़िया उड़ना भूल गई है

और सोने का मूल्य भी बढ़ गया है

इसलिए उसे बेच दिया जाता हे

नया लोहे का लिया जाता है

जिसमें नई पीढ़ी को

इस अपराध में बन्द कर दिया जाता है

आजीवन

कि उसने हमें खत्म करने,

मारने का षड्यन्त्र रचा था

हत्या करनी चाही थी हमारी।

एहसास

किसी के भूलने के

एहसास की वह तीखी गंध,

उतरती चली जाती है,

गहरी, कहीं,अंदर ही अंदर,

और कचोटता रहता है मन,

कि वह भूल

सचमुच ही एक भूल थी,

या केवल एक अदा।

फिर

उस एक एहसास के साथ

जुड़ जाती हैं,

न जाने, कितनी

पुरानी यादें भी,

जो सभी मिलकर,

मन-मस्तिष्क पर ,

बुन जाती हैं,

नासमझी का

एक मोटा ताना-बाना,

जो गलत और ठीक को

समझने नहीं देता।

ये सब एहसास मिलकर

मन पर,

उदासी का,

एक पर्दा डाल जाते हैं,

जो आक्रोश, झुंझलाहट

और निरुत्साह की हवा लगते ही

नम हो उठता है ,

और यह नमी,

न चाहते हुए भी

आंखों में उतर आती है।

न जाने क्या है ये सब,

पर लोग, अक्सर इसे

भावुकता का नाम दे जाते हैं।

 

 

 

 

अंधविश्वासों में जीते

कौओं की पंगत लगी

बैठे करें विचार

क्यों न हम सब मिलकर करें

इस मानव का बहिष्कार

किसी पक्ष में हमको पूजे

कभी उड़ायें पत्थर मार।

यूं कहते मुझको काला-काला,

मेरी कां-कां चुभती तुमको

मनहूस नाम दिया है मुझको

और अब मैं तुमको लगता प्यारा।

मुझको रोटी तब डाले हैं

जब तुम पर शामत आन पड़ी,

बासी रोटी, तैलीय रोटी

तुम मुझको खिलाते हो।

अपने कष्ट-निवारण के लिए

मुझे ढूंढते भागे हो।

किसी-किसी के नाम पर

हमें लगाते भोग

अंधविश्वासों में जीते

बाबाओं  के चाटें तलवे

मिट्टी में होते हैं लोट-पोट।

जब ज़िन्दा होता है मानव

तब क्या करते हैं ये लोग।

न चाहिए मुझको तेरी

दान-दक्षिणा, न पूजी रोटी।

मुंडेर तेरी पर कां-कां करता

बच्चों का मन बहलाता हूं।

अपनी मेहनत की खाता हूं।

चोट दिल पर लगती है

चोट दिल पर लगती है

आंसू आंख से बहते हैं

दर्द जिगर में होता है

बात चेहरा बोलता है

आघात कहीं पर होता है

घाव कहीं पर बनता है

जख्‍म शब्‍दों  के होते हैं

बदला कलम ले लेती है

दूर रहना ज़रा मुझसे

चोट गहरी हो तो

प्रतिघात घातक होता है।

 

अनुभव की थाती

पर्वतों से टकराती, उबड़-खाबड़ राहों पर जब नदी-नीर-धार बहती है

कुछ सहती, कुछ गाती, कहीं गुनगुनाती, तब गंगा-सी निर्मल बन पाती है

अपनेपन की राहों में ,फूल उगें और कांटे न हों, ऐसा कम ही होता है

यूं ही जीवन में कुछ खोकर, कुछ पाकर, अनुभव की थाती बन पाती है।

नदी के उस पार कच्चा रास्ता है

कच्ची राहों पर चलना

भूल रहे हैं हम,

धूप की गर्मी से

नहीं जूझ रहे हैं हम।

पैरों तले बिछते हैं 

मखमली कालीन,

छू न जाये कहीं

धरा का कोई अंश।

उड़ती मिट्टी पर

लगा दी हैं

कई बंदिशें,

सिर पर तान ली हैं,

बड़ी-बड़ी छतरियां

हवा, पानी, रोशनी से

बच कर निकलने लगे हैं हम।

पानी पर बांध लिए हैं

बड़े-बड़े बांध,

गुज़र जायेंगी गाड़ियां,

ज़रूरत पड़े तो

उड़ा लेंगे विमान,

 

पर याद नहीं रखते हम

कि ज़िन्दगी

जब उलट-पलट करती है,

एक साथ बिखरता है सब

टूटता है, चुभता है,

हवा,पानी, मिट्टी

सब एकमेक हो जाते हैं

तब समझ में आता है

यह ज़िन्दगी है एक बहाव

और नदी के उस पार

कच्चा रास्ता है।