आँख मूंद सपनों में जीने लगती हूँ

खिड़की से सूनी राहों को तकती हूँ

उन राहों पर मन ही मन चलती हूँ

भटकन है, ठहराव है, झंझावात हैं

आँख मूंद सपनों में जीने लगती हूँ।

वे पिता ही थे

वे पिता ही थे

जिन्‍होंने थामा था हाथ मेरा।

राह दिखाई थी मुझे

अंधेरे से रोशनी तक

बिखेरी थी रंगीनियां मेरे जीवन में।

और समझाया था मुझे

एक दिन छूट जायेगा मेरा हाथ

और आगे की राह

मुझे स्‍वयं ही चुननी होगी।

मुझे स्‍वयं जूझना होगा

रोशनी और अंधेरों से।

और कहा था

प्रतीक्षा करूंगा तुम्‍हारी

तुम लौटकर आओगी

और थामोगी मेरा हाथ

मेरी लाठी छीनकर।

तब

फिर घूमेंगे हम

साथ-साथ

यूं ही हाथ पकड़कर।

बस नेह की धरा चाहिए

यहां पत्थरों में फूल खिल रहे हैं
और वहां
देखो तो
इंसान पत्थर दिल हुए जा रहे हैं।
बस !!
एक बुरी-सी बात कह कर
ले ली न वाह –वाह !!!
अभी तो
पूरी भी नहीं हुई
मेरी बात
और  आपने
पता नहीं क्या-क्या सोच लिया।
कहां हैं इंसान पत्थर दिल
नहीं हैं इंसान पत्थर दिल
दिलों में भी फूल खिलते हैं
फूल क्या पूरे बाग-बगीचे
महकते हैं
बस नेह की धरा चाहिए
अपनेपन की पौध डालिये
विश्चवास के नीर से सींचिए
थोड़ी देख-भाल कीजिए
प्यार-मनुहार से संवारिये

फिर देखिये
पत्थर भी पिघलेंगे
पत्थरों में भी फूल खिलेंगे।
पर इंसान नहीं हैं
पत्थर दिल !!!!
 

जीना है तो बुझी राख में भी आग दबाकर रखनी पड़ती है

मन के गह्वर में एक ज्वाला जलाकर रखनी पड़ती है

आंसुओं को सोखकर विचारधारा बनाकर रखनी पड़ती है

ज़्यादा सहनशीलता, कहते हैं निर्बलता का प्रतीक होती है

जीना है तो, बुझी राख में भी आग दबाकर रखनी पड़ती है

नदिया की धार-सी टेढ़ी-मेढ़ी बहती है ज़िन्दगी

जीवन का आनन्द है कुछ लाड़ में, कुछ तकरार में

अपनों से कभी न कोई गिला, न जीत में न हार में

नदिया की धार-सी टेढ़ी-मेढ़ी बहती है ज़िन्दगी

रूठेंगे अगर कभी तो मना ही लेंगे हम प्यार से

नई शुरूआत

जो मैं हूं

वैसा सब मुझे जान नहीं पाते

और जैसा सब मुझे जान पाते हैं

वह मैं बन नहीं पाती।

बार बार का यह टकराव

हर बार हताश कर जाता है मुझे

फिर साथ ही उकसा जाता है

एक नई शुरूआत के लिए।।।।।।।।।।।

मन न जाने कहां-कहां-तिरता है

इस एकान्त में

एक अपनापन  है,

फूलों-पत्तियों में

मेरे मन का चिन्तन है।

कुछ हरे-भरे,

कुछ गिरे-पड़े,

कुछ डाली से टूटे,

और कुछ मानों कलियों-से

अधजीवन में ही

अपनेपन से छूटे।

लकड़ी की नैया पर बैठे-बैठे

मन न जाने कहां-कहां-तिरता है।

इस निश्चल, निश्छल जल में

अपनी प्रतिच्छाया ढूंढता है।

कुछ उलटता है, कुछ पलटता है

डूबता-उतरता है,

फिर लौटता है

सहज-सहज

एक मधुर मुस्कान के साथ।

गलत और सही

कहते हैं

अन्त सही तो सब सही।

किन्तु मेरे गले ऐसे

बोध-भाव नहीं उतरते।

शायद जीवन की कड़वाहटें हैं

या कुछ और।

किन्तु यदि

प्रारम्भ सही न हो तो

अन्त कैसे हो सकता है सही।

 

कहां है तबाही कौन सी आपदा

कहां है आपदा,

कहां हुई तबाही,

कोई विपदा नहीं कहीं।

 

कुछ मर गये,

कुछ भूखे रह गये।

किसी को चिकित्सा नहीं  मिल पाई।

आग लगी या

भवन ढहा,

कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा।

करोड़ों-अरबों में

अब किस-किस को देखेंगे?

घर-घर जाकर

किस-किसको पूछेंगे।

आसमान से तो

कह नहीं कर सकते,

बरसना मत।

सूरज को तो रोक नहीं सकते,

ज़्यादा चमकना मत।

सड़कों पर सागर है,

सागर में उफ़ान,

घरों में तैरती मछलियां देखीं आज,

और नदियों में बहते घर

तो कहां है विपदा,

कहां है तबाही,

कौन सी आपदा।

बड़े-बड़े शहरों में

छोटी-छोटी बातें

तो होती रहती हैं सैटोरीना।

ज़्यादा मत सोचा कर।

 

 

शायद प्यार से मन मिला नहीं था

यूं तो उनसे कोई गिला नहीं था

यादों का कोई सिला नहीं था

कभी-कभी मिल लेते थे यूं ही

शायद प्यार से मन मिला नहीं था

 

अब हर पत्थर के भीतर एक आग है।

मैंने तो सिर्फ कहा था "शब्द"

पता नहीं कब

वह शब्द नहीं रहे

चेतावनी हो गये।

मैंने तो सिर्फ कहा था "पत्थर"

तुम पता नहीं क्यों तुम

उसे अहिल्या समझ बैठे।

मैंने तो सिर्फ कहा था "नाम"

और तुम

अपने आप ही राम बन बैठे।

और मैंने तो सिर्फ कहा था

"अन्त"

पता नहीं कैसे

तुम उसे मौत समझ बैठे।

और यहीं से

ज़िन्दगी की नई शुरूआत हुई।

मौत, जो हुई नहीं

समझ ली गई।

पत्थर, जो अहिल्या नहीं

छू लिया गया।

और तुम राम नहीं।

और पत्थर भी अहिल्या नहीं।

जो शताब्दियों से

सड़क के किनारे पड़ा हो

किसी राम की प्रतीक्षा में

कि वह आयेगा

और उसे अपने चरणों से  छूकर

प्राणदान दे जायेगा।

किन्तु पत्थर

जो अहिल्या नहीं

छू लिया गया

और तुम राम नहीं।

जब तक तुम्हें

सही स्थिति का पता लगता

मौत ज़िन्दगी हो गई

और पत्थर आग।

वैसे भी

अब तब मौमस बहुत बदल चुका है।

जब तक तुम्हें

सही स्थिति का पता लगता

मौत ज़िन्दगी हो गई

और पत्थर आग।

एक पत्थर से

दूसरे पत्थर तक

होती हुई यह आग।

अब हर पत्थर के भीतर एक आग है।

जिसे तुम देख नहीं सकते।

आज दबी है

कल चिंगारी हो जायेगी।

अहिल्या तो पता नहीं

कब की मर चुकी है

और तुम

अब भी ठहरे हो

संसार से वन्दित होने के लिए।

सुनो ! चेतावनी देती हूं !

सड़क के किनारे पड़े

किसी पत्थर को, यूं ही

छूने की कोशिश मत करना।

पता नहीं

कब सब आग हो जाये

तुम समझ भी न सको

सब आग हो जाये,एकाएक।।।।

न घटना न दुर्घटना

लगभग 15-16 वर्ष औटो में खूब धक्के खाये हैं। 1992 में किराया मात्र दो-तीन  रूपये होता था और आज इतने वर्षों बाद दस रूपये। मात्र तीन गुणा, ज‍बकि सरकारी बसों के किराया जो उस समय दस रूपये था आज एक सौ रूपये है फिर भी हम कहते हैं औटो वाले हमें लूटते हैं। आज  भी अधिकांश सवारियां मोल-भाव करती हैं। तरह-तरह के अनुभव रहे। सबसे सुविधाजनक यह रहता है कि औटो से कहीं भी उतर जाओ और कहीं भी हाथ हिलाकर रोक लो। कोई नियम नहीं, कोई रोक नहीं। अपनी सुविधानुसार हम औटो वाले से जहां-तहां रूकवा लेंगे, भरे औटो में भी जगह बनाकर सरक-सरक कर बैठ जायेंगे और फिर औटो वाले को भला-बुरा कहेंगे कि लालच करते हैं नियमों का पालन नहीं करते।

औटो वालों से अधिक मुझे औटो में यात्रा करने वाली सवारियों से शिकायत रहती थी। जहां उतरना है, वहां उतरकर पर्स निकालेंगे उसमें से दूसरा पर्स निकालेंगे, दो जेबों में हाथ डालकर पैसे ढूंढेगे और फिर पांच या दस रूपये देने के लिए सौ-पचास का नोट पकड़ा देंगे, फिर बहस करेंगे कि तुम पैसे खुले क्यों नहीं रखते, सवारियों को लूटना चाहते हो।

मुझे प्रतिदिन औटो लेना होता था, मैं घर से हाथ में खुले पैसे लेकर चलती थी और औटो के स्टाप पर रूकने से पहले ही पैसे दे देती थी। चाहे बस में यात्रा करूं या औटो में यह मेरा नियम था। इतने वर्षों तक औटो में एक ही राह पर जाने से कितने औटो वालों से तो मानों एक आत्मीय व्यवहार हो गया जोकि एक ही रूट पर चलते रहे मेरी तरह। हाल-चाल पूछना, परिवार की जानकारी, सुख-दुख की बातें, 15&20 मिनट की यात्रा में कई बातें हो जाती थीं।

बस एक ही बार कटु अनुभव हुआ। स्कूल में कोई कार्यक्रम होने के कारण अंधेरा घिरने के बाद मैंने चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड से लगभग सात बजे एक औटो लिया जिसमें दो सवारियां पहले से बैठी थीं। मेरे हाथ में बड़ा-सा पर्स था। औटो वाला लड़का-सा था।  जैसे ही मैंने औटो के पायदान पर एक पैर रखा, औटो वाले ने औटो चला दिया और मुख्य सड़क से हटकर सुनसान अंधेरे रास्ते, जो श्मशान घाट से होकर जाता था वहां डाल दिया। मैं आधी लटकी रह गई। लगभग चिल्लाने लगी, भैया औटो रोको, औटो रोको, वह फिर भी भगाता रहा। पहले बैठी सवारियां भी कुछ नहीं बोल रही थीं, पल-भर में ही दिमाग घूम गया कि लूट का मामला तो नहीं। मैंने ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया और चालक की कालर खींचनी शुरू कर दी, कान-नाक जो हाथ आया, मारना शुरू कर दिया। और लगभग छलांग लगा दी। औटो रूका और मैंने लड़के को दो-चार थप्पड़ लगा दिये, रोने-सk लगा वह कि पीछे पुलिस वाले थे और उसने गलत जगह रोका था, उनके डर से भगा रहा था। मौका पाते ही औटो वाला भाग गया और मैं पीछे मुड़कर पुलिस वालों से बहस पड़ी कि वे गप्पें मार रहे थे और मेरी चीखें नहीं सुनीं। उन्होंने एक और औटो मेरे लिए कर दिया, मानों मुझसे पीछा छुड़ाया। 

घर आकर अपने पति को किस्सा सुनाया, आदतन चुपचाप सुना और बस। किन्तु अगले दिन भी स्कूल से निकलने का वही समय था।

स्कूल से बाहर निकली तो पतिदेव स्कूटर लेकर खड़े थे मुझे लेने के लिए। मैं चकित आज यह कैसी अनहोनी।
बोले,  मैंने सोचा कल की तरह किसी को मारपीट न आये, या थाने ही न चली जाये पुलिस वालों से लड़ने के लिए ,  मैं ही लेने आ जाता हूं। वाह ! आज तो अनहोनी हो गई। पहले  जब मैं कहती थी मुझे लेने आ जाना, तो कहते थे आ जाना औटो लेकर, पैट्रोल  भी तो उतने ही रूपये का लगेगा।

 

मौत कब आयेगी

कहते हैं

मौत कब आयेगी

कोई नहीं जानता

किन्तु

रावण जानता था

कि उसकी मौत कब आयेगी

और कौन होगा उसका हंता।

 

प्रश्न यह नहीं

कि उद्देश्य क्या रहा होगा,

चिन्तन यह कि

जब संधान होगा

तब कुछ तो घटेगा ही।

और यूंही तो

नहीं साधा होगा निशाना

कुछ तो मन में रहा होगा ही।

जब तीर छूटेगा

तो निशाने पर लगे

या न लगे

कहीं तो लगेगा ही

फिर वह

मछली की आंख हो अथवा

पिता-पुत्र की देह।

 

प्रेम-प्यार के मधुर गीत

मौसम बदला, फूल खिले, भंवरे गुनगुनाते हैं।

सूरज ने धूप बिखेरी, पंछी मधुर राग सुनाते हैं।

जी चाहता है भूल जायें दुनियादारी के किस्से,

चलो मिलकर प्रेम-प्यार के मधुर गीत गाते हैं।

बहुत आनन्द आता है मुझे

बहुत आनन्द आता है मुझे

जब लोग कहते हैं

सब ऊपर वाले की मर्ज़ी।

बहुत आनन्द आता है मुझे

जब लोग कहते हैं

कर्म कर, फल की चिन्ता मत कर।

बहुत आनन्द आता है मुझे

जब लोग कहते हैं

यह तो मेरे परिश्रम का फल है।

बहुत आनन्द आता है मुझे

जब लोग कर्मों का हिसाब करते हैं

और कहते हैं कि मुझे

कर्मानुसार मान नहीं मिला।

कहते हैं यह सृष्टि ईश्वर ने बनाई।

कर्मों का लेखा-जोखा

अच्छा-बुरा सब लिखकर भेजा है।

.

आपको नहीं लगता

हम अपनी ही बात में बात

बात में बात कर-करके

और अपनी ही बात

काट-काटकर

अकारण ही

परेशान होते रहते हैं।

-

लेकिन मुझे

बहुत आनन्द आता है।

 

 

जीवन की कहानियां बुलबुलों-सी नहीं होतीं

 कहते हैं

जीवन पानी का बुलबुला है।

किन्तु कभी लगा नहीं मुझे,

कि जीवन

कोई छोटी कहानी है,

बुलबुले-सी।

सागर की गहराई से भी

उठते हैं बुलबुले।

और खौलते पानी में भी

बनते हैं बुलबुले।

जीवन में गहराई

और जलन का अनुभव

अद्भुत है,

या तो डूबते हैं,

या जल-भुनकर रह जाते हैं।

जीवन की कहानियां

बुलबुलों-सी नहीं होतीं

बड़े गहरे होते हैं उनके निशान।

वैसे ही जैसे

किसी के पद-चिन्हों पर,

सारी दुनिया

चलना चाहती है।

और किसी के पद-चिन्ह

पानी के बुलबुले से

हवाओं में उड़ जाते हैं,

अनदेखे, अनजाने,

अनपहचाने।

 

ओ बादल अब तो बरस ले

तेरे बिना

जीवन की आस नहीं,

तेरे बिना जीव का भास नहीं,

न जाने क्यों

अक्सर रूठ जाया करते हैं।

बुलाने पर भी

नहीं सूरत दिखाया करते हैं।

जानते हो,

मौसम बड़ा बेरहम है,

बस झलक दिखाकर

अक्सर मुंह मोड़कर

चले जाया करते हैं।

न चिन्ता न जताया करते हैं।

 

ओ बादल!

अब तो बरस ले,

हर बार,

ग्रीष्म में यूं ही सताया करते हैं।

छोटी छोटी खुशियों से खुश रहती है ज़िन्दगी

 

बस हम समझ ही नहीं पाते

कितनी ही छोटी छोटी खुशियां

हर समय

हमारे आस पास

मंडराती रहती हैं

हमारा द्वार खटखटाती हैं

हंसाती हैं रूलाती हैं

जीवन में रस बस जाती हैं

पर हम उन्हें बांध नहीं पाते।

आैर इधर

एक आदत सी हो गई है

एक नाराज़गी पसरी रहती है

हमारे चारों ओर

छोटी छोटी बातों पर खिन्न होता है मन

रूठते हैं, बिसूरते हैं, बहकते हैं।

उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से उजली क्यों

उसकी रिंग टोन मेरी रिंग टोन से नई क्यों।

गर्मी में गर्मी क्यों और   शीत ऋतु में ठंडक क्यों

पानी क्यों बरसा

मिट्टी क्यों महकी, रेत क्यों सूखी

बिल्ली क्यों भागी, कौआ क्यों बोला

ये मंहगाई

गोभी क्यों मंहगी, आलू क्यों सस्ता

खुशियों को पहचानते नहीं

नाराज़गी के कारण ढूंढते हैं।

चिड़चिड़ाते हैं, बड़बड़ाते हैं

अन्त में मुंह ढककर सो जाते हैं ।

और अगली सुबह

फिर वही राग अलापते हैं।

एक शुरूआत की ज़रूरत है

सुना और पढ़ा है मैंने

कि कोई

पाप का घड़ा हुआ करता था

और सब

हाथ पर हाथ धरे

प्रतीक्षा में बैठे रहते थे

कि एक दिन तो भरेगा

और फूटेगा] तब देखेंगे।

 

मैं समझ नहीं पाई

आज तक

कि हम प्रतीक्षा क्यों करते हैं

कि पहले तो घड़ा भरे

फिर फूटे, फिर देखेंगे,

बतायेगा कोई मुझे

कि क्या देखेंगे ?

 

और यह भी 

कि अगर घड़ा भरकर

फूटता है

तो उसका क्या किया जाता था।

 

और अगर घड़ा भरता ही जाता था

भरता ही जाता था

और फूटता नहीं था

तब क्या करते थे ?

पलायन का यह स्वर

मुझे भाता नहीं

इंतज़ार करना मुझे आता नहीं

आह्वान करती हूं,

घरों से बाहर निकलिए

घड़ों की शवयात्रा निकालिए।

श्मशान घाट में जाकर

सारे घड़े फोड़ डालिए।

बस पाप को नापना नहीं।

छोटा-बड़ा जांचना नहीं।

बस एक शुरूआत की ज़रूरत है।

बस एक से शुरूआत की ज़रूरत है।।।

  

क्या यह दृष्टि-भ्रम है

क्या यह दृष्टि-भ्रम है ?

मुझे नहीं दिखती

गहन जलप्लावन में

सिर पर टोकरी रखे

बच्चे के साथ गहरे पानी में

कोई माँ, डूबती-सी।

-

नहीं अनुभव होता मुझे

किसी किशन कन्हैया

नंद बाबा

यशोदा मैया या देवकी का।

-

शायद बहुत भावशून्य हूँ मैं,

आप कह सकते हैं।

-

मुझे दिखती हैं

अव्यवस्थाएँ

महलों में बनती योजनाएँ

दूरबीन से देखते

डूबता-तिरता आम आदमी

बोतलों में बन्द पानी

विमान से बनाते बांध

आकाश से गिरता भोजन।

-

कुछ दिन में आप ही

निकल जायेगा जल

सम्हल जायेगा आम आदमी

अगले वर्ष की प्रतीक्षा में।

-

लेकिन बस इतना ध्यान रहे

विभीषिका नाम, स्थान,

समय और काल नहीं देखती।

झोंपड़िया टूटती हैं

तो महल भी बिखर जाते हैं।

 

बस जूझना पड़ता है

मछलियां गहरे पानी में मिलती हैं

किसी मछुआरे से पूछना।

माणिक-मोती पाने के लिए भी

गहरे सागर में

उतरना पड़ता है,

किसी ज्ञानी से बूझना।

किश्तियां भी

मझधार में ही डूबती हैं

किसी नाविक से पूछना।

तल-अतल की गहराईयों में

छिपा है ज्ञान का अपरिमित भंडार,

किसी वेद-ध्यानी से पूछना।

पाताल लोक से

चंद्र-मणि पाने के लिए

कौन-सी राह जाती है,

किसी अध्यवसायी से पूछना।

.

उपलब्धियों को पाने के लिए

गहरे पानी में 

उतरना ही पड़ता है।

जूझना पड़ता है,

सागर की लहरों से,

सहना पड़ता है

मझधार के वेग को,

और आकाश से पाताल

तक का सफ़र तय करना पड़ता है।

और इन कोशिशों के बीच

जीवन में विष मिलेगा

या अमृत,

यह कोई नहीं जानता।

बस जूझना पड़ता है।

 

नेताजी का आसन

नेताजी ने कुर्सी त्याग दी

और भूमि पर आसन बिछाकर बैठ गये।

हमने पूछा, ऐसा क्यों किया आपने।

वैसे तो हमें पता है,

कि आपकी औकात ज़मीन की ही है,

किन्तु

कुर्सी त्यागना तो बहुत महानता की बात है,

कैसे किया आपने यह साहस।

नेताजी मुस्कुराये, बोले,

क्या तुम्हें भी बताना पड़ेगा,

कि कुर्सी की चार टांगे होती हैं

और इंसान की दो।

कोई भी, कभी भी पकड़कर

कोई-सी भी टांग खींच देता था।

अब हम भूमि पर, आसन जमाकर

पालथी मारकर बैठ गये हैं,

कोई  दिखाये हमारी टांग खींचकर।

समझदारी की बात यह

कि कुर्सी के पीछे

तो लोग भागते-छीनते दिखाई देते हैं,

कभी आपने देखा है किसी को

आसन छीनते।

अब गांधी जी भी तो

भूमि पर आसन जमाकर ही बैठते थे,

कोई चला उनकी राह पर

आज तक मांगा उनका आसन किसी ने क्या।

नहीं न !

अब मैं नेताजी को क्या समझाती,

गांधी जी का आसन तो उनके साथ ही चला गया।

और नेताजी आपका आसन ,

आधुनिक भारतीय राजनीति का आसन है,

आप पालथी मारे यूं ही बैठे रह जायेंगे,

और जनता कब आपके नीचे से

आपका आसन खींचकर चलती बनेगी,

आपको पता भी नहीं चलेगा।

 

न समझना हाथ चलते नहीं हैं

हाथों में मेंहदी लगी,

यह न समझना हाथ चलते नहीं हैं

केवल बेलन ही नहीं

छुरियां और कांटे भी

इन्हीं हाथों से सजते यहीं हैं

नमक-मिर्च लगाना भी आता है

और यदि किसी की दाल न गलती हो,

तो बड़ों-बड़ों की

दाल गलाना भी हमें आता है।

बिना गैस-तीली

आग लगाना भी हमें आता है।

अब आपसे क्या छुपाना

दिल तो बड़ों-बड़ों के जलाये हैं,

और  न जाने

कितने दिलजले तो  आज भी

आगे-पीछे घूम रहे हैं ,

और जलने वाले

आज भी जल रहे हैं।
तड़के की जैसी खुशबू हम रचते हैं,

बड़े-बड़े महारथी

हमारे आगे पानी भरते हैं।

मेंहदी तो इक बहाना है

आज घर का सारा काम

उनसे जो करवाना है।