सिक्के सारे खन-खन गिरते

कहते हैं जी,

हाथ की है मैल रूपया,

थोड़ी मुझको देना भई।

मुट्ठी से रिसता है धन,

गुल्लक मेरी टूट गई।

सिक्के सारे खन-खन गिरते

किसने लूटे पता नहीं।

नोट निकालो नोट निकालो

सुनते-सुनते

नींद हमारी टूट गई।

छल है, मोह-माया है,

चाह नहीं है

कहने की ही बातें हैं।

मेरा पैसा मुझसे छीनें,

ये कैसी सरकार है भैया।

टैक्सों के नये नाम

समझ न आयें

कोई हमको समझाए भैया

किसकी जेबें भर गईं,

किसकी कट गईं,

कोई कैसे जाने भैया।

हाल देख-देखकर सबका

अपनी हो गई ता-ता थैया।

नोटों की गद्दी पर बैठे,

उठने की है चाह नहीं,

मोह-माया सब छूट गई,

बस वैरागी होने को

मन करता है भैया।

आगे-आगे हम हैं

पीछे-पीछे है सरकार,

बचने का है कौन उपाय

कोई हमको सुझाओ  दैया।

बड़े-बड़े कर रहे आजकल

बड़े-बड़े कर रहे आजकल बात बहुत साफ़-सफ़ाई की

शौचालय का विज्ञापन करके, करते खूब कमाई जी

इनकी भाषा, इनके शब्दों से हमें  घिन आती है

बात करें महिलाओं की और करते आंख सिकाई जी

 

सुख-दुख तो आने-जाने हैं

धरा पर मधुर-मधुर जीवन की महक का अनुभव करती हूं

पुष्प कहीं भी हों, अपने जीवन को उनसे सुरभित करती हूं

सुख-दुख तो आने-जाने  हैं, फिर आशा-निराशा क्यों

कुछ बिगड़ा है तो बनेगा भी, इस भाव को अनुभव करती हूं

 

इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे

नीली चादर तान कर अम्बर देर तक सोया पाया गया

चंदा-तारे निर्भीक घूमते रहे,प्रकाश-तम कहीं आया-गया

प्रात हुई, भागे चंदा-तारे,रवि ने आहट की,तब उठ बैठा,

इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे, देखो तो, फिर मुस्काता पाया गया

इसे कहते हैं एक झाड़ू

कभी थामा है झाड़ू हाथ में

कभी की है सफ़ाई अंदर-बाहर की

या बस एक फ़ोटो खिंचवाई

और चल दिये।

साफ़ सड़कों की सफ़ाई

साफ़ नालियों की धुलाई

इन झकाझक सफ़ेद कपड़ों पर

एक धब्बा न लगा।

कभी हलक में हाथ डालकर

कचरा निकालना पड़े

तो जान जाती है।

कभी दांत में अटके तिनके को

तिनके से निकालना पड़े तो

जान हलक में अटक जाती है।

हां, मुद्दे की बात करें,

कल को होगी नीलामी

इस झाड़ू की,

बिकेगा लाखों-करोड़ों में

जिसे कोई काले धन का

कचरा जमा करने वाला

सम्माननीय नागरिक

ससम्मान खरीदेगा

या किसी संग्रहालय में रखा जायेगा।

देखेगी इसे अगली पीढ़ी

टिकट देकर, देखो-देखो

इसे कहते हैं एक झाड़ू

पिछली सदी में

साफ़ सड़कों पर कचरा फैलाकर

साफ़ नालियों में साफ़ पानी बहाकर

एक स्वच्छता अभियान का

आरम्भ किया गया था।

लाखों नहीं

शायद करोड़ों-करोड़ों रूपयों का

अपव्यय किया गया था

और सफ़ाई अभियान के

वास्तविक परिचालक

पीछे कहीं असली कचरे में पड़े थे

जिन्होंने अवसर पाते ही

बड़ों-बड़ों की कर दी थी सफ़ाई

किन्तु जिन्हें अक्ल न आनी थी

न आई !!!!!

हमको छुट्टा दे सरकार
रंजोगम में डूब गये हैं, गोलगप्पे हो गये बीस के चार

कितने खायें, कैसे खायें, नोट मिला है दो हज़ार

कहता है भैया हमसे, सारे खाओ या फिर जाओ

हम ढाई आने के ग्राहक हैं, हमको छुट्टा दे सरकार

अजगर करे न चाकरी

न मैं मांगू भिक्षा,

न जांचू पत्री,

न करता हूं प्रभु-भक्ति।

पिता कहते हैं

शिक्षा मंहगी,

मां कहती है रोटी।

दुनिया कहती

बड़े हो जाओ

तब जानोगे

इस जग की हस्ती।

सुनता हूं

खेल-कूद में

बड़ा नाम है

बड़ा धाम है।

टी.वी., फिल्मों में भी

बड़ा काम है।

पर

सब कहते हैं

पैसा-पैसा-पैसा-पैसा !!!!!

तब मैंने सोचा

सबसे सस्ता

यही काम है।

अजगर करे न चाकरी

पंछी करे न काम

दास मलूका कह गये

सबके दाता राम।

हरे राम !! हरे राम !!

बनती रहती हैं गांठें बूंद-बूंद

कहां है अपना वश !
कब के रूके
कहां बह निकलेगें
पता नहीं।
चोट कहीं खाई थी,
जख्म कहीं था,
और किसी और के आगे
बिखर गये।

सबने अपना अपना 
अर्थ निकाल लिया।
अब 
क्या समझाएं
किस-किसको 
क्या-क्या बताएं।
तह-दर-तह
बूंद-बूंद
बनती रहती हैं गांठें
काल की गति में
कुछ उलझी, कुछ सुलझी
और कुछ रिसती

बस यूं ही कह बैठी,
जानती हूं वैसे 
तुम्हारी समझ से बाहर है
यह भावुकता !!!

एक बेला ऐसी भी है

 

एक बेला ऐसी भी है

जब दिन-रात का

अन्तर मिट जाता है

उभरते प्रकाश

एवं आशंकित तिमिर के बीच

मन उलझकर रह जाता है।

फिर वह दूर गगन हो

अथवा  

अतल तक की गहरी जलराशि।

मन न जाने

कहां-कहां बहक जाता है।

सब एक संकेत देते हैं

प्रकाश से तिमिर का

तिमिर से प्रकाश का

बस

इनके ही समाधान में

जीवन बहक जाता है।

इन आंखों का क्या करूं

शब्दों को बदल देने की

कला जानती हूं,

अपनी अभिव्यक्ति को

अनभिव्यक्ति बनाने की

कला जानती हूं ।

पर इन आंखों का क्या करूं

जो सदैव

सही समय पर

धोखा दे जाती हैं।

रोकने पर भी

न जाने

क्या-क्या कह जाती हैं।

जहां चुप रहना चाहिए

वहां बोलने लगती हैं

और जहां बोलना चाहिए

वहां

उठती-गिरती, इधर-उधर

ताक-झांक करती

धोखा देकर ही रहती हैं।

और कुछ न सूझे तो

गंगा-यमुना बहने लगती है।

रोशनियां अब उधार की बात हो गई हैं

रोशनियां

अब उधार की बात हो गई हैं।

कौन किसकी छीन रहा

यह तहकीकात की बात हो गई है।

गगन पर हो

या हो धरा पर

किसने किसका रूप लिया

यह पहचानने की बात हो गई है।

प्रकाश और तम के बीच

जैसे एक

प्रतियोगिता की बात हो गई है।

कौन किस पर कर रहा अधिकार

यह समझने-समझाने की बात हो गई है।

कौन लघु और कौन गुरू

नज़र-नज़र की बात हो गई है।

कौन जीता, कौन हारा

यह विवाद की बात हो गई है।

कौन पहले आया, कौन बाद में

किसने किसको हटाया

यह तकरार की बात हो गई है।

अब आप से क्या छुपाना

अपनी हद से बाहर की बात हो गई है।

कदम रखना सम्भल कर

इन राहों पर कदम रखना सम्भल कर, फ़िसलन है बहुत

मन को कौन समझाये इधर-उधर तांक-झांक करे है बहुत

इस श्वेताभ नि:स्तब्धता के भीतर जीवन की चंचलता है

छूकर देखना, है तो शीतल, किन्तु जलन देता है बहुत

एक साईकिल दिलवा दो न

ए जी,

मुझको भी

एक साईकिल दिलवा दो न।

कार-वार का क्या करना है,

यू. पी. से दिल्ली तक

ही तो फ़र्राटे भरना है।

बस उसमें 

आरक्षण का ए.सी. लगवा देना।

लुभावने वादों की

दो-चार सीटें बनवा देना।

कुछ लैपटाप लटका देना।

कुछ हवा-भवा भरवा देना।

एक-ठौं पत्रकार बिठा देना।

कुछ पूरी-भाजी बनवा देना।

हां,

एक कुर्सी ज़रूर रखवा देना,

उस पर रस्सी बंधवा देना।

और

लौटे में देर हो जाये

तो फुनवा घुमा लेना।

ए जी,

एक ठौ साईकिल दिलवा दो न।

तल से अतल तक

तल से अतल तक

धरा से गगन तक

विस्तार है मेरा

काल के गाल में

टूटते हैं

बिखरते हैं

अकेलेपन से जूझते हैं

फिर संवरते हैं।

बस

इसी आस में

जीवन संवरते हैं !!!!!

 

चूड़ियां उतार दी मैंने

चूड़ियां उतार दी मैंने, सब कहते हैं पहनने वाली नारी अबला होती है

यह भी कि प्रदर्शन-सजावट के पीछे भागती नारी कहां सबला होती है

न जाने कितनी कहावतें, मुहावरे बुन दिये इस समाज ने हमारे लिये

सहज साज-श्रृंगार भी यहां न जाने क्यों बस उपहास की बात होती है

चूड़ी की हर खनक में अलग भाव होते हैं,कभी आंसू,  कभी  हास होते हैं

कभी न समझ सका कोई, यहां तो नारी की हर बात उपहास होती है

धरा पर पांव टिकते नहीं

और चाहिये और चाहिए की भूख में छूट रहे हैं अवसर

धरा पर पांव टिकते नहीं, आकाश को छू पाते नहीं अक्सर

यह भी चाहिये, वह भी चाहिए, लगी है यहां बस भाग-दौड़

क्या छोड़ें, क्या लें लें, इसी उधेड़-बुन में रह जाते हैं अक्सर

बसन्त पंचमी पर

कामना है बस मेरी

जिह्वा पर सदैव

सरस्वती का वास हो।

वीणा से मधुर स्वर

कमल-सा कोमल भाव

जल-तरंगों की तरलता का आभास हो।

मिथ्या भाषण से दूर

वाणी में निहित

भाव, रस, राग हो।

गगन की आभा, सूर्य की उष्मा

चन्द्र की शीतलता, या हों तारे द्युतिमान

वाणी में सदैव सत्य का प्रकाश हो।

हंस सदैव मोती चुगे

जीवन में ऐसी  शीतलता का भास हो।

किन्तु जब आन पड़े

तब, कलम क्या

वाणी में भी तलवार की धार सा प्रहार हो।

‘गर कांटे न होते

इतना न याद करते गुलाब को,  गर कांटे न होते

न सुहाती मुहब्बत गर बिछड़ने के अफ़साने न होते

गर आंसू न होते तो मुस्कुराहट की बात कौन करना

कौन स्मरण करता यहां गर भूलने के बहाने न होते

 

फूल तो फूल हैं

फूल तो फूल हैं
कहीं भी खिलते हैं।
कभी नयनों में द्युतिमान होते हैं
 कभी गालों पर महकते हैं
कभी उपवन को सुरभित करते हैं,
तो कभी मन को 
आनन्दित करते हैं,
मन के मधुर भावों को
साकार कर देते हैं
शब्द को भाव देते हैं
और भाव को अर्थ।
प्रेम-भाव का समर्पण हैं,
कभी किसी की याद में
गुलदानों में लगे-लगे 
मुरझा जाते हैं।
यही फूल स्वागत भी करते हैं
और अन्तिम यात्रा भी। 
और कभी किसी की 
स्मृतियों में जीते हैं
ठहरते हैं उन पर आंसू 
ओस की बूंदों से।

चलते चलते

चलते चलते

सड़क पर पड़े

एक छोटे से कंकड़ को

यूं ही उछाल दिया मैंने।

पल भर में न जाने

कहां खो गया।

सोच कुछ और रही थी

कह कुछ और बैठी।

बातों के, घातों के, वादों के

आघातों के

छोटे-छोटे कंकड़

हम, यूं ही उछालते रहते हैं

कब, किसे, कैसे चोट दे जाता है

नहीं जानते।

किन्तु जब अपने पर पड़ती है

तब..................

मेरे भीतर

एक विशालकाय पर्वत है

ऐसे  छोटे-छोटे कंकड़ों का।

मतदान मेरा कर्त्तव्य भी है

मतदान मेरा अधिकार है

पर किसने कह दिया

कि ज़िम्मेदारी भी है।

हांअधिकार है मेरा मतदान।

पर कौन समझायेगा

कि अधिकार ही नहीं

कर्त्तव्य भी है।

जिस दिन दोनों के बीच की

समानान्तर रेखा मिट जायेगी

उस दिन मतदान सार्थक होगा।

किन्तु

इतना तो आप भी जानते ही होंगें

कि समानान्तर रेखाएं

कभी मिला नहीं करतीं।

अरे अपने भीतर जांच

शब्दों की क्या बात करें, ये मन बड़ा वाचाल है

इधर-उधर भटकता रहता, न अपना पूछे हाल है

तांक-झांक की आदत बुरी, अरे अपने भीतर जांच

है सबका हाल यही, तभी तो सब यहां बेहाल हैं

 

जब मूक रहे तब मूर्ख कहलाये

जब मूक रहे तब मूर्ख कहलाये

बोले तो हम बड़बोले बन जायें

यूं ही क्यों चिन्तन करता रे मन !

जिसको जो कहना है कहते जायें

पीछे से झांकती है दुनिया

कुछ तो घटा होगा

जो यह पत्थर उठे होंगे।

कुछ तो टूटा होगा

जो यह घुटने फूटे होंगे।

कुछ तो मन में गुबार होगा

जो यूं हाथ उठे होंगे।

फिर, कश्मीर हो या कन्याकुमारी

कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

वह कौन-सी बात है

जो शब्दों में नहीं ढाली जा सकी,

कलम ने हाथ खींच लिया
और हाथ में पत्थर थमा दिया।

अरे ! अबला-सबला-विमला-कमला

की बात मत करो,

मत करो बात लाज, ममता, नेह की।

एक आवरण में छिपे हैं भाव

कौन समझेगा ?

न यूं ही आरोप-प्रत्यारोप में उलझो।

कहीं, कुछ तो बिखरा होगा।

कुछ तो हुआ होगा ऐसा

कि चुप्पी साधे सब देख रहे हैं

न रोक रहे हैं, न टोक रहे हैं,

कि पीछे से झांकती है दुनिया

न रोकती है, न मदद करती है

न राह दिखाती है

तमाशबीन हैं सब।

कुछ शब्दों के, कुछ नयनों के।

क्यों ? क्यों ?

सम्मान उन्हें देना है

आपको नहीं लगता

इधर हम कुछ ज़्यादा ही

आंसू बहाने लगे हैं,

उनकी कर्त्तव्यनिष्ठा पर

प्रश्नचिन्ह लगाने लगे हैं।

उनके समर्पण, देशप्रेम को

भुनाने में लगे हैं,

उन्होंने चुना है यह पथ,

इसलिए नहीं

कि आप उनके लिए

जार-जार रोंयें

उनके कृत्यों को

महिमामण्डित करें

और अपने कर्त्तव्यों से

हाथ धोयें,

कुछ शब्दों को घोल-घोलकर

तब तक निचोड़ते रहें

जब तक वे घाव बनकर

रिसने न लगें।

वे अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं

और हमें समझा रहे हैं।

देश के दुश्मन

केवल सीमा पर ही नहीं होते,

देश के भीतर,

हमारे भीतर भी बसे हैं।

हम उनसे लड़ें,

कुछ अपने-आप से भी करें

न करें दया, न छिछली भावुकता परोसें

अपने भीतर छिपे शत्रुओं को पहचानें

देश-हित में क्या करना चाहिए

बस इतना जानें।

बस यही सम्मान उन्हें देना है,

यही अभिमान उन्हें देना है।

खींच-तान में मन उलझा रहता है

आशाओं का संसार बसा है, मन आतुर रहता है

यह भी ले ले, वह भी ले ले, पल-पल ये ही कहता है

क्या छोड़ें, क्या लेंगे, और क्या मिलना है किसे पता

बस इसी खींच-तान में जीवन-भर मन उलझा रहता है

जब तक चिल्लाओ  न, कोई सुनता नहीं

अब शांत रहने से यहां कुछ मिलता नहीं

जब तक चिल्लाओ  न, कोई सुनता नहीं

सब गूंगे-बहरे-अंधे अजनबी हो गये हैं यहां

दो की चार न सुनाओ जब तक, काम बनता नहीं

हां, मैं हूं कुत्ता

एक कुत्ते ने

फेसबुक पर अपना चित्र देखा,

और बड़बड़ाया

इस इंसान को देखो

फेसबुक पर भी मुझे ले आया।

पता नहीं क्या-क्या कह डालेगा मेरे बारे मे।

दुनिया-जहां में तो

नित्यप्रति मेरी कहानियां

गढ़-गढ़कर समय बिताता है।

पता नहीं कितने मुहावरे

बनाये हैं मेरे नाम से,

तरह तरह की बातें बनाता है।

यह तो शिष्ट-सभ्य,

सुशिक्षित बुद्धिजीवियों का मंच है,

मैं अपने मन की पीड़ा

यहां कह भी तो नहीं सकता।

कोई टेढ़ी पूंछ के किस्से सुनाता है,

तो कोई स्वामिभक्ति के गुण गाता है।

कोई तलुवे चाटने की बात करता है

तो कोई बेवजह ही दुत्कारता है।

किसी को मेरे भाग्य से ईर्ष्या होती है

तो कोई अपनी भड़ास निकालने के लिए

मुझे लात मारकर चला जाता है।

और महिलाओं   के हाथ में

मेरा पट्टा देखकर तो

मेरी भांति ही लार टपकाता है।

बची बासी रोटी डालने से

कोई नहीं हिचकिचाता है।

बस,आज तक

एक ही बात समझ नहीं आई

कि मैं कुत्ता हूं, जानता हूं,

फिर मुझे कुत्ता-कुत्ता कहकर क्यों चिड़ाता है।

और हद तो तब हो गई

जब अपनी तुलना मेरे साथ करने लगता है।

बस, तभी मेरा मन

इस इंसान को

काट डालने का करता है।

एक चित्रात्‍मक कथा

वे दिन भी क्या दिन थे, जब बचपन में भरी दोपहरी की तेज़ धूप में मां-दादी, बड़े भाई-बहनों और चाचा-ताउ की नज़रें बचाकर खिड़की फांदकर घर से निकल आया करते थे। न धूप महसूस होती थी न बरसात। न सूखे का पता था और न फ़सल-पानी की चिन्ता। कभी कंचे खेलते, किसी के खेत से फल-सब्ज़ियां चुराते, किसी के पशु खोल देते, मिट्टी में लोटते, तालाब में छपाछप करते, मास्टरों की खूब नकल उतारते। कब सूरज आकाश से धरती पर आ जाता पता ही नहीं लगता था। फिर भागते घर की ओर। निश्चिंत, डांट-मार खाने को तैयार। “अरे ! कुछ पढ़-लिख लो, नहीं तो खेतों में यूं ही जानवरों से हांकते रहोगे, देखो, फ़लाने का बेटा कैसे दसवीं करके शहर जाकर बाबू बन गया।“ और न जाने क्या-क्या। रोज़ का किस्सा था जब तक पढ़ते रहे। न हम सुधरे , न चिन्ता करने वालों ने हमें समझाना छोड़ा।
फिर, युवा हो गये। हम कहां बदले। बस, बचपन में जो बचपना समझा जाता था वह अब आवारागर्दी हो गया। घर-बाहर के काम करने लगे, खेती-बाड़ी सम्हालने लगे किन्तु सबकी आंखों में चुभते ही रहे। बड़े-बुजुर्ग सर पीटते : “अरे ! क्या होगा इन छोरों का, नासपीटों का, न पढ़े-लिखे, न काम-काज किये, अब इसी खेती में जूझेगें। कुछ हमारी सुनी होती तो बड़े बाउ बनकर शहर में नाम कमा रहे होते। कौन करेगा इन नाकारा छोरों से ब्याह।“
फिर ब्याह भी हो गये हम सबके। घर-बार सब चलने लगे। हमें समझाने वाले चले गये। लेकिन हम वैसे के वैसे। पहले पिछली पीढ़ी हमारे पीछे थी, अब अगली पीढ़ी हमारे आगे आ गई।
बच्चे बड़े हो गये। पढ़-लिख गये। खेती रास न आई। बाउ बन गये। शहरी रंग-ढंग आ गये। पढ़ी-लिखी बहुएं आ गईं।
और हम वैसे के वैसे।
भरी दोपहरी की तेज़ धूप हो अथवा भांय-भांय करते खेत, हमारा तो जन्म से यही आशियाना रहा।

और अब, “इन बुढ़उ को देखो, कौन समझावे। उमर हो गई है, आराम से घर में बैठो। घर का, अन्दर-बाहर का कोई काम देखो। घर में सब आराम दियो है, टी. वी. पंखा लगवा दियो है, पर दिमाग फिर गयो है, कैसे तो भरी दोपहरी में, संझा तक धूप में सड़े-पड़े रहे हैं। कल को कुछ हो-हुवा गया तो लोगन कहेंगे बच्चों ने ध्यान न रखा, बहुएं बुरी थीं।“
लेकिन हमें न तो बचपने में ऐसा कुछ सुनाई देता था, न जवानी में सुना और अब तो वैसे ही कान कम सुनने लगे हैं तो बोली जाओ , बोली जाओ , हमें न फ़रक पड़े है।
हा हा हा !!!!!

 

भावों की छप-छपाक

यूं ही जीवन जीना है।

नयनों से छलकी एक बूंद

कभी-कभी

सागर के जल-सी गहरी होती है,

भावों की छप-छपाक

न  जाने क्या-क्या कह जाती है।

और कभी ओस की बूंद-सी

झट-से ओझल हो जाती है।

हो सकता है

माणिक-मोती मिल जायें,

या फिर

किसी नागफ़नी में उलझे-से रह जायें।

कौन जाने, कब

फूलों की सुगंध से मन महक उठे,

तरल-तरल से भाव छलक उठें।

इसी निराश-आस-विश्वास में

ज़िन्दगी बीतती चली जाती है।