अन्त होता है ज़िन्दगी की चालों का

स्याह-सफ़ेद

प्यादों की चालें

छोटी-छोटी होती हैं।

कदम-दर-कदम बढ़ते,

राजा और वज़ीर को

अपने पीछे छुपाये,

बढ़ते रहते हैं,

कदम-दर-कदम,

मानों सहमे-सहमे।

राजा और वज़ीर

रहते हैं सदा पीछे,

लेकिन सब कहते हैं,

बलशाली, शक्तिशाली

होता है राजा,

और वजीर होता है

सबसे ज़्यादा चालबाज़।

फिर भी ये दोनों,

प्यादों में घिरे

घूमते, बचते रहते हैं।

किन्तु, एक समय आता है

प्यादे चुक जाते हैं,

तब दो-रंगे,

राजा और वज़ीर,

आ खड़े होते हैं

आमने-सामने।

ऐसे ही अन्त होता है

किसी खेल का,

किसी युद्ध का,

या किसी राजनीति का।

 

 

जीवन में पतंग-सा भाव ला

जीवन में पतंग-सा भाव ला।

आकाश छूने की कोशिश कर।

 

पांव धरा पर रख।

सूरज को बांध

पतंग की डोरी में।

उंची उड़ान भर।

रंगों-रंगीनियों से खेल।

मन छोटा न कर।

कटने-टूटने से न डर।

एक दिन

टूटना तो सभी को है।

बस हिम्मत रख।

 

आकाश छू ले एक बार।

फिर टूटने का,

लौटकर धरा पर

उतरने का दुख नहीं सालता।

जीवन अंधेरे और रोशनियों के बीच

अंधेरे को चीरती

ये झिलमिलाती रोशनियां,

अनायास,

उड़ती हैं

आकाश की ओर।

एक चमक और आकर्षण के साथ,

कुछ नये ध्वन्यात्मक स्वर बिखेरतीं,

फिर लौट आती हैं धरा पर,

धीरे-धीरे सिमटती हैं,

एक चमक के साथ,

कभी-कभी

धमाकेदार आवाज़ के साथ,

फिर अंधेरे में घिर जाती हैं।

 

जीवन जब

अंधेरे और रोशनियों में उलझता है,

तब चमक भी होती है,

चिंगारियां भी,

कुछ मधुर ध्वनियां भी

और धमाके भी,

आकाश और धरा के बीच

जीवन ऐसे ही चलता है।

 

अन्तर्मन की आग जला ले

अन्तर्मन की आग जला ले

उन लपटों को बाहर दिखला दे

रोना-धोना बन्द कर अब

क्यों जिसका जी चाहे कर ले तब

सबको अपना संसार दिखा ले

अपनी दुनिया आप बसा ले

ठोक-बजाकर जीना सीख

कर ले अपने मन की रीत

कोई नहीं तुझे जलाता

तेरी निर्बलता तुझ पर हावी

अपनी रीत आप बना ले

पाखण्डों की बीन बजा देे

मनचाही तू रीत कर ले

इसकी-उसकी सुनना बन्द कर

बेचारगी का ढोंग बन्द कर

दया-दया की मांग मतकर

बेबस बन कर जीना बन्द कर

अपने मन के गीत बजा ले

घुटते-घुटते रोना बन्द कर

रो-रोकर दिखलाना बन्द कर

इसकी-उसकी सुनना बन्द कर

अपने मन से जीना सीख

अन्तर्मन की आग जला ले

 उन लपटों को बाहर दिखला दे

 

हमें भी मुस्‍काराना आ गया

फूलों को खिलते देख हमें भी मुस्‍काराना आ गया

गरजते बादलों को सुन हमें भी जताना आ गया

बहती नदी की धार ने सिखाया हमें चलते जाना

उंचे पर्वतों को देख हमें भी पांव जमाना आ गया

 

 

भविष्य

आदमी ने कहा

चाहिए औरत

जो बेटे पैदा करे।

 

हर आदमी ने कहा

औरत चाहिए।

पर चाहिए ऐसी औरत

जो केवल बेटे पैदा करे।

 

हर औरत

केवल

बेटे पैदा करने लगी।

 

अब बेटों के लिए

कहां से लाएंगे औरतें

जो उनके लिए

बेटे पैदा करें।

 

तू अपने मन की कर

चाहे कितना काम करें, कोर-कसर तो रहती है

दुनिया का काम है कहना, कहती ही रहती है

तू अपने मन की कर, तू अपने मन से कर

कोई क्या कहता है, चिन्ता जाती रहती है।

जब लहराता है तिरंगा

एक भाव है ध्वजा,

देश के प्रति साख है ध्वजा।

प्रतीक है,

आन का, बान का, शान का।

.

तीन रंगों से सजा,

नारंगी, श्वेत, हरा

देते हमें जीवन के शुद्ध भाव,

शक्ति, साहस की प्रेरणा,

सत्य-शांति का प्रतीक,

धर्म चक्र से चिन्हित,

प्रकृति, वृद्धि एवं शुभता

की प्रेरणा।

भाव है अपनत्व का।

शीश सदा झुकता है

शीष सदा मान से उठता है,

जब लहराता है तिरंगा।

 

 

झूठे रिश्तों की आड़ में
नदियाँ सूख जाती हैं सागर उफ़नते रहते हैं

मन कुंठित होता है, हम फिर भी हंसते रहते हैं

सूखे पत्ते उड़ते हैं, गिरते हैं, ठौर नहीं मिलता

झूठे रिश्तों की आड़ में हम मन बहलाये रहते हैं।

बेभाव अपनापन बांटते हैं

किसी को

अपना बना सकें तो क्या बात है।

जब रह रह कर

 मन उदास होता है,

तब बिना वजह

 खिलखिला सकें तो क्या बात है।

चलो आज

उड़ती चिड़िया के पंख गिने,

जो काम कोई न कर सकता

वही आज कर लें

 तो क्या बात है।

किसी की

प्यास बुझा सकें तो क्या बात है।

चलो,

आज बेभाव अपनापन बांटते हैं,

किसी अपने को

 सच में

 अपना बना सकें तो क्या बात है।

 

 

बस नेह की धरा चाहिए

यहां पत्थरों में फूल खिल रहे हैं
और वहां
देखो तो
इंसान पत्थर दिल हुए जा रहे हैं।
बस !!
एक बुरी-सी बात कह कर
ले ली न वाह –वाह !!!
अभी तो
पूरी भी नहीं हुई
मेरी बात
और  आपने
पता नहीं क्या-क्या सोच लिया।
कहां हैं इंसान पत्थर दिल
नहीं हैं इंसान पत्थर दिल
दिलों में भी फूल खिलते हैं
फूल क्या पूरे बाग-बगीचे
महकते हैं
बस नेह की धरा चाहिए
अपनेपन की पौध डालिये
विश्चवास के नीर से सींचिए
थोड़ी देख-भाल कीजिए
प्यार-मनुहार से संवारिये

फिर देखिये
पत्थर भी पिघलेंगे
पत्थरों में भी फूल खिलेंगे।
पर इंसान नहीं हैं
पत्थर दिल !!!!
 

बस प्यार किया जाता है

मन है कि

आकाश हुआ जाता है

विश्वास हुआ जाता है

तुम्हारे साथ

एक एहसास हुआ जाता है

घनघारे घटाओं में

यूं ही निराकार जिया जाता है

क्षणिक है यह रूप

भाव, पिघलेंगे

हवा बहेगी

सूरत, मिट जायेगी

तो क्या

मन में तो अंकित है इक रूप

बस,

उससे ही जिया जाता है

यूं ही, रहा जाता है

बस प्यार, किया जाता है

प्रकृति की ये कलाएँ

अपने ही रूप को देखो निहार रही ये लताएँ

मन को मुदित कर रहीं मनमोहक फ़िज़ाएँ

जल-थल-गगन मौन बैठे हो रहे आनन्दित

हर रोज़ नई कथा लिखती हैं इनकी अदाएँ

कौन समझ पाया है प्रकृति की ये कलाएँ

अपनी-अपनी कोशिश

हमने जब भी

उठकर

खड़े होने की कोशिश की

तुमने हमें

मिट्टी मे मिला देना चाहा।

लेकिन

तुम यह बात भूल गये

कि मिट्टी में मिल जाने पर ही

एक छोटा-सा बीज

विशाल वृक्ष का रूप

धारण कर लेता है।

 

मानों या न मानों :  आत्माएं ही यमराज होती हैं क्या?

यह मेरे जीवन की एक सत्य घटना है जिसे स्मरण करके आज भी शरीर में सिहरन पैदा हो जाती है।

वर्ष 1990 जनवरी। शिमला। मेरी एक बहन नर्वदा कैंसर की अंतिम स्टेज से जूझ रही थी और चिकित्सकों ने जवाब दे दिया था। बहन लगभग अचेतावस्था में रहती थी, और न के बराबर बोल पाती थी। उस समय उनके पास परिवार में मैं, एक और बहन जिसका नाम सरिता है, एक बहन-जीजा और भाई-भाभी एवं मां थीं। मां और बहन साथ-साथ सोते थे। एक दिन बहन अचानक उठ बैठी और एकदम स्पष्ट जैसे डरकर बोलीं कि मां, देखो-देखो, दादी आई है मुझे लेने, मुझे नहीं जाना। सब हतप्रभ। और इतना बोलकर वह लेट गई। मां ने कहा कि नर्वदा कोई नहीं है यहां, तुझे कोई नहीं ले जायेगा, नहीं है दादी। तब उसने मां की ओर करवट ली कि देखो हमारे बीच सो रही है और मुझे लेने आई है। सब सकते में। मां ने फिर बिस्तर के बीच में हाथ फिराते हुए कहा कि नर्वदा देख यहां कोई नहीं है। तू आराम कर।

फिर ऐसा कई बार होने लगा। कभी उन्हें सामने खड़ी दिखाई देतीं, कभी बिस्तर के पास और अक्सर बीच में लेटी हुई। और हर बार वे साफ़ शब्दों में बताती कि मां देखो दादी आई है मुझे लेने , बीच में आकर लेट गई है, मुझे नहीं जाना, और बोलकर वे अचेत-सी हो जातीं।

शिमला में उस समय केवल प्रातःकाल पानी आता था वह भी लगभग चार बजे, जब घुप्प अंधेरा रहता था। हमारा स्नानघर कमरों से अलग बाहर बरामदे के साथ था। अर्थात स्नानघर जाने के लिए एक तरह से घर से बाहर ही आना पड़ता था ।

नर्वदा लगभग मरणासन्न अवस्था में थीं।

उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले प्रातः चार बजे पानी आया और दूसरी बहन सरिता उठी कि पानी भर ले कि अचानक नर्वदा उठकर बैठ गई और चिल्लाई ‘‘ओ सरिता, ओ सरिता बाहर मत जाना, मुझे लेने दादी आई है, मैं तो मिली नहीं, तुझे ले जायेगी, ओ सरिता बाहर मत जाना।’’ इतना कहकर वह फिर लेट गई। पूरा घर सुन्न पड़ गया। सब मानों एक-दूसरे का हाथ पकडे,़ डरे हुए, एक खौफ़ में बैठे रहे। और नर्वदा पहले की तरह अचेत। किसी का साहस नहीं था कि दरवाज़ा खोले। नौ बजे दूधवाले ने दरवाज़ा खड़काया तब जाकर किसी तरह साहस करके दरवाज़ा खोला।

यह माना जाता है कि यदि कोई आत्मा किसी को लेने आती है तो यदि वह व्यक्ति न मिले तो जो सबसे पहले सामने मिले, उसे ले जाती है।

इसके बाद वह कुछ होश में आने लगीं। तो बोलीं कि मेरे नाम से कुछ फल ही दान कर दो मन्दिर में, एक महीना और जी लूंगी। और ऐसा ही हुआ। उस दान के लगभग एक महीने बाद उनकी मौत हुई।

  

ठहरी ठहरी सी लगती है ज़िन्दगी

अब तो

ठहरी-ठहरी-सी

लगती है ज़िन्दगी।

दीवारों के भीतर

सिमटी-सिमटी-सी

लगती है ज़िन्दगी।

द्वार पर पहरे लगे हैं,

मन पर गहरे लगे हैं,

न कोई चोट है कहीं,

न घाव रिसता है,

रक्त के थक्के जमने लगे हैं।

भाव सिमटने लगे हैं,

अभिव्यक्ति के रूप

बदलने लगे हैं।

इच्छाओं पर ताले लगने लगे हैं।

सत्य से मन डरने लगा है,

झूठ के ध्वज फ़हराने लगे हैं।

न करना शिकायत किसी की

न बताना कभी मन के भेद,

लोग बस

तमाशा बनाने में लगे हैं।

न ग्रहण है न अमावस्या,

तब भी जीवन में

अंधेरे गहराने लगे हैं।

जीतने वालों को न पूछता कोई

हारने वालों के नाम

सुर्खियों में चमकने लगे हैं।

अनजाने डर और खौफ़ में जीते

अपने भी अब

पराये-से लगने लगे हैं।

विश्व-शांति के लिए

विश्व-शांति के लिए

बनाने पड़ते हैं आयुध

रचनी पड़ती हैं कूटनीतियाँ

धर्म, जाति

और देश के नाम पर

बाँटना पड़ता है,

चिननी पड़ती हैं

संदेह की दीवारें

अपनी सुरक्षा के नाम पर

युद्धों का

आह्वान करना पड़ता है

देश की रक्षा की

सौगन्ध उठाकर

झोंक दिये जाते हैं

युद्धों में

अनजान, अपरिचित,

किसी एक की लालसा,

महत्वाकांक्षा

ले डूबती है

पूरी मानवता

पूरा इतिहास।

कच्चे घड़े-सी युवतियां

कच्चे घड़े-सी होती हैं

ये युवतियां।

घड़ों पर रचती कलाकृति

न जाने क्या सोचती हैं

ये युवतियां।

रंग-बिरंगे वस्त्रों से सज्जित

श्रृंगार का रूप होती हैं

ये युवतियां।

रंग सदा रंगीन नहीं होते

ये बात जानती हैं

केवल, ये युवतियां।

हाट सजता है,

बाट लगता है,

ठोक-बजाकर बिकता है,

ये बात जानती हैं

केवल, ये युवतियां।

कला-संस्कृति के नाम पर

बैठक की सजावट बनते हैं]

सजते हैं घट

और चाहिए एक ओढ़नी

जानती हैं सब

केवल, ये युवतियां।

बातें आसमां की करते हैं

पर इनके जीवन में तो

ठीक से धरा भी नहीं है

ये बात जानती हैं

केवल, ये युवतियां।

कच्चे घड़ों की ज़िन्दगी

होती है छोटी

इस बात को

सबसे ज़्यादा जानती हैं

ये युवतियां।

चाहिए जल की तरलता, शीतलता

किन्तु आग पर सिंक कर

पकते हैं घट

ये बात जानती हैं

केवल, ये युवतियां।

 

हमारी अपनी आवाज़ें  गायब हो गई हैं

आवाज़ें निरन्तर गूंजती हैं

मेरे आस-पास।

कभी धीमी, कभी तेज़।

कुछ सुनाई देती हैं

कुछ नहीं।

हमारे कान फ़टते हैं

दुनिया भर की

आवाज़ें सुनते-सुनते।

इस शोर में

इतना खो गये हैं हम

कि अपनी ही आवाज़ से

कतराने में लगे हैं

अपनी ही आवाज़ को

भुलाने में लगे हैं।

हमारे भीतर का सच

झूठ बनने लगा है

दूर से आती आवाज़ों से

मन भरमाने में लगे हैं।

छोटी-छोटी आवाज़ों से

मिलने वाला आनन्द

कहीं खो गया है

हम बस यूं ही

चिल्लाने में लगे हैं।

गुमराह करती

आवाजों के पीछे

हम भागने में लगे हैं।

ऊँची आवाज़ें

हमारी नियामक हो गई हैं

हमारी अपनी आवाज़ें

कहीं गायब हो गई हैं।

  

कर्मनिष्ठ जीवन तो जीना होगा

 

ये कैसा रंगरूप अब तुम ओढ़कर चले हो,

क्यों तुम दुनिया से यूं मुंह मोड़कर चले हो,

कर्मनिष्ठ-जीवन में विपदाओं से जूझना होगा,

त्याग के नाम पर कौन से सफ़र पर चले हो।

दीप तले अंधेरा ढूंढते हैं हम

रोशनी की चकाचौंध में अक्सर अंधकार के भाव को भूल बैठते हैं हम

सूरज की दमक में अक्सर रात्रि के आगमन से मुंह मोड़ बैठते हैं हम

तम की आहट भर से बौखलाकर रोशनी के लिए हाथ जला बैठते हैं

ज्योति प्रज्वलित है, फिर भी दीप तले अंधेरा ही ढूंढने बैठते हैं हम

कुछ तो मुंह भी खोल

बस !

अब बहुत हुआ।

केवल आंखों से न बोल।

कुछ तो मुंह भी खोल।

कोई बोले कजरारे नयना

कोई बोले मतवारे नयना।

कोई बोले अबला बेचारी,

किसी को दिखती सबला है।

तेरे बारे में,

तेरी बातें सब करते।

अवगुण्ठन के पीछे

कोई तेरा रूप निहारे

कोई प्रेम-प्याला पी रहे ।

किसी को

आंखों से उतरा पानी दिखता

कोई तेरी इन सुरमयी आंखों के

नशेमन में जी रहे।

कोई मर्यादा ढूंढ रहा

कोई तेरे सपने बुन रहा,

किसी-किसी को

तेरी आबरू लुटती दिखती

किसी को तू बस

सिसकती-सिसकती दिखती।

जिसका जो मन चाहे

बोले जाये।

पर तू क्या है

बस अपने मन से बोल।

बस अब बहुत हुआ।

केवल आंखों से न बोल।

कुछ तो मुंह भी खोल।

दिल घायल

लोग कहते हैं

किसी की बात गलत हो

तो

एक कान से सुनो

दूसरे से निकाल दो।

किन्तु क्या करें

हमारे

दोनों कानों के बीच में

कोई सुंरग नहीं है

बात या तो

सीधी दिमाग़ में लगती है

अथवा

दिल घायल कर जाती है

अथवा

दोनों को तोड़ जाती है।