जिजीविषा

आम के आम

गुठलियों के दाम मिलें

और आम से आम मिलें

तो और क्या चाहिए जीवन में।

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जीवन-अंकुरण

प्रकृति का स्व-नियम है।

प्रकृति नियम बनाती है

किन्तु जब चाहे

अपने मन से

बदल भी देती है।

नई राहें

आप ही ढूॅंढती है प्रकृति।

जिजीविषा, जाने

किसके भीतर कहां तक है,

हमें समझाती है प्रकृति।

आशाओं का आकाश बड़ा है

जीवन का आधार बड़ा है

हमें बताती है प्रकृति।

डर मत

यहाॅं नहीं तो वहाॅं

कहीं कहीं तो

जीवन का उल्लास

दिखा ही देती है प्रकृति,

जीवन में मिठास

भर ही देती है प्रकृति।

सांझ-सवेरे भागा-दौड़ी

सांझ-सवेरे, भागा-दौड़ी

सूरज भागा, चंदा चमका

तारे बिखरे

कुछ चमके, कुछ निखरे

रंगों की डोली पलटी

हल्के-हल्के रंग बदले

फूलों ने मुख मोड़ लिए

पल्लव देखो सिमट गये

चिड़िया ने कूक भरी

तितली-भंवरे कहाँ गये

कीट-पतंगे बिखर गये

ओस की बूँदें टहल रहीं

देखो तो कैसे बहक रहीं

रंगों से देखो खेल रहीं

अभी यहीं थीं

कहाँ गईं, कहाँ गईं

ढूंढो-ढूंढों कहाँ गईं।

 

प्रकृति का सौन्दर्य

फूलों पर मंडराती तितली को मदमाते देखा

भंवरे को फूलों से गुपचुप पराग चुराते देखा

सूरज की गुनगुनी धूप, चंदा से चांदनी आई

हमने गिरगिट को कभी न रंग बदलते देखा

 

मन हर्षाए बादल
 बिन मौसम आज आये बादल

कड़क-कड़क यूँ डराये बादल

पानी बरस-बरस मन भिगाये

शाम सुहानी, मन हर्षाए बादल

प्रकृति की ये कलाएँ

अपने ही रूप को देखो निहार रही ये लताएँ

मन को मुदित कर रहीं मनमोहक फ़िज़ाएँ

जल-थल-गगन मौन बैठे हो रहे आनन्दित

हर रोज़ नई कथा लिखती हैं इनकी अदाएँ

कौन समझ पाया है प्रकृति की ये कलाएँ

फागुन आया

बादलों के बीच से

चाँद झांकने लगा

हवाएँ मुखरित हुईं

रवि-किरणों के

आलोक में

प्रकृति गुनगुनाई

मन में

जैसे तान छिड़ी,

लो फागुन आया।

सदानीरा अमृत-जल- नदियाँ

नदियों के अब नाम रह गये

नदियों के अब कहाँ धाम रह गये।

गंगा, यमुना हो या सरस्वती

बातों की ही बात रह गये।

कभी पूजा करते थे

नदी-नीर को

अब कहते हैं

गंदे नाले के ये धाम रह गये।

कृष्ण से जुड़ी कथाएँ

मन मोहती हैं

किन्तु जब देखें

यमुना का दूषित जल

तो मन में कहाँ वे भाव रह गये।

पहले मैली कर लेते

कचरा भर-भरकर,

फिर अरबों-खरबों की

साफ़-सफ़ाई पर करते

बात रह गये।

कहते-कहते दिल दुखता है

पर

सदानीरा अमृत-जल-नदियों के तो

अब बस नाम ही नाम रह गये।

ज़िन्दगी ज़िन्दगी हो उठी

प्रकृति में

बिखरे सौन्दर्य को

अपनी आँखों में

समेटकर

मैंने आँखें बन्द कर लीं।

हवाओं की

रमणीयता को

चेहरे से छूकर

बस गहरी साँस भर ली।

आकर्षक बसन्त के

सुहाने मौसम की

बासन्ती चादर

मन पर ओढ़ ली।

सुरम्य घाटियों सी गहराई

मन के भावों से जोड़ ली।

और यूँ ज़िन्दगी

सच में ज़िन्दगी हो उठी।

 

 

अवसान एवं उदित

यह कैसा समय है,

अंधेरे उजालों को

डराने में लगे हैं,

अपने पंख फैलाने में लगे हैं।

दूर जा रही रोशनियां,

अंधेरे निकट आने में लगे हैं।

 

अक्सर मैंने पाया है,

अवसान एवं उदित में

ज़्यादा अन्तर नहीं होता।

दोनों ही तम-प्रकाश से

जूझते प्रतीत होते हैं मुझे।

 

एक रोशनी-रंगीनियां समेटकर

निकल लेता है,

किसी पथ पर,

किसी और को

रोशनी बांटने के लिए।

और दूसरा

बिखरी रोशनी-रंगीनियों को

एक धुरी में बांधकर

फिर बिखेरता है

धरा पर।

चलो, आज एक नई कोशिश करें,

दोनों में ही रंगीनियां-रोशनी ढूंढे।

अंधेरे सिमटने लगेंगें

रोशनियां बिखरने लगेंगी।

 

मन तो बहकेगा ही

कभी बादलों के बीच से झांकता है चांद।

न जाने किस आस में

तारे उसके आगे-पीछे घूम रहे,

तब रूप बदलने लगा ये चांद।

कुछ रंगीनियां बरसती हैं गगन से]

धरा का मन शोख हो उठा ।

तिरती पल्लवों पर लाज की बूंदे

झुकते हैं और धरा को चूमते हैं।

धरा शर्माई-सी,

 आनन्द में

पक्षियों के कलरव से गूंजता है गगन।

 

अब मन  तो  बहकेगा  ही

अब  आप  ही   बताईये

क्या करें।

 

ओस की बूंदें

अंधेरों से निकलकर बहकी-बहकी-सी घूमती हैं ओस की बूंदें ।

पत्तों पर झूमती-मदमाती, लरजतीं] डोलती हैं ओस की बूंदें ।

कब आतीं, कब खो जातीं, झिलमिलातीं, मानों खिलखिलातीं

छूते ही सकुचाकर, सिमटकर कहीं खो जाती हैं ओस की बूंदें। 

तितलियां

फूल-फूल से पराग चुराती तितलियां

उड़ती-फिरती, मुस्कुराती तितलियां

पंख जोड़ती, पंख खोलतीं रंग सजाती

उड़-उड़ जातीं, हाथ न आतीं तितलियां

   

सूर्य देव तुम कहाँ हो

ओ बादलो गगन से घेरा हटाओ

शीतल पवन तुम दूर भाग जाओ

कोहरे से दृष्टि-भ्रम होने लगा है

सूर्य देव तुम कहाँ हो आ जाओ

तितली बोली

तितली उड़ती चुप-चुप, भंवरा करता भुन-भुन

भंवरे से बोली तितली, ज़रा मेरी बात तो सुन

तू काला, मैं सुंदर, रंग-बिरंगी, सबके मन भाती,

फूल-फूल मैं उड़ती फिरती, तू न सपने बुन।

कण-कण नेह से भीगे

रंगों की रंगीनीयों से मन भरमाया।

अप्रतिम सौन्दर्य निरख मन हर्षाया।

घटाओं से देखो रोशनी है झांकती,

कण-कण नेह से भीगे, आनन्द छाया।

बहती धारा

दूर कहीं

अनजान नगर से

बहती धारा आती है

कब छलकी, कहां चली

नहीं हमें बताती है

पथ दुर्गम, राहें अनजानी

पथरीली राहों पर

कहीं रूकती

कहीं लहर-लहर लहराती है।

झुक-झुक कर देख रहे तरू

रूक-रूक कर कहां जाती है

कभी सूखी कभी नम धरा से

मानों पूछ रहे

कभी रौद्र रूप दिखलाती

लुप्‍त कभी क्‍यों हो जाती है।

 

 

भोर में

भोर में

चिड़िया अब भी चहकती है

बस हमने सुनना छोड़ दिया है।

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भोर में

रवि प्रतिदिन उदित होता है

बस हमने आंखें खोलकर

देखना छोड़ दिया है।

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भोर में आकाश

रंगों   से सराबोर

प्रतिदिन चमकता है

बस हमने

आनन्द लेना छोड़ दिया है।

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भोर में पत्तों पर

बहकती है ओस

गाते हैं भंवरे

तितलियां उड़ती-फ़िरती है

बस हमने अनुभव करना छोड़ दिया है।

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सुप्त होते तारागण

और सूरज को निरखता चांद

अब भी दिखता है

बस हमने समझना छोड़ दिया है।

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रात जब डूबती है

तब भोर उदित होती है

सपनों के साथ,

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बस हमने सपनों के साथ

जीना छोड़ दिया है।

 

नदी हो जाना

बहती नदी के

सौन्दर्य की प्रशंसा करना

कितना सरल है]

और  नदी हो जाना

उतना ही कठिन।

+

नदी

मात्र नदी ही तो नहीं है]

यह प्रतीक है]

एक लम्बी लड़ाई की,

बुराईयों के विरुद्ध

कटुता और शुष्कता के विरुद्ध

निःस्वार्थ भावना की

निष्काम भाव से

कर्म किये जाने की

समर्पण और सेवा की

विनम्रता और तरलता की।

अपनी मंज़िल तक पहुंचने के लिए

प्रकृति से युद्ध की।

हर अमृत और विष पी सकने वाली।

नदी

कभी रुकती नहीं

थकती नहीं।

मीलों-मील दौड़ती

उंचाईयों-निचाईयों को नापती

विघ्न-बाधाओं से टकराती

दुनिया-भर की धुल-मिट्टी

 

अपने अंक में समेटती

जिन्दगी बिखेरती

नीचे की ओर बढ़कर भी

अपने कर्मों सेे

निरन्तर

उपर की ओर उठती हुई

- नदी-

कभी तो

रास्ते में ही

सूखकर रह जाती है

और कभी जा पहुंचती है

सागर-तल तक

तब उसे कोइ नहीं पहचानता

यहां

मिट जाता है

उसका अस्तित्व।

नदी समुद्र हो जाती है

बदल जाता है उसका नाम।

समुद्र और कोई नहीं है

नदी ही तो है

बार-बार आकर

समुद्र बनती हुई

चाहो तो तुम भी समुद्र हो सकते हो

पर इसके लिए पहले

नदी बनना होगा।

फूलों संग महक रही धरा

पत्तों पर भंवरे, कभी तितली बैठी देखो पंख पसारे।

धूप सेंकती, भोजन करती, चिड़िया देखो कैसे पुकारे।

सूखे पत्ते झर जायेंगे, फिर नव किसलय आयेंगें,

फूलों संग महक रही धरा, बरसीं बूंदें कण-कण निखारे।

सांझ-सवेरे

 रंगों से आकाश सजा है सांझ-सवेरे।

मन में इक आस बनी है सांझ-सवेरे।

सूरज जाता है,चंदा आता है, संग तारे]

भावों का ऐसा ही संगम है सांझ-सवेरे।

मदमाता शरमाता अम्बर

रंगों की पोटली लेकर देखो आया मदमाता अम्बर

भोर के साथ रंगों की पोटली बिखरी, शरमाता अम्बर

रवि को देख श्वेताभा के अवगुंठन में छिपता, भागता

सांझ ढले चांद-तारों संग अठखेलियां कर भरमाता अम्बर

 

मन हर्षित होता है

दूब पर चमकती ओस की बूंदें, मन हर्षित कर जाती हैं।

सिर झुकाई घास, देखो सदा पैरों तले रौंद दी जाती है।

कहते हैं डूबते को तृण का सहारा ही बहुत होता है,

पूजा-अर्चना में दूर्वा से ही आचमन विधि की जाती है।

 

प्रकृति का मन न समझें हम

कभी ऋतुएं मनोहारी लगती थीं, अब डरता है मन।

ग्रीष्म ऋतु में सूखे ताल-तलैया, जलते हैं कानन।

बदरा घिरते, बरसेगा रिमझिम, धरा की प्यास बुझेगी,

पर अब तो हर बार, विभीषिका लेकर आता है सावन

बहकती हैं पत्तियों पर ओस की बूंदें

 

छू मत देना इन मोतियों को टूट न जायें कहीं।

आनन्द का आन्तरिक स्त्रोत हैं छूट न जाये कहीं।

जब बहकती देखती हूं इन पत्तियों पर ओस की बूंदे ,

बोलती हूं, ठहर-ठहर देखो, ये फूट न जाये कहीं ।

प्रकृति है जीवन सौन्दर्य

 

रक्त पीत वर्ण में बासंती बयार फ़लक है।

आकर्षित करता तुम्हारा रूप दृष्टि ललक है।

न जाने कब छा जायें घटाएं, बदले मौसम,

जीवन के सौन्दर्य की यह बस एक झलक है।

सौन्दर्य निरख मन हरषा

 पलभर में धूप निकलती, कभी बादल बरसें कण-कण।

धरा देखो महक रही, कलियां फूल बनीं, बहक रहा मन।

पल्लव झूम रहे, पंछी डाली-डाली घूम रहे, मन हरषा,

सौन्दर्य निरख, मन भी बहका, सब कहें इसे पागलपन।a

 

पतझड़

हरे पत्ते अचानक

लाल-पीले होने लगते हैं।

नारंगी, भूरे,

और गाढ़े लाल रंग के।

हवाएं डालियों के साथ

मदमस्त खेलती हैं,

झुलाती हैं।

पत्ते आनन्द-मग्न

लहराते हैं अपने ही अंदाज़ में।

हवाओं के संग

उड़ते-फ़िरते, लहराते,

रंग बदलते,

छूटते सम्बन्ध डालियों से।

शुष्कता उन्हें धरा पर

ले आती है।

यहां भी खेलते हैं

हवाओं संग,

बच्चों की तरह उछलते-कूदते

उड़ते फिरते,

मानों छुपन-छुपाई खेलते।

लोग कहते हैं

पतझड़ आया।

 

लेकिन मुझे लगता है

यही जीवन है।

और डालियों पर

हरे पत्ते पुनः अंकुरण लेने लगते हैं।

 

 

प्रेम-प्यार के मधुर गीत

मौसम बदला, फूल खिले, भंवरे गुनगुनाते हैं।

सूरज ने धूप बिखेरी, पंछी मधुर राग सुनाते हैं।

जी चाहता है भूल जायें दुनियादारी के किस्से,

चलो मिलकर प्रेम-प्यार के मधुर गीत गाते हैं।

वृक्षों की लहराती शाखाएं

पुष्प पल्लवविहीन
एक छत्रछाया सी दिखती हैं।
दुलारती, आंचल फैलाकर।
समझाती हैं
डर
थोड़ा सब्र कर।
पतझड़, सूखा, ग्रीष्म
और यह सूनापन 
तो आने जाने हैं।
बस ठहर ज़रा
मौसम बदलेगा
फूल खिलेंगे
सूरज चमकेगा
सागर लहरायेगा
बस फिर
तुम ज़रा सा मुस्कुरा देना।
 

स्वर्गिक सौन्दर्य रूप

रूईं के फ़ाहे गिरते थे  हम हाथों से सहलाते थे।

वो हाड़ कंपाती सर्दी में बर्फ़ की कुल्फ़ी खाते थे।

रंग-बिरंगी दुनिया श्वेत चादर में छिप जाती थी,

स्वर्गिक सौन्दर्य-रूप, मन आनन्दित कर जाते थे।