इंसान भटकता है जिजीविषा की राह ढूंढता

पत्थरों में चेहरे उकेरते हैं,

और इंसानियत के

चेहरे नकारते हैं।

आया होगा

उंट कभी पहाड़ के नीचे,

मुझे नहीं पता,

हम तो इंसानियत के

चेहरे तलाशते हैं।

इधर

पत्थरों में तराशते लगे हैं

आकृतियां,

तब इंसान को

कहां देख पाते हैं।

शिल्पकार का शिल्प

छूता है आकाश की उंचाईयां,

और इंसान

किसी कीट-सा

एक शहर से दूसरे शहर

भटकता है, दूर-दूर

गर्म रेतीली ज़मीन पर

जिजीविषा की राह ढूंढता ।