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अब क्या लिखें आज मन की बात। लिखने में संकोच भी होता है और लिखे बिना रहा भी नहीं जा सकता। अब हर किसी से तो अपने मन की पीड़ा बांटी नहीं जा सकती। कुछ ही तो मित्र हैं जिनसे मन की बात कह लेती हूं।

तो लीजिए कल फिर एक दुर्घटना घट गई एक मंच पर मेरे साथ। बहुत-बहुत ध्यान रखती  हूं प्रतिक्रियाएं लिखते समय, किन्तु इस बार एक अन्य रूप में मेरी प्रतिक्रिया मुझे धोखा दे गई।

 हुआ यूं कि एक कवि महोदय की रचना मुझे बहुत पसन्द आई। हम प्रंशसा में प्रायः  लिख देते हैं: ‘‘बहुत अच्छी रचना’’, ‘‘सुन्दर रचना’’, आदि-आदि। मैं लिख गई ‘‘ बहुत सुन्दर, बहुत खूबसूरत’’ ^^रचना** शब्द कापी-पेस्ट में छूट गया।

मेरा ध्यान नहीं गया कि कवि महोदय ने अपनी कविता के साथ अपना सुन्दर-सा चित्र भी लगाया था।

लीजिए हो गई हमसे गलती से मिस्टेक। कवि महोदय की प्रसन्नता का पारावार नहीं, पहले मैत्री संदेश आया, हमने देखा कि उनके 123 मित्र हमारी भी सूची में हैं, कविताएं तो उनकी हम पसन्द करते ही थे। हमने सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी।

बस !! लगा संदेश बाक्स घनघनाने, आने लगे चित्र पर चित्र, कविताओं पर कविताएं, प्रशंसा के अम्बार, रात दस बजे मैसेंजर बजने लगा। मेरी वाॅल से मेरी ही फ़ोटो उठा-उठाकर मेरे संदेश बाक्स में आने लगीं। समझाया, लिखा, कहा पर कोई प्रभाव नहीं।

वेसे तो हम ऐसे मित्रों को  Block कर देते हैं किन्तु इस बार एक नया उपाय सूझा।

हमने अपना आधार कार्ड भेज दिया,

अब हम Blocked  हैं।

  

ज़िन्दगी लगती बेमानी है

जन्म की अजब कहानी है, मरण से जुड़ी रवानी है।

श्मशान घाट में जगह नहीं, खो चुके ज़िन्दगानी हैं।

पंक्तियों में लगे शवों का टोकन से होगा संस्कार,

फ़ुटपाथ पर लगी पंक्तियां, ज़िन्दगी लगती बेमानी है।

राख पर किसी का नाम नहीं होता

युद्ध की विभीषिका

देश, शहर

दुनिया या इंसान नहीं पूछती

बस पीढ़ियों को

बरबादी की राह दिखाती है।

हम समझते हैं

कि हमने सामने वाले को

बरबाद कर दिया

किन्तु युद्ध में

इंसान मारने से

पहले भी मरता है

और मारने के बाद भी।

बच्चों की किलकारियाँ

कब रुदन में बदल जाती हैं

अपनों को अपनों से दूर ले जाती हैं

हम समझ ही नहीं पाते।

और जब तक समझ आता है

तब तक

इंसानियत

राख के ढेर में बदल चुकी होती है

किन्तु हम पहचान नहीं पाते

कि यह राख हमारी है

या किसी और की।

 

 

 

बड़े-बड़े कर रहे आजकल

बड़े-बड़े कर रहे आजकल बात बहुत साफ़-सफ़ाई की

शौचालय का विज्ञापन करके, करते खूब कमाई जी

इनकी भाषा, इनके शब्दों से हमें  घिन आती है

बात करें महिलाओं की और करते आंख सिकाई जी

 

पूछती है मुझसे मेरी कलम

राष्ट्र भक्ति के गीत लिखने के लिए कलम उठाती हूं जब जब

पूछती है मुझसे मेरी कलम, देश हित में तूने क्‍या किया अब तक

भ्रष्ट्राचार, झूठ, रिश्वतखोरी,अनैतकिता के विरूद्ध क्या लड़ी कभी

गीत लिखकर महान बनने की कोशिश करोगे कवि तुम कब तक

मन वन-उपवन में

यहीं कहीं

वन-उपवन में

घन-सघन वन में

उड़ता है मन

तिेतली के संग।

न गगन की उड़ान है

न बादलों की छुअन है

न चांद तारों की चाहत है

इधर-उधर

रंगों से बातें होती हैं

पुष्पों-से भाव

खिल- खिल खिलते हैं

पत्ती-पत्ती छूते हैं

तृण-कंटक हैं तो क्या,

वट-पीपल तो क्या,

सब अपने-से लगते हैं।

बस यहीं कहीं

आस-पास

ढूंढता है मन अपनापन

तितली के संग-संग

घूमता है मन

सुन्दर वन-उपवन में।

जब प्रेम कहीं से मिलता है

अनबोले शब्दों की चोटें

भावों को ठूंठ बना जाती हैं।

कब रस-पल्लव झड़ गये

जान नहीं पाते हैं।

जब प्रेम कहीं से मिलता है,

तब मन कोमल कोंपल हो जाता है।

रूखे-रूखे भावों से आहत,

मन तरल-तरल हो जाता है।

बिखरे सम्बन्धों के तार कहीं जुड़ते हैं।

जीवन हरा-भरा हो जाता है।

मुस्काते हैं कुछ नव-पल्ल्व,

कुछ कलियां करवट लेती हैं,

जीवन इक खिली-खिली

बगिया-सा हो जाता है।

    

एक आदमी मरा

एक आदमी मरा।

अक्सर एक आदमी मरता है।

जब तक वह जिंदा  था

वह बहुत कुछ था।

उसके बार में बहुत सारे लोग

बहुत-सी बातें जानते थे।

वह समझदार, उत्तरदायी

प्यारा इंसान था।

उसके फूल-से कोमल दो बच्चे थे।

या फिर वह शराबी, आवारा बदमाश था।

पत्नी को पीटता था।

उसकी कमाई पर ऐश करता था।

बच्चे पैदा करता था।

पर बच्चों के दायित्व के नाम पर

उन्हें हरामी के पिल्ले कहता था।

वह आदमी एक औरत का पति था।

वह औरत रोज़ उसके लिए रोटी बनाती थीं,

उसका बिस्तर बिछाती थी,

और बिछ जाती थी।

उस आदमी के मरने पर

पांच सौ आदमी

उसकी लाश के आस-पास एकत्र थे।

वे सब थे, जो उसके बारे में

कुछ भी जानते थे।

वे सब भी थे

जो उसके बारे में तो नहीं जानते थे

किन्तु उसकी पत्नी और बच्चों के बारे

में कुछ जानते थे।

कुछ ऐसे भी थे जो कुछ भी नहीं जानते थे

लेकिन फिर भी वहां थे।

उन पांच सौ   लोगों में

एक भी ऐसा आदमी नहीं था,

जिसे उसके मरने का

अफ़सोस न हो रहा हो।

लेकिन अफ़सोस का कारण

कोई नहीं बता पा रहा था।

अब उसकी लाश ले जाने का

समय आ गया था।

पांच सौ आदमी छंटने लगे थे।

श्‍मशान घाट तक पहुंचते-पहुंचते

बस कुछ ही लोग बचे थे।

लाश   जल रही थी,भीड़ छंट रही थी ।

एक आदमी मरा। एक औरत बची।

 

पता नहीं वह कैसी औरत थी।

अच्छी थी या बुरी

गुणी थी या कुलच्छनी।  

पर एक औरत बची।

एक आदमी से

पहचानी जाने वाली औरत।

अच्छे या बुरे आदमी की एक औरत।

दो अच्छे बच्चों की

या फिर हरामी पिल्लों की मां।

अभी तक उस औरत के पास

एक आदमी का नाम था।

वह कौन था, क्या था,

अच्छा था या बुरा,

इससे किसी को क्या लेना।

बस हर औरत के पीछे

एक अदद आदमी का नाम होने से ही

कोई भी औरत

एक औेरत हो जाती है।

और आदमी के मरते ही

औरत औरत न रहकर

पता नहीं क्या-क्या बन जाती है।

-

अब उस औरत को

एक नया आदमी मिला।

क्या फर्क पड़ता है कि वह

चालीस साल का है

अथवा चार साल का।

आदमी तो आदमी ही होता है।

 

उस दिन  हज़ार से भी ज़्यादा

आदमी एकत्र थे।

एक चार साल के आदमी को

पगड़ी पहना दी गई।

सत्ता दी गई उस आदमी की

जो मरा था।

अब वह उस मरे हुए आदमी का

उत्तरााधिकारी था ,

और उस औरत का भी।

उस नये आदमी की सत्ता की सुरक्षा के लिए

औरत का रंगीन दुपट्टा

और कांच की चूड़ियां उतार दी गईं।

-

एक आदमी मरा।

-

नहीं ! एक औरत मरी।

 

किस असमंजस में पड़ी है ज़िन्दगी

गत-आगत के मोह से जुड़ी है ज़िन्दगी

स्मृतियों के जोड़ पर खड़ी है ज़िन्दगी

मीठी-खट्टी जो भी हैं, हैं तो सब अपनी

जाने किस असमंजस में पड़ी है ज़िन्दगी

सन्दर्भ तो बहुत थे

जीवन में

सन्दर्भ तो बहुत थे

बस उनको भावों से

जोड़ ही नहीं पाये।

कब, कहाँ, कौन-सा

सन्दर्भ छूट गया,

कौन-सा विफ़ल रहा,

समझ ही नहीं पाये।

ऐसा क्यों हुआ

कि प्रेम, मनुहार

अपनापन

विश्वास और आस भी

सन्दर्भ बनते चले गये

और हम जीवन-भर

न जाने कहाँ-कहाँ

उलझते-सुलझते रह गये।

 

चूड़ियां उतार दी मैंने

चूड़ियां उतार दी मैंने, सब कहते हैं पहनने वाली नारी अबला होती है

यह भी कि प्रदर्शन-सजावट के पीछे भागती नारी कहां सबला होती है

न जाने कितनी कहावतें, मुहावरे बुन दिये इस समाज ने हमारे लिये

सहज साज-श्रृंगार भी यहां न जाने क्यों बस उपहास की बात होती है

चूड़ी की हर खनक में अलग भाव होते हैं,कभी आंसू,  कभी  हास होते हैं

कभी न समझ सका कोई, यहां तो नारी की हर बात उपहास होती है

प्रणाम तुम्हें करती हूं

हे भगवान!

इतना उंचा मचान।

सारा तेरा जहान।

कैसी तेरी शान ।

हिमगिरि के शिखर पर

 बैठा तू महान।

 

कहते हैं

तू कण-कण में बसता है।

जहां रहो

वहीं तुझमें मन रमता है।

फिर क्यों

इतने उंचे शिखरों पर

धाम बनाया।

दर्शनों के लिए

धरा से गगन तक

इंसान को दौड़ाया।

 

ठिठुरता है तन।

कांपता है मन।

 

हिम गिरता है।

शीत में डरता है।

 

मन में शिवधाम सृजित करती हूं।

 

यहीं से प्रणाम तुम्हें करती हूं।

 

​​​​​​​ससम्मान बात करनी पड़ती है

पता नहीं वह धोबी कहां है

जिस पर यह मुहावरा बना था

घर का न घाट का।

वैसे इस मुहावरे में

दो जीव भी हुआ करते थे।

जब से समझ आई है

यही सुना है

कि धोबी के गधे हुआ करते थे

जिन पर वे

अपनी गठरियां ठोते थे।

किन्तु मुहावरे से

गर्दभ जी तो गायब हैं

हमारी जिह्वा पर

श्वान महोदय रह गये।

 

और आगे सुनिये मेरा दर्शन।

धोबी के दर्शन तो

कभी-कभार

अब भी हो जाते हैं

किन्तु गर्दभ और श्वान

दोनों ही

अपने-अपने

अलग दल बनाकर

उंचाईयां छू रहे हैं।

इसीलिए जी का प्रयोग किया है

ससम्मान बात करनी पड़ती है।

 

 

 

 

नये सिरे से

मां कहती थी

किसी जाते हुए को

पीठ पीछे पुकारना अपशगुन होता है।

और यदि कोई तुम्हें पुकार भी ले

तो अनसुना करके चले जाना,

पलटकर मत देखना, उत्तर मत देना।

लेकिन, मैं क्या करूं इन आवाजों का

जो मेरी पीठ पीछे

मुझे निरन्तर पुकारती हैं,

मैं मुड़कर नहीं देखती

अनसुना कर आगे बढ़ जाती हूं।

तब वे आवाजें

मेरे पीछे दौड़ने लगती हैं,

उनके कदमों की धमक

मुझे डराने लगती है।

मैं और तेज दौडने लगती हूं।

तब वे आवाजें

एक शोर का रूप लेकर

मेरे भीतर तक उतर जाती हैं,

मेरे दिल-दिमाग को झिंझोड़ते हुये।

मैं फिर भी नहीं रूकती।

किन्तु इन आवाजों की गति

मुझसे कहीं तेज है।

वे आकर

मेरी पीठ से टकराने लगती हैं,

भीतर तक गहराती हैं

बेधड़क मेरे शरीर में।

सामने आकर राह रोक लेती हैं मेरा।

पूछने लगती हैं मुझसे

वे सारे प्रश्न,

जिन्हें हल न कर पाई मैं जीवन-भर,

इसीलिए नकारती आई थी उन्हें,

छोड़ आई थी कहीं अनुत्तरित।

जीवन के इस मोड़ पर ,

अब क्या करूंगी इनका समाधान,

और क्या उपलब्धि प्राप्त कर लूंगी,

पूछती हूं अपने-आपसे ही।

किन्तु इन आवाजों को

मेरा यह पलायन का स्वर भाता नहीं।

अंधायुग में कृष्ण ने कहा था

“समय अब भी है, अब भी समय है

हर क्षण इतिहास बदलने का क्षण होता है”।

किन्तु

उस महाभारत में तो

कुरूक्षेत्र के रणक्षेत्र में

अट्ठारह अक्षौहिणी सेना थी।

 

और यहां अकेली मैं।

मेरे भीतर ही हैं सब कौरव-पांडव,

सारे चक्र-कुचक्र और चक्रव्यूह,

अट्ठारह दिन का युद्ध,

अकेली ही लड़ रही हूं।

 

तो क्या मुझे

मां की सीख को अनसुना कर,

पीछे मुड़कर

इन आवाजों को,

फिर से,

नये सिरे से भोगना होगा,

अपने जीवन का वह हर पल,

जिससे भाग रही थी मैं

जिन्हें मैंने इतिहास की वस्तु समझकर

अपने जीवन का गुमशुदा हिस्सा मान लिया था।

मां ! तू अब है नहीं

कौन बतायेगा मुझे !!!

 

जीवन महकता है

जीवन महकता है

गुलाब-सा

जब मनमीत मिलता है

अपने ख्वाब-सा

रंग भरे

महकते फूल

जीवन में आस देते हैं

एक विश्वास देते हैं

अपनेपन का आभास देते हैं।

सूखेंगे कभी ज़रूर

सूखने देना।

पत्ती –पत्ती सहेजना

यादों की, वादों की

मधुर-मधुर भावों से

जीवन-भर यूं ही मन हेलना ।

 

प्रकृति के प्रपंच

प्रकृति भी न जाने कहां-कहां क्या-क्या प्रपंच रचा करती है

पत्थरों को जलधार से तराश कर दिल बना दिया करती है

कितना भी सजा संवार लो इस दिल को रंगीनियों से तुम

बिगड़ेगा जब मिज़ाज उसका, पल में सब मिटा दिया करती है

शब्द  और  भाव

बड़े सुन्दर भाव हैं

दया, करूणा, कृपा।

किन्तु कभी-कभी

कभी-कभी क्यों,

अक्सर

आहत कर जाते हैं

ये भाव

जहां शब्द कुछ और होते हैं

और भाव कुछ और।

अब शब्दों के अर्थ व्यर्थ हो गये हैं

शब्दकोष में अब शब्दों के अर्थ

व्यर्थ हो गये हैं।

हर शब्द 

एक नई अभिव्यक्ति लेकर आया है।

जब कोई कहना है अब चारों ओर शांति है

तो मन डरता है

कोई उपद्रव हुआ होगा, कोई दंगा या मारपीट।

और जब समाचार गूंजता है

पुलिस गश्त कर रही है, स्थिति नियन्त्रण में है

तो स्पष्ट जान जाते हैं हम

कि बाहर कर्फ्यू है, कुछ घर जले हैं

कुछ लोग मरे हैं, सड़कों पर  घायल पड़े हैं।

शायद, सेना का फ्लैग मार्च हुआ होगा

और हमें अब अपने आपको

घर में बन्द करना होगा ।

अहिंसा के उद्घोष से

घटित हिंसा का बोध होता है।

26 जनवरी, 15 अगस्त जैसे दिन

और बुद्ध, नानक, कबीर, गांधी, महावीर के नाम पर

मात्र एक अवकाश का एहसास होता है

न कि किसी की स्मृति, ज्ञान, शिक्षा, बलिदान का।

धर्म-जाति, धर्मनिरप्रेक्षता, असाम्प्रदायिकता,

सद्भाव, मानवता, समानता, मिलन-समारोह

जैसे शब्द डराते हैं अब।

वहीं, आरोपी, अपराधी, लुटेरे,

स्कैम, घोटाले जैसे शब्द

अब बेमानी हो गये हैं

जो हमें न डराते हैं, और न ही झिंझोड़ते हैं।

“वन्दे मातरम्” अथवा “भारत माता की जय”

के उद्घोष से हमारे भीतर

देश-भक्ति की लहर नहीं दौड़ती

अपितु अपने आस-पास

किसी दल का एहसास खटकता है

और प्राचीन भारतीय योग पद्धति के नाम पर

हमारा मन गर्वोन्नत नहीं होता

अपितु एक अर्धनग्न पुरूष गेरूआ कपड़ा ओढ़े

घनी दाढ़ी और बालों के साथ

कूदता-फांदता दिखाई देता है

जिसने कभी महिला वस्त्र धारण कर

पलायन किया था।

कोई मुझे “बहनजी” पुकारता है

तो मायावती होने का एहसास होता है

और “पप्पू” का अर्थ तो आप जानते ही हैं।

 

कुछ ज़्यादा तो नहीं हो गया।

कहीं आप उब तो नहीं गये

चलो आज यहीं समाप्त करती हूं

बदले अर्थों वाले शब्दकोष के कुछ नये शब्द लेकर

फिर कभी आउंगी

अभी आप इन्हें तो आत्मसात कर लें

और अन्त में, मैं अब

बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार और

सम्मान शब्‍दों   के

नये अर्थों की खोज करने जा रही हूं।

ज्ञात होते ही आपसे फिर मिलूंगी

या फिर उनमें जा मिलूंगी

फिर कहां मिलूंगी ।।।।।।।

 

विचारों का झंझावात

अजब है

विचारों का झंझावात भी

पलट-पलट कर कहता है

हर बार नई बात जी।

राहें, चौराहे कट रहे हैं

कदम भटक रहे हैं

कहाँ से लाऊँ

पत्थरों से अडिग भाव जी।

जब धार आती है तीखी

तब कट जाते हैं

पत्थरों के अविचल भराव भी,

नदियों के किनारों में भी

आते हैं कटाव जी।

और ये भाव तो हवाएँ हैं

कब कहाँ रुख बदल जायेगा

नहीं पता हमें

मूड बदल जाये

तो दुनिया तहस-नहस कर दें

हमारी क्या बात जी।

तो कुछ

आप ही समझाएँ जनाब जी।

 

न उदास हो मन

पथ पर कंटक होते है तो फूलों की चादर भी होती है

जीवन में दुख होते हैं तो सुख की आशा भी होती है

घनघोर घटाएं छंट जाती हैं फिर धूप छिटकती है

न उदास हो मन, राहें कठिन-सरल सब होती हैं

आवागमन में बीत जाता है सारा जीवन

झुलसते हैं पांव, सीजता है मन, तपता है सूरज, पर प्यास तो बुझानी है

न कोई प्रतियोगिता, न जीवटता, विवशता है हमारी, बस इतनी कहानी है

इसी आवागमन में बीत जाता है सारा जीवन, न कोई यहां समाधान सुझाये

और भी पहलू हैं जिन्दगी के, न जानें हम, बस इतनी सी बात बतानी है

समझाने की बात नहीं

आजकल न जाने क्यों

यूं ही 

आंख में पानी भर आता है।

कहीं कुछ रिसता है,

जो न दिखता है,

न मन टिकता है।

कहीं कुछ जैसे

छूटता जा रहा है पीछे कहीं।

कुछ दूरियों का एहसास,

कुछ शब्दों का अभाव।

न कोई चोट, न घाव।

जैसे मिट्टी दरकने लगी है।

नींव सरकने लगी है।

कहां कमी रह गई,

कहां नमी रह गई।

कई कुछ बदल गया।

सब अपना,

अब पराया-सा लगता है।

समझाने की बात नहीं,

जब भीतर ही भीतर

कुछ टूटता है,

जो न सिमटता है

न दिखता है,

बस यूं ही बिखरता है।

एक एहसास है

न शब्द हैं, न अर्थ, न ध्वनि।

दीप प्रज्वलित कर न पाई

मैं चाहकर भी

दीप प्रज्वलित कर न पाई।

घृत भी था, दीप भी था,

पर भाव ला न पाई,

मैं चाहकर भी

दीप प्रज्वलित कर न पाई।

लौ भीतर कौंधती थी,

सोचती रह गई,

समय कब बीत गया

जान ही न पाई।

मैं चाहकर भी

दीप प्रज्वलित कर न पाई।

मित्रों ने गीत गाये,

झूम-झूम नाचे गाये,

कहीं से आरती की धुन,

कहीं से ढोल की थाप

बुला रही थी मुझे

दुख मना रहे हैं या खुशियां

समझ न पाई।

कुछ अफ़वाहें

हवा में प्रदूषण फैला रही थी।

समस्या से जूझ रहे इंसानों को छोड़

धर्म-जाति का विष फैला रही थीं।

लोग सड़कों पर उतर आये,

कुछ पटाखे फोड़े,

पटाखों की रोशनाई

दिल दहला रहीं थी,

आवाज़ें कान फोड़ती थी।

अंधेरी रात में

दूर तक दीप जगमगाये,

पुलिस के सायरन की आवाज़ें

कान चीरती थीं।

दीप हाथ में था

ज्योति थी,

हाथ में जलती शलाका

कब अंगुलियों को छू गई

देख ही न पाई।

सीत्कार कर मैं पीछे हटी,

हाथ से दीप छूटा

भीतर कहीं कुछ और टूटा।

क्या कहूं , कैसे कहूं।

पर ध्यान कहीं और था।

घृत भी था, दीप भी था,

पर भाव ला न पाई,

मैं चाहकर भी

दीप प्रज्वलित कर न पाई।