ज़िन्दगी की पथरीली राहों में

सुना था

पत्थरों में फूल खिलते हैं,

किन्तु यह लिखते समय

यह क्यों नहीं याद रहता

कि फूलों से ही

फल मिलते हैं।

 

ज़िन्दगी की

पथरीली राहों में,

कांटों से उलझकर,

मिट्टी से सुलझकर,

बस फूल खिलते रहें,

फल ज़रूर मिलेंगें।