आज मौसम मिला

आज मौसम मिला।

मैंने पूछा

आजकल

ये क्या रंग दिखा रहे हो।

कौन से कैलेण्डर पर

अपना रूप बना रहे हो।

अप्रैल में अक्तूबर,

और मई में

अगस्त के दर्शन

करवा रहे हो।

मौसम

मासूमियत से बोला

आजकल

इंसानों की बस्ती में

ज़्यादा रहने लगा था।

माह और तारीखों पर

ध्यान नहीं लगा था।

उनके मन को पढ़ता था

और वैसे ही मौसम रचने लगा था।

अपने और परायों में

भेद समझने में लगा था।

कौन किसका कब हुआ

यह परखने में लगा था।

कब कैसे पल्टी मारी जाती है,

किसे क्यों

साथ लेकर चलना है

और किसे पटखनी मारी जानी है

बस यही समझने में लगा था।

गर्मी, सर्दी, बरसात

तो आते-जाते रहते हैं

मैं तो तुम्हारे भीतर के

पल-पल बदलते मौसम को

समझने में लगा था।

.

इतनी जल्दी घबरा गये।

तुमसे ही तो सीख रहा हूँ।

पल में तोला,पल में माशा

इधर पंसेरी उधर तमाशा।

अभी तो शुरुआत है प्यारे

आगे-आगे देखिए होता है क्या!!!

 

और जब टूटती है तन्द्रा

चलती हुई घड़ी

जब अचानक ठहर-जी जाती है,

लगता है

जीवन ही ठहर गया।

सूईयाँ अटकी-सी,

सहमी-सी,

कण-कण

खिसकने का प्रयास करती हैं,

अनमनी-सी,

किन्तु फिर वहीं आकर रुक जाती हैं।

हमारी लापरवाही, आलस्य

और काल के महत्व की उपेक्षा,

कभी-कभी भारी पड़ने लगती है

जब हम भूल जाते हैं

कि घड़ी ठहरी हुई,

चुपचाप, उपेक्षित,

हमें निरन्तर देख रही है।

और हम उनींदे-से,

उसकी चुप्पी से प्रभावित

उसके ठहरे समय को ही

सच मान लेते हैं।

और जब टूटती है तन्द्रा

तब तक न जाने कितना कुछ

छूट जाता है

बहुत कुछ बोलती है घड़ी

बस हम सुनना ही नहीं चाहते

इतना बोलने लगे हैं

कि किसी की क्या

अपनी ही आवाज़ से

उकता गये हैं ।

 

 

 

 

 

 

हे सागर, रास्ता दो मुझे

हे सागर, रास्ता दो मुझे

कहा था सतयुग में राम ने।

सागर की राह से

एक युद्ध की भूमिका थी।

कारण कोई भी रहा हो

युद्ध सुनिश्चित था।

किन्तु फिर भी

सागर का 

एक प्रयास

शायद

युद्ध को रोकने का,

और इसी कारण

मना कर दिया था

राम को राह देने के लिए,

राम की शक्ति को

जानते हुए भी।

शायद वह भी चाहता था

कि युद्ध न हो।

 

युद्ध राम-रावण का हो

अथवा कौरवों-पाण्डवों का

विनाश तो होता ही है

जिसे युगों-युगों तक

भोगती हैं

अगली पीढ़ियां।

 

युद्ध कोई भी हो,

अपनों से

या परायों से

एक बार तो

रोकने की कोशिश

करनी ही चाहिए।

 

प्रतिबन्धित स्मृतियाँ

जब-जब

प्रतिबन्धित स्मृतियों ने

द्वार उन्मुक्त किये हैं

मन हुलस-हुलस जाता है।

कुछ नया, कुछ पुराना

अदल-बदलकर

सामने आ जाता है।

जाने-अनजाने प्रश्न

सर उठाने लगते हैं

शान्त जीवन में

एक उबाल आ जाता है।

जान पाती हूँ

समझ जाती हूँ

सच्चाईयों से

मुँह मोड़कर

ज़िन्दगी नहीं निकलती।

अच्छा-बुरा

खरा-खोटा,

सुन्दर-असुन्दर

सब मेरा ही है

कुछ भोग चुकी

कुछ भोगना है

मुँह चुराने से

पीछा छुड़ाने से

ज़िन्दगी नहीं चलती

कभी-न-कभी

सच सामने आ ही जाता है

इसलिए

प्रतीक्षा करती हूँ

प्रतिबन्धित स्मृतियों का

कब द्वार उन्मुक्त करेंगी

और आ मिलेंगी मुझसे

जीवन को

नये अंदाज़ में

जीने का

सबक देने के लिए।

 

 

ज़िन्दगी निकल जाती है

कहाँ जान पाये हम

किसका ध्वंस उचित है

और किसका पालन।

कौन सा कर्म सार्थक होगा

और कौन-सा देगा विद्वेष।

जीवन-भर समझ नहीं पाते

कौन अपना, कौन पराया

किसके हित में

कौन है

और किससे होगा अहित।

कौन अपना ही अरि

और कौन है मित्र।

जब बुद्धि पलटती है

तब कहाँ स्मरण रहते हैं

किसी के

उपदेश और निर्देश।

धर्म और अधर्म की

गाँठे बन जाती हैं

उन्हें ही

बांधते और सुलझाते

ज़िन्दगी निकल जाती है

और एक नये

युद्धघोष की सम्भावना

बन जाती है।

@@googleAddHere

अपने-आपसे करते हैं  हम फ़रेब

अपने-आपसे करते हैं

हम फ़रेब

जब झूठ का

पर्दाफ़ाश नहीं करते।

किसी के धोखे को

सहन कर जाते हैं,

जब हँसकर

सह लेते हैं

किसी के अपशब्द।

हमारी सच्चाई

ईमानदारी का

जब कोई अपमान करता है

और हम

मन मसोसकर

रह जाते हैं

कोई प्रतिवाद नहीं करते।

हमारी राहों में

जब कोई कंकड़ बिछाता है

हम

अपनी ही भूल समझकर

चले रहते हैं

रक्त-रंजित।

औरों के फ़रेब पर

तालियाँ पीटते हैं

और अपने नाम पर

शर्मिंदा होते हैं।

 

 

विचारों का झंझावात

अजब है

विचारों का झंझावात भी

पलट-पलट कर कहता है

हर बार नई बात जी।

राहें, चौराहे कट रहे हैं

कदम भटक रहे हैं

कहाँ से लाऊँ

पत्थरों से अडिग भाव जी।

जब धार आती है तीखी

तब कट जाते हैं

पत्थरों के अविचल भराव भी,

नदियों के किनारों में भी

आते हैं कटाव जी।

और ये भाव तो हवाएँ हैं

कब कहाँ रुख बदल जायेगा

नहीं पता हमें

मूड बदल जाये

तो दुनिया तहस-नहस कर दें

हमारी क्या बात जी।

तो कुछ

आप ही समझाएँ जनाब जी।

 

दिन सभी मुट्ठियों से फ़िसल जायेंगे
किसी ने मुझे कह दिया

दिन

सभी मुट्ठियों से

फ़िसल जायेंगे,

इस डर से

न जाने कब से मैंने

हाथों को समेटना

बन्द कर दिया है

मुट्ठियों को

बांधने से डरने लगी हूँ।

रेखाएँ पढ़ती हूँ

चिन्ह परखती हूँ

अंगुलियों की लम्बाई

जांचती हूँ,

हाथों को

पलट-पलटकर देखती हूँ

पर मुट्ठियाँ बांधने से

डरने लगी हूँ।

इन छोटी -छोटी

दो मुट्ठियों में

कितने समेट लूँगी

जिन्दगी के बेहिसाब पल।

अब डर नहीं लगता

खुली मुट्ठियों में

जीवन को

शुद्ध आचमन-सा

अनुभव करने लगी हूँ,

जीवन जीने लगी हूँ।

 

इक आग बनती है

तीली से तीली जलती है

यूँ ही इक आग बनती है।

छोटी-छोटी चिंगारियों से

दिल जलता है

कभी बुझता है

कभी भड़कता है।

राख के ढेर नहीं बनते

इतनी-सी आग से

किन्तु जले दिल में

कितने पत्थर

और पहाड़ बनते हैं

कुछ सरकते हैं

कुछ खड़े रहते हैं।

और हम, यूँ ही, बात-बेबात

मुस्कुराते रहते हैं।

 

दरकते पहाड़ों के बीच से

भरभराती मिट्टी

बहुत कुछ ले डूबती है

किन्तु कौन समझता है

हमारी इस बेमतलब मुस्कान को।

शुष्कता को जीवन में रोपते  हैं

भावहीन मन,

उजड़े-बिखरे रिश्ते,

नेह के अभाव में

अर्थहीन जीवन,

किसी निर्जन वन-कानन में

अन्तिम सांसे गिन रहे

किसी सूखे वृक्ष-सा

टूटता है, बिखरता है।

बस

वृक्ष नहीं काटने,

वृक्ष नहीं काटने,

सोच-सोचकर हम

शुष्कता को जीवन में

रोपते रहते हैं।

रसहीन ठूंठ को पकड़े,

अपनी जड़ें छोड़ चुके,

दीमक लगी जड़ों को

न जाने किस आस में

सींचते रहते हैं।

 

समय कहता है,

पहचान कर

मृत और जीवन्त में।

नवजीवन के लिए

नवसंचार करना ही होगा।

रोपने होंगे  नये वृ़क्ष,

जैसे सूखे वृक्षों पर फल नहीं आते

पक्षी बसेरा नहीं बनाते

वैसे ही मृत आकांक्षाओं पर

जीवन नहीं चलता।

भावुक न बन।

 

 

 

जब मन में कांटे उगते हैं

हमारी आदतें भी अजीब सी हैं

बस एक बार तय कर लेते हैं

तो कर लेते हैं।

नज़रिया बदलना ही नहीं चाहते।

वैसे मुद्दे तो बहुत से हैं

किन्तु इस समय मेरी दृष्टि

इन कांटों पर है।

फूलों के रूप, रस, गंध, सौन्दर्य

की तो हम बहुत चर्चा करते हैं

किन्तु जब भी कांटों की बात उठती है

तो उन्हें बस फूलों के

परिप्रेक्ष्य में ही देखते हैं।

पता नहीं फूलों के संग कांटे होते हैं

अथवा कांटों के संग फूल।

लेकिन बात दाेनों की अक्सर

साथ साथ होती है।

बस इतना ही याद रखते हैं हम

कि कांटों से चुभन होती है।

हां, होती है कांटों से चुभन।

लेकिन कांटा भी तो

कांटे से ही निकलता है।

आैर कभी छीलकर देखा है कांटे को

भीतर से होता है रसपूर्ण।

यह कांटे की प्रवृत्ति है

कि बाहर से तीक्ष्ण है,

पर भीतर ही भीतर खिलते हैं फूल।

संजोकर देखना इन्हें,

जीवन भर अक्षुण्ण साथ देते है।

और

जब मन में कांटे उगते हैं

तो यह पलभर का उद्वेलन नहीं होता।

जीवन रस

सूख सूख कर कांटों में बदल जाता है।

कोई जान न पाये इसे

इसलिए कांटों की प्रवृत्ति के विपरीत

हम चेहरों पर फूल उगा लेते हैं

और मन में कांटे संजोये रहते हैं ।

 

पुल अपनों और सपनों  के बीच

सारा जीवन बीत गया

इसी उहापोह में

क्या पाया, क्या गंवाया।

बस आकाश ही आकाश

दिखाई देता था

पैर ज़मीन पर न टिकते थे।

मिट्टी को मिट्टी समझ

पैरों तले रौंदते थे।

लेकिन, एक समय आया

जब मिट्टी में हाथ डाला

तो, मिट्टी ने चूल्हा दिया,

घर दिया,

और दिया भरपेट भोजन।

मिट्टी से सने हाथों से ही

साकार हुए वे सारे स्वर्णिम सपने

जो आकाश में टंगे

दिखाई देते थे,

और बन गया एक पुल

ज़मीन और आकाश के बीच।

अपनों और सपनों  के बीच।

 

 

 

समझ लो  क्या होते हैं कुकुरमुत्ते

बस कहने की बात है

बस मुहावरा भर है

कि उगते हैं कुकुरमुत्ते-से।

चले गये वे दिन

जब यहां वहां

जहां-तहां

दिखाई देते थे कुकुरमुत्ते।

लेकिन

अब नहीं दिखाई देते

कुकुरमुत्ते

जंगली नहीं रह गये

अब कुकुरमुत्ते

कीमत हो गई है इनकी

बिकते और खरीदे जाते हैं

वातानुकूलित भवनों में उगते हैं

भाव रखते हैं

ताव रखते हैं

किसी की ज़िन्दगी जीने का

हिसाब रखते हैं

घर-घर  होते हैं कुकुरमुत्ते।

कहने को हैं

सब्जी-भर

समझ सको तो

समझ लो

अब क्या होते हैं कुकुरमुत्ते।

सपनों में जीने लगते हैं

लक्ष्य जितना सरल दिखता है

राहें

उतनी ही कठिन होने लगती हैं।

 

हमें आदत-सी हो जाती है

सब कुछ को

बस यूं ही ले लेने की

अभ्यास और प्रयास

की आदत छोड़ बैठते हैं

सपनों में जीने लगते हैं

लगता है

बस

हाथ बढ़ाएंगे

और चांद पकड़ लेंगे

अपने में खोये

ग्रहण और अमावस को

समझ नहीं पाते हम

सपनों में जीते

चांद को ही दोष देते हैं

सही राह नहीं पकड़ पाते हम।

-

लक्ष्य कठिन हो तो

राहें

आप ही सरल हो जाती हैं

क्योंकि तब हम समझ पाते हैं

चांद की दूरियां

और ग्रहण-अमावस का भाव

जीवन में।

 

 

कूड़े-कचरे में बचपन बिखरा है

आंखें बोलती हैं

कहां पढ़ पाते हैं हम

कुछ किस्से  खोलती हैं

कहां समझ पाते हैं हम

किसी की मानवता जागी

किसी की ममता उठ बैठी

पल भर के लिए

मन हुआ द्रवित

भूख से बिलखते बच्चे

बेसहारा अनाथ

चल आज इनको रोटी डालें

दो कपड़े पुराने साथ।

फिर भूल गये हम

इनका कोई सपना होगा

या इनका कोई अपना होगा,

कहां रहे, क्या कह रहे

क्यों ऐसे हाल में है

हमारी एक पीढ़ी

कूड़े-कचरे में बचपन बिखरा है

किस पर डालें दोष

किस पर जड़ दें आरोप

इस चर्चा में दिन बीत गया !!

 

सांझ हुई

अपनी आंखों के सपने जागे

मित्रों की महफ़िल जमी

कुछ गीत बजे, कुछ जाम भरे

सौ-सौ पकवान सजे

जूठन से पंडाल भरा

अनायास मन भर आया

दया-भाव मन पर छाया

उन आंखों का सपना भागा आया

जूठन के ढेर बनाये

उन आंखों में सपने जगाये

भर-भर उनको खूब खिलाये

एक सुन्दर-सा चित्र बनाया

फे़सबुक पर खूब सजाया

चर्चा का माहौल बनाया

अगले चुनाव में खड़े हो रहे हम

आप सबको अभी से करते हैं नमन

समय आत्ममंथन का

पता नहीं यह कैसे हो गया ?

मुझे, अपने पैरों के नीचे की ज़मीन की

फ़िसलन का पता ही न लगा

और आकाश की उंचाई का अनुमान।

बस एक कल्पना भर थी

एक आकांक्षा, एक चाहत।

और मैंने छलांग लगा दी ।

आकाश कुछ ज़्यादा ही उंचा निकला

और ज़मीन कुछ ज़्यादा ही चिकनी।

मैं थी बेखबर, आकाश पकड़ न सकी

और पैर ज़मीन पर टिके नहीं।

 

दु:ख गिरने का नहीं

क्षोभ चोट लगने का नहीं।

पीड़ा हारने की नहीं।

ये सब तो सहज परिणाम हैं,

अनुभव की खान हैं

किसी की हिम्मत के।

समय आत्ममंथन का।

कितना कठिन होता है

अपने आप से पूछना।

और कितना सहज होता है

किसी को गिरते देखना

उस पर खिलखिलाना

और ताली बजाना।

 

कितना आसान होता है

चारों ओर भीड़ का मजमा लगाना।

ढोल बजा बजा कर दुनिया को बताना।

जख़्मों को कुरेद कुरेद कर दिखाना।

 

और कितना मुश्किल होता है

किसी के जख़्मों की तह तक जाना

उसकी राह में पड़े पत्थरों को हटाना

और सही मौके पर सही राह बताना।

 

 

 

एकान्त की ध्वनि

एकान्त काटता है,

एकान्त कचोटता है

किन्तु अपने भीतर के

एकान्त की ध्वनि

बहुत मुखर होती है।

बहुत कुछ बोलती है।

जब सन्नाटा टूटता है

तब कई भेद खोलती है।

भीतर ही भीतर

अपने आप को तलाशती है।

किन्तु हम

अपने आपसे ही डरे हुए

दीवार पार की आवाज़ें तो सुनते हैं

किन्तु अपने भीतर की आवाज़ों को

नकारते हैं

इसीलिए जीवन भर

हारते है।

 

जीवन-दर्शन

चांद-सूरज की रोशनी जीवन की राह दिखाती है।

रात-दिन में बंटे, जीवन का आवागमन समझाती है।

दोनों ही सामना करते हैं अंधेरों और रोशनी का,

यूं ही हमें जीवन-दर्शन समझा-समझा जाती है।

मौत कब आयेगी

कहते हैं

मौत कब आयेगी

कोई नहीं जानता

किन्तु

रावण जानता था

कि उसकी मौत कब आयेगी

और कौन होगा उसका हंता।

 

प्रश्न यह नहीं

कि उद्देश्य क्या रहा होगा,

चिन्तन यह कि

जब संधान होगा

तब कुछ तो घटेगा ही।

और यूंही तो

नहीं साधा होगा निशाना

कुछ तो मन में रहा होगा ही।

जब तीर छूटेगा

तो निशाने पर लगे

या न लगे

कहीं तो लगेगा ही

फिर वह

मछली की आंख हो अथवा

पिता-पुत्र की देह।

 

तेरी माया तू ही जाने

कभी तो चांद पलट न।

कभी तो सूरज अटक न।

रात-दिन का आभास देते,

तम-प्रकाश का भाव देते,

कभी तो दूर सटक न।

चांद को अक्सर

दिन में देखती हूं,

कभी तो सूरज

रात में निकल न।

तुम्हारा तो आवागमन है

प्रकृति का चलन है

हमने न जाने कितने

भाव बांध लिये हैं

रात-दिन का मतलब

सुख-दुख, अच्छा-बुरा

और न जाने क्या-क्या।

कभी तो इन सबसे

हो अलग न।

तेरी माया तू ही जाने

कभी तो रात-दिन से

भटक न।

 

जब एक तिनका फंसता है

दांत में

जब एक तिनका फंस जाता है

हम लगे रहते हैं

जिह्वा से, सूई से,

एक और तिनके से

उसे निकालने में।

 

किन्तु , इधर

कुछ ऐसा फंसने लगा है गले में

जिसे, आज हम

देख तो नहीं पा रहे हैं,

जो धीरे-धीरे, अदृश्य,

एक अभेद्य दीवार बनकर

घेर रहा है हमें चारों आेर से।

और हम नादान

उसे दांत का–सा तिनका समझकर

कुछ बड़े तिनकों को जोड़-जोड़कर

आनन्दित हो रहे हैं।

किन्तु बस

इतना ही समझना बाकी रह गया है

कि जो कृत्य हम कर रहे हैं

न तो तिनके से काम चलने वाला है

न सूई से और न ही जिह्वा से।

सीधे झाड़ू ही फ़िरेगा

हमारे जीवन के रंगों पर।

 

झूठ के बल पर

सत्य सदैव प्रमाण मांगता है,
और हम इस डर से, 
कि पता नहीं 
सत्य प्रमाणित हो पायेगा 
या नहीं,
झूठ के बल पर
बेझिझक जीते हैं।
तब हमें 
न सत्य की आंच सहनी पड़ती है,
न किसी के सामने
हाथ फैलाने पड़ते हैं।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी
नहीं ढोने पड़ते हैं
आरोपप्रत्‍यारोप,  
न कोई आहुति , न बलिदान,
न अग्नि-परीक्षाएं 

न पाषाण होने का भय।
नि:शंक जीते हैं हम । 

और न अकेलेपन की समस्‍या । 
एक ढूंढो
हज़ारों मिलेंगे साथ चलने के लिए। 

 

अपनी ही प्रतिच्‍छाया को नकारते हैं हम

अपनी छाया को अक्‍सर नकार जाते हैं हम।

कभी ध्‍यान से देखें

तो बहुत कुछ कह जाती है।

डरते हैं हम अपने अकेलेपन से।

किन्‍तु साथ-साथ चलते-चलते

न जाने क्‍या-क्‍या बता जाती है।

अपनी अन्‍तरात्‍मा को तो

बहुत पुकारते हैं हम,

किन्‍तु अपनी ही प्रतिच्‍छाया को

नकारते हैं हम।

नि:शब्‍द साथ-साथ चलते,

बहुत कुछ समझा जाती है।

हम अक्‍सर समझ नहीं पाते,

किन्‍तु अपने आकार में छाया

बहुत कुछ बोल जाती है।

कदम-दर-कदम,

कभी आगे कभी पीछे,

जीवन के सब मोड़ समझाती है।

छोटी-बड़ी होती हुई ,

दिन-रात, प्रकाश-तम के साथ,

अपने आपको ढालती जाती है।

जीवन परिवर्तन का नाम है।

कभी सुख तो कभी दुख,

जीवन में आवागमन है।

समस्‍या बस इतनी सी

क‍ि हम अपना ही हाथ

नहीं पकड़ते

ज़माने भर का सहारा ढूंढने निकल पड़ते हैं।