अनुप्रास अलंकार छन्दमुक्त रचना

अभी भी अक्तूबर में
ठहर ठहर कर
बेमौसम बारिश।
लौट लौट कर 
आती सर्दी।
और ये ओले 
रात फिर रजाई बाहर आई।
धुले कपड़े धूप में सुखाये।
पर खबरों ने खराब किया मन।
बेमौसम बारिश
बरबाद कर गई फ़सलें।
किसानों को कर्ज़
चुकाने में हुई चूक।
सरकार ने सदा की तरह
वो वादे किये
जो जानते थे सब
न निभायेगी सरकार
और टीवी वाले टंकार कर रहे हैं
नेताओं के निराले वादे।
और इस बीच
कितने किसानों ने
कड़वे आंसू पीकर
कर ली अपनी जीवन लीला समाप्त।
और हमने कागज़-कलम उठा ली
किसी कविता मंच पर
कविता लिखने के लिए।


 

जब एक तिनका फंसता है

दांत में

जब एक तिनका फंस जाता है

हम लगे रहते हैं

जिह्वा से, सूई से,

एक और तिनके से

उसे निकालने में।

 

किन्तु , इधर

कुछ ऐसा फंसने लगा है गले में

जिसे, आज हम

देख तो नहीं पा रहे हैं,

जो धीरे-धीरे, अदृश्य,

एक अभेद्य दीवार बनकर

घेर रहा है हमें चारों आेर से।

और हम नादान

उसे दांत का–सा तिनका समझकर

कुछ बड़े तिनकों को जोड़-जोड़कर

आनन्दित हो रहे हैं।

किन्तु बस

इतना ही समझना बाकी रह गया है

कि जो कृत्य हम कर रहे हैं

न तो तिनके से काम चलने वाला है

न सूई से और न ही जिह्वा से।

सीधे झाड़ू ही फ़िरेगा

हमारे जीवन के रंगों पर।

 

न समझे हम न समझे तुम

सास-बहू क्यों रूठ रहीं

न हम समझे न तुम।

पीढ़ियों का है अन्तर

न हम पकड़ें न तुम।

इस रिश्ते की खिल्ली उड़ती,

किसका मन आहत होता,

करता है कौन,

न हम समझें न तुम।

शिक्षा बदली, रीति बदली,

न बदले हम-तुम।

कौन किसको क्या समझाये,

न तुम जानों न हम।

रीतियों को हमने बदला,

संस्कारों को हमने बदला,

नया-नया करते-करते

क्या-क्या बदल डाला हमने,

न हम समझे न तुम।

हर रिश्ते में उलझन होती,

हर रिश्ते में कड़वाहट होती,

झगड़े, मान-मनौवल होती,

पर न बात करें,

न जाने क्यों,

हम और तुम।

जहां बात नारी की आती,

बढ़-बढ़कर बातें करते ,

हास-परिहास-उपहास करें,

जी भरकर हम और तुम।

किसकी चाबी किसके हाथ

क्यों और कैसे

न जानें हम और न जानें हो तुम।

सब अपनी मनमर्ज़ी करते,

क्यों, और क्या चुभता है तुमको,

न समझे हैं हम

और क्यों न समझे तुम।

 

परिवर्तन नियम है

 परिवर्तन नित्य है,

परिवर्तन नियम है

किन्तु कहां समझ पाते हैं हम।

रात-दिन,

दिन-रात में बदल जाते हैं

धूप छांव बन ढलती है

सुख-दुःख आते-जाते हैं

कभी कुहासा कभी झड़ी

और कभी तूफ़ान पलट जाते हैं।

हंसते-हंसते रो देता है मन

और रोते-रोते

होंठ मुस्का देते हैं

जैसे कभी बादलों से झांकता है चांद

और कभी अमावस्या छा जाती है।

सूरज तपता है,

आग उगलता है

पर रोशनी की आस देता है।

जैसे हवाओं के झोंकों से

कली कभी फूल बन जाती है

तो कभी झटक कर

मिट्टी में मिल जाती है।

बड़ा लम्बा उलट-फ़ेर है यह।

कौन समझा है यहां।

 

चल आज लड़की-लड़की खेलें

चल आज लड़की-लड़की खेलें।

-

साल में

तीन सौ पैंसठ दिन।

कुछ तुम्हारे नाम

कुछ हमारे नाम

कुछ इसके नाम

कुछ उसके नाम।

रोज़ सोचना पड़ता है

आज का दिन

किसके नाम?

कुछ झुनझुने लेकर

घूमते हैं हम।

आम से खास बनाने की

चाह लिए

जूझते हैं हम।

समस्याओं से भागते

कुछ नारे

गूंथते हैं हम।

कभी सरकार को कोसते

कभी हालात पर बोलते

नित नये नारे

जोड़ते हैं हम।

हालात को समझते नहीं

खोखले नारों से हटते नहीं

वास्तविकता के धरातल पर

चलते नहीं

सच्चाई को परखते नहीं

ज़िन्दगी को समझते नहीं

उधेड़-बुन में लगे हैं

मन से जुड़ते नहीं

जो करना चाहिए

वह करते नहीं

बस बेचारगी का मज़ा लेते हैं

फिर आनन्द से

अगले दिन पर लिखने के लिए

मचलते हैं।

 

बंधनों का विरोध कर

जीवन बड़ा सरल सहज अपना-सा हो जाता है

रूढ़ियों के प्रतिकार का जब साहस आ जाता है

डरते रहते हैं हम यूं ही समाज की बातों से

बंधनों का विरोध कर मन तुष्टि पा जाता है

बजता था डमरू

कहलाते शिव भोले-भाले थे पर गरल उन्होंने पिया था

विषधर उनके आभूषण थे त्रिशूल हाथ में लिया था

भूत-प्रेत संग नरमुण्डों की माला पहने, बजता था डमरू

त्रिनेत्र खोल तीनों लोकों के दुष्टों का  संहार उन्होंने किया था

अपने मन के संतोष के लिए

न सम्मान के लिए, न अपमान के लिए

कोई कर्म न कीजिए बस बखान के लिए

अपनी-अपनी सोच है, अपनी-अपनी राय

करती हूं बस अपने मन के संतोष के लिए

हां हूं मैं बगुला भक्त

यह हमारी कैसी प्रवृत्ति हो गई है

कि एक बार कोई धारणा बना लेते हैं

तो बदलते ही नहीं।

कभी देख लिया होगा

किसी ने, किसी समय

एक बगुले को, एक टांग पर खड़ा

मीन का भोजन ढूंढते

बस उसी दिन से

हमने बगुले के प्रति

एक नकारात्मक सोच तैयार कर ली।

बीच सागर में

एक टांग पर खड़ा बगुला

इस विस्तृत जल राशि

को निहार रहा है

एकाग्रचित्त, वासी,

अपने में मग्न ।

सोच रहा है

कि जानते नहीं थे क्या तुम

कि जल में मीन ही नहीं होती

माणिक भी होते हैं।

किन्तु मैंने तो 

अपनी उदर पूर्ति के लिए

केवल मीन का ही भक्षण किया

जो तुम भी करते हो।

माणिक-मोती नहीं चुने मैंने

जिनके लिए तुम समुद्र मंथन कर बैठते हो।

और अपने भाईयों से ही युद्ध कर बैठते हो।

अपने ही भ्राताओं से युद्ध कर बैठे।

किसी प्रलोभन में नहीं रहा मैं कभी।

बस एक आदत सी थी मेरी

यूं ही खड़ा होना अच्छा लगता था मुझे

जल की तरलता को अनुभव करता

और चुपचाप बहता रहता।

तुमने भक्त कहा मुझे

अच्छा लगा था

पर जब इंसानों की तुलना के लिए

इसे एक मुहावरा बना दिया

बस उसी दिन आहत हुआ था।

पर अब तो आदत हो गई है

ऐसी बातें सुनने की

बुरा नहीं मानता मैं

क्योंकि

अपने आप को भी जानता हूं

और उपहास करने वालों को भी

भली भांति पहचानता हूं।

 

हाय-हैल्लो मत कहना

यूं क्यों ताड़ रहा है

टुकुर-टुकुर तू मुझको

मम्मी ने मेरी बोला था

किसी लफड़े में मत आ जाना

रूप बदलकर आये कोई

कहे मैं कान्हा हूं

उसको यूं ही

हाय-हैल्लो मत कहना

देख-देख मैं कितनी सुन्दर

कितने अच्छे  मेरे कपड़े

हाअअ!!

तेरी मां ने तुझको कैसे भेजा

हाअअ !!

हाय-हाय, मैं शर्म से मरी जा रही

तेरी कुर्ती क्या मां ने धो दी थी

जो तू यूं ही चला आया

हाअअ!!

जा-जा घर जा

अपनी कुर्ती पहनकर आ

फिर करना मुझसे बात।

पाषाणों में पढ़ने को मिलती हैं

वृक्षों की आड़ से

झांकती हैं कुछ रश्मियां

समझ-बूझकर चलें

तो जीवन का अर्थ

समझाती हैं ये रश्मियां

मन को राहत देती हैं

ये खामोशियां

जीवन के एकान्त को

मुखर करती हैं ये खामोशियां

जीवन के उतार-चढ़ाव को

समझाती हैं ये सीढ़ियां

दुख-सुख के पल आते-जाते हैं

ये समझा जाती हैं ये सीढ़ियां

पाषाणों में

पढ़ने को मिलती हैं

जीवन की अनकही कठोर दुश्वारियां

समझ सकें तो समझ लें

हम ये कहानियां

अपनेपन से बात करती

मन को आश्वस्त करती हैं

ये तन्हाईयां

अपने लिए सोचने का

समय देती हैं ये तन्हाईयां

और जीवन में

आनन्द दे जाती हैं

छू कर जातीं

मौसम की ये पुरवाईयां

होने का एहसास

साथ-साथ होकर भी

आस-पास होकर भी

दिन-रात होकर भी

अक्सर साथ नहीं होते ।n

 

और मीलों दूर बैठै भी

देश-दुनिया बेखबर

दिला जाते हैं

साथ-साथ

अपने आस-पास

होने का एहसास।

 

शब्द  और  भाव

बड़े सुन्दर भाव हैं

दया, करूणा, कृपा।

किन्तु कभी-कभी

कभी-कभी क्यों,

अक्सर

आहत कर जाते हैं

ये भाव

जहां शब्द कुछ और होते हैं

और भाव कुछ और।

इंसान को न धिक्कारो यारो

 

आत्माओं का गुणगान करके इंसान को न धिक्कारो यारो

इंसानियत की नीयत और गुणों में पूरा विश्वास करो यारो

यह जीवन है, अच्छा-बुरा, ,खरा-खोटा तो चला रहेगा

अपनों को अपना लो, फिर जीवन सुगम है, समझो यारो।

राधिके सुजान

अपनी तो हाला भी राधिके सुजान होती है

हमारी चाय भी उनके लिए मद्यपान होती है

कहा हमने चलो आज साथ-साथ आनन्द लें बोले

तुम्हारी सात की,हमारी सात सौ की कहां बात होती है

मन की गुलामी से बड़ी कोई सफ़लता नहीं

 

ऐसा अक्सर क्यों होता है

कि हम

अपनी इच्छाओं,

आकांक्षाओं का

मान नहीं करते

और,

औरों के चेहरे निरखते हैं

कि उन्हें हमसे क्या चाहिए।

.

मेरी इच्छाओं का सागर

अपार है।

अनन्त हैं उसमें लहरें,

किलोल करती हैं

ज्वार-भाटा उठता है,

तट से टकरा-टकराकर

रोष प्रकट करती हैं,

सारी सीमाएं तोड़कर

पूर्णता की आकांक्षा लिए

बार-बार बढ़ती हैं

उठती हैं, गिरती हैं

फिर आगे बढ़ती हैं।

.

अपने मन के गुलाम नहीं बनेंगे

तो पूर्णता की आकांक्षा पूरी कैसे होगी ?

.

अपने मन की गुलामी से बड़ी

कोई सफ़लता नहीं जीवन में।

 

प्रश्न सुलझा नहीं पाती मैं

वैसे तो

आप सबको

बहुत बार बता चुकी हूँ

कि समझ ज़रा छोटी है मेरी।

आज फिर एक

नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ

मेरे सामने।

पता नहीं क्यों

बहुत छोटे-छोटे प्रश्न

सुलझा नहीं पाती मैं

इसलिए

बड़े प्रश्नों से तो

उलझती ही नहीं मैं।

जब हम छोटे थे

तब बस इतना जानते थे

कि हम बच्चे हैं

लड़का-लड़की

बेटा-बेटी तो समझ ही नहीं थी

न हमें

न हमारे परिवार वालों को।

न कोई डर था न चिन्ता।

पूजा-वूजा के नाम पर

ज़रूर लड़कियों की

छंटाई हुआ करती थी

किन्तु और किसी मुद्दे पर

कभी कोई बात

होती हो

तो मुझे याद नहीं।

 

अब आधुनिक हो गये हैं हम

ठूँस-ठूँसकर भरा जाता है

सोच में

लड़का-लड़की एक समान।

बेटा-बेटी एक समान।

किसी को पता हो तो

बताये मुझे

अलग कब हुए थे ये।

 

तू अपने मन की कर

चाहे कितना काम करें, कोर-कसर तो रहती है

दुनिया का काम है कहना, कहती ही रहती है

तू अपने मन की कर, तू अपने मन से कर

कोई क्या कहता है, चिन्ता जाती रहती है।

युगे-युगे

मां ने कहा मीठे वचन बोलाकर

अमृत होता है इनमें

सुनने वाले को जीवन देते हैं ।

-

पिता ने कहा

चुप रहा कर

ज़माने की धार-से बोलने लगी है  अभी से।

वैसे भी

लड़कियों का कम बोलना ही

अच्छा होता है।

-

यह सब लिखते हुए

मैं बताना तो नहीं चाहती थी

अपनी लड़की होने की बात।

क्योंकि यह पता लगते ही

कि बात कहने वाली लड़की है,

सुनने वाले की भंगिमा

बदल जाती है।

-

पर अब जब बात निकल ही गई,

तो बता दूं

लड़की नहीं, शादीशुदा ओैरत हूं मैं।

-

पति ने कहा,

कुछ पढ़ा-लिखाकर,

ज़माने से जुड़।

अखबार,

बस रसोई में बिछाने

और रोटी बांधने के लिए ही नहीं होता,

ज़माने भर की जानकारियां होती हैं इसमें,

कुछ अपना दायरा बढ़ा।

-

मां की गोद में थी

तब मां की सुनती थी।

पिता का शासनकाल था

तब उनका कहना माना।

और अब, जब

पति-परमेश्वर कह रहे हैं

तब उनका कहना सिर-माथे।

मां के दिये, सभी धर्म-ग्रंथ

उठाकर रख दिये मैंने ताक पर,

जिन्हें, मेरे समाज की हर औरत

पढ़ती चली आई है

पतिव्रता,

सती-सीता-सावित्री बनने के लिए।

और सुबह की चाय के साथ

समाचार बीनने लगी।

-  

माईक्रोवेव के युग में

मेरी रसोई

मिट्टी के तेल के पीपों से भर गई।

मेरा सारा घर

आग की लपटों से घिर गया।

आदिम युग में

किस तरह भूना जाता होगा

मादा ज़िंदा मांस,

मेरी जानकारी बढ़ी।

 

औरत होने के नाते

मेरी भी हिस्सेदारी थी इस आग में।

किन्तु, कहीं कुछ गलत हो गया।

आग, मेरे भीतर प्रवेश कर गई।

भागने लगी मैं पानी की तलाश में।

एक फावड़ा ओैर एक खाली घड़ा

रख दिया गया मेरे सामने

जा, हिम्मत है तो कुंआं खोद

ओैर पानी ला।

भरे कुंएं तो कूदकर जान देने के लिए होते हैं।

-

अविवाहित युवतियां

लड़के मांगती हैं मुझसे।

पैदाकर ऐसे लड़के

जो बिना दहेज के शादी कर लें।

या फिर रोज़-रोज़ की नौटंकी से तंग आकर

आत्महत्या के बारे में

विमर्श करती हैं मेरे घर के पंखों से।

मैं पंखे हटा भी दूं,

तो और भी कई रास्ते हैं विमर्श के।

-

मेरे द्वार पर हर समय

खट्-खट् होने लगी है।

घर से निकाल दी गई औरतें

रोती हैं मेरे द्वार पर,

शरण मांगती हैं रात-आधी रात।

टी वी, फ्रिज, स्कूटर,

पैसा मांगती हैं मुझसे।

आदमी की भूख से कैसे निपटें

राह पूछती हैं मुझसे।

-

मेरे घर में

औरतें ही औरतें हो गईं हैं।

-

बीसियों बलात्कारी औरतों के चेहरे

मेरे घर की दीवारों पर

चिपक गये हैं तहकीकात के लिए।

पुलिसवाले,

कोंच-कोंचकर पूछ रहे हैं

उनसे उनकी कहानी।

फिर करके पूछते हैं,

ऐसे ही हुआ था न।

-

निरीह बच्चियां

बार-बार रास्ता भूल जाती हैं

स्कूल का।

ओढ़ने लगती हैं चूनरी।

मां-बाप इत्मीनान की सांस लेते हैं।

-

अस्पतालों में छांटें जाते हैं

लड़के ओैर लड़कियां।

लड़के घर भेज दिये जाते हैं

और लड़कियां

पुनर्जन्म के लिए।

-

अपने ही चाचा-ताउ से

चचेरों-ममेरों से, ससुर-जेठ

यानी जो भी नाते हैं नर से

बचकर रहना चाहिए

कब उसे किससे ‘काम’ पड़े

कौन जाने

फिर पांच वर्ष की बच्ची हो

अथवा अस्सी वर्ष की बुढ़िया

सब काम आ जाती है।

 

यह मैं क्या कर बैठी !

यूंही सबकी मान बैठती हूं।

कुछ अपने मन का करती।

कुछ गुनती, कुछ बुनती, कुछ गाती।

कुछ सोती, कुछ खाती।

मुझे क्या !

कोई मरे या जिये,

मस्तराम घोल पताशा पीये।

यही सोच मैंने छोड़ दी अखबार,

और इस बार, अपने मन से

उतार लिए,

ताक पर से मां के दिये सभी धर्मग्रंथ।

पर यह कैसे हो गया?

इस बीच,

अखबार की हर खबर

यहां भी छप चुकी थी।

यहां भी तिरस्कृत,

घर से निकाली जा रहीं थीं औरतेंै

अपहरण, चीरहरण की शिकार,

निर्वासित हो रही थीं औरतें।

शिला और देवी बन रहीं थीं औरतें।

अंधी, गूंगी, बहरीं,

यहां भी मर रहीं थीं औरतें।

-

इस बीच

पूछ बैठी मुझसे

मेरी युवा होती बेटी

मां क्या पढूं मैं।

मैं खबरों से बाहर लिकली,

बोली,

किसी का बताया

कुछ मत पढ़ना, कुछ मत करना।

जिन्दगी आप पढ़ायेगी तुझे पाठ।

बनी-बनाई राहों पर मत चलना।

किसी के कदमों का अनुगमन मत करना।

जिन्दगी का पाठ आप तैयार करना।

छोड़कर जाना अपने कदमों के निशान

कि सारा इतिहास, पुराण

और धर्म मिट जाये।

मिट जाये वर्तमान।

और मिट जाये

भविप्य के लिए तैयार की जा रही आचार-संहिता,

जिसमें सती, श्रापित, अपमानित

होती हैं औरतें।

शिला मत बनना।

बनाकर जाना शिलाएं ,

कि युग बदल जाये।

 

 

आप स्वयं ही समझदार हैं

निधि के माता-पिता सुनिश्चित थे कि इस बार तो रिश्ता हो ही जायेगा। लड़की कम पढ़ी-लिखी हो, नौकरी न करती हो तो रिश्ता नहीं मिलता। ज़्यादा शिक्षित हो,  अच्छी नौकरी करती हो तो रिश्ता नहीं मिलता।

निधि सोचती कैसी विडम्बना है यह कि उसकी बहन ज़्यादा नहीं पढ़ पाई, नौकरी में उसकी रूचि नहीं थी तो उसकी जहां भी बात चलती थी यही उत्तर मिलता कि आपकी लड़की की योग्यता हमारे लड़के के बराबर नहीं है। अथवा हमें तो नौकरी करने वाली पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए। आजकल की लड़कियां तो बहुत आगे चल रही हैं आपको भी अपनी लड़की को कुछ तो आधुनिक बनाना चाहिए था।

और निधि , उच्च शिक्षा प्राप्त, एक कम्पनी में बड़ी अधिकारी। जहां भी बात करते, पहले ही अस्पष्ट मना हो जाती क्योंकि वह उस लड़के से ज़्यादा पढ़ी और उंचे पद पर अवस्थित दिखती।

निधि समझ नहीं पाती कि विवाह एक व्यक्तित्व, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता से भी उपर है क्या। किन्तु माता-पिता तो सामाजिक-पारिवारिक दायित्व में बंधे थे। वैसे भी समाज लड़की की विवाह योग्य आयु ही देखता है उसकी योग्यता, शिक्षा आदि कुछ नहीं देखता और माता-पिता पर तो दबाव रहता ही है।

इस बार जहां बात चल रही थी, परिवार आधुनिक, सुशिक्षित एवं खुले विचारों के लगते थे। बड़ा परिवार था। परिवार में कोई व्यवसाय में था, कोई सरकारी नौकरी में तो कोई किसी अच्छी कम्पनी में। परिवार की लड़कियां भी उच्च शिक्षा प्राप्त एवं आत्मनिर्भर थीं।  बात भी उनकी ही ओर से उठी थी और सिरे चढ़ती प्रतीत हो रही थी।

आज परिवार मिलने एवं बात करने के लिए आया। युवक, माता-पिता, दो बहनें, एक भाई-भाभी। स्वागत सत्कार के बीच बात होती रही। दोनों ही पक्ष हां की स्थिति में थे।

अनायास ही युवक के पिता बोले कि बाकी सब ठीक है, हमारी कोई मांग भी नहीं है, घर भरा पूरा है कि सात पीढ़ियां बैठकर खा सकती हैं। बस हमारी एक ही शर्त है।

हमारे घर की बहुएं नौकरी नहीं करतीं । सब हक्के बक्के रह गये। एक-दूसरे का मुंह देखते रह गये। निधि के पिता ही बोले कि आप तो पहले से ही जानते हैं कि निधि एक अच्छी कम्पनी में उच्च पदाधिकारी है, इतना वेतन है, जानते हुए ही आपने बात की थी तो अब आप क्यों आपत्ति कर रहे हैं। वह तो  नौकरी करना चाहती है।

कुछ अजीब से एवं तिरस्कारपूर्ण स्वर में उत्तर आया , जी हां, विवाह से पहले तो यह सब चलता है किन्तु विवाह के बाद लड़की दस घंटे नौकरी करेगी तो घर-बार क्या सम्हालेगी। और वेतन की बात क्या है, हमारे पास तो इतना है कि सात पीढ़ियां बैठकर खायें।

अचानक निधि उठ खड़ी हुई और बोली कि जब आपके पास इतना है कि सात पीढ़ियां बैठकर खायें तो आपके परिवार के लड़के क्यों काम कर रहे हैं, वे भी बैठकर क्यों नहीं खाते। वे दस-दस, बारह-बारह घंटे घर से बाहर क्यों काम करते हैं। क्या घर के प्रति उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं।

उसके बाद क्या हुआ होगा और क्या होता आया है मुझे बताने की आवश्यकता नहीं, आप स्वयं ही समझदार हैं।

कोई हमें आंख दिखाये  सह नहीं सकते

त्याग, अहिंसा, शांति के नाम पर आज हम पीछे हट नहीं सकते

शक्ति-प्रदर्शन चाहिए, किसी की चेतावनियों से डर नहीं सकते

धरा से गगन तक एक आवाज़ दी है हमने, विश्व को जताते हैं

आत्मरक्षा में सजग, कोई हमें आंख दिखायेसह नहीं सकते

 

एक मानवता को बसाने में

ये धुएँ का गुबार

और चमकती रोशनियाँ

पीढ़ियों को लील जाती हैं

अपना-पराया नहीं पहचानतीं

बस विध्वंस को जानती हैं।

किसी गोलमेज़ पर

चर्चा अधूरी रह जाती है

और परिणामस्वरूप

धमाके होने लगते हैं

बम फटने लगते हैं

लोग सड़कों-राहों पर

मरने लगते हैं।

क्यों, कैसे, किसलिए

कुछ नहीं होता।

शताब्दियाँ लग जाती हैं

एक मानवता को बसाने में

और पल लगता है

उसको उजाड़ कर चले जाने में।

फिर मलबों के ढेर में

खोजते हैं

इंसान और इंसानियत,

कुछ रुपये फेंकते हैं

उनके मुँह पर

ज़हरीले आंसुओं से सींचते हैं

उनके घावों को

बदले की आग में झोंकते हैं

उनकी मानसिकता को

और फिर एक

गोलमेज़ सजाने लगते हैं।

 

श्वेत हंसों का जोड़ा

अपनी छाया से मोहित मन-मग्न हुआ हंसों का जोड़ा

चंदा-तारों को देखा तो कुछ शरमाया हंसों का जोड़ा

इस मिलन की रात को देख चंदा-तारे भी मग्न हुए

नभ-जल की नीलिमा में खो गया श्वेत हंसों का जोड़ा