वहीं के वहीं खड़े हैं

क्यों पूछते हो

कहाँ आ गये।

अक्सर लगता है

जहाँ से चले थे

वहीं के वहीं खड़े हैं

कदम ठहरे से

भाव सहमे से

प्रश्न झुंझलाते से

उत्तर नाकाम।

न लहरों में

लहरें

न हवाओं में

सिरहन

न बातों में

मिठास

न अपनों से

अपनापन

भावहीन-सा मन

क्यों पूछते हो

कहाँ आ गये

एक अर्थहीन

ठहराव में जी रहे हैं

क्यों पूछते हो

कहाँ आ गये।

अक्सर लगता है

जहाँ से चले थे

वहीं के वहीं खड़े हैं।

 

शिकायतों का  पुलिंदा

शिकायतों का

पुलिंदा है मेरे पास।

है तो सबके पास

बस सच बोलने का

मेरा ही ठेका है।

काश!

कि शिकायतें

आपसे होतीं

किसी और से होतीं,

इससे-उससे होतीं,

तब मैं कितनी प्रसन्न होती,

बिखेर देती

सारे जहाँ में।

इसकी, उसकी

बुराईयाँ कर-कर मन भरती।

किन्तु

क्या करुँ

सारी शिकायतें

अपने-आपसे ही हैं।

जहाँ बोलना चाहिए

वहाँ चुप्पी साध लेती हूँ

जहाँ मौन रहना चाहिए

वहाँ बक-झक कर जाती हूँ।

हँसते-हँसते

रोने लग जाती हूँ,

रोते-रोते हँस लेती हूँ।

न खड़े होने का सलीका

न बैठने का

न बात करने का,

बहक-बहक जाती हूँँ

मन कहीं टिकता नहीं

बस

उलझी-उलझी रह जाती हूँ।

 

ब्लॉक

कब सालों-साल बीत गये

पता ही नहीं लगा

जीवन बदल गया

दुनिया बदल गई

और मैं

वहीं की वहीं खड़ी

तुम्हारी यादों में।

प्रतिदिन

एक पत्र लिखती

और नष्ट कर देती।

अक्सर सोचा करती थी

जब मिलोगे

तो यह कहूँगी

वह कहूँगी।

किन्तु समय के साथ

पत्र यादों में रहने लगे

स्मृतियाँ धुँधलाने लगी

और चेहरा मिटने लगा।

 

पर उस दिन फ़ेसबुक पर

अनायास तुम्हारा चेहरा

दमक उठा

और मैं

एकाएक

लौट गई सालों पीछे

तुम्हारे साथ।

खोला तुम्हारा खाता

और चलाने लगी अंगुलियाँ

भावों का बांध

बिखरने लगा

अंगुलियाँ कंपकंपान लगीं

क्या कर रही हूँ मैं।

 

इतने सालों बाद

क्या लिखूँ अब

ब्लॉक का बटन दबा दिया।

 

यादें: शिमला की बारिश की

न जाने वे कैसे लोग हैं

जो बारिश की

सौंधी खुशबू से

मदहोश हो जाते हैं

प्रेम-प्यार के

किस्सों में खो जाते हैं।

विरह और श्रृंगार की

बातों में रो जाते हैं।

सर्द सांसों से

खुशियों में

आंसुओं के

बीज बो जाते हैं।

और कितने तो

भीग जाने के डर से,

घरों में छुपकर सो जाते हैं।

यह भी कोई ज़िन्दगी है भला !

.

 

कभी तेज़, कभी धीमी

कभी मूसलाधार

बेपरवाह हम और बारिश !

पानी से भरी सड़क पर

छप-छपाक कर चलना

छींटे उछालना

तन-मन भीग-भीग जाना

चप्पल पानी में बहाना

कभी भागना-दौड़ना

कभी रुककर

पेड़ों से झरती बूँदों को

अंजुरी में सम्हालना

बरसती बूंदों से

सिहरती पत्तियों को

सहलाना

चीड़-देवदार की

नुकीली पत्तियों से

झरती एक-एक बूँद को

निरखना

उतराईयों पर

तेज़ दौड़ते पानी से

रेस लगाना।

और फिर

रुकती-रुकती बरसात,

बादलों के बीच से

रास्ता खोजता सूरज

रंगों की आभा बिखेरता

मानों प्रकृति

नये कलेवर में

अवतरित होती है

एक नवीन आभा लिए।

हरे-भरे वृक्ष

मानों नहा-धोकर

नये कपड़े पहन कर

धूप सेंकने आ खड़े हों।

स्मृतियों के खण्डहर

कुछ

अनचाही स्मृतियाँ

कब खंडहर बन जाती हैं

पता ही नहीं लग पाता

और हम

उन्हीं खंडहरों पर

साल-दर-साल

लीपा-पोती

करते रहते हैं

अन्दर-ही-अन्दर

दीमक पालते रहते हैं

देखने में लगती हैं

ऊँची मीनारें

किन्तु एक हाथ से

ढह जाती हैं।

प्रसन्न रहते हैं हम

इन खंडहरों के बारे में

बात करते हुए

सुनहरे अतीत के साक्षी

और इस अतीत को लेकर

हम इतने

भ्रमित रहते हैं

कि वर्तमान की

रोशनियों को

नकार बैठते हैं।

 

 

 

हम वहीं के वहीं ठहरे रह गये

जीवन में क्या बनोगे

क्या बनना चाहते हो

अक्सर पूछे जाते थे

ऐसे सवाल।

अपने आस-पास

देखते हुए

अथवा बड़ों की सलाह से

मिले थे कुछ बनने के आधार।

रट गईं थी हमें

बताईं गईं कुछ राहें और काम,

और जब भी कोई पूछता था

हम ले देते थे

कोई भी एक-दो नाम।

किन्तु मन तब डरने लगा

जब हमारे सामने

दी जाने लगीं ढेरों मिसालें

अनगिनत उदाहरण।

किसी की जीवनियाँ,

किसी की आहुति,

किसी की सेवा

और किसी का समर्पण।

कोई सच्चा, कोई त्यागी,

कोई महापुरुष।

इन सबको समझने

और आत्मसात करने में

जीवन चला गया

और हम

वहीं के वहीं ठहरे रह गये।

 

छोटी-छोटी बातों पर

छोटी-छोटी बातों पर

अक्सर यूँ ही

उदासी घिर आती है

जीवन में।

तब मन करता है

कोई सहला दे सर

आँखों में छिपे आँसू पी ले

एक मुस्कुराहट दे जाये।

पर सच में

जीवन में

कहाँ होता है ऐसा।

-

आ गया है

अपने-आपको

आप ही सम्हालना।

यह वह मेरा सूरज तो नहीं

यह वह सूरज तो नहीं

जिसकी मैं बात किया करती थी।

यह वह सूरज भी नहीं

जो अक्सर

मेरे सपनों में आया करता था।

यह वह सूरज तो नहीं

जो मुझे राह दिखाया करता था।

यह वह सूरज भी नहीं

जो मेरी राहें आलोकित

किया करता था।

यह वह सूरज भी नहीं

जिस पर मैं विश्वास किया करती थी।

यह वह सूरज भी नहीं

जो मुझे रोज़ मिला करता था।

 

गली-गली ढूंढ रही

मेरा सूरज कहां गया।

यह सूरज तो राहों से भटक गया।

अंधेरे-रोशनी की

पहचान भूल गया।

जहां रोशनी चाहिए

वहां अंधेरा पसरता है,

किसी के घर में

झांके बिना ही निकल जाता है,

और कहीं आग बरसाता है।

मेरा सूरज तो ऐसा नासमझ नहीं था।

 

कल मिला बड़े दिनों के बाद।

पूछा मैंने कहाँ गये,

ऐसे कैसे हो गये।

 

सूरज मुस्काया,

समय के साथ चलना सीख।

नज़र बदल, सड़क बदल

कुछ कांटे बिछा, कुछ ज़हर उगल।

न अंधेरे से डर

न रोशनी की चाहत रख

जो मिले, उसे निगल

आगे बढ़, सबकी खींच।

न आस रख, न विश्वास रख

न जी का जंजाल रख।

सबको तोड़, अपने को जोड़

बस ऐसा जीवन जी

इशारा कर दिया मैंने

शेष अपनी बुद्धि लगा

और मस्त जीवन जी।

 

मनोरम प्रकृति का यह रूप

कितना मनोरम दिखता है

प्रकृति का यह रूप।

मानों मेरे मन के

सारे भाव चुराकर

पसर गई है

यहां अनेक रूपों में।

कभी हृदय

पाषाण-सा हो जाता है

कभी भाव

तरल-तरल बहकते हैं।

लहरें मानों

कसमसाती हैं

बहकती हैं

किनारों से टकराती हैं

और लौटकर

मानों

मन मसोसकर रह जाती हैं।

जल अपनी तरलता से

प्रयासरत रहता है

धीरे-धीरे

पाषाणों को आकार देने के लिए।

हरी दूब की कोमलता में

पाषाण कटु भावों-से

नेह-से पिघलने लगते हैं

एक छाया मानों सान्त्वना

के भाव देती है

और मन हर्षित हो उठता है।

 

अन्तर्मन का पंछी

अन्तर्मन का पंछी

कब क्या बोले,

क्या जानें।

कुछ टुक-टुक

कुछ कुट-कुट

कुछ उलझे, कुछ सुलझे

किससे क्या कह डाले

कब क्या सुन ले

आैर किससे क्या कह डाले

क्या जानें।

यूं तो पोथी-पोथी पढ़ता

आैर बात नासमझों-सी करता।

कब किसका चुग्गा

चुग डाले

आैर कब

माणिक –मोती ठुकराकर चल दे

क्या जाने।

भावों की लेखी

लिख डाले

किस भाषा में

किन शब्दों में

न हम जानें।   

 

 

शांति और सन्नाटा

हम अक्सर सन्नाटे और

शांति को एक समझ बैठते हैं।

 

शांति भीतर होती है,

और सन्नाटा !!

 

बाहर का सन्नाटा

जब भीतर पसरता है

बाहर से भीतर तक घेरता है,

तब तोड़ता है।

अन्तर्मन झिंझोड़ता है।

 

सन्नाटे में अक्सर

कुछ अशांत ध्वनियां होती हैं।

 

हवाएं चीरती हैं

पत्ते खड़खड़ाते हैं,

चिलचिलाती धूप में

बेवजह सनसनाती आवाज़ें,

लम्बी सूनी सड़कें

डराती हैं,

आंधियां अक्सर भीतर तक

झकझोरती हैं,

बड़ी दूर से आती हैं

कुत्ते की रोने की आवाज़ें,

बिल्लियां रिरियाती है।

पक्षियों की सहज बोली

चीख-सी लगने लगती है,

चेहरे बदनुमा दिखने लगते हैं।

 

हम वजह-बेवजह

अन्दर ही अन्दर घुटते हैं,

सोच-समझ

कुंद होने लगती है,

तब शांति की तलाश में निकलते हैं

किन्तु भीतर का सन्नाटा छोड़ता नहीं।

 

कोई न मिले

तो अपने-आपको

अपने साथ ही बांटिये,

अपने-आप से मिलिए,

लड़िए, झगड़िए, रूठिए,मनाईये।

कुछ खट्टा-मीठा, मिर्चीनुमा बनाईये

खाईए, और सन्नाटे को तोड़ डालिए।

दीप प्रज्वलित कर न पाई

मैं चाहकर भी

दीप प्रज्वलित कर न पाई।

घृत भी था, दीप भी था,

पर भाव ला न पाई,

मैं चाहकर भी

दीप प्रज्वलित कर न पाई।

लौ भीतर कौंधती थी,

सोचती रह गई,

समय कब बीत गया

जान ही न पाई।

मैं चाहकर भी

दीप प्रज्वलित कर न पाई।

मित्रों ने गीत गाये,

झूम-झूम नाचे गाये,

कहीं से आरती की धुन,

कहीं से ढोल की थाप

बुला रही थी मुझे

दुख मना रहे हैं या खुशियां

समझ न पाई।

कुछ अफ़वाहें

हवा में प्रदूषण फैला रही थी।

समस्या से जूझ रहे इंसानों को छोड़

धर्म-जाति का विष फैला रही थीं।

लोग सड़कों पर उतर आये,

कुछ पटाखे फोड़े,

पटाखों की रोशनाई

दिल दहला रहीं थी,

आवाज़ें कान फोड़ती थी।

अंधेरी रात में

दूर तक दीप जगमगाये,

पुलिस के सायरन की आवाज़ें

कान चीरती थीं।

दीप हाथ में था

ज्योति थी,

हाथ में जलती शलाका

कब अंगुलियों को छू गई

देख ही न पाई।

सीत्कार कर मैं पीछे हटी,

हाथ से दीप छूटा

भीतर कहीं कुछ और टूटा।

क्या कहूं , कैसे कहूं।

पर ध्यान कहीं और था।

घृत भी था, दीप भी था,

पर भाव ला न पाई,

मैं चाहकर भी

दीप प्रज्वलित कर न पाई।

 

हालात कहाँ बदलते हैं

वर्ष बदलते हैं

दिन-रात बदलते हैं

पर हालात कहाँ बदलते हैं।

 

नया साल आ जाने पर

लगता था

कुछ तो बदलेगा,

यह जानते हुए भी

कि ऐसा सोचना ही

निरर्थक है।

आस-पास

जैसे सब ठहर गया हो।

मन की ऋतुएँ

नहीं बदलतीं अब,

शीत, बसन्त, ग्रीष्म हो

या  हो पतझड़

कोई नयी आस लेकर

नहीं आते अब,

किसी परिवर्तन का

एहसास नहीं कराते अब।

बन्द खिड़कियों से

न मदमाती हवाएँ

रिझाती हैं

और न रिमझिम बरसात

मन को लुभाती है।

 

एक ख़ौफ़ में जीते हैं

डरे-डरे से।

नये-नये नाम

फिर से डराने लगे हैं

हम अन्दर ही अन्दर

घबराने लगे हैं।

द्वार फिर बन्द होने लगे हैं

बाहर निकलने से डरने लगे हैं,

आशाओं-आकांक्षाओं के दम

घुटने लगे हैं

हम पिंजरों के जीव

बनने लगे हैं।

 

 

 

अब मौन को मुखर कीजिए

बस अब बहुत हो चुका,

अब मौन को मुखर कीजिए

कुछ तो बोलिए

न मुंह बन्द कीजिए।

संकेतों की भाषा

कोई समझता नहीं

बोलकर ही भाव दीजिए।

खामोशियां घुटती हैं कहीं

ज़रा ज़ोर से बोलकर

आवाज़ दीजिए।

जो मन न भाए

उसका

खुलकर विरोध कीजिए।

यह सोचकर

कि बुरा लगेगा किसी को

अपना मन मत उदास कीजिए।

बुरे को बुरा कहकर

स्पष्ट भाव दीजिए,

और यही सुनने की

हिम्मत भी

अपने अन्दर पैदा कीजिए।

चुप्पी को सब समझते हैं कमज़ोरी

चिल्लाकर जवाब दीजिए।

कलम की नोक तीखी कीजिए

शब्दों को आवाज़ कीजिए।

मौन को मुखर कीजिए।

 

लक्ष्य संधान

पीछे लौटना तो नहीं चाहती

किन्तु कुछ लकीरें

रास्ता रोकती हैं।

कुछ हाथों में

कुछ कदमों के नीचे,

कुछ मेरे शुभचिन्तकों की

उकेरी हुई मेरी राहों में

मेरे मन-मस्तिष्क में

आन्दोलन करती हुईं।

हम ज्यों-ज्यों

बड़े होने लगते हैं

अच्छी लगती हैं

लक्ष्य की लकीरें बढ़ती हुईं।

किन्तु ऐसा क्यों

कि ज्यों-ज्यों लक्ष्यों के

दायरे बढ़ने लगे

राहें सिकुड़ने लगीं,

मंज़िल बंटने लगी

और लकीरें और गहराने लगीं।

 

फिर पड़ताल करने निकल पड़ती हूँ

आदत से मज़बूर

देखने की कोशिश करती हूँ पलटकर

जो लक्ष्य मैंने चुने थे

वे कहाँ पड़े हैं

जो अपेक्षाएं मुझसे की गईं थीं

मैं कहाँ तक पार पा सकी उनसे।

हम जीवन में

एक लक्ष्य चुनते हैं

किन्तु अपेक्षाओं की

दीवारें बन जाती हैं

और हम खड़े देखते रह जाते हैं।

-

कुछ लक्ष्य बड़े गहरे चलते हैं जीवन में।

-

अर्जुन ने एक लक्ष्य संधान किया था

चिड़िया की आंख का

और दूसरा किया था

मछली की आंख का

और इन लक्ष्यों से कितने लक्ष्य निकले

जो तीर की तरह

बिखर गये कुरूक्षेत्र में

रक्त-रंजित।

.

क्या हमारे, सबके जीवन में

ऐसा ही होता है?

 

 

 

बड़े मसले हैं रोटी के

बड़े मसले हैं रोटी के।

रोटी बनाने

और खाने से पहले

एक लम्बी प्रक्रिया से

गुज़रना पड़ता है

हम महिलाओं को।

इस जग में

कौन समझा है

हमारा दर्द।

बस थाली में रोटी देखते ही

टूट पड़ते हैं।

मिट्टी से लेकर

रसोई तक पहुंचते-पहुंचते

किसे कितना दर्द होता है

और कितना आनन्द मिलता है

कौन समझ पाता है।

जब बच्चा

रोटी का पहला कौर खाता है

तब मां का आनन्द

कौन समझ पाता है।

जब किसी की आंखों में

तृप्ति दिखती है

तब रोटी बनाने की

मानों कीमत मिल जाती है।

लेकिन बस

इतना ही समझ नहीं आया

मुझे आज तक

कि रोटी गोल ही क्यों।

ठीक है

दुनिया गोल, धरती गोल

सूरज-चंदा गोल,

नज़रें गोल,

जीवन का पहिया गोल

पता नहीं और कितने गोल।

तो भले-मानुष

रोटी चपटी ही खा लो।

वही स्वाद मिलेगा।

   

 

हमारी अपनी आवाज़ें  गायब हो गई हैं

आवाज़ें निरन्तर गूंजती हैं

मेरे आस-पास।

कभी धीमी, कभी तेज़।

कुछ सुनाई देती हैं

कुछ नहीं।

हमारे कान फ़टते हैं

दुनिया भर की

आवाज़ें सुनते-सुनते।

इस शोर में

इतना खो गये हैं हम

कि अपनी ही आवाज़ से

कतराने में लगे हैं

अपनी ही आवाज़ को

भुलाने में लगे हैं।

हमारे भीतर का सच

झूठ बनने लगा है

दूर से आती आवाज़ों से

मन भरमाने में लगे हैं।

छोटी-छोटी आवाज़ों से

मिलने वाला आनन्द

कहीं खो गया है

हम बस यूं ही

चिल्लाने में लगे हैं।

गुमराह करती

आवाजों के पीछे

हम भागने में लगे हैं।

ऊँची आवाज़ें

हमारी नियामक हो गई हैं

हमारी अपनी आवाज़ें

कहीं गायब हो गई हैं।

  

सच बोलने लग जाती हूँ

मन में

न जाने क्यों

कभी-कभी

बुरे ख़याल आने लगते हैं

और मैं

सच बोलने लग जाती हूँ।

मेरी कही बातों पर

ध्यान मत देना।

एक प्रलाप समझकर

झटक देना।

मूर्ख

बहुत देखे होंगे दुनिया में,

किन्तु

मुझसे बड़ा मूर्ख कोई नहीं

यह समझ लेना।

मैं तो ऐसी हूँ

जैसी हूँ, वैसी हूँ।

बस

तुम अपना ध्यान रखना।

सच को झूठ

और झूठ को सच

सिद्ध करने की

हिम्मत रखना।

 

फिर भी

मन में मेरे

बुरे-बुरे ख़याल आते हैं

बस

अपना ध्यान रखना।।।

  

नेह के मोती

अपने मन से,

अपने भाव से,

अपने वचनों से,

मज़बूत बांधी थी डोरी,

पिरोये थे

नेह के मोती,

रिश्तों की आस,

भावों का सागर,

अथाह विश्वास।

-

किन्तु

समय की धार

बहुत तीखी होती है।

-

अकेले

मेरे हाथ में नहीं थी

यह डोर।

हाथों-हाथ

घिसती रही

रगड़ खाती रही

गांठें पड़ती रहीं

और बिखरते रहे मोती।

और जब माला टूटती है

मोती बिखरते हैं

तो कुछ मोती तो

खो ही जाते हैं

कितना भी सम्हाल लें

बस यादें रह जाती हैं।

 

 

 

मन चंचल करती तन्हाईयां

जीवन की धार में

कुछ चमकते पल हैं

कुछ झिलमिलाती रोशनियां

कुछ अवलम्ब हैं

तो कुछ

एकाकीपन की झलकियां

स्मृतियों को संजोये

मन लेता अंगड़ाईयां

मन को विह्वल करती

बहती हैं पुरवाईयां

कुछ ठिठके-ठिठके से पल हैं

कुछ मन चंचल करती तन्हाईयां

 

 

 

पार जरूर उतरना है

चल रे मन !

आज नैया की सैर कराउं !

पतवारों का क्या करना है।

खेवट को क्या रखना है।

बस अपने मन से तरना है।

डूबेंगें, उतरेंगे।

सीपी शंखों को ढूढेंगे।

मोती माणिक का क्या करना है।

उपर नीचे डोलेगी।

हिचकोले ले लेकर बोलेगी।

चल चल सागर के मध्य चलें।

लहरों संग संग तैर चलें।

पानी में छाया को छूलेंगे।

अपनी शक्लें ढूंढेंगे।

बस इतना ही तो करना है

पार जरूर उतरना है।

चल रे मन !

आज नैया की सैर कराउं !


यह अथाह शांत जलराशि

गगन की व्यापकता

ठहरी-ठहरी सी हवा,

निश्चल, निश्छल-सा समां

दूर कहीं घूमतीं

हल्की हल्की सी बदरिया।

तैरने लगती हूं, डूबने लगती हूं

फिर तरती हूं, दूर तक जाती हूं

फिर लौट लौट आती हूं।

इस सूनेपन में,  इक अपनापन है।

 

अजीब होती हैं  ये हवाएँ भी

अजीब होती हैं

ये हवाएँ भी।

बहुत रुख बदलती हैं

ये हवाएँ भी।

फूलों से गुज़रती

मदमाती हैं

ये हवाएँ भी।

बादलों संग आती हैं

तो झरती-झरती-सी लगती हैं

ये हवाएँ भी।

मन उदास हो तो

सर्द-सर्द लगती हैं

ये हवाएँ भी।

और जब मन में झड़ी हो

तो भिगो-भिगो जाती हैं

ये हवाएँ भी।

क्रोध में बहुत बिखरती हैं

ये हवाएँ भी।

सागर में उठते बवंडर-सा

भीतर ही भीतर

सब तहस-नहस कर जाती हैं

ये हवाएं भी।

इन हवाओं से बचकर रहना

बहुत आशिकाना होती हैं

ये हवाएँ भी।

 

ख़ुद में कमियाँ निकालते रहना

मेरा अपना मन है।

बताने की बात तो नहीं,

फिर भी मैंने सोचा

आपको बता दूं

कि मेरा अपना मन है।

आपको अच्छा लगे

या बुरा,

आज,

मैंने आपको बताना

ज़रूरी समझा कि

मेरा अपना मन है।

 

यह बताना

इसलिए भी ज़रूरी समझा

कि मैं जैसी भी हूॅं,

अच्छी या बुरी,

अपने लिए हूॅं

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

यह बताना

इसलिए भी

ज़रूरी हो गया था

कि मेरा अपना मन है,

कि मैं अपनी कमियाॅं

जानती हूॅं

नहीं जानना चाहती आपसे

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

जैसी भी हूॅं, जो भी हूॅं

अपने जैसी हूॅं,

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

चाहती हू

किसी की कमियाॅं न देखूॅं

बस अपनी कमियाॅं निकालती रहूॅं

क्योंकि मेरा अपना मन है।