कहते हैं जब जागो तभी सवेरा

कहते हैं जब जागो तभी सवेरा, पर ऐसा कहां हो पाता है

आधे टूटे-छूटे सपनों से जीवन-भर न पीछा छूट पाता है

रात और दिन के अंधेरे-उजियारे में उलझा रहता है मन

सपनों की गठरी रिसती है यह मन कभी समझ न पाता

जैसा सोचो वैसा स्वाद देती है जि़न्दगी

कभी अस्त–व्यस्त सी लगे है जि़न्दगी
कभी मस्त-मस्त सी लगे है जि़न्दगी
झर-पतझड़, कण्टक-सुमन सब हैं यहां
जैसा सोचो वैसा स्वाद देती है जि़न्दगी

जब एक तिनका फंसता है

दांत में

जब एक तिनका फंस जाता है

हम लगे रहते हैं

जिह्वा से, सूई से,

एक और तिनके से

उसे निकालने में।

 

किन्तु , इधर

कुछ ऐसा फंसने लगा है गले में

जिसे, आज हम

देख तो नहीं पा रहे हैं,

जो धीरे-धीरे, अदृश्य,

एक अभेद्य दीवार बनकर

घेर रहा है हमें चारों आेर से।

और हम नादान

उसे दांत का–सा तिनका समझकर

कुछ बड़े तिनकों को जोड़-जोड़कर

आनन्दित हो रहे हैं।

किन्तु बस

इतना ही समझना बाकी रह गया है

कि जो कृत्य हम कर रहे हैं

न तो तिनके से काम चलने वाला है

न सूई से और न ही जिह्वा से।

सीधे झाड़ू ही फ़िरेगा

हमारे जीवन के रंगों पर।

 

कैसे होगा तारण

आज डूबने का मन है कहां डूबें बता रे मन

सागर-दरिया में जल है किन्तु वहां है मीन

जो कर्म किये बैठे हैं इस जहां में हम लोग

चुल्लू-भर पानी में डूब मरें तभी तो होगा तारण

परीलोक से आई है

चित्रलिखित सी प्रतीक्षारत ठहरी हो मुस्काई-सी
नभ की लाली मुख पर कुमकुम सी है छाई-सी
दीपों की आभा में आलोकित, घूंघट की ओट में
नयनाभिराम रूप लिए परीलोक से आई है सकुचाई-सी

जीवन के अनमोल पल
यादों की गठरियों में कुछ अनमोल रत्न हुआ करते हैं

कभी कभी कुछ रिसते-से जख्म भी हुआ करते हैं

इन सबके बीच झूलता है मन,क्‍या करे कोई

जीवन के पल जैसे भी हों,सब अनमोल हुआ करते है।

 

नयन क्यों भीगे

मन के उद्गारों को कलम उचित शब्द अक्सर दे नहीं पाती

नयन क्यों भीगे, यह बात कलम कभी समझ नहीं पाती

धूप-छांव तो आनी-जानी है हर पल, हर दिन जीवन में

इतनी सी बात क्यों इस पगले मन को समझ नहीं आती

ज़िन्दगी में मुश्किल से सम्हलते हैं रिश्ते

वे चुप-चुप थे ज़रा, हमने पूछा कई बार, क्या हुआ है

यूं ही छोटी-छोटी बातों पर भी कभी कोई गैर हुआ है

ज़िन्दगी में मुश्किल से सम्हलते हैं कुछ अच्छे रिश्ते

सबसे हंस-बोलकर समय बीते, ऐसा  कब-कब हुआ है

सेंकनी है मुझको ज़िन्दगी की रोटी।

हाथ भी जलाती हूं, पैर भी जलाती हूं

दिल भी जलाती हूं, दिमाग भी जलाती हूं

पर तवा गर्म नहीं होता।

सेंकनी है मुझको ज़िन्दगी की रोटी।

मां ने कहा, बाप ने कहा,

पति ने कहा, सास ने कहा।

सेंकनी है तुझको ज़िन्दगी की रोटी।

न आग न लपट, न धुंआ न चटक

सेंकनी है मुझको ज़िन्दगी की रोटी

मां ने कहा, बाप ने कहा,

पति ने कहा, समाज ने कहा।

सेंकनी है तुझको ज़िन्दगी की रोटी।

हाथ भी बंधे हैं, पैर भी बंधे हैं,

मुंह भी सिला है, कान भी कटे हैं।

सेंकनी है मुझको ज़िन्दगी की रोटी।

मां ने कहा, बाप ने कहा,

पति ने कहा, समाज ने कहा।

बोलना मना है, सुनना मना है,

देखना मना है, सोचना मना है,

सेंकनी है मुझको ज़िन्दगी की रोटी।

मां ने कहा, बाप ने कहा,

पति ने कहा, सास ने कहा।

भाव भी मिटाती हूं, आस भी लुटाती हूं

सपने भी बुझाती हूं, आब भी गंवाती हूं

सेंकनी है मुझको ज़िन्दगी की रोटी

आना मना है, जाना मना है,

रोना मना है, हंसना मना है।

मां ने कहा, बाप ने कहा,

पति ने कहा, सास ने कहा।

सेंकनी है मुझको ज़िन्दगी की रोटी।

हाथ भी जलाती हूं, पैर भी जलाती हूं

दिल भी जलाती हूं, दिमाग भी जलाती हूं

पर तवा गर्म नहीं होता।……………

बताते हैं क्या कीजिए

सुना है ज्ञान, ध्यान, स्नान एक अनुष्ठान है, नियम, काल, भाव से कीजिए

तुलसी-नीम डालिए, स्वच्छ जल लीजिए, मंत्र पढ़िए, राम-राम कीजिए।।

शून्य तापमान, शीतकाल, शीतल जल, काम इतना कीजिए बस चुपचाप

चेहरे को चमकाईए, क्रीम लगाईए, और हे राम ! हे राम ! कीजिए ।।

भोर की आस

चिड़िया आई

कहती है

भोर हुई,

उठ जा, भोर हुई।

आ मेरे संग

चल नये तराने गा,

रंगों से

मन में रंगीनीयाँ ला।

चल

एक उड़ान भर

मन में उमंग ला।

धरा पर पाँव रख।

गगन की आस रख।

जीवन में भाव रख।

रात की बात कर

भोर की आस रख।

चल मेरे संग उड़ान भर।

 

घन-घन-घन घनघोर घटाएं

घन-घन-घन घनघोर घटाएं,
लहर-लहर लहरातीं।

कुछ बूंदें बहकीं,

बरस-बरस कर,
मन सरस-सरस कर,
हुलस-हुलस कर,
हर्षित कर
लौट-लौटकर आतीं।

बूंदों का  सागर बिखरा ।

कड़क-कड़क, दमक-दमक,
चपल-चंचला दामिनी दमकाती।
मन आशंकित।
देखो, झांक-झांककर,
कभी रंग बदलतीं,

कभी संग बदलतीं।
इधर-उधर घूम-घूमकर
मारूत संग
धरा-गगन पर छा जातीं।

रवि  ने  मौका ताना,

सतरंगी आकाश बुना ।
निरख-निरख कर
कण-कण को
नेह-नीर से दुलराती।

ठिठकी-ठिठकी-सी शीत-लहर

फ़र्र-फ़र्र करती दौड़ गई।

सर्र-सर्र-सर्र कुछ पत्ते झरते

डाली पर नव-संदेश खिले

रंगों से धरती महक उठी।

पेड़ों के झुरमुट में बैठी चिड़िया

की किलकारी से नभ गूंज उठा

मानों बोली, उठ देख ज़रा

कौन आया ! बसन्त आया!!!


 

हम नित मूरख बन जायें

ज्ञानी-ध्यानी

पंडित-पंडे

भारी-भरकम।

पोथी बांचे

ज्ञान बांटें

हरदम।

गद्दी छोटी

पोटली मोटी

हम जैसे

अनपढ़।

डर का पाठ

हमें पढ़ाएं,

ईश्वर से डरना

हमें सिखाएं,

झूठ-सच से

हमें डराएं।

दान-दक्षिणा

से भरमाएं।

जेब हमारी खाली

हम नित

मूरख बन जायें।

 

 

 

प्यार का नाता

एक प्यार का नाता है, विश्वास का नाता है

भाई-बहन से मान करता, अपनापन भाता है

दूर रहकर भी नज़दीकियाँ यूँ बनी रहें सदा

जब याद आती है, आँख में पानी भर आता है

भविष्य

आदमी ने कहा

चाहिए औरत

जो बेटे पैदा करे।

 

हर आदमी ने कहा

औरत चाहिए।

पर चाहिए ऐसी औरत

जो केवल बेटे पैदा करे।

 

हर औरत

केवल

बेटे पैदा करने लगी।

 

अब बेटों के लिए

कहां से लाएंगे औरतें

जो उनके लिए

बेटे पैदा करें।

 

बस जूझना पड़ता है

मछलियां गहरे पानी में मिलती हैं

किसी मछुआरे से पूछना।

माणिक-मोती पाने के लिए भी

गहरे सागर में

उतरना पड़ता है,

किसी ज्ञानी से बूझना।

किश्तियां भी

मझधार में ही डूबती हैं

किसी नाविक से पूछना।

तल-अतल की गहराईयों में

छिपा है ज्ञान का अपरिमित भंडार,

किसी वेद-ध्यानी से पूछना।

पाताल लोक से

चंद्र-मणि पाने के लिए

कौन-सी राह जाती है,

किसी अध्यवसायी से पूछना।

.

उपलब्धियों को पाने के लिए

गहरे पानी में 

उतरना ही पड़ता है।

जूझना पड़ता है,

सागर की लहरों से,

सहना पड़ता है

मझधार के वेग को,

और आकाश से पाताल

तक का सफ़र तय करना पड़ता है।

और इन कोशिशों के बीच

जीवन में विष मिलेगा

या अमृत,

यह कोई नहीं जानता।

बस जूझना पड़ता है।

 

बोध

बोध 

खण्डित दर्पण में चेहरा देखना

अपशकुन होता है

इसलिए तुम्हें चाहिए

कि तुम

अपने इस खण्डित दर्पण को

खण्ड-खण्ड कर लो

और हर टुकड़े में

अपना अलग चेहरा देखो।

फिर पहचानकर

अपना सही चेहरा अलग कर लो

इससे पहले

कि वह फिर से

किन्हीं गलत चेहरों में खो जाये।

 

असलियत तो यह

कि हर टुकड़े का

अपना एक चेहरा है

जो हर दूसरे से अलग है

हर चेहरा एक टुकड़ा है

जो दर्पण में बना करता है

और तुम, उस दर्पण में

अपना सही चेहरा

कहीं खो देते हो

इसलिए तुम्हें चाहिए

कि दर्पण मत संवरने दो।

 

पर अपना सही चेहरा अलगाते समय

यह भी देखना

कि कभी-कभी, एक छोटा-टुकड़ा

अपने में

अनेक चेहरे आेढ़ लिया करता है

इसलिए

अपना सही अलगाते समय

इतना ज़रूर देखना

कि कहीं तुम

गलत चेहरा न उठा डालो।

 

आश्चर्य तो यह

कि हर चेहरे का टुकड़ा

तुम्हारा अपना है

और विडम्बना यह

कि इन सबके बीच

तुम्हारा सही चेहरा

कहीं खो चुका है।

 

ढू्ंढ सको तो अभी ढूंढ लो

क्योंकि दर्पण बार-बार नहीं टूटा करते

और हर खण्डित दर्पण

हर बार

अपने टुकड़ों में

हर बार चेहरे लेकर नहीं आया करता

टूटने की प्रक्रिया में

अक्सर खरोंच भी पड़ जाया करती है

तब वह केवल

एक शीशे का टुकड़ा होकर रह जाता है

जिसकी चुभन

तुम्हारे अलग-अलग चेहरों की पहचान से

कहीं ज़्यादा घातक हो सकती है।

 

जानती हूं,

कि टूटा हुआ दर्पण कभी जुड़ा नहीं करता

किन्तु जब भी कोई दर्पण टूटता है

तो मैं भीतर ही भीतर

एक नये सिरे से जुड़ने लगती हूं

और उस टूटे दर्पण के

छोटे-छोटे, कण-कण टुकड़ों में बंटी

अपने-आपको

कई टुकड़ों में पाने लगती हूं।

समझने लगती हूं

टूटना

और टूटकर, भीतर ही भीतर

एक नये सिरे से जुड़ना।

टूटने का बोध मुझे

सदा ही जोड़ता आया है।

सम्बन्धों की डोर

विशाल वृक्षों की जड़ों से जब मिट्टी दरकने लगती है

जिन्दगी की सांसें भी तब कुछ यूं ही रिसने लगती हैं

विशाल वृक्षों की छाया तले ही पनपने हैं छोटे पेड़ पौधे,

बड़ों की छत्रछाया के बिना सम्बन्धों की डोर टूटने लगती है

खामोशियां भी बोलती है

नई बात। अब कहते हैं मौन रहकर अपनी बात कहना सीखिए, खामोशियाँ भी बोलती हैं। यह भी भला कोई बात हुई। ईश्वर ने गज़ भर की जिह्वा दी किसलिए है, बोलने के लिए ही न, शब्दाभिव्यक्ति के लिए ही तो। आपने तो कह दिया कि खामोशियाँ बोलती हैं, मैंने तो सदैव धोखा ही खाया यह सोचकर कि मेरी खामोशियाँ समझी जायेगी। न जी न, सरासर झूठ, धोखा, छल, फ़रेब और सारे पर्यायवाची शब्द आप अपने आप देख लीजिएगा व्याकरण में।

मैंने तो खामोशियों को कभी बोलते नहीं सुना। हाँ, हम संकेत का प्रयास करते हैं अपनी खामोशी से। चेहरे के हाव-भाव से स्वीकृति-अस्वीकृति, मुस्कान से सहमति-असहमति, सिर से सहमति-असहमति। लेकिन बहुत बार सामने वाला जानबूझकर उपेक्षा कर जाता है क्योंकि उसे हमें महत्व देना ही नहीं है। वह तो कह जाता है तुम बोली नहीं तो मैंने समझा तुम्हारी मना है।

कहते हैं प्यार-व्यार में बड़ी खामोशियाँ होती हैं। यह भी सरासर झूठ है। इतने प्यार-भरे गाने हैं तो क्या वे सब झूठे हैं? जो आनन्द अच्छे, सुन्दर, मन से जुड़े शब्दों से बात करने में आता है वह चुप्पी में कहाँ, और यदि किसी ने आपकी चुप्पी न समझी तो गये काम से। अपना ऐसा कोई इरादा नहीं है।

मेरी बात बड़े ध्यान से सुनिए और समझिए। खामोशी की भाषा अभिव्यक्ति करने वाले से अधिक समझने वाले पर निर्भर करती है। शायद स्पष्ट ही कहना पड़ेगा, गोलमाल अथवा शब्दों की खामोशी से काम नहीं चलने वाला।

मेरा अभिप्राय यह कि जिस व्यक्ति के साथ हम खामोशी की भाषा में अथवा खामोश अभिव्यक्ति में अपनी बात कहना चाह रहे हैं, वह कितना समझदार है, वह खामोशी की कितनी भाषा जानता है, उसकी कौन-सी डिग्री ली है इस खामोशी की भाषा समझने में। बस यहीं हम लोग मात खा जाते हैं।

इस भीड़ में, इस शोर में, जो जितना ऊँचा बोलता है, जितना चिल्लाता है उसकी आवाज़ उतनी ही सुनी जाती है, वही सफ़ल होता है। चुप रहने वाले को गूँगा, अज्ञानी, मूर्ख समझा जाता है।

ध्यान रहे, मैं खामोशी की भाषा न बोलना जानती हूँ और न समझती हूँ, मुझे अपने शब्दों पर, अपनी अभिव्यक्ति पर, अपने भावों पर पूरा विश्वास है और ईश प्रदत्त गज़-भर की जिह्वा पर भी।

  

कामयाबी और भटकाव’

 

ओलम्पिक पदक विजेता सुशील कुमार पर गम्भीर आपराधिक मामले हैं। प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा प्राप्त करने के बाद नामी खिलाड़ी नकारात्मक दुनिया में कदम रखने लगे हैं। यह उनकी आकांक्षाओं का विस्तार और भटकाव तो है ही, किन्तु विचारणीय यह कि कारण क्या है? निःसंदेह ओलम्पिक में पदक प्राप्त करना बहुत बड़ी उपलब्धि है, और वे सम्मान के पात्र भी हैं। किन्तु इन विजेताओं को इतना महिमा-मण्डित किया जाता है कि वे अपने-आपको अति श्रेष्ठ समझने लग जाते हैं। कामयाबी और अहंकार उनके सर चढ़कर बोलने लगता है।  पुरस्कारों, पदकों, नकद राशि, ज़मीन, फ़्री की उंची नौकरी, उपहारों की झड़ी लग जाती है और यहां तक राजनीति में भी इनकी पूछ होने लगती है। राजीव गांधी खेल-रत्न, अर्जुन पुरस्कार, पद्म श्री, आदि न जाने कितने पुरस्कार मिले। कितने ही खिलाड़ियों को खेल एकेडमी खोलने के लिए ज़मीन दी जाती है। किन्तु जिस ओलम्पिक तक वे पहुंचते हैं, परिश्रम उनका होता है किन्तु उन पर किया जाने वाला व्यय, अभ्यास, प्रयास सब देश करता है और आम नागरिक के  धन से होता है। इसका एहसास उन्हें कभी भी नहीं कराया जाता। उन पर कोई दायित्व नहीं होते । इतना सब मिल जाने के बाद वे प्राप्त धनराशि, पद, ज़मीन का क्या कर रहे हैं कोई नहीं पूछता। उपलब्धियों के बाद वे अपने खेल के प्रति अथवा देश के प्रति क्या उत्तरदायित्व निभा रहे हैं कोई जांच नहीं होती। सात पीढ़ियों की सुविधाएं उनके पास आ जाती हैं और उन्हें कोई कर्तव्य बोध नहीं कराया जाता। हमारी यही नीतियां उन्हें नाकारा, उच्छृंखल और अपराधी बना देती हैं।

  

फूलों संग महक रही धरा

पत्तों पर भंवरे, कभी तितली बैठी देखो पंख पसारे।

धूप सेंकती, भोजन करती, चिड़िया देखो कैसे पुकारे।

सूखे पत्ते झर जायेंगे, फिर नव किसलय आयेंगें,

फूलों संग महक रही धरा, बरसीं बूंदें कण-कण निखारे।

जब लहराता है तिरंगा

एक भाव है ध्वजा,

देश के प्रति साख है ध्वजा।

प्रतीक है,

आन का, बान का, शान का।

.

तीन रंगों से सजा,

नारंगी, श्वेत, हरा

देते हमें जीवन के शुद्ध भाव,

शक्ति, साहस की प्रेरणा,

सत्य-शांति का प्रतीक,

धर्म चक्र से चिन्हित,

प्रकृति, वृद्धि एवं शुभता

की प्रेरणा।

भाव है अपनत्व का।

शीश सदा झुकता है

शीष सदा मान से उठता है,

जब लहराता है तिरंगा।

 

 

अपनी पहचान की तलाश

नाम ढूँढती हूँ पहचान पूछती हूँ ।

मैं कौन हूँ बस अपनी आवाज ढूँढती हूँ ।

प्रमाणपत्र जाँचती हूँ

पहचान पत्र तलाशती हूँ

जन्मपत्री देखती हूँ

जन्म प्रमाणपत्र मांगती हूँ

बस अपना नाम मांगती हूँ।

परेशान घूमती हूँ

पूछती हूँ सब से

बस अपनी पहचान मांगती हूं।

खिलखिलाते हैं सब

अरे ! ये कमला की छुटकी

कमली हो गई है।

नाम  ढूँढती है, पहचान ढूँढती है

अपनी आवाज ढूँढती है।

अरे ! सब जानते हैं

सब पहचानते हैं

नाम जानते हैं।

कमला  की बिटिया, वकील की छोरी

विन्नी बिन्नी की बहना,

हेमू की पत्नी, देवकी की बहू,

और मिठू की अम्मा ।

इतने नाम इतनी पहचान।

फिर भी !

परेशान घूमती है, पहचान पूछती है

नाम मांगती है, आवाज़ मांगती है।

मैं पूछती हूं

फिर ये कविता कौन है

कौन है यह कविता ?

बौखलाई, बौराई घूमती हूं

नाम पूछती हूं, अपनी आवाज ढूँढती हूं

अपनी पहचान मांगती हूं

अपना नाम मांगती हूं।