ज़िन्दगी निकल जाती है

कहाँ जान पाये हम

किसका ध्वंस उचित है

और किसका पालन।

कौन सा कर्म सार्थक होगा

और कौन-सा देगा विद्वेष।

जीवन-भर समझ नहीं पाते

कौन अपना, कौन पराया

किसके हित में

कौन है

और किससे होगा अहित।

कौन अपना ही अरि

और कौन है मित्र।

जब बुद्धि पलटती है

तब कहाँ स्मरण रहते हैं

किसी के

उपदेश और निर्देश।

धर्म और अधर्म की

गाँठे बन जाती हैं

उन्हें ही

बांधते और सुलझाते

ज़िन्दगी निकल जाती है

और एक नये

युद्धघोष की सम्भावना

बन जाती है।

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अपने-आपसे करते हैं  हम फ़रेब

अपने-आपसे करते हैं

हम फ़रेब

जब झूठ का

पर्दाफ़ाश नहीं करते।

किसी के धोखे को

सहन कर जाते हैं,

जब हँसकर

सह लेते हैं

किसी के अपशब्द।

हमारी सच्चाई

ईमानदारी का

जब कोई अपमान करता है

और हम

मन मसोसकर

रह जाते हैं

कोई प्रतिवाद नहीं करते।

हमारी राहों में

जब कोई कंकड़ बिछाता है

हम

अपनी ही भूल समझकर

चले रहते हैं

रक्त-रंजित।

औरों के फ़रेब पर

तालियाँ पीटते हैं

और अपने नाम पर

शर्मिंदा होते हैं।

 

 

मैं उपवास नहीं करती

मैं उपवास नहीं करती।

वह वाला

उपवास नहीं करती

जिसमें बन्धन हो।

मैंने देखा है

जो उपवास करते हैं

सारा दिन

ध्यान रहता है

अरे कुछ नहीं खाना

कुछ नहीं पीना।

अथवा

यह खाना और

यह पीना।

विशेष प्रकार का भोजन

स्वाद

कभी नमक रहित

कभी मिष्ठान्न सहित।

किस समय, किस रूप में,

यही चर्चा रहती है

दो दिन।

फिर

विशेष पूजा-पाठ,

सामग्री,

चाहे-अनचाहे

सबको उलझाना।

मैं बस मस्ती में जीती हूँ,

अपने कर्मों का

ध्यान करती हूँ,

अपनी ही

भूल-चूक पर

स्वयँ प्रायश्चित कर लेती हूँ

और अपने-आपको

स्वयँ क्षमा करती हूँ।

 

दिन सभी मुट्ठियों से फ़िसल जायेंगे
किसी ने मुझे कह दिया

दिन

सभी मुट्ठियों से

फ़िसल जायेंगे,

इस डर से

न जाने कब से मैंने

हाथों को समेटना

बन्द कर दिया है

मुट्ठियों को

बांधने से डरने लगी हूँ।

रेखाएँ पढ़ती हूँ

चिन्ह परखती हूँ

अंगुलियों की लम्बाई

जांचती हूँ,

हाथों को

पलट-पलटकर देखती हूँ

पर मुट्ठियाँ बांधने से

डरने लगी हूँ।

इन छोटी -छोटी

दो मुट्ठियों में

कितने समेट लूँगी

जिन्दगी के बेहिसाब पल।

अब डर नहीं लगता

खुली मुट्ठियों में

जीवन को

शुद्ध आचमन-सा

अनुभव करने लगी हूँ,

जीवन जीने लगी हूँ।

 

इक आग बनती है

तीली से तीली जलती है

यूँ ही इक आग बनती है।

छोटी-छोटी चिंगारियों से

दिल जलता है

कभी बुझता है

कभी भड़कता है।

राख के ढेर नहीं बनते

इतनी-सी आग से

किन्तु जले दिल में

कितने पत्थर

और पहाड़ बनते हैं

कुछ सरकते हैं

कुछ खड़े रहते हैं।

और हम, यूँ ही, बात-बेबात

मुस्कुराते रहते हैं।

 

दरकते पहाड़ों के बीच से

भरभराती मिट्टी

बहुत कुछ ले डूबती है

किन्तु कौन समझता है

हमारी इस बेमतलब मुस्कान को।

पाप की हो या पुण्य की गठरी

 

पाप की हो या

पुण्य की गठरी

तो भारी होती है।

कौन करेगा निर्णय

पाप क्या

या पुण्य क्या!

तू मेरे गिनता

मैं तेरे गिनती,

कल के डर से

काल के डर से

सहम-सहम

चलते जीवन में।

इहलोक यहीं

परलोक यहीं

सब लोक यहीं

यहीं फ़ैसला कर लें।

कल किसने देखा

चल आज यहीं

सब भूल-भुलाकर

जीवन

जी भर जी लें।

 

जब मन में कांटे उगते हैं

हमारी आदतें भी अजीब सी हैं

बस एक बार तय कर लेते हैं

तो कर लेते हैं।

नज़रिया बदलना ही नहीं चाहते।

वैसे मुद्दे तो बहुत से हैं

किन्तु इस समय मेरी दृष्टि

इन कांटों पर है।

फूलों के रूप, रस, गंध, सौन्दर्य

की तो हम बहुत चर्चा करते हैं

किन्तु जब भी कांटों की बात उठती है

तो उन्हें बस फूलों के

परिप्रेक्ष्य में ही देखते हैं।

पता नहीं फूलों के संग कांटे होते हैं

अथवा कांटों के संग फूल।

लेकिन बात दाेनों की अक्सर

साथ साथ होती है।

बस इतना ही याद रखते हैं हम

कि कांटों से चुभन होती है।

हां, होती है कांटों से चुभन।

लेकिन कांटा भी तो

कांटे से ही निकलता है।

आैर कभी छीलकर देखा है कांटे को

भीतर से होता है रसपूर्ण।

यह कांटे की प्रवृत्ति है

कि बाहर से तीक्ष्ण है,

पर भीतर ही भीतर खिलते हैं फूल।

संजोकर देखना इन्हें,

जीवन भर अक्षुण्ण साथ देते है।

और

जब मन में कांटे उगते हैं

तो यह पलभर का उद्वेलन नहीं होता।

जीवन रस

सूख सूख कर कांटों में बदल जाता है।

कोई जान न पाये इसे

इसलिए कांटों की प्रवृत्ति के विपरीत

हम चेहरों पर फूल उगा लेते हैं

और मन में कांटे संजोये रहते हैं ।

 

पुल अपनों और सपनों  के बीच

सारा जीवन बीत गया

इसी उहापोह में

क्या पाया, क्या गंवाया।

बस आकाश ही आकाश

दिखाई देता था

पैर ज़मीन पर न टिकते थे।

मिट्टी को मिट्टी समझ

पैरों तले रौंदते थे।

लेकिन, एक समय आया

जब मिट्टी में हाथ डाला

तो, मिट्टी ने चूल्हा दिया,

घर दिया,

और दिया भरपेट भोजन।

मिट्टी से सने हाथों से ही

साकार हुए वे सारे स्वर्णिम सपने

जो आकाश में टंगे

दिखाई देते थे,

और बन गया एक पुल

ज़मीन और आकाश के बीच।

अपनों और सपनों  के बीच।

 

 

 

कांटों की बुआई में

तीर की जगह तुक्का चलाना आ गया।

झूठ को सच, सच को झूठ बनाना आ गया।

कांटों की बुआई में हाथ बहुत साफ़ है,

किसी की चुभन देख मुस्कुराना आ गया।

   

 

 

सपनों में जीने लगते हैं

लक्ष्य जितना सरल दिखता है

राहें

उतनी ही कठिन होने लगती हैं।

 

हमें आदत-सी हो जाती है

सब कुछ को

बस यूं ही ले लेने की

अभ्यास और प्रयास

की आदत छोड़ बैठते हैं

सपनों में जीने लगते हैं

लगता है

बस

हाथ बढ़ाएंगे

और चांद पकड़ लेंगे

अपने में खोये

ग्रहण और अमावस को

समझ नहीं पाते हम

सपनों में जीते

चांद को ही दोष देते हैं

सही राह नहीं पकड़ पाते हम।

-

लक्ष्य कठिन हो तो

राहें

आप ही सरल हो जाती हैं

क्योंकि तब हम समझ पाते हैं

चांद की दूरियां

और ग्रहण-अमावस का भाव

जीवन में।

 

 

कूड़े-कचरे में बचपन बिखरा है

आंखें बोलती हैं

कहां पढ़ पाते हैं हम

कुछ किस्से  खोलती हैं

कहां समझ पाते हैं हम

किसी की मानवता जागी

किसी की ममता उठ बैठी

पल भर के लिए

मन हुआ द्रवित

भूख से बिलखते बच्चे

बेसहारा अनाथ

चल आज इनको रोटी डालें

दो कपड़े पुराने साथ।

फिर भूल गये हम

इनका कोई सपना होगा

या इनका कोई अपना होगा,

कहां रहे, क्या कह रहे

क्यों ऐसे हाल में है

हमारी एक पीढ़ी

कूड़े-कचरे में बचपन बिखरा है

किस पर डालें दोष

किस पर जड़ दें आरोप

इस चर्चा में दिन बीत गया !!

 

सांझ हुई

अपनी आंखों के सपने जागे

मित्रों की महफ़िल जमी

कुछ गीत बजे, कुछ जाम भरे

सौ-सौ पकवान सजे

जूठन से पंडाल भरा

अनायास मन भर आया

दया-भाव मन पर छाया

उन आंखों का सपना भागा आया

जूठन के ढेर बनाये

उन आंखों में सपने जगाये

भर-भर उनको खूब खिलाये

एक सुन्दर-सा चित्र बनाया

फे़सबुक पर खूब सजाया

चर्चा का माहौल बनाया

अगले चुनाव में खड़े हो रहे हम

आप सबको अभी से करते हैं नमन

भीड़ में अकेलापन

एक मुसाफ़िर के रूप में

कहां पूरी हो पाती हैं

जीवन भर यात्राएं

कहां कर पाते हैं

कोई सफ़र अन्तहीन।

लोग कहते हैं

अकेल आये थे

और अकेले ही जाना है

किन्तु

जीवन-यात्रा का

आरम्भ हो

या हो अन्तिम यात्रा, ं

देखती हूं

जाने-अनजाने लोगों की

भीड़,

ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा

समझाते हुए,

जीवन-दर्शन बघारते हुए।

किन्तु इनमें से

कोई भी तो समय नहीं होता

यह सब समझने के लिए।

 

और जब समझने का

समय होता है

तब भीड़ में भी

अकेलापन मिलता है।

दर्शन

तब भी बघारती है भीड़

बस तुम्हारे नकारते हुए

 

एकान्त की ध्वनि

एकान्त काटता है,

एकान्त कचोटता है

किन्तु अपने भीतर के

एकान्त की ध्वनि

बहुत मुखर होती है।

बहुत कुछ बोलती है।

जब सन्नाटा टूटता है

तब कई भेद खोलती है।

भीतर ही भीतर

अपने आप को तलाशती है।

किन्तु हम

अपने आपसे ही डरे हुए

दीवार पार की आवाज़ें तो सुनते हैं

किन्तु अपने भीतर की आवाज़ों को

नकारते हैं

इसीलिए जीवन भर

हारते है।

 

जीवन-दर्शन

चांद-सूरज की रोशनी जीवन की राह दिखाती है।

रात-दिन में बंटे, जीवन का आवागमन समझाती है।

दोनों ही सामना करते हैं अंधेरों और रोशनी का,

यूं ही हमें जीवन-दर्शन समझा-समझा जाती है।

रेखाएं बोलती हैं

घर की सारी

खिड़कियां-दरवाज़े

बन्द रखने पर भी

न जाने कहां से

धूल आ पसरती है

भीतर तक।

जाने-अनजाने

हाथ लग जाते हैं।

शीशों पर अंगुलियां घुमाती हूं,

रेखाएं खींचती हूं।

गर्द बोलने लगती है,

आकृतियों में, शब्दों में।

गर्द उड़ने लगती है

आकृतियां और शब्द

बदलने लगते हैं।

एक साफ़ कपड़े से

अच्छे से साफ़ करती हूं,

किन्तु जहां-तहां

कुछ लकीरें छूट जाती हैं

और फिर आकृतियां बनने लगती हैं,

शब्द घेरने लगते हैं मुझे।

अरे!

डरना क्या!

इसी बात पर मुस्कुरा देने में क्या लगता है।

 
 

तेरी माया तू ही जाने

कभी तो चांद पलट न।

कभी तो सूरज अटक न।

रात-दिन का आभास देते,

तम-प्रकाश का भाव देते,

कभी तो दूर सटक न।

चांद को अक्सर

दिन में देखती हूं,

कभी तो सूरज

रात में निकल न।

तुम्हारा तो आवागमन है

प्रकृति का चलन है

हमने न जाने कितने

भाव बांध लिये हैं

रात-दिन का मतलब

सुख-दुख, अच्छा-बुरा

और न जाने क्या-क्या।

कभी तो इन सबसे

हो अलग न।

तेरी माया तू ही जाने

कभी तो रात-दिन से

भटक न।

 

जब एक तिनका फंसता है

दांत में

जब एक तिनका फंस जाता है

हम लगे रहते हैं

जिह्वा से, सूई से,

एक और तिनके से

उसे निकालने में।

 

किन्तु , इधर

कुछ ऐसा फंसने लगा है गले में

जिसे, आज हम

देख तो नहीं पा रहे हैं,

जो धीरे-धीरे, अदृश्य,

एक अभेद्य दीवार बनकर

घेर रहा है हमें चारों आेर से।

और हम नादान

उसे दांत का–सा तिनका समझकर

कुछ बड़े तिनकों को जोड़-जोड़कर

आनन्दित हो रहे हैं।

किन्तु बस

इतना ही समझना बाकी रह गया है

कि जो कृत्य हम कर रहे हैं

न तो तिनके से काम चलने वाला है

न सूई से और न ही जिह्वा से।

सीधे झाड़ू ही फ़िरेगा

हमारे जीवन के रंगों पर।

 

वक्त की रफ्तार देख कर

वक्त की रफ्तार देख कर
मैंने कहा, ठहर ज़रा,
साथ चलना है मुझे तुम्हारे।
वक्त, ऐसा ठहरा
कि चलना ही भूल गया।

आज इस मोड़ पर समझ आया,
वक्त किसी के साथ नहीं चलता।
वक्त ने बहुत आवाज़ें दी थीं,
बहुत बार चेताया था मुझे,
द्वार खटखटाया था मेरा,
किन्तु न जाने
किस गुरूर में था मेरा मन,
हवा का झोंका समझ कर
उपेक्षा करती रही।

वक्त के साथ नहीं चल पाते हम।
बस हर वक्त
किसी न किसी वक्त को कोसते हैं।
एक भी
ईमानदार कोशिश नहीं करते,
अपने वक्त को,
अपने सही वक्त को पहचानने की ।

अपनी ही प्रतिच्‍छाया को नकारते हैं हम

अपनी छाया को अक्‍सर नकार जाते हैं हम।

कभी ध्‍यान से देखें

तो बहुत कुछ कह जाती है।

डरते हैं हम अपने अकेलेपन से।

किन्‍तु साथ-साथ चलते-चलते

न जाने क्‍या-क्‍या बता जाती है।

अपनी अन्‍तरात्‍मा को तो

बहुत पुकारते हैं हम,

किन्‍तु अपनी ही प्रतिच्‍छाया को

नकारते हैं हम।

नि:शब्‍द साथ-साथ चलते,

बहुत कुछ समझा जाती है।

हम अक्‍सर समझ नहीं पाते,

किन्‍तु अपने आकार में छाया

बहुत कुछ बोल जाती है।

कदम-दर-कदम,

कभी आगे कभी पीछे,

जीवन के सब मोड़ समझाती है।

छोटी-बड़ी होती हुई ,

दिन-रात, प्रकाश-तम के साथ,

अपने आपको ढालती जाती है।

जीवन परिवर्तन का नाम है।

कभी सुख तो कभी दुख,

जीवन में आवागमन है।

समस्‍या बस इतनी सी

क‍ि हम अपना ही हाथ

नहीं पकड़ते

ज़माने भर का सहारा ढूंढने निकल पड़ते हैं।

 

नया सूर्य उदित होगा ही

 

आजकल रोशनियां

डराने लगी हैं,

अंधेरे गहराने लगे हैं।

विपदाओं की कड़ी

लम्बी हो रही है।

इंसान से इंसान

डरने लगा है।

ख़ौफ़ भीतर तक

पसरने लगा है।

राहें पथरीली होने लगी हैं,

पहचान मिटने लगी है।

ज़िन्दगी

बेनाम दिखने लगी है।

 

पर कब चला है इस तरह जीवन।

कब तक चलेगा इस तरह जीवन।

 

जानते हैं हम,

बादल घिरते हैं

तो बरस कर छंटते भी हैं।

बिजली चमकती है

तो रोशनी भी देती है।

 

अंधेरों को

परखने का समय आ गया है।

ख़ौफ़ के साये को

तोड़ने का समय आ गया है।

जीवन बस डर से नहीं चलता,

आशाओं को फिर से

सहेजने का समय आ गया है।

नया सूर्य उदित होने को है,

हाथ बढ़ाओ ज़रा,

हाथ से हाथ मिलाओ ज़रा,

सबको अपना बनाने का

समय आ गया है।

नया सूर्य उदित होगा ही,

अपने लिए तो सब जीते हैं,

औरों के दुख को

अपना बनाने का समय आ गया है।

बस जूझना पड़ता है

मछलियां गहरे पानी में मिलती हैं

किसी मछुआरे से पूछना।

माणिक-मोती पाने के लिए भी

गहरे सागर में

उतरना पड़ता है,

किसी ज्ञानी से बूझना।

किश्तियां भी

मझधार में ही डूबती हैं

किसी नाविक से पूछना।

तल-अतल की गहराईयों में

छिपा है ज्ञान का अपरिमित भंडार,

किसी वेद-ध्यानी से पूछना।

पाताल लोक से

चंद्र-मणि पाने के लिए

कौन-सी राह जाती है,

किसी अध्यवसायी से पूछना।

.

उपलब्धियों को पाने के लिए

गहरे पानी में 

उतरना ही पड़ता है।

जूझना पड़ता है,

सागर की लहरों से,

सहना पड़ता है

मझधार के वेग को,

और आकाश से पाताल

तक का सफ़र तय करना पड़ता है।

और इन कोशिशों के बीच

जीवन में विष मिलेगा

या अमृत,

यह कोई नहीं जानता।

बस जूझना पड़ता है।

 

मन के इस बियाबान में

मन के बियाबान में

जब राहें बनती हैं

तब कहीं समझ पाते हैं।

मौसम बदलता है।

कभी सूखा,

तो कभी

हरीतिमा बरसती है।

जि़न्दगी बस

राहें सुझाती है।

उपवन महकता है,

पत्ती-पत्ती गुनगुन करती है।


फिर पतझड़, फिर सूखा।

 

फिर धरा के भीतर से ,

पनपती है प्यार की पौध।

उसी के इंतजार में खड़े हैं।

मन के इस बियाबान में

एकान्त मन।

 

मेरे हिस्से का सूरज

कैसे कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज खा भी गये।

यूं देखा जाये

तो रोशनी पर सबका हक़ है।

पर सबके पास

अपने-अपने हक का

सूरज भी तो होता है।

फ़िर, क्यों, कैसे

कुछ लोग

मेरे हिस्से का सूरज खा गये।

बस एक बार

इतना ही समझना चाहती हूं

कि गलती मेरी थी कहीं,

या फिर

लोगों ने मेरे हक का सूरज

मुझसे छीन लिया।

शायद गलती मेरी ही थी।

बिना सोचे-समझे

रोशनियां बांटने निकल पड़ी मैं।

यह जानते हुए भी

कि सबके पास

अपना-अपना सूरज भी है।

बस बात इतनी-सी

कि अपने सूरज की रोशनी पाने के लिए

कुछ मेहनत करनी पड़ती है,

उठाने पड़ते हैं कष्ट,

झेलनी पड़ती हैं समस्याएं।

पर जब यूं ही

कुछ रोशनियां मिल जायें,

तो क्यों अपने सूरज को जलाया जाये।

जब मैं नहीं समझ पाई,

इतनी-सी बात।

तो होना यही था मेरे साथ,

कि कुछ लोग

मेरे हिस्से का सूरज खा गये।