समय आत्ममंथन का

पता नहीं यह कैसे हो गया ?

मुझे, अपने पैरों के नीचे की ज़मीन की

फ़िसलन का पता ही न लगा

और आकाश की उंचाई का अनुमान।

बस एक कल्पना भर थी

एक आकांक्षा, एक चाहत।

और मैंने छलांग लगा दी ।

आकाश कुछ ज़्यादा ही उंचा निकला

और ज़मीन कुछ ज़्यादा ही चिकनी।

मैं थी बेखबर, आकाश पकड़ न सकी

और पैर ज़मीन पर टिके नहीं।

 

दु:ख गिरने का नहीं

क्षोभ चोट लगने का नहीं।

पीड़ा हारने की नहीं।

ये सब तो सहज परिणाम हैं,

अनुभव की खान हैं

किसी की हिम्मत के।

समय आत्ममंथन का।

कितना कठिन होता है

अपने आप से पूछना।

और कितना सहज होता है

किसी को गिरते देखना

उस पर खिलखिलाना

और ताली बजाना।

 

कितना आसान होता है

चारों ओर भीड़ का मजमा लगाना।

ढोल बजा बजा कर दुनिया को बताना।

जख़्मों को कुरेद कुरेद कर दिखाना।

 

और कितना मुश्किल होता है

किसी के जख़्मों की तह तक जाना

उसकी राह में पड़े पत्थरों को हटाना

और सही मौके पर सही राह बताना।

 

 

 

मन से मन मिले हैं

यूं तो

मेरा मन करता है

नित्य ही

पूजा-आराधना करुँ।

किन्तु

पूजा के भी

बहुत नियम-विधान हैं

इसलिए

डरती हूं पूजा करने से।

ऐसा नहीं

कि मैं

नियमों का पालन करने में

असमर्थ हूँ

किन्तु जहाँ भाव हों

वहाँ विधान कैसा ?

जहाँ नेह हो

वहां दान कैसा ?

जहाँ भरोसा हो

वहाँ प्रदर्शन कैसा ?

जब

मन से मन मिले हैं

तो बुलावा कैसा ?

जब अन्तर्मन से जुड़े हैं

तो दिनों का निर्धारण कैसा ?

 

 

 

अनजान राही

एक अनजान राही से

एक छोटी-सी

मुस्कान का आदान-प्रदान।

ज़रा-सा रुकना,

झिझकना,

और देखते-देखते

चले जाना।

अनायास ही

दूर हो जाती है

जीवन की उदासी

मिलता है असीम आनन्द।

 

प्रकृति का सौन्दर्य निरख

सांसें

जब रुकती हैं,

मन भीगता है,

कहीं दर्द होता है,

अकेलापन सालता है।

तब प्रकृति

अपने अनुपम रूप में

बुलाती है

समझाती है,

खिलते हैं फूल,

तितलियां पंख फैलाती हैं,

चिड़िया चहकती है,

डालियां

झुक-झुक मन मदमाती हैं।

सब कहती हैं

समय बदलता है।

धूप है तो बरसात भी।

आंधी है तो पतझड़ भी।

सूखा है तो ताल भी।

मन मत हो उदास

प्रकृति का सौन्दर्य निरख।

आनन्द में रह।

 

अजीब होती हैं  ये हवाएँ भी

अजीब होती हैं

ये हवाएँ भी।

बहुत रुख बदलती हैं

ये हवाएँ भी।

फूलों से गुज़रती

मदमाती हैं

ये हवाएँ भी।

बादलों संग आती हैं

तो झरती-झरती-सी लगती हैं

ये हवाएँ भी।

मन उदास हो तो

सर्द-सर्द लगती हैं

ये हवाएँ भी।

और जब मन में झड़ी हो

तो भिगो-भिगो जाती हैं

ये हवाएँ भी।

क्रोध में बहुत बिखरती हैं

ये हवाएँ भी।

सागर में उठते बवंडर-सा

भीतर ही भीतर

सब तहस-नहस कर जाती हैं

ये हवाएं भी।

इन हवाओं से बचकर रहना

बहुत आशिकाना होती हैं

ये हवाएँ भी।

 

ख़ुद में कमियाँ निकालते रहना

मेरा अपना मन है।

बताने की बात तो नहीं,

फिर भी मैंने सोचा

आपको बता दूं

कि मेरा अपना मन है।

आपको अच्छा लगे

या बुरा,

आज,

मैंने आपको बताना

ज़रूरी समझा कि

मेरा अपना मन है।

 

यह बताना

इसलिए भी ज़रूरी समझा

कि मैं जैसी भी हूॅं,

अच्छी या बुरी,

अपने लिए हूॅं

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

यह बताना

इसलिए भी

ज़रूरी हो गया था

कि मेरा अपना मन है,

कि मैं अपनी कमियाॅं

जानती हूॅं

नहीं जानना चाहती आपसे

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

जैसी भी हूॅं, जो भी हूॅं

अपने जैसी हूॅं,

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

चाहती हू

किसी की कमियाॅं न देखूॅं

बस अपनी कमियाॅं निकालती रहूॅं

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

ज़िन्दगी के रास्ते

यह निर्विवाद सत्य है

कि ज़िन्दगी

बने-बनाये रास्तों पर नहीं चलती।

कितनी कोशिश करते हैं हम

जीवन में

सीधी राहों पर चलने की।

निश्चित करते हैं कुछ लक्ष्य

निर्धारित करते हैं राहें

पर परख नहीं पाते

जीवन की चालें

और अपनी चाहतें।

ज़िन्दगी

एक बहकी हुई

नदी-सी लगती है,

तटों से टकराती

कभी झूमती, कभी गाती।

राहें बदलती

नवीन राहें बनाती।

किन्तु

बार-बार बदलती हैं राहें

बार-बार बदलती हैं चाहतें

बस,

शायद यही अटूट सत्य है।

 

 

जीवन यूं ही चलता है

पीतल की एक गगरी होती

मुस्कानों की नगरी होती

सुबह शाम की बात यह होती

जल-जीवन की बात यह होती

जीवन यूं ही चलता है

कुछ रूकता है, कुछ बहता है

धूप-छांव सब सहता है।

छोड़ो राहें मेरी

मां देखती राह,

मुझको पानी लेकर

जल्दी घर जाना है

न कर तू चिन्ता मेरी

जीवन यूं ही चलता है

सहज-सहज सब लगता है।

कभी हंसता है, कभी सहता है।

न कर तू चिन्ता मेरी।

सहज-सहज सब लगता है।

 

गुनगुनाता है चांद

शाम से ही

गुनगुना रहा है चांद।

रोज ही की बात है

शाम से ही

गुनगुनाता है चांद।

सितारों की उलझनों में

वृक्षों की आड़ में

नभ की गहराती नीलिमा में

पत्‍तों के झरोखों से,

अटपटी रात में

कभी इधर से,

कभी उधर से

झांकता है चांद।

छुप-छुपकर देखता है

सुनता है,

समझता है सब चांद।

कुछ वादे, कुछ इरादे

जीवन भर

साथ निभाने की बातें

प्रेम, प्‍यार के किस्‍से,

कुछ सच्‍चे, कुछ झूठे

कुछ मरने-जीने की बातें

सब जानता है

इसीलिए तो

रोज ही की बात है

शाम से ही

गुनगुनाता है चांद

 

 

 

नव वर्ष की प्रतीक्षा में

नव वर्ष की प्रतीक्षा में

कामना लिए कुछ नयेपन की

एक बदलाव, एक नये एहसास की,

हम एक पूरा साल

कैलेण्डर की और ताकते रहते हैं।

कैलेण्डर पर तारीखें बदलती हैं।

दिन, महीने बदलते हैं।

और हम पृष्‍ठ  पलटते रहते हैं

उलझे रहते हैं बेमतलब ही कुछ तारीखों-दिनों में।

चिह्नित करते हैं रंगों से

कुछ अच्छे दिनों की आस को।

और उस आस को लिए–लिए

बीत जाता है पूरा साल।

वे अच्छे दिन

टहलते हैं हमारे आस-पास,

जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर जाते हैं

बेमतलब उलझे

काल्पनिक आशंकाओं और चिन्ताओं में।

फिर चौंक कर कहते हैं

अरे ! एक साल और यूं ही बीत गया।

शायद बुरा-सा लगता है कहीं

कि लो, एक साल और बीत गया यूं ही

बस जताते नहीं हैं।

फिर पिछले पूरे साल को

मुट्ठी में समेटकर आगे बढ़ते हैं

फिर से एक नयेपन की

आशाओं-आकांक्षाओं के साथ।


बस एक पल का ही तो अन्तर है

इस नये और पुराने के बीच।

उस एक पल के अन्तर को भूलकर

एक पल के लिए

निरन्तरता में देखें

तो कुछ भी तो नहीं बदलता।

पता नहीं

गत वर्ष के समापन की खुशियां मनाते हैं

या आने वाले दिनों की आस को जगाते हैं

किन्तु वास्तविकता यह

कि हम चाहते ही नहीं

कि कभी साल दर साल बीतें।

बस प्रतीक्षा में रहते हैं

एक नयेपन की , एक परिवर्तन की,

कुछ नई चाहतों की

वह साल हो या कुछ और ।

हर साल, साल-दर-साल

पता नहीं हम

गत वर्ष के समापन की खुशियां मनाते हैं

या आने वाले दिनों की आस को जगाते हैं।

बस देखते रहते हें कैलेण्‍डर की ओर

दिन, महीने, तिथियां बदलती हैं

पृष्‍ठ पलटते हैं

और हम उलझे रहते हैं

बेमतलब कुछ दिनों तारीखों को

किन्तु वास्तविकता यह

कि हम चाहते ही नहीं

कि कभी साल दर साल बीतें।

बस प्रतीक्षा में रहते हैं

एक नयेपन की , एक परिवर्तन की,

कुछ नई चाहतों की

वह साल हो या कुछ और ।

   

एक साल और मिला

अक्सर एक एहसास होता है

या कहूं

कि पता नहीं लग पाता

कि हम नये में जी रहे हैं

या पुराने में।

दिन, महीने, साल

यूं ही बीत जाते हैं,

आगे-पीछे के

सब बदल जाते हैं

किन्तु हम अपने-आपको

वहीं का वहीं

खड़ा पाते हैं।

**    **    **    **

अंगुलियों पर गिनती रही दिन

कब आयेगा वह एक नया दिन

कब बीतेगा यह साल

और सब कहेंगे

मुबारक हो नया साल

बहुत-सी शुभकामनाएं

कुछ स्वाभाविक, कुछ औपचारिक।

**    **    **    **

वह दिन भी

आकर बीत गया

पर इसके बाद भी

कुछ नहीं बदला

**    **    **    **

कोई बात नहीं,

नहीं बदला तो न सही।

पर  चलो

एक दिन की ही

खुशियां बटोर लेते हैं

और खुशियां मनाते हैaa

कि एक साल और मिला

आप सबके साथ जीने के लिए।

   

 

चल आज गंगा स्नान कर लें

चल आज गंगा स्नान कर लें

पाप-पुण्य का लेखा कर लें

अगले-पिछले पाप धो लें

स्वर्ग-नरक से मुक्ति लें लें

*    

भीड़ पड़ी है भारी देख

कूड़ा-कचरा फैला देख

अपने मन में मैला देख

लगा हुआ ये मेला देख

वी आई का रेला देख

चुनावों का आगाज़ तू देख

धर्मों का अंदाज़ तू देख

धर्मों का उपहास तू देख

नित नये बाबाओं का मेला देख

हाथी, घोड़े, उंट सवारी

उन पर बैठे बाबा भारी

मोटी-मोटी मालाएं देख

जटाओं का ;s स्टाईल तू देख

लैपटाप-मोबाईल देख

इनका नया अंदाज़ यहां

नित नई आवाज़ यहां

पण्डों-पुजारियों के पाखण्ड तू देख

नये-पुराने रिवाज़ तू देख

बाजों-गाजों संग आगाज़ तू देख।

पैसे का यहां खेला देख

अपने मन का मैला देख

चल आज गंगा स्नान कर लें

   

बेटा-बेटी एक समान

बेटी ने पूछा

मां, बेटा-बेटी एक समान!

मां बोली,

हां हां, बेटा-बेटी एक समान!

बेटी बोली,

मां तो अब से कहना

मैं अपने बेटे को

बेटी समान मानती हूं।

 

हम नित मूरख बन जायें

ज्ञानी-ध्यानी

पंडित-पंडे

भारी-भरकम।

पोथी बांचे

ज्ञान बांटें

हरदम।

गद्दी छोटी

पोटली मोटी

हम जैसे

अनपढ़।

डर का पाठ

हमें पढ़ाएं,

ईश्वर से डरना

हमें सिखाएं,

झूठ-सच से

हमें डराएं।

दान-दक्षिणा

से भरमाएं।

जेब हमारी खाली

हम नित

मूरख बन जायें।

 

 

 

हां हुआ था भारत आज़ाद

कभी लगा ही नहीं

कि हमें आज़ाद हुए इतने वर्ष हो गये।

लगता है अभी कल ही की तो बात है।

हमारे हाथों में सौंप गये थे

एक आज़ाद भारत

कुछ आज़ादी के दीवाने, परवाने।

फ़ांसी चढ़े, शहीद हुए।

और न जाने क्या क्या सहन किया था

उन लोगों ने जो हम जानते ही नहीं।

जानते हैं तो बस एक आधा अधूरा सच

जो हमने पढ़ा है पुस्तकों में।

और ये सब भी याद आता है हमें

बस साल के गिने चुने चार दिन।

हां हुआ था भारत आज़ाद।

कुछ लोगों की दीवानगी, बलिदान और हिम्मत से।

 

और हम ! क्या कर रहे हैं हम ?

कैसे सहेज रहे हैं आज़ादी के इस उपहार को।

हम जानते ही नहीं

कि मिली हुई आजादी का अर्थ क्या होता है।

कैसे सम्हाला, सहेजा जाता है इसे।

दुश्मन आज भी हैं देश के

जिन्हें मारने की बजाय

पाल पोस रहे हैं हम उन्हें अपने ही भीतर।

झूठ, अन्नाय के विरूद्ध

एक छोटी सी आवाज़ उठाने से तो डरते हैं हम।

और आज़ादी के दीवानों की बात करते हैं।

बड़ी बात यह

कि आज देश के दुश्मनों के विरूद्ध खड़े होने के लिए

हमें पहले अपने विरूद्ध हथियार उठाने पड़ेंगे।

शायद इसलिए

अधिकार नहीं है हमें

शहीदों को नमन का

नहीं है अधिकार हमें तिरंगे को सलामी का

नहीं है अधिकार

किसी और पर उंगली उठाने का।

पहले अपने आप को तो पहचान लें

देश के दुश्मनों को अपने भीतर तो मार लें

फिर साथ साथ चलेंगे

न्याय, सत्य, त्याग की राह पर

शहीदों को नमन करेंगे

और तिरंगा फहरायेंगे अपनी धरती पर

और अपने भीतर।

 

 

 

एकान्त की ध्वनि

एकान्त काटता है,

एकान्त कचोटता है

किन्तु अपने भीतर के

एकान्त की ध्वनि

बहुत मुखर होती है।

बहुत कुछ बोलती है।

जब सन्नाटा टूटता है

तब कई भेद खोलती है।

भीतर ही भीतर

अपने आप को तलाशती है।

किन्तु हम

अपने आपसे ही डरे हुए

दीवार पार की आवाज़ें तो सुनते हैं

किन्तु अपने भीतर की आवाज़ों को

नकारते हैं

इसीलिए जीवन भर

हारते है।

 

समझाती हैं ये सीढ़ियां

जीवन के उतार-चढ़ाव को

समझाती हैं ये सीढ़ियां

दुख-सुख के पल आते-जाते हैं

ये समझा जाती हैं ये सीढ़ियां

जीवन में

कुछ गहराते अंधेरे होते हैं

और कुछ होती हैं रोशनियां

हिम्मत करें

तो अंधेरे को बेधकर

रोशनी का मार्ग

दिखाती हैं ये सीढ़ियां

जो बीत गया

सो बीत गया

पीछे मुड़कर क्या देखना

आगे की राह

दिखाती हैं ये सीढि़यां

 

आज़ादी की कीमत

कौन थे वे लोग !

गोलियों से जूझते, फांसी पर झूलते

अंग्रज़ों को ललकारते, भूख प्यास नकारते

देश के लिए जन जन जागते

बस एक सपना लेकर स्वतन्त्र भारत का।

 

हम कहानियों में पढ़ते हैं, इतिहास में रटते हैं

और उकताकर जल्दी ही भूल जाते हैं।

उनका जुनून, उनका त्याग, और उनका बलिदान।

उनका संघर्ष

हमारी समझ में नहीं आता।

 

नहीं समझ पाते कि

आ़ज़ादी मिलती नहीं

लेनी पड़ती है

अपने प्राण देकर।

 

बस कुछ दिन और कुछ तारीखें

याद कर ली हैं हमने।

झंडे उठा लेते हैं, नारे लगा लेते हैं

प्रभात फेरियां निकालते हैं

फूल मालाएं चढ़ाते हैं

और देश भक्ति के कुछ पुराने गीत गा लेते हैं।

श्रद्धांजलि के नाम पर नौटंकी कर जाते हैं।

फिर छुट्टी मनाते हैं।

 

मौका मिलते ही भ्रष्टाचार को कोसते हैं

नेताओं के नाम पर रोते हैं

झूठ, पाखण्ड , धोखे के साथ जीते हैं

सत्य को नकारते हैं, दूसरों को कोसते हैं

आज़ादी को रोते हैं

लेकिन जब कर्त्तव्य निर्वाह की बात आती है

तो मुंह ढककर सो जाते हैं।

फिर कहते हैं

किस काम की ऐसी आज़ादी

इससे तो अंग्रेज़ों का समय ही अच्छा था।

 

काश ! हम समझ पाते

घर बैठे मिली आज़ादी के पीछे

कितनी खून की नदियां बही हैं।

सैंकड़ों वर्षों के संघर्ष का अभिमान है ये।

देश के गौरव की रक्षा के लिए

तन मन धन के बलिदान की

एक लम्बी गाथा है ये।

सत्य, निष्ठा और प्रेम की परिभाषा है ये।

सहेजना है हमें इसे।

और यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी

उन वीरों के प्रति

जो जीवन से पहले ही मृत्यु को चुनकर चले गये

हमारे आज के लिए।

 

 

 

क्या था मेरा सपना

हा हा !!

वे सपने ही क्या

जो पूरे हो जायें।

कुछ सपने हम

जागते में देखते हैं

और कुछ सोते हुए।

जागते हुए देखे सपने

सुबह-शाम

अपना रूप बदलते रहते हैं

और हम उलझ कर रह जाते हैं

क्या यही था मेरा सपना 

और जब तक उस राह पर

बढ़ने लगते हैं

सपना फिर बदल जाता है।

सोचती हूं

इससे तो

न ही देखा होता सपना।

सच्चाई की कंकरीट पर

चल लेती चाहे नंगे पांव ही]

पर बार-बार

सपने बदलने की

तकलीफ़ से तो न गुज़रना पड़ता।

 

और सोते हुए देखे सपने !!

यूं ही आधे-अधूरे होते हैं

कभी नींद टूटती है,

कभी प्यास लगती है,

कभी डरकर उठ बैठते हैं,

फिर टुकड़ों में आती है नींद

और अपने साथ

सपनों के भी टुकड़े

करने लगती है,

दिन बिखर जाता है

उन अधूरे सपनों को जोड़ने की

नाकाम कोशिश में।

 

 

जूझना पड़ता है अकेलेपन से

कभी-कभी दूरियां

रिश्तों को पास ले आती है

उलझे रिश्तों को सुलझाती हैं

राहें बदलकर जीवन में

आस ले आती हैं

कभी तो चलें साथ-साथ

और कभी-कभी 

चुनकर चलें दो राहें,

जीवन आसान कर जाती हैं।

जीवन सदैव

सहारों से नहीं चलता

ये सीख दे जाती हैं

कदम-दर-कदम

जूझना पड़ता है

अकेलेपन से,

ढूंढनी पड़ती हैं

आप ही जीवन की राहें

अंधेरों और उजालों में

पहचान हो पाती है,

कठोर धरातल पर तब

ज़िन्दगी आसान हो जाती है।

फिर मुड़कर देखना एक बार

छूटे हाथ फिर जुड़ते हैं

और ज़िन्दगी

सहज-सहज हो जाती है।

 

 

उम्र का एक पल: और पूरी ज़िन्दगी

पता ही नहीं लगा

उम्र कैसे बीत गई

अरे !

पैंसठ की हो गई मैं।

अच्छा !!

कैसे बीत गये ये पैंसठ वर्ष,

मानों कल की ही घटना हो।

-

स्मृतियों की

छोटी-सी गठरी है

जानती हूं

यदि खोलूंगी, खंगालूंगी

इस तरह बिखरेगी

कि समझने-समेटने में

अगले पैंसठ वर्ष लग जायेंगे।

और यह भी नहीं जानती

हाथ आयेगी रिक्तता

या कोई रस।

-

और कभी-कभी

ऐसा क्यों होता है

कि उम्र का एक पल

पूरी ज़िन्दगी पर

भारी हो जाता है

और हम

दिन, महीने, साल,

गिनते रह जाते हैं

लगता है मानों

शताब्दियां बीत गईं

और हम

अपने-आपको वहीं खड़ा पाते हैं।

 

जीवन-दर्शन

चांद-सूरज की रोशनी जीवन की राह दिखाती है।

रात-दिन में बंटे, जीवन का आवागमन समझाती है।

दोनों ही सामना करते हैं अंधेरों और रोशनी का,

यूं ही हमें जीवन-दर्शन समझा-समझा जाती है।

कण-कण नेह से भीगे

रंगों की रंगीनीयों से मन भरमाया।

अप्रतिम सौन्दर्य निरख मन हर्षाया।

घटाओं से देखो रोशनी है झांकती,

कण-कण नेह से भीगे, आनन्द छाया।

समय जब कटता नहीं

काम है नहीं कोई

इसलिए इधर की उधर

उधर की इधर

करने में लगे हैं हम आजकल ।

अपना नहीं,

औरों का चरित्र निहारने में

लगे हैं आजकल।

पांव धरा पर टिकते नहीं

आकाश को छूने की चाहत

करने लगे हैं हम आजकल।

समय जब कटता नहीं

हर किसी की बखिया उधेड़ने में
लगे रहते हैं हम आजकल।

और कुछ न हो तो

नई पीढ़ी को कोसने में

लगे हैं हम आजकल।

सुनाई देता नहीं, दिखाई देता नहीं

आवाज़ लड़खड़ाती है,

पर सारी दुनिया को

राह दिखाने में लगे हैं हम आजकल।

 

कांगड़ी बोली में छन्दमुक्त कविता

चल मनां अज्ज सिमले चलिए,

पहाड़ां दी रौनक निरखिए।

बसा‘च जाणा कि

छुक-छुक गड्डी करनी।

टेडे-फेटे मोड़़ा‘च न डरयां,

सिर खिड़किया ते बा‘र न कड्यां,

चल मनां अज्ज सिमले चलिए।

-

माल रोडे दे चक्कर कटणे

मुंडु-कुड़ियां सारे दिखणे।

भेडुआं साई फुदकदियां छोरियां,

चुक्की लैंदियां मणा दियां बोरियां।

बालज़ीस दा डोसा खादा

जे न खादे हिमानी दे छोले-भटूरे

तां सिमले दी सैर मनदे अधूरे।

रिज मदानां गांधी दा बुत

लकड़ियां दे बैंचां पर बैठी

खांदे मुंगफली खूब।

गोल चक्कर बणी गया हुण

गुफ़ा, आशियाना रैस्टोरैंट।

लक्कड़ बजारा जाणा जरूर

लकड़िया दी सोटी लैणी हजूर।

जाखू जांगें तां लई जाणी सोटी,

चड़दे-चड़दे गोडे भजदे,

बणदी सा‘रा कन्ने

बांदरां जो नठाणे‘, कम्मे औंदी।

स्कैंडल पाईंट पर खड़े लालाजी

बोलदे इक ने इक चला जी।

मौसम कोई बी होये जी

करना नीं कदी परोसा जी।

सुएटर-छतरी लई ने चलना

नईं ता सीत लई ने हटणा।

यादां बड़ियां मेरे बाॅल

पर बोलदे लिखणा 26 लाईनां‘च हाल।

 

 

हिन्दी अनुवाद

चल मन आज शिमला चलें,

पहाडों की रौनक देखें।

बस में जाना या

छुक-छुक गाड़ी करनी।

टेढ़े-मेढ़े मोड़ों से न डरना

सिर खिड़की से बाहर न निकालना

चल मन आज शिमला चलें।

 

माल रोड के चक्कर काटने

लड़के-लड़कियां सब देखने

भेड़ों की तरह फुदकती हैं लड़कियां

उठा लेती हैं मनों की बोरियां।

बालज़ीस का डोसा खाया

और यदि न खाये हिमानी के भटूरे

तो शिमले की सैर मानेंगे अधूरे।

रिज मैदान पर गांधी का बुत।

लकड़ियों के बैंचों पर बैठकर

खाई मूंगफ़ली खूब।

गोल चक्कर बन गया अब

गुफ़ा, आशियाना रैस्टोरैंट।

लक्कड़ बाज़ार जाना ज़रूर।

लकड़ी की लाठी लेना  हज़ूर।

जाखू जायेंगे तो ले जाना लाठी,

चढ़ते-चढ़ते घुटने टूटते

साथ बनती है सहारा,

बंदरों को भगाने में आती काम।

स्कैंडल प्वाईंट पर खड़े लालाजी

कहते हैं एक के साथ एक चलो जी।

मौसम कोई भी हो

करना नहीं कभी भरोसा,

स्वैटर-छाता लेकर चलना,

नहीं तो शीत लेकर हटना।

यादें बहुत हैं मेरे पास

पर कहते हैं 26 पंक्तियों में लिखना है हाल।

 

 

 

 

 

अंधेरों से जूझता है मन

गगन की आस हो या चांद की,

धरा की नज़दीकियां छूटती नहीं।

मन उड़ता पखेरु-सा,

डालियों पर झूमता,

संजोता ख्वाब कोई।

अंधेरों से जूझता है मन,

संजोता है रोशनियां,

दूरियां कभी सिमटती नहीं,

आस कभी मिटती नहीं।

चांद है या ख्वाब कोई।

रोशनी है आस कोई।

 

कभी धरा कभी गगन को छू लें

चल री सखी

आज झूला झूलें,

कभी धरा

तो कभी

गगन को छू लें,

डोर हमारी अपने हाथ

जहां चाहे

वहां घूमें।

चिन्ताएं छूटीं

बाधाएं टूटीं

सखियों संग

हिल-मिल मन की

बातें हो लीं,

कुछ गीत रचें

कुछ नवगीत रचें,

मन के सब मेले खेंलें

अपने मन की खुशियां लें लें।

नव-श्रृंगार करें

मन से सज-संवर लें

कुछ हंसी-ठिठोली

कुछ रूसवाई

कभी मनवाई हो ली।

मेंहदी के रंग रचें

फूलों के संग चलें

कभी बरसे हैं घन

कभी तरसे है मन

आशाओं के दीप जलें

हर दिन यूं ही महक रहे

हर दिन यूं ही चहक रहे।

चल री सखी

आज झूला झूलें

कभी धरा

तो कभी

गगन को छू लें।

किससे क्या कहें हम

लाशों पर शहर नहीं बसते

बाले-बरछियों से घर नहीं बनते

फ़सलों में पानी की ही तरावट चाहिए

रक्त से बीज नहीं पनपते।

कब कौन किसको समझाये यह

हमें तो यह भी नहीं पता

कि कौन शत्रु

और कौन मित्र बनकर लड़ते।

जिनसे आज करते हैं मैत्री समझौता

वे ही कल शत्रु बन बरसते।

अस्त्रों-शस्त्रों से घरों की सजावट नहीं होती

और दूसरों के कंधों पर दुनिया नही चलती।

छाता लेकर निकले हम

छाता लेकर निकले हम

देखें बारिश में

कितना है दम।

भीगने से

न जाने क्यों

लोगों का निकलता है दम।

छाता कर देंगे बंद

जमकर भीगेंगे हम।

जब लग जायेगी ठण्डी

तब लौटेंगे घर को हम

मोटी मोटी डांट पड़ेगी

फिर हलवा-पूरी,

 चाट पकौड़ी जी भर

खायेंगे हम।

 

समय के साथ

हवा आती है

और बन्द खिड़कियों से टकराकर

लौट जाती है।

हमें अब

खिड़कियां खोलने की

आदत नहीं रही।

ताज़ी हवा

और पहली बरसात से हमें

सर्दी लग जाती है।

मिट्टी से सौंधी-सौंधी गंध आने पर

हम नाक पर

रुमाल रख लेते हैं

और चढ़ते सूरज की धूप से

लूह लग जाने का

डर लगता है।

फिर खिड़कियां खोल देने पर

हो सकता है

ताज़ी हवा के साथ

कुछ मिट्टी, कुछ कंकड़

कुछ नया-पुराना, कुछ अच्छा-बुरा

भी चला आये।

अब हवा में ये सब

ज़्यादा हो गये हैं

और इन सबको

सहने की हमारी आदत कम।

हम आदी हो गये हैं

पंखे की हवा, बिजली की रोशनी 

और फ्रिज के पानी के अपने-आप में बंद।

हवा की छुअन से

नहीं महसूस होती अब

वह मीठी-सी सिहरन

जो मन में उमंग जगाती थी

और अन्तर्मन के तारों को

कोई मीठा गीत गाने के लिए

झंकृत कर जाती थी।

हवा ने भी हमारी ही तरह

बच-बचकर निकलना सीख लिया है

न इस पर किसी का कोई रंग चढ़ता है

और न इसका रंग किसी पर चढ़ता है।

और कौन जीता है

कौन मरता है

किसी को क्या फ़र्क पड़ता है।

हमें भी अब

मौसम के अनुसार जीने की आदत नहीं रही।

इसलिए हमने

हवा को बाहर कर दिया हे

और अपने-आपको

कमरे में बन्द।

हवा के बदलते रुख पर

चर्चा करने के लिए

हमने अपने कमरों को

वातानुकूलित कर लिया है

सावन-भादों, ज्येष्ठ-पौष

सब वातानुकूलित होकर

हमारे कमरों में बन्द हो गये हैं

और हम

अपने-आपमें।