डरते हैं क्या

जीवन के सन्दर्भ में

जब भी बात करते हैं

केवल सीढ़ियाॅं

चढ़ने की ही बात करते हैं

कभी उतरने

अथवा

सीढ़ियों से

पैर फ़िसलने की बात नहीं करते।

डरते हैं क्या ?

समझ समझ की बात
 कहावत है

बड़ों का कहा

और आंवले का खाया

बाद में मीठा लगता है।

जब किसी ने समझाया था

तब तो

समझ में आया था।

आज जीवन के इस मोड़ पर

समझ आने से क्या होगा

जो खोना था

खो दिया

और जो मिल सकता था

उससे हाथ धो बैठे।

 

आप्त वाक्य

कभी-कभी आप्त वाक्य

बड़े कष्टकारी होते हैं।

जीवन में हम चाहते कुछ हैं,

मिलता कुछ है।

किसी ने कह दिया

जहां चाह, वहां राह।

काश!

कि ऐसा ही होता जीवन में।

चाह तो थी

चांद-सितारों की,

मां ने चुनरी पर टांक दिये।

और मैं

ओढ़नी सिर पर लिए

आकाश में उड़ने लगी।

मन की बात

रातों को

महसूस किया है कभी आपने।

कितनी भी रोशनी कर लें

कभी-कभी

अंधेरा  टूटता ही नहीं।

रातें अंधेरी ही होती हैं

फिर भी

न जाने क्यों

बार-बार कह बैठते हैं

कितनी अंधेरी होती हैं रातें।

शायद हम

रात की बात नहीं करते

अपने मन की बात करते हैं।

क्या अन्त यही है

टूटा तो नहीं है

डाल से छूटकर भी

बिखरा तो नहीं है

धरा पर

ठहरा-सा लगता है

मानों सोच रहा हो

क्या यही जीवन है

लौट सकता नहीं,

जीवन से जुड़ सकता नहीं

क्या अन्त यही है

 

हाईकु: धारा

धारा निर्बाध

भावों में हलचल

आंखों में पानी

-

अविरल है

धारा की तरलता

भाव क्यों रूखे

-

धारा निश्छल

चंदा की परछाईं

मन बहके

 

फ़ागुन की आहट

फ़ागुन की आहट

मानों जीवन में

मधुर सी गुनगुनाहट

हवाओं में फूलों की महक

नव-पल्लव अंकुरित

वृक्षों की शाखाओं से

पंछियों की

मधुर कलरव

पत्तों की मरमर

तृण मानों 

ओस की बूंदों से

कर रहे शरारत।

भीगा-भीगा-सा मौसम

कभी धूप कभी छांव

कहता है

ले ले आनन्द

पता नहीं

फिर कब मिलेगा यह जीवन।

 

ज़िन्दगी की लम्बी राहों में

साथ कोई

उम्र-भर देता नहीं है

जानते हैं हम, फिर भी

मन को मनाते नहीं हैं।

मुड़-मुड़कर देखते रहते हैं

जाने वालों को हम

भुला पाते नहीं हैं।

ज़िन्दगी की लम्बी राहों में

न जाने कितने छूट गये

कितने हमें भूल गये

याद अब कर पाते नहीं हैं।

फिर भी इक टीस-सी अक्सर

दिल में उभरती रहती है

जिसे हम नकार पाते नहीं हैं।

चेहरे बदल लें

चलो आज चेहरे बदल लें।

बहुत दिन बीत गये।

लोग अब

हमारी

असलियत

पहचानने लगे हैं

हमें

बहुत अच्छे से

जानने लगे हैं।

 

खरपतवार

वही फ़सल काटते हैं

जो हम बोते हैं,

ऐसा नहीं होता यारो।

जीवन में

खरपतवार का भी

कोई महत्व है

या नहीं।

नहले पे दहला
तू 

नहले पे दहला

लगाना सीख ले

नहीं तो

गुलाम

बनकर

रह जायेगा

 

ज़िन्दगी जीने के तरीके

ज़िन्दगी जीने के

तरीके

यूॅं तो मुझे

ज़िन्दगी जीने के

तरीके बहुत आते हैं

किन्तु क्या करुॅं मैं

उदाहरण और उलाहने

बहुत सताते हैं।

 

दिल  या दिमाग

मित्र कहते हैं,

बात पसन्द न आये

तो एक कान से सुनो,

दूसरे से निकाल दो।

किन्तु मैं क्या करूॅं।

मेरे दोनों कानों के बीच

रास्ता नहीं है।

या तो

दिल को जाकर लगती है

या दिमाग भन्नाती है।

 

झूठ-सच Lia

झूठ-सच के अर्थ बदल गये

फूलों से ज़्यादा कांटे बसर गये

 

रिश्ते
समय की मार में

जो बदल जायें

वे रिश्ते नहीं होते।

रिश्ते क्या होते है

तब ही समझ पाते हैं

जब वे

बदल जाते हैं।

***

अफ़सोस 

कि हम 

बदलते रिश्तों की सूरत

समझ नहीं पाते

और  आजीवन

बिखरे रिश्तों को

ढोते रहते हैं।

**

समय की चोट

रिश्तों को

बार&बार

नया नाम दे देती है

और हम नासमझ

पुराने नामों के साथ ही

उन्हें

आजीवन ढोते रहते हैं।

 ***

टूटे]

रिश्तों को

छोड़ने की

हिम्मत नहीं करते

इस कारण

रोज़]

हर रोज़ मरते हैं।

**-*

 

उड़ान

दिल से भरें

उड़ान

चाहतों की

तो पर्वतों को चीर

रंगीनियों में

छू लेगें आकाश।

 

बस आस मत छोड़ना

कौन कहता है

कि टूटने से

जीवन समाप्त हो जाता है।

टूटकर धरा में मिलेंगे,

नवीन कोंपल से

फिर उठ खड़े होंगे

फिर पनपेंगे,

फूलेंगे, फलेंगे

बस आस मत छोड़ना।

 

मिलन की घड़ियाॅं

चुभती हैं

मिलन की घड़ियाॅं,

जो यूॅं ही बीत जाती हैं,

कुछ चुप्पी में,

अनबोले भावों में,

कुछ कही-अनकही

शिकायतों में,

बातों की छुअन

वादों की कसम

घुटता है मन

और मिलन की घड़ियाॅं

बीत जाती हैं।

 

शब्द लड़खड़ा रहे

रात भीगी-भीगी

पत्तों पर बूंदें

सिहरी-सिहरी

चांद-तारे सुप्त-से

बादलों में रोशनी घिरी

खिड़कियों पर कोहरा

मन पर शीत का पहरा

 शब्द लड़खड़ा रहे

बातें मन में दबीं।

 

बसन्त के फूल खिलें
फूलों के बसन्त की 

प्रतीक्षा नहीं करती मैं

मन में बसन्त के फूल खिलें

बस इतना ही चाहती हूं मैं

जीवन की राहों में

कदम-ताल करते चलें

मन में उमंग

भावों में तरंग

बगिया में हर रंग

और तुम संग

सुनहरे रंगों की लकीर

आप ही खिंच जाती है

ज़िन्दगी में

तो और क्या चाहिए भला।

 

सलवटें
कपड़ों पर पड़ी सलवटें
कोशिश करते रहने से
कभी छूट भी जाती हैं,
किन्तु मन पर पड़ी
अदृश्य सलवटों का क्या करें,
जिन्हें निकालने की कोशिश में
आंखें 
नम हो जाती हैं,
वाणी बिखर जाती हैं,
कपड़ों पर घूमती अंगुलियों में
खरोंच आ जाती है।
कपड़े 
तह-दर-तह 
सिमटते रहते हैं
और मैं बिखरती रहती हूॅं।
  
दो हाईकु

उदासी तो है

चेहरे पे मुस्कान

कुछ समझे

-

उदासी का क्या

कब देखी तुमने

झूठी  मुस्कान

 

भाव

हाइकु

=======

मन में आस

कैसे करें विश्वास

चेहरे बोलें

-

मन में भाव

आशा और निराशा

आँखें बरसें।

-

मन तरसे

कैसे कहें किसी से

कौन अपना

-

 

आंसुओं का क्या

भीग जाने दो आज

चेहरे को आंसुओं से,

भीतर जमी गर्द

धुल जायेगी।

नहीं चाहती मैं

कोई

उस गर्द को

छूने की कोशिश करे,

कोई पढ़े

उसके धुंधले हो चुके शब्द।

नहीं चाहती मैं

कोई कहानियां लिखे।

आंसुओं का क्या

वे तो

सुख-दुख दोनों में

बहते हैं

कौन समझता है

उनका अर्थ यहां।

 

शाम

हाइकु

शाम सुहानी

चंद्रमा की चांदनी

मन बहका

-

शाम सुहानी

पुष्प महक उठे

रंग बिखरे

-

किससे कहूं

रंगीन हुआ मन

शाम सुहानी

-

शाम की बात

सूरज डूब रहा

मन में तारे

 

शरद

हाइकु

शरद ऋतु

मीठी मीठी बयार

मन मुदित

-

कण बरसें

शरद की चांदनी

मन हुलसे

-

शरद ऋतु

चंदा की चांदनी

मन हुलसा

-

ओस के कण

पत्तों पर बहकते

भाव बिखरे

 

जीवन संघर्ष  का दूसरा नाम है

कहते हैं

जीवन संघर्ष  का

दूसरा नाम है।

किन्तु जीवन

बस

संघर्ष ही बना रहे

कभी समर या

संग्राम बनने दें।

कहने को तो

पर्यायवाची शब्द हैं

किन्तु जब

जीवन में उतरते हैं

तब

सबका अर्थ बदल जाता है

इसलिए सावधान रहें।

 

अनचाही दस्तक

श्रवण-शक्ति

तो ठीक है मेरी

किन्तु नहीं सुनती मैं

अनचाही दस्तक।

खड़काते रहो तुम

मेरे मन को

जितना चाहे,

नहीं सुनना मुझे

यदि किसी को,

तो नहीं सुनना।

अपने मन से

जीने की

मेरी कोशिश को

तुम्हारी अनचाही दस्तक

तोड़ नहीं सकती।

 

जीवन के वे पल

जीवन के वे पल

बड़े

सुखद होते हैं जब

पलभर की पहचान से

अनजाने

अपने हो जाते हैं,

किन्तु

कहीं एक चुभन-सी

रह जाती है

जब महसूस होता है

कि जिनके साथ

सालों से जी रहे थे

कभी

समझ ही न पाये

कि वे

अपने थे या अनजाने।

 

दिल घायल

लोग कहते हैं

किसी की बात गलत हो

तो

एक कान से सुनो

दूसरे से निकाल दो।

किन्तु क्या करें

हमारे

दोनों कानों के बीच में

कोई सुंरग नहीं है

बात या तो

सीधी दिमाग़ में लगती है

अथवा

दिल घायल कर जाती है

अथवा

दोनों को तोड़ जाती है।