वितंडावाद में चतुर

घात प्रतिघात आघात की बात हम करते रहे है

अपनी नाकामियों का दोष दूसरों पर मढ़ते रहे हैं

भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे कुछ करने का दम नहीं है

वितंडावाद में चतुर जनता को भ्रमित करते रहे हैं

औरों को मत देख बस अपने मन में ठान ले

अपने जीवन को  निष्‍कपट बनाने के लिए क्रांति की जरूरत है

अपने भीतर की बुराईयों को मिटाने के लिए क्रांति की जरूरत है

किसी क्रांतिकारी ने कभी झाड़ू नहीं उठाया था किसी नारे के साथ

औरों को मत देख बस अपने मन में ठान ले इसकी ज़रूरत है

स्वच्छता अभियान की नहीं, स्वच्छ भारत बनाये रखने की ज़रूरत है

जमाना जले तो जलने दो

मौसम आशिकाना है मुहब्बत की बात करो
जमाना जले तो जलने दो इकरार से डरो
उम्र की बात करना मेरे साथ, जी जलता है
नहीं समझ आती मेरी बात तो बाबा बन के मरो

बस स्नेह की वाणी बोल रे

बस दो मीठे बोल बोल ले

जीवन में मधुरस घोल ले

सहज-सहज बीतेगा जीवन

बस स्नेह की वाणी बोल रे

अमृत गरल जो भी मिले

जीवन सरल सहज है बस मस्ती में जिये जा

सुख दुख तो आयेंगे ही घोल पताशा पिये जा

न बोल,बोल कड़वे,हर दिन अच्छा बीतेगा

अमृत गरल जो भी मिले हंस बोलकर लिये जा

कौन क्या कहता है, भूलकर मदमस्त जिये जा

हाथ पर रखें लौ को

रोशनी के लिए दीप प्रज्वलित करते हैं

फिर दीप तले अंधेरे की बात करते हैं

तो हिम्मत करें, हाथ पर रखें लौ को

जो जग से तम मिटाने की बात करते है

न उदास हो मन

पथ पर कंटक होते है तो फूलों की चादर भी होती है

जीवन में दुख होते हैं तो सुख की आशा भी होती है

घनघोर घटाएं छंट जाती हैं फिर धूप छिटकती है

न उदास हो मन, राहें कठिन-सरल सब होती हैं

भोर का सूरज

भोर का सूरज जीवन की आस देता है

भोर का सूरज रोशनी का भास देता है

सुबह से शाम तक ढलते हैं जीवन के रंग

भोर का सूरज नये दिन का विश्वास देता है

गगन पर बिखरी रंगीनिया

सूरज की किरणें देखो नित नया कुछ लाती है

भोर की आभा देखो नित नये रूप सजाती है

पत्ते-पत्ते पर खेल रही ओस की बूंदे झिलमिल

गगन पर बिखरी रंगीनिया देखो नित लुभाती है।

आकाश में अठखेलियां करते देखो बादल

आकाश में अठखेलियां करते देखो बादल

ज्‍यों मां से हाथ छुड़ाकर भागे देखो बादल

डांट पड़ी तो रो दिये,मां का आंचल भीगा

शरारती-से,जाने कहां गये ज़रा देखो बादल

कर्म-काण्ड छोड़कर, बस कर्म करो

राधा बोली कृष्ण से, चल श्याम वन में, रासलीला के लिए

कृष्ण हतप्रभ, बोले गीता में दिया था संदेश हर युग के लिए

बहुत अवतार लिए, युद्ध लड़े, उपदेश दिये तुम्हें हे मानव!

कर्म-काण्ड छोड़कर, बस कर्म करो मेरी आराधना के लिए 

क्यों अनकही बातें नासूर बनकर रहें

मन में कटु भाव रहें, मुख पर हास रहे
इस छल-कपट को कौन कब तक सहे
जो मन में है, खुलकर बोल दिया कर 
क्यों अनकही बातें नासूर बनकर रहें

 

अफ़वाहों से दूरी कीजिए

थोड़ा धीरज कीजिए, घर के भीतर रह लीजिए

समय की मांग है अब अपनों से दूरी कीजिए

विश्वव्यापी समस्याओं से उलझे हुए हैं हम

सब ठीक हो जायेगा, अफ़वाहों से दूरी कीजिए

डरे हुए हैं हम

तनिक विचार कीजिए कहां खड़े हैं हम

न आयुध, न सेना, फिर भी लड़ रहे हैं हम

परस्पर दूरियां बनाकर जीने को विवश हैं

मौत किस ओर से आयेगी डरे हुए हैं हम

फंसते हैं मंझधार में हम

सत्य बोलें तो मधुर नहीं
असत्य वचन उचित नहीं
फंसते हैं मंझधार में हम
मौन भी तो समाधान नहीं


 

गौरैया से मैंने पूछा कहां रही तू इतने दिन

गौरैया से मैंने पूछा कहां रही तू इतने दिन

बोली मायके से भाई आया था कितने दिन

क्या-क्या लाया, क्या दे गया और क्या बात हुई

मां की बहुत याद आई रो पड़ी, गौरैया उस दिन

चिड़-चिड़ करती गौरैया

चिड़-चिड़ करती गौरैया

उड़-उड़ फिरती गौरैया

दाना चुगती, कुछ फैलाती

झट से उड़ जाती गौरैया

सोने की  हैं ये कुर्सियां

सरकार अपनी आ गई है चल अब तोड़ाे जी ये कुर्सियां

काम-धाम छोड़-छाड़कर अब सोने की  हैं जी ये कुर्सियां

पांच साल का टिकट कटा है हमरे इस आसन का

कई पीढ़ियों का बजट बनाकर देंगी देखो जी ये कुर्सियां

कभी फुहार तो कभी बहार

चल सावन की घटाओं को हेर फेर घेर लें हम
जैसा मन आये वैसे ही मन की बात टेर लें हम
कभी हरा, कभी सूखा कभी फुहार तो कभी बहार
प्यार, मनुहार, इकरार, जैसे भी उनको घेर लें हम

कहते हैं सावन जलता है

कहते हैं सावन जलता है, यहां तो गली-गली पानी बहता है
प्यार की पींगे चढ़ती हैं, यहां सड़कों पर सैलाब बहता है
जो घर से निकला पता नहीं किस राह लौटेगा बहते-बहते
इश्क-मुहब्बत कहने की ातें, छत से पानी टपका रहता है


 

राहें जिन्दगी की खूबसरत हैं

जिन्दगी कोई शतरंज नहीं कि चाल चलकर मात हो
जिन्दगी कोई ख्वाब नहीं कि सपनों में हर बात हो
राहें जिन्दगी की खूबसरत हैं साथ साथ चलते रहें 
जिन्दगी कोई रण नहीं कि बात बात पर प्रतिघात हो


 

नारी में भी चाहत होती है

ममता, नेह, मातृछाया बरसाने वाली नारी में भी चाहत होती है

कोई उसके मस्तक को भी सहला दे तो कितनी ही राहत होती है

पावनता के सारे मापदण्ड बने हैं बस एक नारी ही के लिए
कभी तुम भी अग्नि-परीक्षा में खरे उतरो यह भी चाहत होती है

ऐसा ही होता है हर युग में

अग्नि परीक्षा देने पर भी सीता तो बदनाम हुई थी

किया कुकर्म इन्द्र ने पर अहिल्या तो बलिदान हुई थी

पाषाण रूप पड़ी रही, सीता को बनवास मिला था

ऐसा ही होता है हर युग में नारी ही कुरबान हुई थी

अबला- सबला की बातें अब छोड़ क्‍यों नहीं देते

शूर्पनखा, सती-सीता-सावित्री, देवी, भवानी की बातें अब हम छोड़ क्यों नहीं देते

कभी आरोप, कभी स्तुति, कभी उपहास, अपने भावों को नया मोड़ क्यों नहीं देते

बातें करते अधिकारों  की, मानों बेडि़यों में जकड़ी कोई जन्‍मों की अपराधी हो

त्‍याग, तपस्‍या , बलिदान समर्पण अबला- सबला की बातें अब छोड़ क्‍यों नहीं देते

बारिश के मौसम में

बारिश के मौसम में मन देखो, है भीग रहा

तरल-तरल-सा मन-भाव यूं कुछ पूछ रहा

क्यों मन चंचल है आज यहां कौन आया है

कैसे कह दूं किसकी यादों में मन सीज रहा

बारिश की बूंदे अलमस्त सी

बारिश की बूंदे अलमस्त सी, बहकी-बहकी घूम रहीं

पत्तों-पत्तों पर सर-सर करतीं, इधर-उधर हैं झूम रहीं

मैंने रोका, हाथों पर रख, उनको अपने घर ले आई मैं

पता नहीं कब भागीं, कहां गईं, मैं घर-भर में ढूंढ रही

उलझनों से भागकर सहज लगता है जीवन

तितलियों संग देखो उड़ता फिरता है मन

चांद-तारो संग देखो मुस्कुराता है गगन

चल कहीं आज किसी के संग बैठें यूं ही

उलझनों से भागकर सहज लगता है जीवन

कब उससे आंखें चार हुईं थीं याद करूं वे दिन

कब उससे आंखें चार हुईं थीं, याद करूं वे दिन

दिखने में भोला-भाला लगता था कैसे थे वे दिन

चिट्ठी पर चिट्ठी लिखता था तब ऐसे थे वे दिन

नागपुर से शिमला आता था भाग-भागकर कितने दिन

तब हंस-हंस मिलता था, आफिस से बंक मार कर

पांच रूपये का सूप पिलाकर बिताता था पूरा दिन

तीन दशक पीछे की यादें अक्सर क्यों लाता है मन

याद करूं जब,तो कहता अब तू दिन में तारे गिन

अब कहता है जा चाय बना और बना साथ चिकन

रिश्तों को तो बचाना है

समय ने दूरियां खड़ी कर दी हैं, न जाने कैसा ये ज़माना है

मिलना-जुलना बन्द हुआ, मोबाईल,वाट्स-एप का ज़माना है

अपनी-अपनी व्यस्तताओं में डूबे,कुछ तो समय निकालो यारो

कभी मेरे घर आओ,कभी मुझे बुलाओ,रिश्तों को तो बचाना है

आवश्यकता है होश दिवस की

१६ अक्टूबर को  'एनेस्थीसिया डे' अर्थात् 'मूर्छा दिवस' होता है

प्रेरित होकर प्रस्तुति

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कोई होश दिवस मनाए

हम सबको होश में लाये

जो हो रहा है

उसकी जांच परख करवाए।

यहां सब सो रहे हैं

किसका धन है काला

किसका है सफ़ेद

कौन हमें बतलाए।

कुछ दुकानें बन्द हो रहीं

कुछ की दीवाली सज रही

इधर बार-बार बाढ़

आ रही

और दुनिया है कि

पानी को तरस रही

कौन बतलाए

कोई होश दिवस मनाएं

हम सबको होश में लाये।

 

बैंक डूब रहे

निकासी बन्द हो रही

सुनते हैं कुछ मंदी है

पर सरकार कहे सब चंगी है

सच को कौन हमें समझाए

कोई होश दिवस मनाए

हम सबको होश में लाये

जो हो रहा है

उसकी जांच परख करवाए।