मन की भोली-भाली हूं

डील-डौल पर जाना मत

मुझसे तुम घबराना मत

मन की भोली-भाली हूं

मुझसे तुम कतराना मत

स्मृतियों के खण्डहर

कुछ

अनचाही स्मृतियाँ

कब खंडहर बन जाती हैं

पता ही नहीं लग पाता

और हम

उन्हीं खंडहरों पर

साल-दर-साल

लीपा-पोती

करते रहते हैं

अन्दर-ही-अन्दर

दीमक पालते रहते हैं

देखने में लगती हैं

ऊँची मीनारें

किन्तु एक हाथ से

ढह जाती हैं।

प्रसन्न रहते हैं हम

इन खंडहरों के बारे में

बात करते हुए

सुनहरे अतीत के साक्षी

और इस अतीत को लेकर

हम इतने

भ्रमित रहते हैं

कि वर्तमान की

रोशनियों को

नकार बैठते हैं।

 

 

 

अपने ही घर को लूटने से

कुछ रोशनियां अंधेरे की आहट से ग्रस्त हुआ करती हैं

जलते घरों की आग पर कभी भी रोटियां नहीं सिकती हैं

अंधेरे में हम पहचान नहीं पाते हैं अपने ही घर का द्वार

अपने ही घर को लूटने से तिज़ोरियां नहीं भरती हैं।

धरा बिना आकाश नहीं

पंख पसारे चिड़िया को देखा

मन विस्तारित आकाश हुआ

मन तो करता है

पंछी-सा उन्मुक्त आकाश मिले

किन्तु

लौट धरा पर उतरूं कैसे,

कौन सिखलाएगा मुझको।

उंचा उड़ना बड़ा सरल है

पर कैसे जानूंगी फिर

धरा पर लौटूं कैसे मैं।

दूरी तो शायद पल भर की है

पर मन जब ऊंचा उड़ता है

दूर-दूर सब दिखता है

सब छोटे-छोटे-से लगते हैं

और अपना रूप नहीं दिखता

धरा बिना आकाश नहीं

पंछी तो जाने यह बात

बस हम ही भूले बैठें हैं यह।

 

हां हुआ था भारत आज़ाद

कभी लगा ही नहीं

कि हमें आज़ाद हुए इतने वर्ष हो गये।

लगता है अभी कल ही की तो बात है।

हमारे हाथों में सौंप गये थे

एक आज़ाद भारत

कुछ आज़ादी के दीवाने, परवाने।

फ़ांसी चढ़े, शहीद हुए।

और न जाने क्या क्या सहन किया था

उन लोगों ने जो हम जानते ही नहीं।

जानते हैं तो बस एक आधा अधूरा सच

जो हमने पढ़ा है पुस्तकों में।

और ये सब भी याद आता है हमें

बस साल के गिने चुने चार दिन।

हां हुआ था भारत आज़ाद।

कुछ लोगों की दीवानगी, बलिदान और हिम्मत से।

 

और हम ! क्या कर रहे हैं हम ?

कैसे सहेज रहे हैं आज़ादी के इस उपहार को।

हम जानते ही नहीं

कि मिली हुई आजादी का अर्थ क्या होता है।

कैसे सम्हाला, सहेजा जाता है इसे।

दुश्मन आज भी हैं देश के

जिन्हें मारने की बजाय

पाल पोस रहे हैं हम उन्हें अपने ही भीतर।

झूठ, अन्नाय के विरूद्ध

एक छोटी सी आवाज़ उठाने से तो डरते हैं हम।

और आज़ादी के दीवानों की बात करते हैं।

बड़ी बात यह

कि आज देश के दुश्मनों के विरूद्ध खड़े होने के लिए

हमें पहले अपने विरूद्ध हथियार उठाने पड़ेंगे।

शायद इसलिए

अधिकार नहीं है हमें

शहीदों को नमन का

नहीं है अधिकार हमें तिरंगे को सलामी का

नहीं है अधिकार

किसी और पर उंगली उठाने का।

पहले अपने आप को तो पहचान लें

देश के दुश्मनों को अपने भीतर तो मार लें

फिर साथ साथ चलेंगे

न्याय, सत्य, त्याग की राह पर

शहीदों को नमन करेंगे

और तिरंगा फहरायेंगे अपनी धरती पर

और अपने भीतर।

 

 

 

रिश्तों की अकुलाहट

बस कहने की ही तो  बातें हैं कि अगला-पिछला छोड़ो रे

किरचों से चुभते हैं टूटे रिश्ते, कितना भी मन को मोड़ो रे

पत्थरों से बांध कर जल में तिरोहित करती रहती हूं बार-बार

फिर मन में क्यों तर आते हैं, क्यों कहते हैं, फिर से जोड़ो रे

प्रणाम तुम्हें करती हूं

हे भगवान!

इतना उंचा मचान।

सारा तेरा जहान।

कैसी तेरी शान ।

हिमगिरि के शिखर पर

 बैठा तू महान।

 

कहते हैं

तू कण-कण में बसता है।

जहां रहो

वहीं तुझमें मन रमता है।

फिर क्यों

इतने उंचे शिखरों पर

धाम बनाया।

दर्शनों के लिए

धरा से गगन तक

इंसान को दौड़ाया।

 

ठिठुरता है तन।

कांपता है मन।

 

हिम गिरता है।

शीत में डरता है।

 

मन में शिवधाम सृजित करती हूं।

 

यहीं से प्रणाम तुम्हें करती हूं।

 

जीवन आशा प्रत्याशा या निराशा

 

हमारे बड़े-बुज़ुर्ग

सुनाया करते थे कहानियां,

चेचक, हैज़ा,

मलेरिया, डायरिया की,

जब महामारी फैलती थी,

तो सैंकड़ों नहीं

हज़ारों प्राण लेकर जाती थी।

गांव-गांव, शहर-शहर

लील जाती थी।

सूने हो जाते थे घर।

संक्रामक माना जाता था

इन रोगों को,

अलग कोठरी में

डाल दिया जाता था रोगी को,

और वहीं मर जाता था,

या कभी भाग्य अच्छा रहे,

तो बच भी जाया करता था।

और एक समय बाद

सन्नाटे को चीरता,

आप ही गायब हो जाता था रोग।

देसी दवाएं, हकीम, वैद्य

घरेलू काढ़े, हवन-पूजा,

बस यही थे रोग प्रतिरोधक उपाय।

 

और आज,

क्या वही दिन लौट आये हैं?

किसी और नाम से।

विज्ञान के चरम पर बैठे,

पर फिर भी हम बेबस,

हाथ बांधे।

उपाय तो बस दूरियां हैं

अपनों से अपनी मज़बूरियां हैं।

काल काल बनकर खड़ा है,

उपाय न कोई बड़ा है।

रोगी को अलग कर,

हाथ बांधे बस प्रतीक्षा में

बचेगा या पता नहीं मरेगा।

 

निर्मम, निर्मोही

 जीवन-आशा,

जीवन-प्रत्याशा

या जीवन-निराशा ?

मूर्तियों  की आराधना

 

चित्राधारित रचना

जब मैं अपना शोध कार्य रही थी तब मैंने मूर्तिकला एवं वास्तुकला पर भी कुछ पुस्तकें पढ़ी थीं।

मैंने अपने अध्ययन से यह जाना कि प्रत्येक मूर्ति एवं वास्तु के निर्माण की एक विधि होती है। किसी भी मूर्ति को यूँ ही सजावट के तौर पर कहीं भी बैठकर नहीं बनाया जा सकता यदि उसका निर्माण पूजा-विधि के लिए किया जा रहा है। स्थान, व्यक्ति, निर्माण-सामग्री, निर्माण विधि सब नियम-बद्ध होते हैं।  जो व्यक्ति मूर्ति का निर्माण करता है वह अनेक नियमों का पालन करता है, शाकाहारी एवं बहुत बार उपवास पर भी रहता है जब तक उसका कार्य पूरा नहीं हो जाता।

हमारे धर्म में अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती है उनमें गणेश जी भी एक हैं। प्राचीन काल में प्रत्येक देवी-देवता की सम्पूर्ण पूजा विधि का पालन किया जाता था और उसी के अनुसार मूर्ति-निर्माण एवं स्थापना का कार्य।

आज हमारी पूजा-अर्चना व्यापारिक हो गई है। यह सिद्ध है कि प्रत्येक देवी-देवता की पूजा-विधि, मूर्ति-निर्माण विधि, पूजन-सामग्री एवं पूजा-स्थल में उनकी स्थापना विधि अलग-अलग है। किन्तु आज इस पर कोई विचार ही नहीं करता। एक ही धर्म-स्थल पर एक ही कमरे में सारे देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है, जबकि प्राचीन काल में ऐसा नहीं था।

सबसे बड़ी बात यह कि हम यह मानते हैं कि हमारा स्थान ईश्वर के चरणों में है न कि ईश्वर हमारे चरणों में।

हम निरन्तर यह तो देख रहे हैं कि कौन किसे खींच रहा है, कौन देख रहा है किन्तु यह नहीं देख पा रहे कि  गणेश जी की मूर्ति को पैरों में रखकर ले जाया जा रहा है, कैसे होगी फिर उनकी पूजा-आराधना?

   

हर किसी में खोट ढूंढने में लगे हैं हम

अच्छाईयों से भी अब डरने लगे हैं हम

हर किसी में खोट ढूंढने में लगे हैं हम

अपने भीतर झांकने की तो आदत नहीं

औरों के पांव के नीचे से चादर खींचने में लगे हैं हम

होगा कैसे मनोरंजन

कौन कहे ताक-झांक की आदत बुरी, होगा कैसे मनोरंजन

किस घर में क्या पकता, नहीं पता तो कैसे मानेगा मन

अपने बर्तन-भांडों की खट-पट चाहे सुनाये पूरी कथा

औरों की सीवन उधेड़ कर ही तो मिलता है चैन-अमन

सुन्दर-सुन्दर दुनियाd
परीलोक के सपने मन में 

झूला झूलें नील गगन में

सुन्दर-सुन्दर दुनिया सारी

चंदा-तारों संग मन मगन में

मां के आंचल की छांव

प्रकृति का नियम है

विशाल वट वृक्ष तले

नहीं पनपते छोटे पेड़ पौधे।

नहीं पुष्पित पल्लवित होतीं यूं ही लताएं।

और यदि कुछ पनप भी जाये

तो उसे नाम नहीं मिलता।

पहचान नहीं मिलती।

बस, वट वृक्ष की विशालता के सामने

खो जाते हैं सब।

लेकिन, एक सा वट वृक्ष भी है

जिसका अपना कोई नाम नहीं होता

कोई पहचान नहीं होती।

बस एक दीर्घ आंचल होता है

जिसके साये तले, पलती बढ़ती है

एक पूरी की पूरी पीढ़ी,

एक पूरा का पूरा युग।

अपनी जड़ों से पोषण करती है उनका।

नये पौधों का रोपण करती है

अपने आपको खोकर।

उन्हें नाम देती है, पहचान देती है

आंचल की छांव देती है।

पूरी ज़मीन और पूरा आकाश देती है।

युग बदलते हैं, पर नहीं बदलती

नहीं छूटती आंचल की छांव।

हिन्दी की हम बात करें

शिक्षा से बाहर हुई, काम काज की भाषा नहीं, हम मानें या न मानें

हिन्दी की हम बात करें , बच्चे पढ़ते अंग्रेज़ी में, यह तो हम हैं जाने

विश्वगुरू बनने चले , अपने घर में मान नहीं है अपनी ही भाषा का

वैज्ञानिक भाषा को रोमन में लिखकर हम अपने को हिन्दीवाला मानें

क्रोध कोई विकार नहीं

अनैतिकता, अन्याय, अनाचार पर क्या क्रोध नहीं आता, जो बोलते नहीं

केवल विनम्रता, दया, विलाप से यह दुनिया चलती नहीं, क्यों सोचते नहीं

नवरसों में क्रोध कोई विकार नहीं मन की सहज सरल अभिव्यक्ति है

एक सुखद परिवर्तन के लिए खुलकर बोलिए, अपने आप को रोकिए नहीं

जीवन क्या होता है

जीवन में अमृत चाहिए

तो पहले विष पीना पड़ता है।

जीवन में सुख पाना है

तो दुख की सीढ़ी पर भी

चढ़ना पड़ता है।

धूप खिलेगी

तो कल

घटाएँ भी घिर आयेंगी

रिमझिम-रिमझिम बरसातों में

बिजली भी चमकेगी

कब आयेगी आँधी,

कब तूफ़ान से उजड़ेगा सब

नहीं पता।

जीवन में चंदा-सूरज हैं

तो ग्रहण भी तो लगता है

पूनम की रातें होती हैं

अमावस का

अंधियारा भी छाता है।

किसने जाना, किसने समझा

जीवन क्या होता है।

 

एहसास

किसी के भूलने के

एहसास की वह तीखी गंध,

उतरती चली जाती है,

गहरी, कहीं,अंदर ही अंदर,

और कचोटता रहता है मन,

कि वह भूल

सचमुच ही एक भूल थी,

या केवल एक अदा।

फिर

उस एक एहसास के साथ

जुड़ जाती हैं,

न जाने, कितनी

पुरानी यादें भी,

जो सभी मिलकर,

मन-मस्तिष्क पर ,

बुन जाती हैं,

नासमझी का

एक मोटा ताना-बाना,

जो गलत और ठीक को

समझने नहीं देता।

ये सब एहसास मिलकर

मन पर,

उदासी का,

एक पर्दा डाल जाते हैं,

जो आक्रोश, झुंझलाहट

और निरुत्साह की हवा लगते ही

नम हो उठता है ,

और यह नमी,

न चाहते हुए भी

आंखों में उतर आती है।

न जाने क्या है ये सब,

पर लोग, अक्सर इसे

भावुकता का नाम दे जाते हैं।

 

 

 

 

परीलोक से आई है

चित्रलिखित सी प्रतीक्षारत ठहरी हो मुस्काई-सी
नभ की लाली मुख पर कुमकुम सी है छाई-सी
दीपों की आभा में आलोकित, घूंघट की ओट में
नयनाभिराम रूप लिए परीलोक से आई है सकुचाई-सी

जीवन-दर्शन

चांद-सूरज की रोशनी जीवन की राह दिखाती है।

रात-दिन में बंटे, जीवन का आवागमन समझाती है।

दोनों ही सामना करते हैं अंधेरों और रोशनी का,

यूं ही हमें जीवन-दर्शन समझा-समझा जाती है।