अपने ही घर को लूटने से

कुछ रोशनियां अंधेरे की आहट से ग्रस्त हुआ करती हैं

जलते घरों की आग पर कभी भी रोटियां नहीं सिकती हैं

अंधेरे में हम पहचान नहीं पाते हैं अपने ही घर का द्वार

अपने ही घर को लूटने से तिज़ोरियां नहीं भरती हैं।

अपनी पहचान की तलाश

नाम ढूँढती हूँ पहचान पूछती हूँ ।

मैं कौन हूँ बस अपनी आवाज ढूँढती हूँ ।

प्रमाणपत्र जाँचती हूँ

पहचान पत्र तलाशती हूँ

जन्मपत्री देखती हूँ

जन्म प्रमाणपत्र मांगती हूँ

बस अपना नाम मांगती हूँ।

परेशान घूमती हूँ

पूछती हूँ सब से

बस अपनी पहचान मांगती हूं।

खिलखिलाते हैं सब

अरे ! ये कमला की छुटकी

कमली हो गई है।

नाम  ढूँढती है, पहचान ढूँढती है

अपनी आवाज ढूँढती है।

अरे ! सब जानते हैं

सब पहचानते हैं

नाम जानते हैं।

कमला  की बिटिया, वकील की छोरी

विन्नी बिन्नी की बहना,

हेमू की पत्नी, देवकी की बहू,

और मिठू की अम्मा ।

इतने नाम इतनी पहचान।

फिर भी !

परेशान घूमती है, पहचान पूछती है

नाम मांगती है, आवाज़ मांगती है।

मैं पूछती हूं

फिर ये कविता कौन है

कौन है यह कविता ?

बौखलाई, बौराई घूमती हूं

नाम पूछती हूं, अपनी आवाज ढूँढती हूं

अपनी पहचान मांगती हूं

अपना नाम मांगती हूं।

छोड़ दो अब मुफ्त की बात

क्या तुम्हारी शिक्षा

क्या आयु

कितनी आय

कौन-सी नौकरी

कौन-सा आरक्षण

और इस सबका क्या आधार ?

अनुत्तरित हैं सब प्रश्न।

यह कौन सी आग है

जो अपने-आप को ही जला रही है।

कैसे भूल सकते हैं हम

तिनका-तिनका जोड़कर

बनता है एक घरौंदा।

शताब्दियों से लूटे जाते रहे हम

आततायियों से।

जाने कहां से आते थे

और देश लूटकर चले जाते थे,

अपनों से ही युद्धों में

झोंक दिये जाते थे हम।

कैसे निकले उस सबसे बाहर

फिर शताब्दियां लग गईं,

कैसे भूल सकते हैं हम।

और आज !

अपना ही परिश्रम,

अपनी ही सम्पत्ति

अपना ही घर फूंक रहे हैं हम।

अपने ही भीतर

आततायियों को पाल रहे हैं हम।

किसके झांसे में आ गये हैं हम।

न शिक्षा चाहिए

न विकास, न उद्यम।

खैरात में मिले, नाम बाप के मिले

एक नौकरी सरकारी

धन मिले, घर मिले,

अपना घर फूंककर मिले,

मरे की मिले

या जिंदा दफ़न कर दें तो मिले

लाश पर मिले, श्मशान में मिले

कफ़न बेचकर मिले

बस मुफ्त की मिले

बस जो भी मिले, मुफ्त ही मिले

कन्यादान -परम्परा या रूढ़ि

न तो मैं कोई वस्तु थी

न ही अन्न वस्त्र,

और न ही

घर के किसी कोने में पड़ा

कोई अवांछित, उपेक्षित पात्र

तो फिर हे पिता !

दान क्यों किया तुमने मेरा ?

धर्म, संस्कृति, परम्परा, रीति रिवाज़

सब बदल लिए तुमने अपने हित में।

किन्तु मेरे नाम पर

युगों युगों की परम्परा निभाते रहे हो तुम।

मुझे व्यक्तित्व से वस्तु बनाते रहे हो तुम।

दान करके

सभी दायित्वों से मुक्ति पाते रहे थे तुम।

और इस तरह, मुझे

किसी की निजी सम्पत्ति बनाते रहे तुम।

मेरे नाम से पुण्य कमाते रहे थे तुम ।

अपने लिए स्वर्गारोहण का मार्ग बनाते रहे तुम।

तभी तो मेरे लिए पहले से ही

सृजित कर लिये  कुछ मुहावरे 

“इस घर से डोली उठेगी उस घर से अर्थी”।

पढ़ा है पुस्तकों में मैंने

बड़े वीर हुआ करते थे हमारे पूर्वज

बड़े बड़े युद्ध जीते उन्होंनें

बस बेटियों की ही रक्षा नहीं कर पाते थे।

जौहर करना पड़ता था उन्हें

और तुम उनके उत्तराधिकारी।

युग बदल गये, तुम बदल गये

लेकिन नहीं बदला तो  बस

मुझे देखने का तुम्हारा नज़रिया।

कभी बेटी मानकर तो देखो,

मुझे पहचानकर तो देखो।

खुला आकाश दो, स्वाधीनता का भास दो।

अपनेपन का एहसास दो,

विश्वास का आभास दो।

अधिकार का सन्मार्ग दो,

कर्त्तव्य का भार दो ।

सौंपों मत किसी को।

किसी का मेरे हाथ में हाथ दो,

जीवन भर का साथ दो।

अपनेपन का भान दो।

बस थोड़ा सा मान दो

बस दान मत दो। दान मत दो।

कभी तुम भी अग्नि-परीक्षा में खरे उतरो

ममता, नेह, मातृछाया बरसाने वाली नारी में भी चाहत होती है

कोई उसके मस्तक को भी सहला दे तो कितनी राहत होती है

पावनता के सारे मापदण्ड बने हैं बस एक नारी ही के लिए
कभी तुम भी अग्नि-परीक्षा में खरे उतरो यह भी चाहत होती है

झाड़ पर चढ़ा करता है आदमी

सुना है झाड़ पर चढ़ा करता है आदमी

देखूं ज़रा कहां-कहां पड़ा है आदमी

घास, चारा, दाना-पानी सब खा गया

देखूं अब किस जुगाड़ में लगा है आदमी

 

एक अपनापन यूं ही

सुबह-शाम मिलते रहिए

दुआ-सलाम करते रहिए

बुलाते रहिए अपने  घर

काफ़ी-चाय पिलाते रहिए

और भर दे पिचकारी में

शब्दों में नवरस घोल और भर दे पिचकारी में
स्नेह की बोली बोल और भर दे पिचकारी में
आशाओं-विश्वासों के रंग बना, फिर जल में डाल
इस रंग को रिश्तों में घोल और भर दे पिचकारी में
मन की सारी बातें खोल और भर दे पिचकारी में
मन की बगिया में फूल खिला, और भर दे पिचकारी में
अगली-पिछली भूल, नये भाव जगा,और भर दे पिचकारी में
हंसी-ठिठोली की महफिल रख और भर दे पिचकारी में
सब पर रंग चढ़ा, सबके रंग उड़ा, और भर दे पिचकारी में
मीठे में मिर्ची डाल, मिर्ची में मीठा घोल और भर दे पिचकारी में
इन्द्रधनुष को रोक, रंगों के ढक्कन खोल और भर दे पिचकारी में
मीठा-सा कोई गीत सुना, नई धुन बना और भर दे पिचकारी में

भावों के तार मिला, सुर सजा और भर दे पिचकारी में
तारों की झिलमिल, चंदा की चांदनी धरा पर ला और भर दे पिचकारी में
बच्चे की किलकारी में चिड़िया की चहक मिला और भर  दे पिचकारी में
छन्द की चिन्ता छोड़, टूटा फूटा जोड़ और भर दे पिचकारी में
मात्राओं के बन्धन तोड़, कर ले तू भी होड़ और भर दे पिचकारी में
भावों के तार मिला, सुर सजा और भर दे पिचकारी में
तारों की झिलमिल, चंदा की चांदनी धरा पर ला और भर दे पिचकारी में
बच्चे की किलकारी में चिड़िया की चहक मिला और भर  दे पिचकारी में
इतना ही सूझा है जब और सूझेगा तब फिर भर दूंगी पिचकारी में

 

अभिलाषाओं के कसीदे

आकाश पर अभिलाषाओं के कसीदे कढ़े थे
भावनाओं के ज्वार से माणिक-मोती जड़े थे
न जाने कब एक धागा छूटा हाथ से मेरे
समय से पहले ही सारे ख्वाब ज़मीन पर पड़े थे

मन मिलते हैं

जब हाथों से हाथ जुड़ते हैं

जीवन में राग घुलते हैं
रिश्तों की डोर बंधती है

मन से फिर मन मिलते हैं

 

मन की भोली-भाली हूं

डील-डौल पर जाना मत

मुझसे तुम घबराना मत

मन की भोली-भाली हूं

मुझसे तुम कतराना मत

हम सब तो बस बन्दर हैं

नाचते तो सभी हैं

बस

इतना ही पता नहीं लगता

कि डोरी किसके हाथ में है।

मदारी कौन है और बन्दर कौन।

बहुत सी गलतफहमियां रहती हैं मन में।

खूब नाचते हैं हम

यह सोच कर , कि देखों

कैसा नाच नचाया हमने सामने वाले को।

लेकिन बहुत बाद में पता लगता है कि

नाच तो हम ही रहे थे

और सामने वाला तो तमाशबीन था।

किसके इशारे पर

कब कौन नाचता है

और कौन नचाता है पता ही नहीं लगता।

इशारे छोड़िए ,

यहां तो लोग

उंगलियों पर नचा लेते हैं

और नाच भी लेते हैं।

और भक्त लोग कहते हैं

कि डोरी तो उपर वाले के हाथ में है

वही नचाता है

हम सब तो बस बन्दर हैं।

कुछ कर्म करो

राधा बोली कृष्ण से, चल श्याम वन में, रासलीला के लिए

कृष्ण हतप्रभ, बोले गीता में दिया था संदेश हर युग के लिए

बहुत अवतार लिए, युद्ध लड़े, उपदेश दिये तुम्हें हे मानव!

कर्म-काण्ड छोड़कर, बस कर्म करो मेरी आराधना के लिए

सूखी धरती करे पुकार

वातानुकूलित भवनों में बैठकर जल की योजनाएं बनाते हैं

खेल के मैदानों पर अपने मनोरंजन के लिए पानी बहाते हैं

बोतलों में बन्द पानी पी पीकर, सूखी धरती को तर करेंगे

सबको समान सुविधाएं मिलेंगी, सुनते हैं कुछ ऐसा कहते हैं

शोर भीतर की आहटों को

बाहर का शोर

भीतर की आहटों को

अक्सर चुप करवा देता है

और हम

अपने भीतर की आवाज़ों-आहटों को

अनसुना कर

आगे निकल जाते हैं,

अक्सर, गलत राहों पर।

मन के भीतर भी एक शोर है,

खलबली है, द्वंद्व है,

वाद-विवाद, वितंडावाद है

जिसकी हम अक्सर

उपेक्षा कर जाते हैं।

अपने-आप को सुनना ही नहीं चाहते।

कहीं डरते हैं

क्योंकि सच तो वहीं है

और हम

सच का सामना करने से

डरते हैं।

अपने-आप से डरते हैं

क्योंकि

जब भीतर की आवाज़ें

सन्नाटें का चीरती हुई

बाहर निकलेंगी

तब कुछ तो अनघट घटेगा

और हम

उससे ही बचना चाहते हैं

इसीलिए  से डरते हैं।

पांच-सात क्या पी ली

जगती हूं,उठती हूं, फिर सोती हूं,मनमस्त हूं

घड़ी की सूईयों को रोक दिया है, अलमस्त हूं

पूरा दिन पड़ा है कर लेंगे सारे काम देर-सबेर

बस पांच-सात क्या पी ली,(चाय),मदमस्त हूं

चलो, आज बेभाव अपनापन बांटते हैं

किसी की प्यास बुझा सकें तो क्या बात है।

किसी को बस यूं ही अपना बना सकें तो क्या बात है।

जब रह रह कर मन उदास होता है,

तब बिना वजह खिलखिला सकें तो क्या बात है।

चलो आज उड़ती चिड़िया के पंख गिने,

जो काम कोई न कर सकता हो,

वही आज कर लें तो क्या बात है।

चलो, आज बेभाव अपनापन बांटते हैं,

किसी अपने को सच में अपना बना सकें तो क्या बात है।

कहां सीख पाये हैं हम

नयनों की एक बूंद

सागर  के जल से गहरी होती है

ढूंढोगे तो किन्तु

जलराशि जब अपने तटबन्धों को

तोड़ती है

तब भी विप्लव होता है

और जब भीतर ही भीतर

सिमटती है तब भी।

 

कहां सीख पाये हैं हम

सीमाओं में रहना।

जिन्दगी कोई तकरार नहीं है

जिन्दगी गणित का कोई दो दूनी चार नहीं है

गुणा-भाग अगर कभी छूट गया तो हार नहीं है

कभी धूप है तो कभी छांव और कभी है आंधी

सुख-दुख में बीतेगी, जिन्दगी कोई तकरार नहीं है

गुम हो जाये चाबी स्कूल की

 हाथ जोड़कर तुम क्या मांग रहे मुझको कुछ भी नहीं पता

बैठा था गर्मी की छुट्टी की आस में, क्या की थी मैंने खता

मैं तो बस मांगूं एक टी.वी.,एक पी.सी,एक आई फोन 6

और मांगू, गुम हो जाये चाबी स्कूल की, और मेरा बस्ता

मन में एक जंगल है

मन में एक जंगल है

विचारों का, भावों का।

एक झंझावात की तरह आते हैं

अन्तर्मन को झिंझोड़ते हैं,

तहस-नहस करते हैं

और हवा के झोंके के साथ

अचानक

कहीं दूर उड़ जाते हैं।

कभी शब्द दे पाती हूं

और कभी नहीं।

लिखे शब्द पिघलने लगते हैं

आसमानी बादलों की तरह।

कहीं दूर उड़ जाते हैं

पक्षी की तरह।

हर बार एक कही-अनकही

आधी-अधूरी कहानी रह जाती है।

चंदा को जब देखो मनमर्ज़ी करता है

चंदा को मैंने थाम लिया, जब देखो अपनी मनमर्ज़ी करता है

रोज़ रूप बदलता अपने, जब देखो इधर-उधर घूमा करता है

जब मन हो गायब हो जाता है, कभी पूरा, कभी आधा भी

यूं तो दिन में भी आ जायेगा, ईद-चौथ पर तरसाया करता है

 

आंखों में लरजते कुछ सपने देखो

न चूड़ियां देखो, न मेंहदी

न साज-श्रृंगार।

बस, आंखों में लरजते

कुछ सपने देखो।

कुछ पीछे छूट गये ,

कुछ बनते, कुछ सजते

कुछ वादे कुछ यादें।

आधी ज़िन्दगी

इधर थी, आधी उधर है।

पर, सपनों की गठरी

इक ही है।

कुछ बांध लिए, कुछ छिन लिए

कुछ पैबन्द लगे, कुछ गांठ पड़ी

कुछ बिखर गये , कुछ नये बुने

कुछ नये बने।

फिर भी सपने हैं, हैं तो, अपने हैं

कोई देख नहीं पायेगा

इस गठरी को, मन में है।

सपने हैं, जैसे भी हैं

हैं तो बस अपने हैं।

यूं ही पार उतरना है

नैया का क्या करना है, अब तो यूं ही पार उतरना है

कुछ डूबेंगे, कुछ तैरेंगे, सब अपनी हिम्मत से करना है

नहीं खड़ा है अब खेवट कोई, नैया पार लगाने को

जान लिया है सब दिया-लिया इस जीवन में ही भरना है

खुश होने के लिए भी

न कोई चाहत, न कभी कोई मांग।
एक नये आनन्द के साथ
रोज़ आते हैं
आनन्दित करते हैं
और चले जाते हैं।
चांद को कभी उदास नहीं देखा
सूरज कभी रोया नहीं
तारे कभी टिमटिमाना नहीं भूलते।
और  हम हैं कि
ज़रा-सा खुश होने के लिए भी
कोई बहाना ढूंढते हैं
कोई बड़ा-सा कारण
नहीं तो लोग पता नहीं क्या सोचेंगे
कि अरे !
यह आज इतनी खुश क्यों है
और एक तहलका मच जायेगा।


 

इंसान की फ़ितरत

देखो रोशनी से कतराने लगे हैं हम

देखो बत्तियां बुझाने में लगे हैं हम

जलती तीली देखकर भ्रमित न होना

देखो सीढ़ियां गिराने में लगे हैं हम

जिन्दगी की डगर

जिन्दगी की डगर यूं ही घुमावदार होती हैं

कभी सुख, कभी दुख की जमा-गुणा होती है

हर राह लेकर ही जाती है धरा से गगन तक

बस कदम-दर-कदम बढ़ाये रखने की ज़रूरत होती है

खत लिखने से डरते थे।

मन ही मन

उनसे प्यार बहुत करते थे

पर खत लिखने से डरते थे।

कच्ची पैंसिल, फटा लिफ़ाफ़ा

आटे की लेई,

कापी का आखिरी पन्ना।

फिर सुन लिया

लोग लिफ़ाफ़ा देखकर

मजमून भांप लिया करते हैं।

उनसे प्यार बहुत करते थे

पर इस कारण

खत लिखने से डरते थे।

अब हमें

मजमून का अर्थ तो पता नहीं था

लेकिन

मजमून से

कुछ मजनूं की-सी ध्वनि

प्रतिध्वनित होती थी।

कुछ लैला-मजनूं की-सी।

और कभी-कभी जूं की-सी।

और
इन सबसे हम डरते थे ।
उनसे प्यार बहुत करते थे

पर इस कारण

खत लिखने से डरते थे।

ज़िन्दगी बहुत झूले झुलाती है

ज़िन्दगी बहुत झूले झुलाती है

कभी आगे,कभी पीछे ले जाती है

जोश में कभी ज़्यादा उंचाई ले लें

तो सीधे धराशायी भी कर जाती है

आंखें फ़ेर लीं

अपनों से अपनेपन की चाह में

जीवन-भर लगे रहे हम राह में

जब जिसने चाहा आंखें फ़ेर लीं

कहीं कोई नहीं था हमारी परवाह में