मन के मन्दिर ध्वस्त हुए हैं

मन के मन्दिर ध्वस्त हुए हैं,नव-नव मन्दिर गढ़ते हैं

अरबों-खरबों की बारिश है,धर्म के गढ़ फिर सजते हैं

आज नहीं तो कल होगा धर्मों का कोई नाम नया होगा

आयुधों पर बैठे हम, कैसी मानवता की बातें करते हैं

 

यह कैसी विडम्बना है

सुना है,

मानव

चांद तक हो आया।

वहां जल की

खोज कर लाया।

ताकती हूं

अक्सर, चांद की ओर

काश !

मेरा घर चांद पर होता

तो मानव

इस रेगिस्तान में भी

जल की खोज कर लेता।

आपको चाहिए क्या पारिजात वृक्ष

कृष्ण के स्वर्ग पहुंचने से पूर्व

इन्द्र आये थे मेरे पास

इस आग्रह के साथ

कि स्वीकार कर लूं मैं

पारिजात वृक्ष, पुष्पित पल्लवित

जो मेरी सब कामनाएं पूर्ण करेगा।

स्वर्ग के लिए प्रस्थान करते समय

कृष्ण ने भी पूछा था मुझसे

किन्तु दोनों का ही

आग्रह अस्वीकार कर दिया था मैंने।

लौटा दिया था ससम्मान।

बात बड़ी नहीं, छोटी-सी है।

पारिजात आ जाएगा

तब जीवन रस ही चुक जायेगा।

सब भाव मिट जायेंगे,

शेष जीवन व्यर्थ हो जायेगा।

 

जब चाहत न होगी, आहत न होगी

न टूटेगा दिल, न कोई दिलासा देगा

न श्रम का स्वेद होगा

न मोतियों सी बूंदे दमकेंगी भाल पर

न सरस-विरस होगा

न लेन-देन की आशाएं-निराशाएं

न कोई उमंग-उल्लास

न कभी घटाएं तो न कभी बरसात

रूठना-मनाना, लेना-दिलाना

जब कभी तरसता है मन

तब आशाओं से सरस होता है मन

और जब पूरी होने लगती हैं आशाएं-आकांक्षाएं

तब

पारिजात पुष्पों के रस से भी अधिक

सरस-सरस होता है मन।

मगन-मगन होता है मन।

बस

बात बड़ी नहीं, छोटी-सी है।

चाहत बड़ी नहीं, छोटी-सी है।

छटा निखर कर आई

शीत ऋतृ ने पंख समेटे धूप निखरकर आई

तितली ने मकरन्द चुना,फूलों ने ली अंगड़ाई

बासन्ती चूनर ओढ़े उपवन ने देखो रंग बदले,

पल्लव निखरे,पुष्प खिले,छटा निखर कर आई

एक सुन्दर सी कृति बनाई मैंने

उपवन में कुछ पत्ते संग टहनी, कुछ फूल झरे थे।

मैं चुन लाई, देखो कितने सुन्दर हैं ये, गिरे पड़े थे।

न डाली पर जायेंगे न गुलदान में अब ये सजेंगे।

एक सुन्दर सी कृति बनाई मैंने, सब देख रहे थे।

 

जिन्दगी का एक नया गीत

चलो

आज जिन्दगी का

एक नया गीत गुनगुनाएं।

न कोई बात हो

न हो कोई किस्सा

फिर भी अकारण ही मुस्कुराएं

ठहाके लगाएं।

न कोई लय हो न धुन

न करें सरगम की चिन्ता

ताल सब बिखर जायें।

कुछ बेसुरी सी लय लेकर

सारी धुनें बदल कर

कुछ बेसुरे से राग नये बनाएं।

अलंकारों को बेसुध कर

तान को बेसुरा गायें।

न कोई ताल हो न कोई सरगम

मंद्र से तार तक

हर सप्तक की धज्जियां उड़ाएं

तानों को खींच खींच कर

पुरज़ोर लड़ाएं

तारों की झंकार, ढोलक की थाप

तबले की धमक, घुंघुरूओं की छनक

बेवजह खनकाएं।

मीठे में नमकीन और नमकीन में

कुछ मीठा बनायें।

चाहने वालों को

ढेर सी मिर्ची खिलाएं।

दिन भर सोयें

और रात को सबको जगाएं।

पतंग के बहाने छत पर चढ़ जाएं

इधर-उधर कुछ पेंच लड़ाएं

कभी डोरी खींचे

तो कभी ढिलकाएं।

और, इस आंख का क्या करें

आप ही बताएं।

श्मशान में देखो

देश-प्रेम की आज क्यों बोली लगने लगी है

मौत पर देखो नोटों की गिनती होने लगी है

राजनीति के गलियारों में अजब-सी हलचल है

श्मशान में देखो वोटों की गिनती होने लगी है

और हम हल नहीं खोजते

बाधाएं-वर्जनाएं 
यूं ही बहुत हैं जीवन में।
पहले तो राहों में 
कांटे बिछाये जाते थे
और अब देखो
जाल बिछाये जा रहे हैं
मकड़जाल बुने जा रहे हैं

दीवारें चुनी जा रही हैं
बाढ़ बांधी जा रही है
कांटों में कांटे उलझाये जा रहे हैं।
कहीं हाथ न बढ़ा लें
कोई आस न बुन लें
कोई विश्वास न बांध लें
कहीं दिल न लगा लें
कहीं राहों में फूल न बिछा दें

ये दीवारें, बाधाएं, बाढ़, मकड़जाल,
कांटों के नहीं अविश्वास के है
हमारे, आपके, सबके भीतर।
चुभते हैं,टीस देते हैं,नासूर बनते हैं
खून रिसता है
अपना या किसी और का।

और हम 
चिन्तित नहीं होते
हल नहीं खोजते,
आनन्दित होते हैं।

पीड़ा की भी
एक आदत हो जाती है
फिर वह
अपनी हो अथवा परायी।

मानवता को मुंडेर पर रख

आस्था, विश्वास,श्रद्धा को हम निर्जीव पत्थरों पर लुटा रहे हैं

अधिकारों के नाम पर जाति-धर्म,आरक्षण का विष पिला रहे हैं

अपने ही घरों में विष-बेल बीज ली है,जानते ही नहीं हम

मानवता को मुंडेर पर रख,अपना घर फूंक ताली बजा रहे हैं

अपने ही घर को लूटने से

कुछ रोशनियां अंधेरे की आहट से ग्रस्त हुआ करती हैं

जलते घरों की आग पर कभी भी रोटियां नहीं सिकती हैं

अंधेरे में हम पहचान नहीं पाते हैं अपने ही घर का द्वार

अपने ही घर को लूटने से तिज़ोरियां नहीं भरती हैं।

अपनी पहचान की तलाश

नाम ढूँढती हूँ पहचान पूछती हूँ ।

मैं कौन हूँ बस अपनी आवाज ढूँढती हूँ ।

प्रमाणपत्र जाँचती हूँ

पहचान पत्र तलाशती हूँ

जन्मपत्री देखती हूँ

जन्म प्रमाणपत्र मांगती हूँ

बस अपना नाम मांगती हूँ।

परेशान घूमती हूँ

पूछती हूँ सब से

बस अपनी पहचान मांगती हूं।

खिलखिलाते हैं सब

अरे ! ये कमला की छुटकी

कमली हो गई है।

नाम  ढूँढती है, पहचान ढूँढती है

अपनी आवाज ढूँढती है।

अरे ! सब जानते हैं

सब पहचानते हैं

नाम जानते हैं।

कमला  की बिटिया, वकील की छोरी

विन्नी बिन्नी की बहना,

हेमू की पत्नी, देवकी की बहू,

और मिठू की अम्मा ।

इतने नाम इतनी पहचान।

फिर भी !

परेशान घूमती है, पहचान पूछती है

नाम मांगती है, आवाज़ मांगती है।

मैं पूछती हूं

फिर ये कविता कौन है

कौन है यह कविता ?

बौखलाई, बौराई घूमती हूं

नाम पूछती हूं, अपनी आवाज ढूँढती हूं

अपनी पहचान मांगती हूं

अपना नाम मांगती हूं।

छोड़ दो अब मुफ्त की बात

क्या तुम्हारी शिक्षा

क्या आयु

कितनी आय

कौन-सी नौकरी

कौन-सा आरक्षण

और इस सबका क्या आधार ?

अनुत्तरित हैं सब प्रश्न।

यह कौन सी आग है

जो अपने-आप को ही जला रही है।

कैसे भूल सकते हैं हम

तिनका-तिनका जोड़कर

बनता है एक घरौंदा।

शताब्दियों से लूटे जाते रहे हम

आततायियों से।

जाने कहां से आते थे

और देश लूटकर चले जाते थे,

अपनों से ही युद्धों में

झोंक दिये जाते थे हम।

कैसे निकले उस सबसे बाहर

फिर शताब्दियां लग गईं,

कैसे भूल सकते हैं हम।

और आज !

अपना ही परिश्रम,

अपनी ही सम्पत्ति

अपना ही घर फूंक रहे हैं हम।

अपने ही भीतर

आततायियों को पाल रहे हैं हम।

किसके झांसे में आ गये हैं हम।

न शिक्षा चाहिए

न विकास, न उद्यम।

खैरात में मिले, नाम बाप के मिले

एक नौकरी सरकारी

धन मिले, घर मिले,

अपना घर फूंककर मिले,

मरे की मिले

या जिंदा दफ़न कर दें तो मिले

लाश पर मिले, श्मशान में मिले

कफ़न बेचकर मिले

बस मुफ्त की मिले

बस जो भी मिले, मुफ्त ही मिले

कन्यादान -परम्परा या रूढ़ि

न तो मैं कोई वस्तु थी

न ही अन्न वस्त्र,

और न ही

घर के किसी कोने में पड़ा

कोई अवांछित, उपेक्षित पात्र

तो फिर हे पिता !

दान क्यों किया तुमने मेरा ?

धर्म, संस्कृति, परम्परा, रीति रिवाज़

सब बदल लिए तुमने अपने हित में।

किन्तु मेरे नाम पर

युगों युगों की परम्परा निभाते रहे हो तुम।

मुझे व्यक्तित्व से वस्तु बनाते रहे हो तुम।

दान करके

सभी दायित्वों से मुक्ति पाते रहे थे तुम।

और इस तरह, मुझे

किसी की निजी सम्पत्ति बनाते रहे तुम।

मेरे नाम से पुण्य कमाते रहे थे तुम ।

अपने लिए स्वर्गारोहण का मार्ग बनाते रहे तुम।

तभी तो मेरे लिए पहले से ही

सृजित कर लिये  कुछ मुहावरे 

“इस घर से डोली उठेगी उस घर से अर्थी”।

पढ़ा है पुस्तकों में मैंने

बड़े वीर हुआ करते थे हमारे पूर्वज

बड़े बड़े युद्ध जीते उन्होंनें

बस बेटियों की ही रक्षा नहीं कर पाते थे।

जौहर करना पड़ता था उन्हें

और तुम उनके उत्तराधिकारी।

युग बदल गये, तुम बदल गये

लेकिन नहीं बदला तो  बस

मुझे देखने का तुम्हारा नज़रिया।

कभी बेटी मानकर तो देखो,

मुझे पहचानकर तो देखो।

खुला आकाश दो, स्वाधीनता का भास दो।

अपनेपन का एहसास दो,

विश्वास का आभास दो।

अधिकार का सन्मार्ग दो,

कर्त्तव्य का भार दो ।

सौंपों मत किसी को।

किसी का मेरे हाथ में हाथ दो,

जीवन भर का साथ दो।

अपनेपन का भान दो।

बस थोड़ा सा मान दो

बस दान मत दो। दान मत दो।

कभी तुम भी अग्नि-परीक्षा में खरे उतरो

ममता, नेह, मातृछाया बरसाने वाली नारी में भी चाहत होती है

कोई उसके मस्तक को भी सहला दे तो कितनी राहत होती है

पावनता के सारे मापदण्ड बने हैं बस एक नारी ही के लिए
कभी तुम भी अग्नि-परीक्षा में खरे उतरो यह भी चाहत होती है

झाड़ पर चढ़ा करता है आदमी

सुना है झाड़ पर चढ़ा करता है आदमी

देखूं ज़रा कहां-कहां पड़ा है आदमी

घास, चारा, दाना-पानी सब खा गया

देखूं अब किस जुगाड़ में लगा है आदमी

 

एक अपनापन यूं ही

सुबह-शाम मिलते रहिए

दुआ-सलाम करते रहिए

बुलाते रहिए अपने  घर

काफ़ी-चाय पिलाते रहिए

और भर दे पिचकारी में

शब्दों में नवरस घोल और भर दे पिचकारी में
स्नेह की बोली बोल और भर दे पिचकारी में
आशाओं-विश्वासों के रंग बना, फिर जल में डाल
इस रंग को रिश्तों में घोल और भर दे पिचकारी में
मन की सारी बातें खोल और भर दे पिचकारी में
मन की बगिया में फूल खिला, और भर दे पिचकारी में
अगली-पिछली भूल, नये भाव जगा,और भर दे पिचकारी में
हंसी-ठिठोली की महफिल रख और भर दे पिचकारी में
सब पर रंग चढ़ा, सबके रंग उड़ा, और भर दे पिचकारी में
मीठे में मिर्ची डाल, मिर्ची में मीठा घोल और भर दे पिचकारी में
इन्द्रधनुष को रोक, रंगों के ढक्कन खोल और भर दे पिचकारी में
मीठा-सा कोई गीत सुना, नई धुन बना और भर दे पिचकारी में

भावों के तार मिला, सुर सजा और भर दे पिचकारी में
तारों की झिलमिल, चंदा की चांदनी धरा पर ला और भर दे पिचकारी में
बच्चे की किलकारी में चिड़िया की चहक मिला और भर  दे पिचकारी में
छन्द की चिन्ता छोड़, टूटा फूटा जोड़ और भर दे पिचकारी में
मात्राओं के बन्धन तोड़, कर ले तू भी होड़ और भर दे पिचकारी में
भावों के तार मिला, सुर सजा और भर दे पिचकारी में
तारों की झिलमिल, चंदा की चांदनी धरा पर ला और भर दे पिचकारी में
बच्चे की किलकारी में चिड़िया की चहक मिला और भर  दे पिचकारी में
इतना ही सूझा है जब और सूझेगा तब फिर भर दूंगी पिचकारी में

 

अभिलाषाओं के कसीदे

आकाश पर अभिलाषाओं के कसीदे कढ़े थे
भावनाओं के ज्वार से माणिक-मोती जड़े थे
न जाने कब एक धागा छूटा हाथ से मेरे
समय से पहले ही सारे ख्वाब ज़मीन पर पड़े थे

मन मिलते हैं

जब हाथों से हाथ जुड़ते हैं

जीवन में राग घुलते हैं
रिश्तों की डोर बंधती है

मन से फिर मन मिलते हैं

 

मन की भोली-भाली हूं

डील-डौल पर जाना मत

मुझसे तुम घबराना मत

मन की भोली-भाली हूं

मुझसे तुम कतराना मत

हम सब तो बस बन्दर हैं

नाचते तो सभी हैं

बस

इतना ही पता नहीं लगता

कि डोरी किसके हाथ में है।

मदारी कौन है और बन्दर कौन।

बहुत सी गलतफहमियां रहती हैं मन में।

खूब नाचते हैं हम

यह सोच कर , कि देखों

कैसा नाच नचाया हमने सामने वाले को।

लेकिन बहुत बाद में पता लगता है कि

नाच तो हम ही रहे थे

और सामने वाला तो तमाशबीन था।

किसके इशारे पर

कब कौन नाचता है

और कौन नचाता है पता ही नहीं लगता।

इशारे छोड़िए ,

यहां तो लोग

उंगलियों पर नचा लेते हैं

और नाच भी लेते हैं।

और भक्त लोग कहते हैं

कि डोरी तो उपर वाले के हाथ में है

वही नचाता है

हम सब तो बस बन्दर हैं।

कुछ कर्म करो

राधा बोली कृष्ण से, चल श्याम वन में, रासलीला के लिए

कृष्ण हतप्रभ, बोले गीता में दिया था संदेश हर युग के लिए

बहुत अवतार लिए, युद्ध लड़े, उपदेश दिये तुम्हें हे मानव!

कर्म-काण्ड छोड़कर, बस कर्म करो मेरी आराधना के लिए

सूखी धरती करे पुकार

वातानुकूलित भवनों में बैठकर जल की योजनाएं बनाते हैं

खेल के मैदानों पर अपने मनोरंजन के लिए पानी बहाते हैं

बोतलों में बन्द पानी पी पीकर, सूखी धरती को तर करेंगे

सबको समान सुविधाएं मिलेंगी, सुनते हैं कुछ ऐसा कहते हैं

शोर भीतर की आहटों को

बाहर का शोर

भीतर की आहटों को

अक्सर चुप करवा देता है

और हम

अपने भीतर की आवाज़ों-आहटों को

अनसुना कर

आगे निकल जाते हैं,

अक्सर, गलत राहों पर।

मन के भीतर भी एक शोर है,

खलबली है, द्वंद्व है,

वाद-विवाद, वितंडावाद है

जिसकी हम अक्सर

उपेक्षा कर जाते हैं।

अपने-आप को सुनना ही नहीं चाहते।

कहीं डरते हैं

क्योंकि सच तो वहीं है

और हम

सच का सामना करने से

डरते हैं।

अपने-आप से डरते हैं

क्योंकि

जब भीतर की आवाज़ें

सन्नाटें का चीरती हुई

बाहर निकलेंगी

तब कुछ तो अनघट घटेगा

और हम

उससे ही बचना चाहते हैं

इसीलिए  से डरते हैं।

पांच-सात क्या पी ली

जगती हूं,उठती हूं, फिर सोती हूं,मनमस्त हूं

घड़ी की सूईयों को रोक दिया है, अलमस्त हूं

पूरा दिन पड़ा है कर लेंगे सारे काम देर-सबेर

बस पांच-सात क्या पी ली,(चाय),मदमस्त हूं

चलो, आज बेभाव अपनापन बांटते हैं

किसी की प्यास बुझा सकें तो क्या बात है।

किसी को बस यूं ही अपना बना सकें तो क्या बात है।

जब रह रह कर मन उदास होता है,

तब बिना वजह खिलखिला सकें तो क्या बात है।

चलो आज उड़ती चिड़िया के पंख गिने,

जो काम कोई न कर सकता हो,

वही आज कर लें तो क्या बात है।

चलो, आज बेभाव अपनापन बांटते हैं,

किसी अपने को सच में अपना बना सकें तो क्या बात है।

कहां सीख पाये हैं हम

नयनों की एक बूंद

सागर  के जल से गहरी होती है

ढूंढोगे तो किन्तु

जलराशि जब अपने तटबन्धों को

तोड़ती है

तब भी विप्लव होता है

और जब भीतर ही भीतर

सिमटती है तब भी।

 

कहां सीख पाये हैं हम

सीमाओं में रहना।

जिन्दगी कोई तकरार नहीं है

जिन्दगी गणित का कोई दो दूनी चार नहीं है

गुणा-भाग अगर कभी छूट गया तो हार नहीं है

कभी धूप है तो कभी छांव और कभी है आंधी

सुख-दुख में बीतेगी, जिन्दगी कोई तकरार नहीं है

गुम हो जाये चाबी स्कूल की

 हाथ जोड़कर तुम क्या मांग रहे मुझको कुछ भी नहीं पता

बैठा था गर्मी की छुट्टी की आस में, क्या की थी मैंने खता

मैं तो बस मांगूं एक टी.वी.,एक पी.सी,एक आई फोन 6

और मांगू, गुम हो जाये चाबी स्कूल की, और मेरा बस्ता

मन में एक जंगल है

मन में एक जंगल है

विचारों का, भावों का।

एक झंझावात की तरह आते हैं

अन्तर्मन को झिंझोड़ते हैं,

तहस-नहस करते हैं

और हवा के झोंके के साथ

अचानक

कहीं दूर उड़ जाते हैं।

कभी शब्द दे पाती हूं

और कभी नहीं।

लिखे शब्द पिघलने लगते हैं

आसमानी बादलों की तरह।

कहीं दूर उड़ जाते हैं

पक्षी की तरह।

हर बार एक कही-अनकही

आधी-अधूरी कहानी रह जाती है।