तुम्हारा अंहकार हावी रहा मेरे वादों पर

जीवन में सारे काम

सदा

जल्दबाज़ी से नहीं होते।

कभी-कभी

प्रतीक्षा के दो पल

बड़े लाभकारी होते हैं।

बिगड़ी को बना देते हैं

ठहरी हुई

ज़िन्दगियों को संवार देते हैं।

समझाया था तुम्हें

पर तुम्हारा

अंहकार हावी रहा

मेरे वादों पर।

मैंने कब इंकार किया था

कि नहीं दूंगी साथ तुम्हारा

जीवन की राहों में।

हाथ थामना ही ज़रूरी नहीं होता

एक विश्वास की झलक भी

अक्सर राहें उन्मुक्त कर जाती है।

किन्तु

तुम्हारा अंहकार हावी रहा,

मेरे वादों पर।

अब न सुनाओ मुझे

कि मैं अकेले ही चलता रहा।

ये चयन तुम्हारा था।