तिनके का सहारा

कभी किसी ने  कह दिया

एक तिनके का सहारा भी बहुत होता है,

किस्मत साथ दे

तो सीखा हुआ

ककहरा भी बहुत होता है।

लेकिन पुराने मुहावरे

ज़िन्दगी में साथ नहीं देते सदा।

यूं तो बड़े-बड़े पहाड़ों को

यूं ही लांघ जाता है आदमी,

लेकिन कभी-कभी एक तिनके की चोट से

घायल मन

हर आस-विश्वास खोता है।

कुछ कह रही ओस की बूंदे

रंग-बिरंगी आभाओं से सजकर रवि हुआ उदित

चिड़ियां चहकीं, फूल खिले, पल्लव हुए मुदित

देखो भाग-भागकर कुछ कह रही ओस की बूंदे

इस मधुर भाव में मन क्यों न हो जाये प्रफुल्लित

इक नल लगवा दे भैया

कहां है अब पनघट

कहां है अब कृष्ण कन्हैया

क्यो इन सबमें

अब उलझा है मन दैया

इतना ही है तू

कृष्ण कन्हैया

तो मेरे घर में

इक नल लगवा दे भैया।

युग बदल गया

तू भी अपना यह वेश बदल,

न छेड़ बैठना किसी को

गोपी समझ के

कारागार के द्वार खुले हैं दैया।

गीत-संगीत सब बदल गये

रास-बिहारी खिसक गये

ढोल की ताल अब बहक गई

रास-बिहारी चले गये

किचन में कितना काम पड़ा है मैया

इतना ही है तू

कृष्ण कन्हैया

तो अपनी अंगुली से

मेरे घर के सारे काम

करवा दे रे भैया।

​​​​​​​

हाय-हैल्लो मत कहना

यूं क्यों ताड़ रहा है

टुकुर-टुकुर तू मुझको

मम्मी ने मेरी बोला था

किसी लफड़े में मत आ जाना

रूप बदलकर आये कोई

कहे मैं कान्हा हूं

उसको यूं ही

हाय-हैल्लो मत कहना

देख-देख मैं कितनी सुन्दर

कितने अच्छे  मेरे कपड़े

हाअअ!!

तेरी मां ने तुझको कैसे भेजा

हाअअ !!

हाय-हाय, मैं शर्म से मरी जा रही

तेरी कुर्ती क्या मां ने धो दी थी

जो तू यूं ही चला आया

हाअअ!!

जा-जा घर जा

अपनी कुर्ती पहनकर आ

फिर करना मुझसे बात।

निशा पड़ाव पल भर

निशा !

दिन भर के थके कदमों का

पड़ाव पल भर।

रोशनी से शुरू होकर

रोशनी तक का सफ़र।

सूर्य की उष्मा से राहत

पल भर।

चांद की शीतलता का

मधुर हास।

चमकते तारों से बंधी आस।

-अंधेरा छंटेगा।

फिर सुबह होगी।

नई सुबह।

यह सफ़र जारी रहेगा।

परिवर्तन नित्य है

सन्मार्ग पर चलने के लिए रोशनी की बस एक किरण ही काफ़ी है
इरादे नेक हों, तो, राही दो हों न हों, बढ़ते रहें, इतना ही काफ़ी है
सूर्य अस्त होगा, रात आयेगी, तम भी फैलेगा, संगी साथ छोड़ देंगे,
तब भी राह उन्मुक्त है, परिवर्तन नित्य है, इतना जानना ही काफ़ी है

छनक-छन तारे छनके

ज़रा-सा मैंने हाथ बढ़ाया, नभ मेरे हाथ आया

छनक-छनक-छन तारे छनके, चंदा भी मुस्काया

सूरज की गठरी बांधी, सपनों की सीढ़ी तानी

इन्द्रधनुष ने रंग बिखेरे, मनमोहक चित्र बनाया

बदली के पीछे से कुछ बूंदे निकली, मन भरमाया

 

 

हां हूं मैं बगुला भक्त

यह हमारी कैसी प्रवृत्ति हो गई है

कि एक बार कोई धारणा बना लेते हैं

तो बदलते ही नहीं।

कभी देख लिया होगा

किसी ने, किसी समय

एक बगुले को, एक टांग पर खड़ा

मीन का भोजन ढूंढते

बस उसी दिन से

हमने बगुले के प्रति

एक नकारात्मक सोच तैयार कर ली।

बीच सागर में

एक टांग पर खड़ा बगुला

इस विस्तृत जल राशि

को निहार रहा है

एकाग्रचित्त, वासी,

अपने में मग्न ।

सोच रहा है

कि जानते नहीं थे क्या तुम

कि जल में मीन ही नहीं होती

माणिक भी होते हैं।

किन्तु मैंने तो 

अपनी उदर पूर्ति के लिए

केवल मीन का ही भक्षण किया

जो तुम भी करते हो।

माणिक-मोती नहीं चुने मैंने

जिनके लिए तुम समुद्र मंथन कर बैठते हो।

और अपने भाईयों से ही युद्ध कर बैठते हो।

अपने ही भ्राताओं से युद्ध कर बैठे।

किसी प्रलोभन में नहीं रहा मैं कभी।

बस एक आदत सी थी मेरी

यूं ही खड़ा होना अच्छा लगता था मुझे

जल की तरलता को अनुभव करता

और चुपचाप बहता रहता।

तुमने भक्त कहा मुझे

अच्छा लगा था

पर जब इंसानों की तुलना के लिए

इसे एक मुहावरा बना दिया

बस उसी दिन आहत हुआ था।

पर अब तो आदत हो गई है

ऐसी बातें सुनने की

बुरा नहीं मानता मैं

क्योंकि

अपने आप को भी जानता हूं

और उपहास करने वालों को भी

भली भांति पहचानता हूं।

 

चैन से सो लेने दो

अच्छे-भले मुंह ढककर सो रहे थे यूं ही हिला हिलाकर जगा दिया

अच्छा-सा चाय-नाश्ता कराओं खाना बनाओ, हुक्म जारी किया

अरे अवकाश  हमारा अधिकार है, चैन से सो लेने दो, न जगाओ

नींद तोड़ी हमारी तो मीडिया बुला लेंगे हमने बयान जारी किया

अपनी हिम्मत से जीते हैं

बस एक दृढ़ निश्चय हो तो राहें उन्मुक्त हो ही जाती हैं
लक्ष्य पर दृष्टि हो तो बाधाएं स्वयं ही हट जाती हैं
कौन रोक पाता है उन्हें जो अपनी हिम्मत से जीते हैं
प्रयास करते रहने वालों को मंज़िल मिल ही जाती है

रोशनी की चकाचौंध में

रोशनी की चकाचौंध में अक्सर अंधकार के भाव को भूल बैठते हैं हम

सूरज की दमक में अक्सर रात्रि के आगमन से मुंह मोड़ बैठते हैं हम

तम की आहट भर से बौखलाकर रोशनी के लिए हाथ जला बैठते हैं

ज्योति प्रज्वलित है, फिर भी दीप तले अंधेरा ही ढूंढने बैठते हैं हम

मानव के धोखे में मत आ जाना

समझाया था न तुझको

जब तक मैं न लौटूं

नीड़ से बाहर मत जाना

मानव के 

धोखे में मत आ जाना।

फैला चारों ओर प्रदूषण

कहीं चोट मत खा जाना।

कहां गये सब संगी साथी

कहां ढूंढे अब उनको।

समझाकर गई थी न

सब साथ-साथ ही रहना।

इस मानव के धोखे में मत आ जाना।

उजाड़ दिये हैं रैन बसेरे

कहां बनाएं नीड़।

न फल मिलता है

न जल मिलता है

न कोई डाले चुग्गा।

हाथों में पिंजरे है

पकड़ पकड़ कर हमको

इनमें डाल रहे हैं

कोई अभयारण्य बना रहे हैं,

परिवारों से नाता टूटे

अपने जैसा मान लिया है।

फिर कहते हैं, देखो देखो

हम जीवों की रक्षा करते हैं।

चलो चलो

कहीं और चलें

इन शहरों से दूर।

करो उड़ान की तैयारी

हमने अब यह ठान लिया है।

अपनापन आजमाकर देखें

चलो आज यहां ही सबका अपनापन आजमाकर देखें

मेरी तुकबन्दी पर वाह वाह की अम्बार लगाकर देखें

न मात्रा, न मापनी, न गणना, छन्द का ज्ञान है मुझे

मेरे तथाकथित मुक्तक की ज़रा हवा निकालकर देखें

 

बहके हैं रंग

रंगों की आहट से खिली खिली है जिन्दगी

अपनों की चाहत से मिली मिली है जिन्दगी

बहके हैं रंग, चहके हैं रंग, महके हैं रंग,

 रंगों की रंगीनियों से हंसी हंसी है जिन्दगी

अस्त्र उठा संधान कर

घृणा, द्वेष, हिंसा, अपराध, लोभ, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता के रावण बहुत हैं।

और हम हाथ जोड़े, बस राम राम पुकारते, दायित्व से भागते, सयाने बहुत हैं।

न आयेंगे अब सतयुग के राम तुम्हारी सहायता के लिए इन का संधान करने।

अपने भीतर तलाश कर, अस्त्र उठा, संधान कर, साहस दिखा, रास्ते बहुत हैं।

ज़मीन से उठते पांव थे

आकाश को छूते अरमान थे

ज़मीन से उठते पांव थे

आंखों पर अहं का परदा था

उल्टे पड़े सब दांव थे

फिर उनके कंधों पर बंहगी ढूंढते हैं

अपनी संतान के कंधों पर

हमने लाद दिये हैं

अपने अधूरे सपने,

अपनी आशाएं –आकांक्षाएं,

उनके मन-मस्तिष्क पर

ठोंक कर बैठे हैं

अपनी महत्वाकांक्षाओं की कीलें,

उनकी इच्छाओं-अनच्छिाओं पर

बनकर बैठे हैं हम प्रहरी।

आगे, आगे और आगे

निकल लें।

जितनी दूर निकल सकें,

निकल लें।

सबसे आगे, और  आगे, और आगे।

धरा को छोड़

आकाश को निगल ले।

और वे भागने लगे हैं

हमसे दूर, बहुत दूर ।

हम स्वयं ही नहीं जानते

उनके कंधों पर कितना बोझ डालकर

किस राह पर उन्हें ढकेल रहे हैं हम ।

धरा के रास्‍ते बन्‍द कर दिये हैं

उनके लिए।

बस पकड़ना है तो

आकाश ही आकाश है।

फिर शिकायत करते हैं

कुछ नहीं कर रही नई पीढ़ी

हमारे लिए ।

फिर उनके कंधों पर बंहगी ढूंढते हैं !!!
 

कमाल है !!!!

निर्माण हो या हो अवसान

उपवन में रूप ले रही

कलियों ने पहले से झूम रहे

पुष्पों की आभा देखी

और अपना सुन्दर भविष्य

देखकर मुस्कुरा दीं।

पुष्पों ने कलियों की

मुस्कान से आलोकित

उपवन को निहारा

और अपना पूर्व स्वरूप भानकर

मुदित हुए।

फिर धरा पर झरी पत्तियों में

अपने भविष्य की

आहट का अनुभव किया।

धरा से बने थे

धरा में जा मिलेंगे

सोच, खिलखिला दिये।

फिर स्वरूप लेंगे

मुस्कुराएंगे, मुदित होंगे,

फिर खिलखिलाएंगे।

निर्माण हो या हो अवसान की आहट

होना है तो होना है

रोना क्या खोना क्या

होना है तो होना है।

चलो, इसी बात पर मुस्कुरा दें ज़रा।

चल न मन,पतंग बन

आकाश छूने की तमन्ना है

पतंग में।

एक पतली सी डोर के सहारे

यह जानते हुए भी

कि कट सकती है,

फट सकती है,

लूट ली जा सकती है

तारों में उलझकर रह सकती है

टूटकर धरा पर मिट्टी में मिल सकती है।

किन्तु उन्मुक्त गगन

जीवन का उत्साह

खुली उड़ान,

उत्सव का आनन्द

उल्लास और उमंग।

पवन की गति,

कुछ हाथों की यति

रंगों की मति

राहें नहीं रोकते।

  *    *    *    *

चल न मन,

पतंग बन।

दिमाग़ की बत्ती गुल पड़ी है

मैं भाषण देता हूं

मैं राशन देता हूं

मैं झाड़ू देता हूं

मैं पैसे देता हूं

रोटी दी मैंने

मैंने गैस दिया

पहले कर्ज़ दिये

फिर सब माफ़ किया

टैक्स माफ़ किये मैंने

फिर टैक्स लगाये

मैंने दुनिया देखी

मैंने ढोल बजाये

नये नोट बनाये

अच्छे दिन मैं लाया

सारी दुनिया को बताया

ये बेईमानों का देश था,

चोर-उचक्कों का हर वेश था

मैंने सब बदल दिया

बेटी-बेटी करते-करते

लाखों-लाखों लुट गये

पर बेटी वहीं पड़ी है।

सूची बहुत लम्बी है

यहीं विराम लेते हैं

और अगले पड़ाव पर चलते हैं।

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चुनावों का अब बिगुल बजा

किसका-किसका ढोल बजा

किसको चुन लें, किसको छोड़ें

हर बार यही कहानी है

कभी ज़्यादा कभी कम पानी है

दिमाग़ की बत्ती गुल पड़ी है

आंखों पर पट्टी बंधी है

बस बातें करके सो जायेंगे

और सुबह फिर वही राग गायेंगे।

अन्तस में हैं सारी बातें

पन्नों पर लिखी हैं मन की वे सारी गाथाएं

जो दुनिया तो  जाने थी पर मन था छुपाए

पर इन फूलों के अन्तस में हैं वे सारी बातें

न कभी हम उन्हें बताएं न वो हमें जताएं

रेखाएं अनुभव की अनुभूत सत्‍य की

रेखाएं

कलम की, तूलिका की,

रचती हैं कुछ भाव, कोई चित्र।

किन्‍तु 

रेखाएं अनुभव की, अनुभूत सत्‍य की,

दिखती तो दरारों-सी हैं

लेकिन झांकती है

इनके भीतर से एक रोशनी

देती एक गहन जीवन-संदेश।

जिसे पाने के लिए, समझने के लिए

समर्पित करना पड़ता है

एक पूरा जीवन

या एक पूरा युग।

ऐसे हाथ जब आशीष में उठते हैं

तब भी

और जब अभिवादन में जुड़ते हैं

तब भी

नतमस्‍तक होता है मन।

चूड़ियां: रूढ़ि या परम्परा

आज मैंने अपने हाथों की 

सारी चूड़ियों उतार दी हैं

और उतार कर सहेज नहीं ली हैं

तोड़ दी हैं

और  टुकड़े टुकड़े करके

उनका कण-कण

नाली में बहा दिया हैं।

इसे

कोई बचकानी हरकत न समझ लेना।

वास्तव में मैं डर गई थी।

चूड़ियों की खनक से,

उनकी मधुर आवाज़ से,

और उस आवाज़ के प्रति

तुम्हारे आकर्षण से।

और साथ ही चूड़ियों से जुड़े

शताब्दियों से बन रहे

अनेक मुहावरों और कहावतों से।

मैंने सुना है

चूड़ियों वाले हाथ कमज़ोर हुआ करते हैं।

निर्बलता का प्रतीक हैं ये।

और अबला तो मेरा पर्यायवाची

पहले से ही है।

फिर चूड़ी के कलाई में आते ही

सौर्न्दय और प्रदर्शन प्रमुख हो जाता है

और कर्म उपेक्षित।

 

और सबसे बड़ा खतरा यह

कि पता नहीं

कब, कौन, कहां,

परिचित-अपरिचित

अपना या पराया

दोस्त या दुश्मन

दुनिया के किसी

जाने या अनजाने कोने में

मर जाये

और तुम सब मिलकर

मेरी चूड़ियां तोड़ने लगो।

फ़िलहाल

मैंने इस खतरे को टाल दिया है।

जानती हूं

कि तुम जब यह सब जानेगे

तो बड़ा बुरा मानोगे।                       

क्योंकि, बड़ी मधुर लगती है

तुम्हें मेरी चूड़ियों की खनक।

तुम्हारे प्रेम और सौन्दर्य गीतों की

प्रेरणा स्त्रोत हैं ये।

फुलका बेलते समय

चूड़ियों से ध्वनित होते स्वर

तुम्हारे लिए अमर संगीत हैं

और तुम

मोहित हो इस सब पर।

पर मैं यह भी जानती हूं

कि इस सबके पीछे

तुम्हारा वह आदिम पुरूष है

जो स्वयं तो पहुंच जाना चाहता है

चांद के चांद पर।

पर मेरे लिए चाहता है

कि मैं,

रसोईघर में,

चकले बेलने की ताल पर,

तुम्हारे लिए,

संगीत के स्वर सर्जित करती रहूं,

तुम्हारी प्रतीक्षा में,

तुम्हारी प्रशंसा के

दो बोल मात्र सुनने के लिए।

पर मैं तुम्हें बता दूं

कि तुम्हारे भीतर का वह आदिम पुरूष

जीवित है अभी तो हो,

किन्तु,

मेरे भीतर की वह आदिम स्त्री

कब की मर चुकी है।

तुम्हारी यह चुप्पी सुहाती नहीं

तुम्हारी यह चुप्पी सुहाती नहीं

उदास बैठी तुम भाती नहीं

कभी तुम्हें यूं देखा नहीं

एकान्‍तवासी

मौन, गम्भीर, चिन्तित।

लौट आओ

ज़रा अपने अंदाज़ में

तुम्हारी किटकिटकुटकुट

डाल डाल फांदती

छुप्पनछुपाई खेलती

कूदती भागती,

पेड़ों के कोटर से झांकती,

यही अंदाज़ भाता है तुम्हारा।

गुनगुनाती हो

हंसती खिलखिलाती हो मेरे भीतर

जीवन को राग रंग देती हो।

कैसे समझाउं तुम्हें

न तुम मेरी बोली समझती हो

न मैं तुम्हारी।

क्या था, क्या हो गया, क्या होगा

कहां वश रह गया हमारा

चलो, लौट आओ तो ज़रा अपने रंग में।

मां के आंचल की छांव

प्रकृति का नियम है

विशाल वट वृक्ष तले

नहीं पनपते छोटे पेड़ पौधे।

नहीं पुष्पित पल्लवित होतीं यूं ही लताएं।

और यदि कुछ पनप भी जाये

तो उसे नाम नहीं मिलता।

पहचान नहीं मिलती।

बस, वट वृक्ष की विशालता के सामने

खो जाते हैं सब।

लेकिन, एक सा वट वृक्ष भी है

जिसका अपना कोई नाम नहीं होता

कोई पहचान नहीं होती।

बस एक दीर्घ आंचल होता है

जिसके साये तले, पलती बढ़ती है

एक पूरी की पूरी पीढ़ी,

एक पूरा का पूरा युग।

अपनी जड़ों से पोषण करती है उनका।

नये पौधों का रोपण करती है

अपने आपको खोकर।

उन्हें नाम देती है, पहचान देती है

आंचल की छांव देती है।

पूरी ज़मीन और पूरा आकाश देती है।

युग बदलते हैं, पर नहीं बदलती

नहीं छूटती आंचल की छांव।

फूल खिलखिलाए

बारिश के बाद धूप निखरी
आंसुओं के बाद मुस्कान बिखरी
बदलते मौसम के एहसास हैं ये
फूल खिलखिलाए, महक बिखरी

 

शिलालेख हैं मेरे भीतर

शिलालेख हैं मेरे भीतर कल की बीती बातों के

अपने ही जब चोट करें तब नासूर बने हैं घातों के

इन रिसते घावों की गांठे बनती हैं न खुलने वाली

अन्तिम यात्रा तक ढोते हैं हम खण्डहर इन आघातों के

मन टटोलता है प्रस्तर का अंतस

प्रस्तर के अंतस में

सुप्त हैं न जाने कितने जल प्रपात।

कल कल करती नदियां, 

झर झर करते झरने, 

लहराती बलखाती नहरें, 

मन की बहारें, और कितने ही सपने।

जहां अंकुरित होते हैं

नव पुष्प,

पुष्पित पल्लवित होती हैं कामनाएं

जिंदगी महकती है, गाती है,

गुनगुनाती है, कुछ समझाती है।

इन्द्रधनुषी रंगों से

आकाश सराबोर होता है

और मन टटोलता है

प्रस्तर का अंतस।

कुछ छूट गया जीवन में

गांव तक कौन सी राह जाती है कभी देखी नहीं मैंने

वह तरूवर, कुंआ, बाग-बगीचे, पनघट, देखे नहीं मैंने

पीपल की छाया, चौपालों का जमघट, नानी-दादी के किस्से

लगता है कुछ छूट गया जीवन में, जो पाया नहीं मैंने

बताते हैं क्या कीजिए

सुना है ज्ञान, ध्यान, स्नान एक अनुष्ठान है, नियम, काल, भाव से कीजिए

तुलसी-नीम डालिए, स्वच्छ जल लीजिए, मंत्र पढ़िए, राम-राम कीजिए।।

शून्य तापमान, शीतकाल, शीतल जल, काम इतना कीजिए बस चुपचाप

चेहरे को चमकाईए, क्रीम लगाईए, और हे राम ! हे राम ! कीजिए ।।