खत लिखने से डरते थे।

मन ही मन

उनसे प्यार बहुत करते थे

पर खत लिखने से डरते थे।

कच्ची पैंसिल, फटा लिफ़ाफ़ा

आटे की लेई,

कापी का आखिरी पन्ना।

फिर सुन लिया

लोग लिफ़ाफ़ा देखकर

मजमून भांप लिया करते हैं।

उनसे प्यार बहुत करते थे

पर इस कारण

खत लिखने से डरते थे।

अब हमें

मजमून का अर्थ तो पता नहीं था

लेकिन

मजमून से

कुछ मजनूं की-सी ध्वनि

प्रतिध्वनित होती थी।

कुछ लैला-मजनूं की-सी।

और कभी-कभी जूं की-सी।

और
इन सबसे हम डरते थे ।
उनसे प्यार बहुत करते थे

पर इस कारण

खत लिखने से डरते थे।

ज़िन्दगी बहुत झूले झुलाती है

ज़िन्दगी बहुत झूले झुलाती है

कभी आगे,कभी पीछे ले जाती है

जोश में कभी ज़्यादा उंचाई ले लें

तो सीधे धराशायी भी कर जाती है

आंखें फ़ेर लीं

अपनों से अपनेपन की चाह में

जीवन-भर लगे रहे हम राह में

जब जिसने चाहा आंखें फ़ेर लीं

कहीं कोई नहीं था हमारी परवाह में

जीवन में यह उलट-पलट होती है

बहुत छोटी हूं मैं

कुछ समझने के लिए।

पर

इतनी छोटी भी तो नहीं

कि कुछ भी समझ न आये।

मेरे आस-पास लोग कहते हैं

हर औरत मां होती है

बहन होती है,पत्नी होती है

बेटी और सखा होती है।

फिर मुझे देखकर कहते हैं

देखो,कष्टों में भी मुस्कुरा लेती है

ममतामयी, देवी है देवी।

मुझे नहीं पता

औरत क्या, मां क्या,

बेटी क्या, बहन क्या, देवी क्या

और ममता क्या होती है।

मुझे नहीं पता

मेरी गोद यह में कौन है

बेटा है, भाई है

पति है, या कोई और।

बहुत सी बातें

नहीं समझ पाती हूं

और जो समझ जाती हूं

वह भी कहां समझ पाती हूं।

लोग कहते हैं, देखो

भाई की देख-भाल करती है।

बड़ा होकर यही तो है

इसकी रक्षा करेगा

राखी बंधवायेगा, हाथ पीले करेगा,

अपने घर भेजेगा।

कोई समझायेगा मुझे

जीवन में  यह उलट-पलट कैसे होती है।

बहुत सी बातें

नहीं समझ पाती हूं

और जो समझ जाती हूं

वह भी कहां समझ पाती हूं।

मन के भीतर कल्पवृक्ष

मन के भीतर ही

उगे बैठे हैं

न जाने कितने कल्पवृक्ष।

रोज उगते हैं, फलते-फूलते हैं

जड़े जमाते हैं

और समय के प्रवाह में

सब कुछ दे जाते हैं।

न समुद्र मंथन की आवश्यकता,

न किसी युद्ध की

न देवताओं-असुरों की,

क्योंकि सब कुछ तो

इसी मन के भीतर है।

कहां बाहर भटकते हैं हम

क्यों बाहर भटकते हैं हम।

हां, यह और बात है

कि समय के प्रवाह में

बदल जाता है बहुत कुछ।

शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं

भाव बदल जाते हैं

प्रभाव बदल जाते हैं।

इसलिए

मन के इस कल्पवृक्ष से भी

बहुत आशाएं मत रखना।

निद्रा पर एक झलकी

जब खरीखरी कह लेते हैं,नींद भली-सी आती है

ज़्यादा चिकनी-चुपड़ी ठीक नहीं,चर्बी बढ़ जाती है

हृदयाघात का डर नहीं, औरों की नींद उड़ाते हैं

हमको तो जीने की बस ऐसी ही शैली आती है

जीवन यूं ही करवट लेता है

गुब्बारों में अरमानों की हवा भरी है कुछ खाली बन्द पड़े हैं

कुछ में रंग-बिरंगी आशाएं हैं, कुछ में रंगीन जल भरे हैं

कब हवा का रूख बदलेगा, हाथों से छूटेंगे फूटेंगे, पिचकेंगे

जीवन यूं ही करवट लेता है, ये क्यों न हम समझ सके हैं

शब्दों की झोली खाली पाती हूं

जब भावों का ज्वार उमड़ता है, तब सोच-समझ उड़ जाती है

लिखने बैठें तो अपने ही मन की बात कहां समझ में आती है

कलम को क्यों दोष दूं, क्यों स्याही फैली, सूखी या मिट गई

भावों को किन शब्दों में ढालूं, शब्दों की झोली खाली पाती हूं

किस युग में जी रहे हो तुम

मेरा रूप तुमने रचा,

सौन्दर्य, श्रृंगार

सब तुमने ही तो दिया।

मेरा सम्पूर्ण व्यक्तित्व

मेरे गुण, या मेरी चमत्कारिता

सब तुम्हारी ही तो देन है।

मुझे तो ठीक से स्मरण भी नहीं

किस युग में, कब-कब

अवतरित हुआ था मैं।

क्यों आया था मैं।

क्या रचा था मैंने इतिहास।

कौन सी कथा, कौन सा युद्ध

और कौन सी लीला।

हां, इतना अवश्य स्मरण है

कि मैंने रचा था एक युग

किन्‍तु समाप्त भी किया था एक युग।

तब से अब तक

हज़ारों-लाखों वर्ष बीत गये।

चकित हूं, यह देखकर

कि तुम अभी भी

उसी युग में जी रहे हो।

वही कल्पनाएं, कपोल-कथाएं

वही माटी, वही बाल-गोपाल

राधा और गोपियां, यशोदा और माखन,

लीला और रास-लीलाएं।

सोचा कभी तुमने

मैंने जब भी

पुन:-पुन: अवतार लिया है

एक नये रूप में, एक नये भाव में

एक नये अर्थ में लिया है।

काल के साथ बदला हूं मैं।

हर बार नये रूप में, नये भाव में

या तुम्हारे शब्दों में कहूं तो

युगानुरूप

नये अवतार में ढाला है मैंने

अपने-आपको।

किन्तु, तुम

आज भी, वहीं के वहीं खड़े हो।

तो इतना जान लो

कि तुम

मेरी आराधना तो करते हो

किन्तु मेरे साथ नहीं हो।

शब्दों से जलाने वाले

आग लगाने वाले यहां बहुत हैं

बिना आग सुलगाने वाले बहुत हैं

बुझाने की बात तो करना ही मत

शब्दों से जलाने वाले यहां बहुत हैं

कैसे होगा तारण

आज डूबने का मन है कहां डूबें बता रे मन

सागर-दरिया में जल है किन्तु वहां है मीन

जो कर्म किये बैठे हैं इस जहां में हम लोग

चुल्लू-भर पानी में डूब मरें तभी तो होगा तारण

सम्मान से जीना है रूपसी

आंखों की भाषा समझे न, निष्ठुर है यह जग रूपसी

आवरण हटा कर बोल, मन की बात खोल रूपसी

तेरी इस साज-सज्जा से यूं ही भ्रमित हैं सब देख तो

न डर, हो निडर, गरसम्मान से जीना है रूपसी

बस प्यार किया जाता है

मन है कि

आकाश हुआ जाता है

विश्वास हुआ जाता है

तुम्हारे साथ

एक एहसास हुआ जाता है

घनघारे घटाओं में

यूं ही निराकार जिया जाता है

क्षणिक है यह रूप

भाव, पिघलेंगे

हवा बहेगी

सूरत, मिट जायेगी

तो क्या

मन में तो अंकित है इक रूप

बस,

उससे ही जिया जाता है

यूं ही, रहा जाता है

बस प्यार, किया जाता है

बस नेह की धरा चाहिए

यहां पत्थरों में फूल खिल रहे हैं
और वहां
देखो तो
इंसान पत्थर दिल हुए जा रहे हैं।
बस !!
एक बुरी-सी बात कह कर
ले ली न वाह –वाह !!!
अभी तो
पूरी भी नहीं हुई
मेरी बात
और  आपने
पता नहीं क्या-क्या सोच लिया।
कहां हैं इंसान पत्थर दिल
नहीं हैं इंसान पत्थर दिल
दिलों में भी फूल खिलते हैं
फूल क्या पूरे बाग-बगीचे
महकते हैं
बस नेह की धरा चाहिए
अपनेपन की पौध डालिये
विश्चवास के नीर से सींचिए
थोड़ी देख-भाल कीजिए
प्यार-मनुहार से संवारिये

फिर देखिये
पत्थर भी पिघलेंगे
पत्थरों में भी फूल खिलेंगे।
पर इंसान नहीं हैं
पत्थर दिल !!!!
 

कहां गई वह गिद्ध-दृष्टि

बने बनाये मुहावरों के फेर में पड़कर हम यूं ही गिद्धों को नोचने में लगे हैं

पर्यावरणिकों से पूछिये ज़रा, गिद्धों की कमी से हम भी तो मरने लगे हैं

कहां गई हमारी वह गिद्ध-दृष्टि जो अच्छे और बुरे को पहचानती थी

स्वच्छता-अभियान के इस महानायक को हम यूं ही कोसने में लगे हैं

मेरा आधुनिक विकासशील भारत

यह मेरा आधुनिक विकासशील भारत है

जो सड़क पर रोटियां बना रहा है।

यह मेरे देश की

पचास प्रतिशत आबादी है

जो सड़क पर अपनी संतान को

जन्म देती है

उनका लालन-पालन करती है

और इस प्राचीन

सभ्य, सुसंस्कृत देश के लिए

नागरिक तैयार करती है।

यह मेरे देश की वह भावी पीढ़ी है

जिसके लिए

डिजिटल इंडिया की

संकल्पना की जा रही है।

यह मेरे देश के वे नागरिक हैं

जिनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास

के विज्ञापनों पर

अरबों-खरबों रूपये लगाये जा रहे हैं,

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

अभियान चला रहे हैं।

इन सब की सुरक्षा

और विकास के लिए

धरा से गगन तक के

मार्ग बनाये जा रहे हैं।

क्या यह भारत

चांद और उपग्रहों से नहीं दिखाई देता ?

जीवन में सुख दुख शाश्वत है

सूर्य का गमन भी तो एक नया संदेश देता है

चांदनी छिटकती है, शीतलता का एहसास देता है

जीवन में सुख-दुख की अदला-बदली शाश्वत है

चंदा-सूरज के अविराम क्रम से हमें यह सीख देता है

 

एक मधुर संदेश

प्रतिदिन प्रात में सूर्य का आगमन एक मधुर संदेश देता है

तोड़े न कभी क्रम अपना, मार्ग सुगम नहीं दिखाई देता है

कभी बदली, आंधी, कभी ग्रहण भी नहीं रोक पाते राहों को

मंज़िल कभी दूर नहीं होती, बस लगे रहो, यही संदेश देता है

गांधी जी ने ऐसा तो नहीं कहा था

गांधी जी को तो

गोली मार दी गई।

वे चले गये।

किन्तु उनके तीन बन्दर

यहीं रह गये

आंख, कान, मुंह बन्द किये।

आज उनकी संतति

पीढ़ी दर पीढ़ी

यूं ही आंख, कान, मुंह

बन्द किये बैठी है,

तीन हिस्सों में बंटी

गांधी जी ने

ऐसा तो नहीं कहा था।

किन्तु, यही है सत्य।

जो सुनते-देखते हैं वे बोलते नहीं,

जो बोलते-देखते हैं, वे सुनते नहीं

जो बोलते-सुनते हैं, वे देखते नहीं।

फिर कहते हैं

इस देश में कुछ बदल क्यों नहीं रहा !!!!!

कौन जाने सच

सुना है

बड़ी मछली 

छोटी मछली को

खा जाती है।

शायद, या नहीं,

या पता नहीं।

यह मुहावरा है,

अथवा वास्तविकता,

कौन जाने।

क्योंकि, जब भी बात उठती है

तो, हम

मनुष्यों के सन्दर्भ में ही उठती है।

मछलियों को तो

यूं ही बदनाम कर बैठे हैं हम।

और भी ग़म हैं मुहब्बत के सिवा

समझ नहीं पाते हैं

कि धरा पर

ये कैसे प्राणी रहते हैं

ज़रा-सा पास-पास बैठे देखा नहीं

कि इश्क, मुहब्ब्त, प्यार के

चर्चे होने लगते हैं।

तोता-मैना

की कहानियां बनाने लगते हैं।

अरे !

क्या तुम्हारे पास नहीं हैं

जिन्दगी के और भी मसले

जिन्हें सुलझाने के लिए

कंधे से कंधा मिलाकर चलना पड़ता है,

सोचना-समझना पड़ता है।

देखो तो,

मौसम बदल रहा है

निकाल रहे हो न तुम

गर्म कपड़े, रजाईयां-कम्बल,

हमें भी तो नया घोंसला बनाना है,

तिनका-तिनका जमाना है,

सर्दी भर के लिए भोजन जुटाना है।

बच्चों को उड़ना सिखाना है,

शिकारियों से बचना बताना है।

अब

हमारी जिन्दगी के सारे फ़लसफ़े तो

तुम्हारी समझ में आने से रहे।

गालिब ने कहा था

ज़माने में

और भी ग़म हैं मुहब्बत के सिवा

और

इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

बस इतना ही समझाना है !!!!

कुहुक-कुहुक करती

चीं चीं चीं चीं करती दिन भर, चुपकर दाना पानी लाई हूं, ले खा

निकलेंगे तेरे भी पंख सुनहरे लम्बी कलगी, चल अब खोखर में जा

उड़ना सिखलाउंगी, झूमेंगे फिर डाली-डाली, नीड़ नया बनायेंगे

कुहुक-कुहुक करती, फुदक-फुदक घूमेगी, अब मेरी जान न खा

औकात दिखा दी

ऐसा थोड़े ही होता है कि एक दिन में ही तुमने मेरी औकात गिरा दी

जो कल था आज भी वही, वहीं हूं मैं, बस तुमने अपनी समझ हटा दी

आज गया हूं बस कुछ रूप बदलने, कल लौटूंगा फिर आओगे गले लगाने

एक दिन क्या रोका मुझको,देखा मैंने कैसे तुम्हें,तुम्हारी औकात दिखा द

एकान्त की ध्वनियां

एकान्त काटता है,

एकान्त कचोटता है

किन्तु अपने भीतर के

एकान्त की ध्वनि

बहुत मुखर होती है।

बहुत कुछ बोलती है।

जब सन्नाटा टूटता है

तब कई भेद खोलती है।

भीतर ही भीतर

अपने आप को तलाशती है।

किन्तु हम

अपने आपसे ही डरे हुए

दीवार पार की आवाज़ें तो सुनते हैं

किन्तु अपने भीतर की आवाज़ों को

नकारते हैं

इसीलिए जीवन भर हारते है।

सिक्के सारे खन-खन गिरते

कहते हैं जी,

हाथ की है मैल रूपया,

थोड़ी मुझको देना भई।

मुट्ठी से रिसता है धन,

गुल्लक मेरी टूट गई।

सिक्के सारे खन-खन गिरते

किसने लूटे पता नहीं।

नोट निकालो नोट निकालो

सुनते-सुनते

नींद हमारी टूट गई।

छल है, मोह-माया है,

चाह नहीं है

कहने की ही बातें हैं।

मेरा पैसा मुझसे छीनें,

ये कैसी सरकार है भैया।

टैक्सों के नये नाम

समझ न आयें

कोई हमको समझाए भैया

किसकी जेबें भर गईं,

किसकी कट गईं,

कोई कैसे जाने भैया।

हाल देख-देखकर सबका

अपनी हो गई ता-ता थैया।

नोटों की गद्दी पर बैठे,

उठने की है चाह नहीं,

मोह-माया सब छूट गई,

बस वैरागी होने को

मन करता है भैया।

आगे-आगे हम हैं

पीछे-पीछे है सरकार,

बचने का है कौन उपाय

कोई हमको सुझाओ  दैया।

बड़े-बड़े कर रहे आजकल

बड़े-बड़े कर रहे आजकल बात बहुत साफ़-सफ़ाई की

शौचालय का विज्ञापन करके, करते खूब कमाई जी

इनकी भाषा, इनके शब्दों से हमें  घिन आती है

बात करें महिलाओं की और करते आंख सिकाई जी

 

सुख-दुख तो आने-जाने हैं

धरा पर मधुर-मधुर जीवन की महक का अनुभव करती हूं

पुष्प कहीं भी हों, अपने जीवन को उनसे सुरभित करती हूं

सुख-दुख तो आने-जाने  हैं, फिर आशा-निराशा क्यों

कुछ बिगड़ा है तो बनेगा भी, इस भाव को अनुभव करती हूं

 

इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे

नीली चादर तान कर अम्बर देर तक सोया पाया गया

चंदा-तारे निर्भीक घूमते रहे,प्रकाश-तम कहीं आया-गया

प्रात हुई, भागे चंदा-तारे,रवि ने आहट की,तब उठ बैठा,

इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे, देखो तो, फिर मुस्काता पाया गया

इसे कहते हैं एक झाड़ू

कभी थामा है झाड़ू हाथ में

कभी की है सफ़ाई अंदर-बाहर की

या बस एक फ़ोटो खिंचवाई

और चल दिये।

साफ़ सड़कों की सफ़ाई

साफ़ नालियों की धुलाई

इन झकाझक सफ़ेद कपड़ों पर

एक धब्बा न लगा।

कभी हलक में हाथ डालकर

कचरा निकालना पड़े

तो जान जाती है।

कभी दांत में अटके तिनके को

तिनके से निकालना पड़े तो

जान हलक में अटक जाती है।

हां, मुद्दे की बात करें,

कल को होगी नीलामी

इस झाड़ू की,

बिकेगा लाखों-करोड़ों में

जिसे कोई काले धन का

कचरा जमा करने वाला

सम्माननीय नागरिक

ससम्मान खरीदेगा

या किसी संग्रहालय में रखा जायेगा।

देखेगी इसे अगली पीढ़ी

टिकट देकर, देखो-देखो

इसे कहते हैं एक झाड़ू

पिछली सदी में

साफ़ सड़कों पर कचरा फैलाकर

साफ़ नालियों में साफ़ पानी बहाकर

एक स्वच्छता अभियान का

आरम्भ किया गया था।

लाखों नहीं

शायद करोड़ों-करोड़ों रूपयों का

अपव्यय किया गया था

और सफ़ाई अभियान के

वास्तविक परिचालक

पीछे कहीं असली कचरे में पड़े थे

जिन्होंने अवसर पाते ही

बड़ों-बड़ों की कर दी थी सफ़ाई

किन्तु जिन्हें अक्ल न आनी थी

न आई !!!!!

हमको छुट्टा दे सरकार
रंजोगम में डूब गये हैं, गोलगप्पे हो गये बीस के चार

कितने खायें, कैसे खायें, नोट मिला है दो हज़ार

कहता है भैया हमसे, सारे खाओ या फिर जाओ

हम ढाई आने के ग्राहक हैं, हमको छुट्टा दे सरकार