अंधेरों और रोशनियों का संगम है जीवन

भाव उमड़ते हैं,

मिटते हैं, उड़ते हैं,

चमकते हैं।

पंख फैलाती हैं

आशाएं, कामनाएं।

लेकिन, रोशनियां

धीरे-धीरे पिघलती हैं,

बूंद-बूंद गिरती हैं।

अंधेरे पसरने लगते हैं।

रोशनियां यूं तो

लुभावनी लगती हैं,

लेकिन अंधेरे में

खो जाती हैं

कितनी ही रोशनियां।

मिटती हैं, सिमटती हैं,

जाते-जाते कह जाती हैं,

अंधेरों और रोशनियों का

संगम है जीवन,

यह हम पर है

कि हम किसमें जीते हैं।

 

सरस-सरस लगती है ज़िन्दगी

जल सी भीगी-भीगी है ज़िन्दगी

कहीं सरल, कहीं धीमे-धीमे

आगे बढ़ती है ज़िन्दगी।

तरल-तरल भाव सी

बहकती है ज़िन्दगी

राहों में धार-सी बहती है ज़िन्दगी

चलें हिल-मिल

कितनी सुहावनी लगती है ज़िन्दगी

किसी और से क्या लेना

जब आप हैं हमारे साथ ज़िन्दगी

आज भीग ले अन्तर्मन,

कदम-दर-कदम

मिलाकर चलना सिखाती है ज़िन्दगी

राहें सूनी हैं तो क्या,

तुम साथ हो

तब सरस-सरस लगती है ज़िन्दगी।

आगे बढ़ते रहें

तो आप ही खुलने लगती हैं मंजिलें ज़िन्दगी

    

जब प्रेम कहीं से मिलता है

अनबोले शब्दों की चोटें

भावों को ठूंठ बना जाती हैं।

कब रस-पल्लव झड़ गये

जान नहीं पाते हैं।

जब प्रेम कहीं से मिलता है,

तब मन कोमल कोंपल हो जाता है।

रूखे-रूखे भावों से आहत,

मन तरल-तरल हो जाता है।

बिखरे सम्बन्धों के तार कहीं जुड़ते हैं।

जीवन हरा-भरा हो जाता है।

मुस्काते हैं कुछ नव-पल्ल्व,

कुछ कलियां करवट लेती हैं,

जीवन इक खिली-खिली

बगिया-सा हो जाता है।

    

अर्थ का अनर्थ

शब्द बदल देने से

भाव बदल जाते हैं।

नाम-मात्र से

युद्धों के

परिणाम बदल जाते हैं।

बात कुंजर की थी,

नर कहा गया,

महाभारत का युद्ध पलट गया।

नाम वही है,

पर आधी बात सुनने से

कभी-कभी

अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

गज-गामिनी,

मदमस्त चाल कहने से

कभी-कभी

व्यंग्य-कटाक्ष हो जाता है।

इसलिए

जब भी शब्द चुनो

सोच-समझकर चुनना,

कहने से पहले दो बार सोचना,

क्योंकि

मद-मस्त चलने वाला

जब भड़कता है

तब

शहर किसने देखे,

जंगल के जंगल

उजड़ जाते हैं।

शुक्र मनाईये,

ये शहर की ओर नहीं देखते,

नहीं तो हम-आप

अभयारण्य में होते।

कहां गई तुम्हारी अम्मां

छोटी-सी छतरी तानी मैंने।

दाना-चुग्गा लाउंगा,

तुमको मैं खिलाउंगा।

मां कहती है,

बारिश में भीगो न,

ठंडी लग जायेगी।

मेरी मां तो

मुझको गुस्सा करती,

कहां गई तुम्हारी अम्मां।

ऐसे कैसे बैठे हो,

अपने घर जाओ,

कम्बल मैं दे जाउंगा।

कल जब धूप खिलेगा

तब आना

साथ-साथ खेलेंगे,

मेरे घर चलना,

मां से मैं मिलवाउंगा।

चांद मानों मुस्कुराया

चांद मानों हड़बड़ाया

बादलों की धमक से।

सूरज की रोशनी मिट चुकी थी,

चांद मानों लड़खड़ाया

अंधेरे की धमक से।

लहरों में मची खलबली,

देख तरु लड़खड़ाने लगे।

जल में देख प्रतिबिम्ब,

चांद मानों मुस्कुराया

अपनी ही चमक से।

अंधेरों में भी रोशनी होती है,

चमक होती है, दमक होती है,

यह समझाया हमें चांद ने

अपनेपन से  मनन  से ।

हम नहीं लकीर के फ़कीर

हमें बचपन से ही

घुट्टी में पिलाई जाती हैं

कुछ बातें,

उन पर

सच-झूठ के मायने नहीं होते।

मायने होते हैं

तो बस इतने

कि बड़े-बुजुर्ग कह गये हैं

तो गलत तो हो ही नहीं सकता।

उनका अनुभूत सत्य रहा होगा

तभी तो सदियों से

कुछ मान्यताएं हैं हमारे जीवन में,

जिनका विरोध करना

संस्कृति-संस्कारों का अपमान

परम्पराओं का उपहास,

और बड़े-बुज़ुर्गों का अपमान।

 

आज की  शिक्षित पीढ़ी

नकारती है इन परम्पराओं-आस्थाओं को।

कहती है

हम नहीं लकीर के फ़कीर।

 

किन्तु

नया कम्प्यूटर लेने पर

उस पर पहले तिलक करती है।

नये आफ़िस के बाहर

नींबू-मिर्च लटकाती है,

नया काम शुरु करने से पहले

उन पण्डित जी से मुहूर्त निकलवाती है

जो संस्कृत-पोथी पढ़ना भूले बैठे हैं,

फिर नारियल फोड़ती है

कार के सामने।

पूजा-पाठ अनिवार्य है,

नये घर में हवन तो करना ही होगा

चाहे सामग्री मिले या न मिले।

बिल्ली रास्ता काट जाये

तो राह बदल लेते हैं

और छींक आने पर

लौट जाते हैं

चाहे गाड़ी छूटे या नौकरी।

हाथों में ग्रहों की चार अंगूठियां,

गले में चांदी

और कलाई में काला-लाल धागा

नज़र न लगे किसी की।

लेकिन हम नहीं लकीर के फ़कीर।

ये तो हमारी परम्पराएं, संस्कृति है

और मान रखना है हमें इन सबका।

 

झुकना तो पड़ता ही है

कहां समय  मिलता है

कमर सीधी करने का।

काम कोई भी करें,

घर हो या खलिहान,

झुकना तो पड़ता ही है,

झुककर ही

काम करना पड़ता है।

फिर धीरे-धीरे

आदत हो जाती है,

झुके रहने की।

और फिर एक  समय

ऐसा  आता है

कि सिर उठाकर

चलना ही भूल जाती हैं।

फिर,

कहां कभी सिर  उठाकर

चल पाती हैं।

 

मुस्कानों की भाषा लिखूं

छलक-छलक-छलकती बूंदें,

मन में रस भरती बूंदें

लहर-लहर लहराता आंचल

मन हरषे जब घन बरसे

मुस्कानों की भाषा लिखूं

हवाओं संग उड़ान भरूं मैं

राग बजे और साज बजे

मन ही मन संगीत सजे

धारा संग बहती जाती

अपने में ही उड़ती जाती

कोई न रोके कोई न टोके

जीवन-भर ये हास सजे।

 

हमने न कभी डर-डर कर जीवन जिया है

प्यार क्यों किया है ?

किया है तो किया है।

प्यार किया है

तो इकरार भी किया है।

कभी रूठने

कभी मनाने का

लाड़ भी किया है।

प्यार भरी निगाहों से

छूते रहे हमें,

हमने कब

इंकार किया है।

जाने-अनजाने

हमारे चेहरे पर

खिल आई उनकी

मुस्कुराहटें,

हमने मानने से

कब इंकार किया है।

कहते हैं

लोग जानेंगे तो

चार बातें करेंगे,

हमने न कभी

डर-डर कर

जीवन जिया है।

 

 

 

कुछ यादें

काश !

भूल पाते

कुछ यादें, कुछ बातें

तो आज जि़न्‍दगी

कितनी आसान होती

कुछ भूलें तुमने की

कुछ भूलें हमने  की।

कुछ की गठरी

तुमने अपनी पीठ पर बांध ली

और कुछ की मैंने

और विपरीत दिशा में चल दिये

 

 

कुछ भूलें

 

कुछ भूलें हमसे हुई होंगी

कुछ भूलें उनसे हुईं होंगीं

गिला हम करते नहीं,

पर इंतज़ार करते रहे

कि  करेंगे वे गिला

बड़ी जल्‍दी भूल जाते हैं

वे  अपनी गलतियों को,

पर औरों की भूलों को

कहानी की तरह

याद रखते हैं

 

ज़्यादा मत उड़

कौन सी वास्तविकता है

और कौन सा छल,

अक्सर असमंजस में रह जाती हूं।

रोज़ हर रोज़

समाचारों में गूंजती हैं आवाजे़ं

देखो हमने

नारी को

कहां से कहां पहुंचा दिया।

किसी ने चूल्हा बांटा ,

किसी ने गैस,

किसी की सब्सिडी छीनी        

तो किसी की आस।

नौकरियां बांट रहे।

घर संवार रहे।

मौज करवा रहे।

स्टेटस दिलवा रहे।

कभी चांद पर खड़ी दिखी।

कभी मंच पर अड़ी दिखी।

आधुनिकता की सीढ़ी पर

आगे और आगे बढ़ी।

अपना यह चित्र देख अघाती नहीं।

अंधविश्वासों    ,

कुरीतियों का विरोध कर

मदमाती रही।

प्रंशसा के अंबार लगने लगे।

तुम्हारे नाम के कसीदे

बनने लगे।

साथ ही सब कहने लगे

ऐसी औरतें घर-बार की रहती नहीं

पर तुम अड़ी रही

ज़रा भी डिगी नहीं।

-

ज़्यादा मत उड़ ।

कहीं भी हो आओ

लौटकर यहीं,

यही चूल्हा-चौका करना है।

परम्पराओं के नाम पर

घूंघट की ओट में जीना है।

और ऐसे ही मरना है।।।

 

फिर आ गये वे दस दिन

फिर आ गये वे दस दिन

पूजा-अर्चना ,

व्रतोपवास,

निराहार, निरामिष,

मितभाषी, पूजा-पाठी,

राम-नाम, बस मां का नाम।

कन्या-पूजन,चरण-वन्दना।

 

फिर तिरोहित कर देंगे जल में।

 

और हम मुक्त हो जायेंगे

फिर,

कंस, दुर्योधन, दुःशासन    ,

रावण बनने के लिए।

 

खेल-कूद क्या होती है

बचपन की

यादों के झरोखे खुल गये,

कितने ही खेल खेलने में

मन ही मन जुट गये।

चलो, आपको सब याद दिलाते हैं।

खेल-कूद क्या होती है,

तुम क्या समझोगे फेसबुक बाबू।

वो चार कंचे जीतना,

बड़ा कंचा हथियाना,

स्टापू में दूसरे के काटे लगाना,

कोक-लाछी-पाकी में पीठ पर धौंस जमाना।

वो गुल्ली-डंडे में गुल्ली उड़ाना,

तेरी-मेरी उंच-नीच पर रोटियां पकाना,

लुका-छिपी में आंख खोलना।

आंख पर पट्टी बांधकर पकड़म-पकड़ाई ,

लंगड़ी टांग का आनन्द लेना।

कक्षा की पिछली सीट पर बैठकर

गिट्टियां बजाना, लट्टू घुमाना ।

कापी के आखिरी पन्ने पर

काटा-ज़ीरों बनाना,

पिट्ठू में पत्थर जमाना ।

पुरानी कापियों के पन्नों के

किश्तियां बनाना और हवाई-ज़हाज उड़ाना।

सांप-सीढ़ी के खेल में 99 से एक पर आना,

और कभी सात से 99 पर जाना।

पोशम-पा भई पोशम-पा में चोर पकड़ना।

व्यापार में ढेर-से रूपये जीतना।

विष-अमृत और रस्सी-टप्पा।

है तो और भी बहुत-कुछ।

किन्तु

खेल-कूद क्या होती है

तुम क्या समझोगे फेसबुक बाबू।

 

बहुत बाद समझ आया

कितनी बार ऐसा हुआ है

कि समय मेरी मुट्ठी में था

और मैं उसे दुनिया भर में

तलाश कर रही थी।

मंजिल मेरे सामने थी

और मैं बार-बार

पीछे मुड़-मुड़कर भांप रही थी।

समस्याएं बाहर थीं

और समाधान भीतर,

और मैं

आकाश-पाताल नाप रही थी।

 

बहुत बाद समझ आया,

कभी-कभी,

प्रयास छोड़कर

प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए,

भटकाव छोड़

थोड़ा विश्राम कर लेना चाहिए।

तलाश छोड़

विषय बदल लेना चाहिए।

जीवन की आधी समस्याएं

तो यूं ही सुलझ जायेंगीं।

 

बस मिलते रहिए मुझसे,

ऐसे परामर्श का

मैं कोई शुल्क नहीं लेती।

 

यह दिल की बात है

कभी दिल है

कभी दिलदार होगा

बादलों में

यूं हमारा नाम होगा

कभी होती है झड़ी

कभी चांद का रोब-दाब होगा

देखो , झांकती है रोशनी

कहती है दिलदार से

दीदार होगा

कभी टूटते हैं

कभी जुड़ते हैं दिल

इस बात का भी

कोई तो जवाबदार होगा

ज़रा-सी आह से

पिघल जाते हैं,

ऐसे दिल से दिल लगाकर,

कौन-सा सरोकार होगा

बदलते मौसम के आसार हैं ये

न दिल लगा

नहीं तो बुरा हाल होगा

 

मन गीत गुने

मृदंग बजे

सुर-साज सजे

मन-मीत मिले

मन गीत गुने

निर्जन वन में

वन-फूल खिले

अबोल बोले

मन-भाव बने

इस निर्जन में

इस कथा कहे

अमर प्रेम की

 

हम भी शेर हुआ करते थे

एक प्राचीन कथा है

गीदड़ ने शेर की खाल ओढ़ ली थी

और जंगल का राजा बन बैठा था।

जब साथियों ने हुंआ-हुंआ की

तब वह भी कर बैठा था।

और पकड़ा गया था,

पकड़ा क्या, बेचारा मारा गया था।

ज़माना बदल गया ।

शेर न सोचा

मैं गीदड़ की खाल ओढ़कर देखूं एक बार।

एक की देखा-देखी,

सभी शेरों ने गीदड़ की खाल ओढ़ ली

और हुंआ-हुंआ करने लगे।

धीरे-धीरे वे

अपनी असलियत भूलते चले गये।

आज सारे शेर

दहाड़ना भूलकर

हुंआ-हुंआ करने में लगे हैं।

अपना शिकार करना छोड़कर

औरों  की जूठन खाने में लगे हैं।

गीदड़-भभकियां दे रहे हैं,

और सारे अपने-आप को

राजा समझ बैठे हैं।

शोक किस बात का, आरोप किस बात का।

हमारे भीतर का शेर भी तो

हुंआ-हुंआ करने में ही लगा है।

लेकिन बड़ी बात यह,

कि हमें यही नहीं पता

कि हम भीतर से वास्तव में शेर हैं

जो गीदड़ की खाल ओढ़े बैठे हैं,

या हैं ही गीदड़

और इस भ्रम में जी रहे हैं,

कि एक समय की बात है,

हम भी शेर हुआ करते थे।

 

 

ताल-तलैया पोखर भैया

ताल-तलैया, पोखर भैया,

मैं क्‍या जानू्ं

क्‍या होते सरोवर मैया।

बस नाम सुना है

न देखें हमने भैया।

गड्ढे देखे, नाले देखे,

सड़कों पर बहते परनाले देखे,

छप-छपाछप गाड़ी देखी।

सड़कों पर आबादी देखी।

-

जब-जब झड़ी लगे,

डाली-डाली बहके।

कुहुक-कुहुक बोले चिरैया ।

रंग निखरें मन महके।

मस्‍त समां है,

पर लोगन को लगता डर है भैया।

सड़कों पर होगा

पोखर भैया, ताल-तलैया

हमने बोला मैया,

अब तो हम भी देखेंगे ,

कैसे होते हैं ताल-तलैया,

और सरोवर, पोखर भैया ।

 

 

ककहरा जान लेने से ज़िन्दगियां नहीं बदल जातीं

इस चित्र को देखकर सोचा था,

 

आज मैं भी

कोई अच्छी-सी रचना रचूंगी।

मां-बेटी की बात करूंगी।

लड़कियों की शिक्षा,

प्रगति को लेकर बड़ी-बड़ी

बात करूंगी।

पर क्या करूं अपनी इस सोच का,

अपनी इस नज़र का,

मुझे न तो मां दिखाई दी इस चित्र में,

किसी बेटी के लिए आधुनिकता-शिक्षा के

सपने बुनती हुई ,

और न बेटी एवरेस्ट पर चढ़ती हुई।

मुझे दिखाई दे रही है,

एक तख्ती परे सरकती हुई,

कुछ गुम हुए, धुंधलाते अक्षरों के साथ,

और एक छोटी-सी बालिका।

यहां कहां बेटी पढ़ाने की बात है।

कहां कुछ सिखाने की बात है।

नहीं है कोई सपना।

नहीं है कोई आस।

जीवन की दोहरी चालों में उलझे,

तख्ती, चाक और लिखावट

तो बस दिखावे की बात है।

एक ओर  तो पढ़ ले,पढ़ ले,

का राग गा रहे हैं,

दूसरी ओर

इस छोटी सी बालिका को

सजा-धजाकर बिठा रहे हैं।

कोई मां नहीं बुनती

ऐसे हवाई सपने

अपनी बेटियों के लिए।

जानती है गहरे से,

ककहरा जान लेने से

ज़िन्दगियां नहीं बदल जातीं,

भाव और परम्पराएं नहीं उलट जातीं।

.

आज ही देख रही है ,

उसमें अपना प्रतिरूप।

.

सच कड़वा होता है

किन्तु यही सच है।

 

हमारे नाम की चाबी

मां-पिता

जब ईंटें तोड़ते हैं

तब मैंने पूछा

इनसे क्या बनता है मां ?

 

मां हंसकर बोली

मकान बनते हैं बेटा!

मैंने आकाश की ओर

सिर उठाकर पूछा

ऐसे उंचे बनते हैं मकान?

कब बनते हैं मकान?

कैसे बनते हैं मकान?

कहां बनते हैं मकान?

औरों के ही बनते हैं मकान,

या अपना भी बनता है मकान।

मां फिर हंस दी।

पिता की ओर देखकर बोली,

छोटा है अभी तू

समझ नहीं पायेगा,

तेरे हिस्से का मकान कब बन पायेगा।

शायद कभी कोई

हमारे नाम से चाबी देने आयेगा।

और फिर ईंटें तोड़ने लगी।

मां को उदास देख

मैंने भी हथौड़ी उठा ली,

बड़ी न सही, छोटी ही सही,

तोड़ूंगा कुछ ईंटें

तो मकान तो ज़रूर बनेगा,

इतना उंचा न सही

ज़मीन पर ज़रूर बनेगा मकान!

 

लिखने को तो बहुत कुछ है

पढ़ने की ललक है,

आगे बढ़ने की ललक है।

न जाने कहां तक

राह खुली है ,

और कहां ताला बन्द है।

आजकल

विज्ञापन बहुत हैं,

बनावट बहुत है,

तरह तरह की

सजावट बहुत है।

सरल-सहज

कहां जीवन रह गया,

कसावट बहुत है।

राहें दुर्गम हैं,

डर बहुत है।

 

पढ़ ले, पढ़ ले।

आजकल

पढ़ी-लिखी लड़कियों की

डिमांड बहुत है।

पर साथ-साथ

चूल्हा-चौका-घिसाई भी सीख लेना,

उसके बिना

लड़कियों का जीवन

नरक है।

अंग्रज़ी में गिट-पिट करना सीख ले,

पर मानस भी रट लेना ,

यह भी जीवन का जरूरी पक्ष है।

तुम्हारी सादगी, तुम्हारी यह मुस्कुराहट

आकर्षित करती है,

पर

सजना-संवरना भी सीख ले,

यहां भी होना दक्ष है।

लिखने को तो बहुत कुछ है,

पर कलम रोकती है,

चुप कर ,

यहां बहुत बड़ा विपक्ष है।

 

हम मस्त हैं अपने ही बुने मकड़जाल में

जीवन में जरूरी है

किसी परिधि में सिमटना,

सीमाओं में बंधना।

और ये सीमाएं

हम स्वयं तय करें,

तय करें अपनी दूरियां,

अपनी दीवारें चुनें,

बनायें किले या ढहायें।

तुम कुछ भी सोचते रहो

कि फंस रहें हैं हम

अपने ही जाल में,

लेकिन सदा ऐसा नहीं होता।

जब हम

सबकी उपेक्षा कर

अपना सुरक्षा कवच

स्वयं बुनते हैं,

तो तकलीफ होती है,

कहानियां बुनी जाती हैं,

कथाएं सुनी जाती हैं।

कुछ भी कहो,

हम मस्त हैं

अपने ही बुने मकड़जाल में। 

 

 

जीते जी मूर्तियों पर हार

बाज़ार में बिक रहे हैं

कीर्ति-ध्वज, यश-पताकाएं,

जितनी चाहें

घर में लाकर सजा लें,

कुछ दीवारों पर टांगे,

कुछ गले में लटका लें,

नामपट्ट बन जायेंगे,

मूर्तियों पर हार चढ़ जायेंगे ।

द्वार पर मढ़ जायेंगे ।

पुस्तकों पर नाम छप जायेंगे ।

हार चढ़ जायेंगे ।

बस झुक कर

कुछ चरण-पादुकाओं को

छूना होगा,

कुछ खर्चा-पानी करना होगा,

फिर देखिए

कैसे जीते-जी ही

मूर्तियों पर हार चढ़ जायेंगे ।

 

काश! कह सकूं याद नहीं अब

मैंने कब चलना सीखा
किसने सिखलाया था मुझको,
किसने थामी थी अंगुली
किसने गिरते से उठाया था मुझको,
याद नहीं अब।

कब छूटा था हाथ मेरा,
कब नया हाथ थामा था,
संगी-साथी थे मेरे
या फ़िर चली
अकेली जीवन-पथ पर
किसने समझाया था मुझको,
याद नहीं अब।

कहीं सरल-सुगम राहें थीं
कहीं अनगढ़ दीवारें थीं।
कहीं कंकड़ -पत्थर थे
कहीं पर्वत-सी बाधाएं थीं
क्या चुना था मैंने
याद नहीं अब।

राहों से राहें निकली थीं,
इधर-उधर भटक रही थी
कब लौट-लौटकर
नई शुरूआत कर रही थी,
याद नहीं अब।

क्या पाना चाहा था मैंने,
क्या खोया मैंने ,
बहुत बड़ी गठरी है।
काश!
कह सकूं,
याद नहीं अब।

 

नहीं बोलती नहीं बोलती

नहीं बोलती नहीं बोलती ,

जा जा अब मैं नहीं बोलती,

जब देखो सब मुझको गुस्‍सा करते।

दादी कहती छोरी है री,

कम बोला कर कम बोला कर।

मां कहती है पढ़ ले पढ़ ले।

भाई बोला छोटा हूं तो क्‍या,

तू लड़की है मैं लड़का।

मैं तेरा रक्षक।

क्‍या करना है मुझसे पूछ।

क्‍या कहना है मुझसे पूछ।

न कर बकबक न कर झकझक।

पापा कहते दुनिया बुरी,

सम्‍हलकर रहना ,

सोच-समझकर कहना,

रखना ज़बान छोटी ।

 

दिन भर चिडि़या सी चींचीं करती।

कोयल कू कू कू कू करती।

कौआ कां कां कां कां करता।

टामी भौं भौं भौं भौं  करता।

उनको कोई कुछ नहीं कहता।

मुझको ही सब डांट पिलाते।

मैं पेड़ पर चढ़ जाउंगी।

चिडि़या संग रोटी खाउंगी।

वहीं कहीं सो जाउंगी।

फिर मुझसे मिलने आना,

गीत मधुर सुनाउंगी।

 

 

झूठ के बल पर

सत्य सदैव प्रमाण मांगता है,
और हम इस डर से, 
कि पता नहीं 
सत्य प्रमाणित हो पायेगा 
या नहीं,
झूठ के बल पर
बेझिझक जीते हैं।
तब हमें 
न सत्य की आंच सहनी पड़ती है,
न किसी के सामने
हाथ फैलाने पड़ते हैं।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी
नहीं ढोने पड़ते हैं
आरोपप्रत्‍यारोप,  
न कोई आहुति , न बलिदान,
न अग्नि-परीक्षाएं 

न पाषाण होने का भय।
नि:शंक जीते हैं हम । 

और न अकेलेपन की समस्‍या । 
एक ढूंढो
हज़ारों मिलेंगे साथ चलने के लिए। 

 

बैठे-ठाले यूं ही

अदृश्‍य,

एक छोटा-सा मन।

भाव,

सागर की अथाह जलराशि-से।

न डूबें, न उतरें।

तरल-तरल, बहक-बहक।

विशालकाय वृक्ष से

कभी सम्‍बल देते।

और कभी अनन्‍त शाखाओं से

इधर-उधर भटकन।

जल अतल, थल विस्‍तारित

कभी भंवर, कभी बवंडर

कुछ रंग, कुछ बेरंग  

बस

बैठे-ठाले यूं ही।

 

 

टांके लगा नहीं रही हूं काट रही हूं

अपनी उलझनों को सिलते-सिलते

निहारती हूं अपना जीवन।

मिट्टी लिपा चूल्हा,

इस लोटे, गागर, थाली

गिलास-सा,

किसी पुरातन युग के

संग्रहालय की वस्तुएं हों मानों

हम सब।

और मैं वही पचास वर्ष पुरानी

आेढ़नी लिये,

बैठी रहती हूं

तुम्हारे आदेश की प्रतीक्षा में।

कभी भी आ सकते हो तुम।

चांद से उतरते हुए,

देश-विदेश घूमकर लौटे,

पंचतारा सुविधाएं भोगकर,

अपने सुशिक्षित,

देशी-विदेशी मित्रों के साथ।

मेरे माध्यम से

भारतीय संस्कृति-परम्पराओं का प्रदर्शन करने।

कैसा होता था हमारा देश।

कैसे रहते थे हम लोग,

किसी प्राचीन युग में।

कैसे हमारे देश की नारी

आज भी निभा रही है वही परम्परा,

सिर पर आेढ़नी लिये।

सिलती है अपने भीतर के टांके

जो दिखते नहीं किसी को।

 

लेकिन, ध्यान से देखो ज़रा।

आज टांके लगा नहीं रही हूं,

काट रही हूं।