बाहर निकलना चाहती हूं

निकाल फेंकना चाहती हूं मन की फांस को।

बाहर निकलना चाहती हूं

स्मृतियों के जाल से, जंजाल से

जो जीने नहीं देतीं मुझे अपने आज में।

पर ये कैसी दुविधा है

कि लौट लौटकर झांकती हूं

मन की दरारों में, किवाड़ों में।

जहां अतीत के घाव रिसते हैं

जिनसे बचना चाहती हूं मैं।

एक अदृश्य अभेद्य संसार है मेरे भीतर

जिसे बार बार छू लेती हूं

अनजाने में ही।

खंगालने लगती हूं अतीत की गठरियां

हाथ रक्त रंजित हो जाते हैं

स्मृतियों के दंश देह को निष्प्राण कर देते हैं

फिर एक मकड़जाल

मेरे मन मस्तिष्क को कुंठित कर देता है

और मैं उलझनों में उलझी

न वर्तमान में जी पाती हूं

और  न अतीत को नकार पाती हूं।।।।।।।

काश ! पहाड़-सी होती मेरी ज़िन्दगी

काश !  पहाड़-सी होती मेरी ज़िन्दगी

 

ज़रा-ज़रा सी बात पर

यूं ही

भरभराकर

नहीं गिर जाते ये पहाड़।

अपने अन्त:करण में

असंख्य ज्वालामुखी समेटे

बांटते हैं

नदियों की तरलता

झरनों की शरारत

नहरों का लचीलापन।

कौन कहेगा इन्हें देखकर

कि इतने भाप्रवण होते हैं ये पहाड़।

 

पहाड़ों की विशालता

अपने सामने

किसी को बौना नहीं करती।

अपने सीने पर बसाये

एक पूरी दुनिया

ज़मीन से उठकर

कितनी सरलता से

छू लेते हैं आकाश को।

बादलों को सहलाते-दुलारते

बिजली-वर्षा-आंधी

सहते-सहते

कमज़ोर नहीं हो जाते यह पहाड़।

आकाश को छूकर

ज़मीन को नहीं भूल जाते ये पहाड़।

 

ज़रा-ज़रा सी बात पर

सागर की तरह

उफ़न नहीं पड़ते ये पहाड़।

नदियों-नहरों की तरह

अपने तटबन्धों को नहीं तोड़ते।

बार-बार अपना रास्ता नहीं बदलते

नहरों-झीलों-तालाबों की तरह

झट-से लुप्त नहीं हो जाते।

और मावन-मन की तरह

जगह-जगह नहीं भटकते।

अपनी स्थिरता में

अविचल हैं ये पहाड़।

 

अपने पैरों से रौंद कर भी

रौंद नहीं सकते तुम पहाड़।

 

पहाड़ों को उजाड़ कर भी

उजाड़ नहीं सकते तुम पहाड़।

 

पहाड़ की उंचाई

तो शायद

आंख-भर नाप भी लो

लेकिन नहीं जान सकते कभी

कितने गहरे हैं ये पहाड़।

 

बहुत बड़ी चाहत है मेरी

काश !

पहाड़-सी होती मेरी ज़िन्दगी।

 

 

शब्दों की भाषा समझी न

शब्दों की भाषा समझी न

नयनों की भाषा क्या समझोगे

 

रूदन समझते हो आंसू को

मुस्कानों की भाषा क्या समझोगे

 

मौन की भाषा समझी न

मनुहार की भाषा क्या समझोगे

 

गुलदानों में रखते हो फूलों को

प्यार की भाषा क्या समझोगे

मैं वारिस हूं अकेली अपनी तन्हाईयों की।

मैं हंसती हूं, गाती हूं।

गुनगुनाती हूं, मुस्कुराती हूं

खिलखिलाती हूं।

हंसती हूं

तो हंसती ही चली जाती हूं

बोलती हूं

तो बोलती ही चली जाती हूं

लोग कहते हैं

कितना जीवन्तता भरी है इसके अन्दर

जीवन जीना हो तो कोई इससे सीखे।

 

एक आवरण है यह।

झांक न ले कहीं कोई मेरे भीतर।

न भेद ले मेरे मन की गहराईयों को।

न खटखटाए कोई मेरे मन की सांकल।

छू न ले मेरी तन्हाईयों को।

न भंग हो मेरी खामोशी की चीख।

मेरी अचल अटल सम्पत्ति हैं ये।

कोई लूट न ले

मेरी जीवन भर की अर्जित सम्पदा

मैं वारिस हूं अकेली अपनी तन्हाईयों की।

 

ठकोसले बहुत हैं

न मन थका-हारा, न तन थका-हारा

किसी झूठ, किसी सच में फंसा बेचारा

यहां दुनियादारी के ठकोसले बहुत हैं

किस-किससे निपटे, बुरा फंसा बेचारा

अच्‍छी नींद लेने के लिए

अच्‍छी नींद लेने के लिए बस एक सरकारी कुर्सी चाहिए

कुछ चाय-नाश्‍ता और कमरे में एक ए सी होना चाहिए

फ़ाईलों को बनाईये तकिया, पैर मेज़ पर ज़रा टिकाईये

काम तो होता रहेगा, टालने का तरीका आना चाहिए

दो चाय पिला दो

प्रात की नींद से न अच्‍छा समय कोई

दो चाय पिला दो आपसे अच्‍छा न कोई

मोबाईल की टन-टन न हमें जगा पाये

कुम्‍भकरण से कम न जाने हमें कोई

जो मिला बस उसे संवार

कहते हैं जीवन छोटा है, कठिनाईयां भी हैं और दुश्वारियां भी

किसका संग मिला, कौन साथ चला, किसने निभाई यारियां भी

आते-जाते सब हैं, पर यादों में तो कुछ ही लोग बसा करते हैं

जो मिला बस उसे संवार, फिर देख जीवन में हैं किलकारियां भी

मन के भाव देख प्रेयसी

रंग रूप की ऐसी तैसी

मन के भाव देख प्रेयसी

लीपा-पोती जितनी कर ले

दर्पण बोले दिखती कैसी

नादानियां भी आप ही तो कर रहे हैं हम

बाढ़ की विभीषिका से देखो डर रहे हैं हम

नादानियां भी आप ही तो कर रहे हैं हम

पेड़ काटे, नदी बांधी, जल-प्रवाह रोक लिए

आफ़त के लिए सरकार को कोस रहे हैं हम

पर मूर्ख बहुत था रावण

कहते हैं दुराचारी था, अहंकारी था, पर मूर्ख बहुत था रावण

बहन के मान के लिए उसने दांव पर लगाया था सिंहासन

जानता था जीत नहीं पाउंगा, पर बहन का मान रखना था उसे

अपने ही कपटी थे, जानकर भी,  दांव पर लगाया था सिंहासन

चल आगे बढ़ जि़न्‍दगी

भूल-चूक को भूलकर, चल आगे बढ़ जि़न्‍दगी

अच्‍छा-बुरा सब छोड़कर, चल आगे बढ़ जि़न्‍दगी

हालातों से कभी-कभी समझौता करना पड़ता है

बदले का भाव छोड़कर, चल आगे बढ़ जि़न्‍दगी

द्वार पर सांकल लगने लगी है

उत्‍सवों की चहल-पहल अब भीड़ लगने लगी है

अपनों की आहट अब गमगीन करने लगी है

हवाओं को घोटकर बैठते हैं सिकुड़कर हम

कोई हमें बुला न ले, द्वार पर सांकल लगने लगी है

ज़रा-ज़रा-सी बात पर

ज़रा-ज़रा-सी बात पर यूं ही विश्‍वास चला गया

फूलों को रौंदते, कांटों को सहेजते चला गया

काश, कुछ ठहर कर कही-अनकही सुनी होती

हम रूके नहीं,सिखाते-सिखाते ज़माना चला गया

खालीपन का एहसास

 

घर के आलों में

दीवारों में,

कहीं कोनों में,

पुरानी अलमारियों में,

पुराने कपड़ों की तहों में

छिपाकर रखती रही हूं

न जाने कितने एहसास,

तह-दर-तह

समेटकर रखे थे मैंने

बेमतलब, बेवजह।

सर्दी-गर्मी,

होली-दीपावली पर

जब साफ़-सफ़ाई

होती है घर में,

सबसे पहले,

सब, एक होकर

उनकी ही छंटाई में लग जाते हैं,

कितना बेकार कचरा जमा कर रखा है घर में।

कितनी जगह रूकी है

इनकी वजह से,

कब काम आता है ये सब,

पूछते हैं सब मुझसे।

मेरे पास कोई उत्तर नहीं होता कभी भी।

इसे मेरा समर्पण मानकर

मुझसे पूछे बिना

छंटाई हो जाती है।

घर में जगह बन जाती है।

मैं अपने भीतर भी

एक खालीपन का एहसास करती हूं

पर वहां कुछ नया जमा नहीं पाती।

 

ठेस लगती है कभी

ठेस लगती है कभी, टूटता है कुछ, बता पाते नहीं।

आंख में आंसू आते हैं, किससे कहें, बह पाते नहीं।

कभी किसी को दिखावा लगे, कोई कहे निर्बलता ।

बार-बार का यह टकराव कई बार सह पाते नहीं।

अकारण क्यों हारें

राहों में आते हैं कंकड़-पत्थर, मार ठोकर कर किनारे।

न डर किसी से, बोल दे सबको, मेरी मर्ज़ी, हटो सारे।

जो मन चाहेगा, करें हम, कौन, क्यों रोके हमें यहां।

कर्म का पथ कभी छोड़ा नहीं, फिर अकारण क्यों हारें।

 

अपना ही साथ हो

उम्र के इस पड़ाव पर

अनजान सुनसान राहों पर

जब नहीं पाती हूं

किसी को अपने आस पास

तब अपनी ही प्रतिकृति तराशती हूं ।

मन का कोना कोना खोलती हूं उसके साथ।

बालपन से अब तक की

कितनी ही यादें और कितनी ही बातें

सब सांझा करती हूं इसके साथ।

लौट आता है मेरा बचपना

वह अल्हड़पन और खुशनुमा यादें

वो बेवजह की खिलखिलाहटें

वो क्लास में सोना

कंचे और गोटियां, सड़क पर बजाई सीटियां

छत की पतंग

आमपापड़ और खट्टे का स्वाद

पुरानी कापियां देकर  

चूरन और रेती खाने की उमंग

गुल्लक से चुराए पैसे

फिल्में देखीं कैसे कैसे

टीचर की नकल, उनके नाम

और पता नहीं क्या क्या

अब सब तो बताया नहीं जा सकता।

यूं ही

खुलता है मन का कोना कोना।

बांटती हूं सब अपने ही साथ।

जिन्हें किसी से बांटने के लिए तरसता था मन

अपना ही हाथ पकड़कर आगे बढ़ जाती हूं

नये सिरे से।

यूं ही डरती थी, सहमी थी।

अब जानी हूं

ज़िन्दगी को पहचानी हूं।

विचलित करती है यह बात

मां को जब भी लाड़ आता है

तो कहती है

तू तो मेरा कमाउ पूत है।

 

पिता के हाथ में जब

अपनी मेहनत की कमाई रखती हूं

तो एक बार तो शर्म और संकोच से

उनकी आंखें डबडबा जाती हैं

फिर सिर पर हाथ फेरकर

दुलारते हुए कहते हैं

मुझे बड़ा नाज़ है

अपने इस होनहार बेटे पर।

 

किन्तु

मुझे विचलित करती है यह बात

कि मेरे माता पिता को जब भी

मुझ पर गर्व होता है

तो वे मुझे

बेटा कहकर सम्बोधित क्यों करते हैं

बेटी मानकर गर्व क्यों नहीं कर पाते।

नई शुरूआत

जो मैं हूं

वैसा सब मुझे जान नहीं पाते

और जैसा सब मुझे जान पाते हैं

वह मैं बन नहीं पाती।

बार बार का यह टकराव

हर बार हताश कर जाता है मुझे

फिर साथ ही उकसा जाता है

एक नई शुरूआत के लिए।।।।।।।।।।।

खेल फिर शुरू हो जाता है

कभी कभी, समझ नहीं पाती हूं

कि मैं

आतंकित होकर चिल्लती हूं

या आतंक पैदा करने के लिए।

तुमसे डरकर चिल्लती हूं

या तुम्हें डराने के लिए।

लेकिन इतना जानती हूं

कि मेरे भीतर एक डर है

एक औरत होने का डर।

और यह डर

तुम सबने पैदा किया है

तुम्हारा प्यार, तुम्हारी मनुहार

पराया सा अपनापन

और तुम्हारी फ़टकार

फिर मौके बे मौके

उपेक्षा दर्शाता तुम्हारा तिरस्कार

निरन्तर मुझे डराते रहते हैं।

और तुम , अपने अलग अलग रूपों में

विवश करते रहते हो मुझे

चिल्लाते रहने के लिए।

फिर एक समय आता है

कि थककर मेरी चिल्लाहट

रूदन में बदल जाती है।

और तुम मुझे

पुचकारने लगते हो।

*******

खेल, फिर शुरू हो जाता है।

घुमक्कड़ हो गया है मन

घुमक्कड़ हो गया है मन

बिन पूछे बिन जाने

न जाने

निकल जाता है कहां कहां।

रोकती हूं, समझाती हूं

बिठाती हूं , डराती हूं, सुलाती हूं।

पर सुनता नहीं।

भटकता है, इधर उधर अटकता है।

न जाने किस किस से जाकर लग  जाता है।

फिर लौट कर

छोटी छोटी बात पर

अपने से ही उलझता है।

सुलगता है।

ज्वालामुखी सा भभकता है।

फिर लावा बहता है आंखों से।

मेरे देश को रावणों की ज़रूरत है

मेरे देश को रावणों की ज़रूरत है।

चौराहे पर रीता, बैठक में मीता

दफ्तर में नीता, मन्दिर में गीता

वन वन सीता,

कहती है

रावण आओ, मुझे बचाओ

अपहरण कर लो मेरा

अशोक वाटिका बनवाओ।

 

ऋषि मुनियों की, विद्वानों की

बलशाली बाहुबलियों की

पितृभक्तों-मातृभक्तों की

सत्यवादी, मर्यादावादी, वचनबद्धों की

अगणित गाथाएं हैं।

वेद-ज्ञाता, जन-जन के हितकारी

धर्मों के नायक और गायक

भीष्म प्रतिज्ञाधारी, राजाज्ञा के अनुचारी

धर्मों के गायक और नायक

वचनों से भारी।

कर्म बड़े हैं, धर्म बड़े हैं

नियम बड़े हैं, कर्म बड़े हैं।

नाक काट लो, देह बांट लो

संदेह करो और त्याग करो।

वस्त्र उतार लो, वस्त्र चढ़ा दो।

श्रापित कर दो, शिला बना दो।

मुक्ति दिला दो। परीक्षा ले लो।

कथा बना लो।चरित्र गिरा दो।

 

देवी बना दो, पूजा कर लो

विसर्जित कर दो।

हरम सजा लो, भोग लगा लो।

नाच नचा लो, दुकान सजा लो।

भाव लगा लो। बेचो-बेचो और खरीदो।

बलात् बिठा लो, बलात् भगा लो।

मूर्ख बहुत था रावण।

जीत चुका था जीवन ,हार चुकी थी मौत।

विश्व-विजेता, ज्ञानी-ध्यानी

ऋद्धि-सिद्धि का स्वामी।

 

न चेहरा देखा, न स्पर्श किया।

पत्नी बना लूं, हरम सजा लूं

दासी बना लूं

बिना स्वीकृति कैसे छू लूं

सोचा करता था रावण।

मूर्ख बहुत था रावण।

 

सुरक्षा दी, सुविधाएं दी

इच्छा पूछी, विनम्र बना था रावण।

दूर दूर रहता था रावण।

मूर्ख बहुत था रावण।

 

धर्म-विरोधी, काण्ड-विरोधी

निर्मम, निर्दयी, हत्यारा,

असुर बुद्धि था रावण।

पर औरत को औरत माना

मूर्ख बहुत था रावण।

 

अपमान हुआ था एक बहन का

था लगाया दांव पर सिहांसन।

राजा था, बलशाली था

पर याचक बन बैठा था रावण

मूर्ख बहुत था रावण।

एक बोध कथा

बचपन में

एक बोध कथा पढ़ाई जाती थी:

आंधी की आहट से आशंकित

घास ने

बड़े बड़े वृक्षों से कहा

विनम्रता से झुक जाओ

नहीं तो यह आंधी

तुम्हें नष्ट कर देगी।

वृक्ष सुनकर मुस्कुरा दिये

और आकाश की ओर सिर उठाये

वैसे ही तनकर खड़े रहे।

 

आंधी के गुज़र जाने के बाद

घास मुस्कुरा रही थी

और वृक्ष धराशायी थे।

 

किन्तु बोध कथा के दूसरे भाग में

जो कभी समझाई नहीं गई

वृक्ष फिर से उठ खड़े हुए

अपनी जड़ों से

आकाश की ओर बढ़ते हुए

एक नई आंधी का सामना करने के लिए

और झुकी हुई घास

सदैव पैरों तले रौंदी जाती रही।

 

दो घूंट

छोड़ के देख

एक बार

बस एक बार

दो घूंट

छोड़ के देख

दो घूंट का लालच।

 

शाम ढले घर लौट

पर छोड़ के

दो घूंट का लालच।

फिर देख,

पहली बार देख

महकते हैं

तेरी बगिया में फूल।

 

पर एक बार

 

 

बस एक बार

छोड़ के देख

दो घूंट का लालच।

 

देख

फिर देख

जिन्दगी उदास है।

द्वार पर टिकी

एक मूरत।

निहारती है

सूनी सड़क।

रोज़

दो आंखें पीती हैं।

जिन्हें, देख नहीं पाता तू।

क्योंकि

पी के आता है

तू

दो घूंट।

डरते हैं,

रोते भी हैं

फूल।

और सहमकर

बेमौसम ही

मुरझा भी जाते हैं ये फूल।

कैसे जान पायेगा तू ये सब

पी के जो लौटता है

दो घूंट।

 

एक बार, बस एक बार

छोड़ के देख दो घूंट।

 

चेहरे पर उतर आयेगी

सुबह की सुहानी धूप।

बस उसी रोज़, बस उसी रोज़

जान पायेगा

कि महकते ही नहीं

चहकते भी हैं फूल।

 

जिन्दगी सुहानी है

हाथ की तेरे बात है

बस छोड़ दे, बस छोड़ दे

दो घूंट।

 

बस एक बार, छोड़ के देख

दो घूंट का लालच ।

आंख को धुंधला अहं भी कर देता है

लोग, अंधेरे से घबराते हैं

मुझे, उजालों से डर लगता है।

प्रकाश देखती हूं

मन घबराने लगता है

सूरज निकलता है

आंखें चौंधिया जाती हैं

ज़्यादा रोशनी

आंख को अंधा कर देती है।

फिर

पैर ठोकर खाने लगते हैं,

गिर भी सकती हूं,

चोट भी लग सकती है,

और जान भी जा सकती है।

किन्तु जब अंधेरा होता है,

तब आंखें फाड़-फाड़ कर देखने का प्रयास

मुझे रास्ता दिखाने लगता है।

गिरने का भय नहीं रहता।

और उजाले की अपेक्षा

कहीं ज़्यादा दिखाई देने लगता है।

 

आंखें

अभ्यस्त हो जाती हैं

नये-नये पथ खोजने की

डरती नहीं

पैर भी नहीं डगमगाते

वे जान जाते हैं

आगे अवरोध ही होंगे

पत्थर ही नहीं, गढ्ढे भी होंगे।

पर अंधेरे की अभ्यस्त आंखें

प्रकाश की आंखों की तरह

चौंधिया नहीं जातीं।

राहों को तलाशती

सही राह पहचानतीं

ठोकर खाकर भी आगे बढ़ती हैं

प्रकाश की आंखों की तरह

एक अहं से नहीं भर जातीं।

 

आंख को धुंधला

केवल आंसू ही नहीं करते

अहं भी कर देता है।

वैसे मैं तुम्हें यह भी बता दूं

कि ज़्यादा प्रकाश

आंख के आगे अंधेरा कर देता है

और ज़्यादा अंधेरा

आंख को रोशन

 

अत:

मैं रोशनी का अंधापन नहीं चाहती

मुझे

अंधेरे की नज़र चाहिए

जो रात में दिन का उजाला खोज सके

जो अंधेरे में

प्रकाश की किरणें बो सके

और प्रकाश के अंधों को

अंधेरे की तलाश

और उसकी पहचान बता सके।

 

हादसा

यह रचना मैंने उस समय लिखी थी जब 1987 में चौधरी चरण सिंह की मृत्यु हुई थी और उसी समय लालडू में दो बसों से उतारकर 43 और 47 सिखों को मौत के घाट उतार दिया था।)

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भूचाल, बाढ़, सूखा।

सामूहिक हत्याएं, साम्प्रदायिक दंगे।

दुर्घटनाएं और दुर्घटनाएं।

लाखों लोग दब गये, बह गये, मर गये।

बचे घायल, बेघर।

 

प्रशासन निर्दोष। प्राकृतिक प्रकोप।

खानदानी शत्रुता। शरारती तत्व।

विदेशी हाथ।

 

सरकार का कर्त्तव्य

आंकड़े और न्यायिक जांच।

पदयात्राएं, आयोग और सुझाव।

चोट और मौत के अनुसार राहत।

 

विपक्षी दल

बन्द का आह्वान।

फिर दंगे, फिर मौत।

 

सवा सौ करोड़ में

ऐसी रोज़मर्रा की घटनाएं

हादसा नहीं हुआ करतीं।

 

हादसा तब हुआ

जब एक नब्बे वर्षीय युवा,

राजनीति में सक्रिय

स्वतन्त्रता सेनानी

सच्चा देशभक्त

सर्वगुण सम्पन्न चरित्र

असमय, बेमौत चल बसा

अस्पताल में

दस वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद।

हादसा ! बस उसी दिन हुआ।

 

देश शोक संतप्त।

देश का एक कर्णधार कम हुआ।

हादसे का दर्द

बड़ा गहरा है

देश के दिल में।

क्षतिपूर्ति असम्भव।

और दवा -

 सरकारी अवकाश,

राजकीय शोक, झुके झण्डे

घाट और समाधियां,

गीता, रामायण, बाईबल, कुरान, ग्रंथ साहिब

सब आकाशवाणी और दूरदर्शन पर।

अब हर वर्ष

इस हादसे का दर्द बोलेगा

देश के दिल में

नारों, भाषणों, श्रद्धांजलियों

और शोक संदेशों के साथ।

 

ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को

शांति देना।

कहते हैं जब जागो तभी सवेरा

कहते हैं जब जागो तभी सवेरा, पर ऐसा कहां हो पाता है

आधे टूटे-छूटे सपनों से जीवन-भर न पीछा छूट पाता है

रात और दिन के अंधेरे-उजियारे में उलझा रहता है मन

सपनों की गठरी रिसती है यह मन कभी समझ न पाता

किसके हाथ में डोर है

नगर नगर में शोर है यहां गली-गली में चोर है

मुंह ढककर बैठे हैं सारे, देखो अन्याय यह घोर है

समझौते की बात हुई, कोई किसी का नाम न ले

धरने पर बैठै हैं सारे, ढूंढों किसके हाथ में डोर है

होगा कैसे मनोरंजन

कौन कहे ताक-झांक की आदत बुरी, होगा कैसे मनोरंजन

किस घर में क्या पकता, नहीं पता तो कैसे मानेगा मन

अपने बर्तन-भांडों की खट-पट चाहे सुनाये पूरी कथा

औरों की सीवन उधेड़ कर ही तो मिलता है चैन-अमन