करिये योग भगाये रोग

कैसी विडम्बना एवं आश्चर्य की बात है कि जिस  योग पद्धति का उल्लेख हमारे प्राचीनतम ग्रंथों ऋग्वेद एवं कठोपनिषद ग्रंथों में मिलता है, जो ईसा पूर्व के ग्रंथ हैं, उस प्राचीनतम योग पद्धति को  हम आज प्रदर्शन के रूप में योगा डे के रूप में मना रहे हैं। पतंजलि का योगसूत्र योग का सबसे महत्वपूर्ण गं्रथ है। अन्य अनेक ग्रंथों में भी योग की परिभाषाएँ महत्व एवं क्रियाएँ उल्लिखित हैं। योग केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं है, अपितु एक मानसिक, चिकित्सीय पद्धति भी है।

वर्तमान में हम इस बात से ज़्यादा प्रसन्न नहीं हैं कि एक हमारी प्राचीनतम योग पद्धति जो लुप्त हो रही थी, पुनः प्रकाश में आई है, हमारे जीवन का हिस्सा बनने लगी है, उसके गुणों को हम अपने जीवन में उतारने में लगे हैं बल्कि हम इस बात की ज़्यादा खुशियाँ मनाने में लगे हैं कि देखिए हमारा योगा अब विश्व में मनाया जाने लगा है। हमारे योगा का अब अन्तर्राष्ट्रीय दिवस है।

यदि सत्य को समझने का साहस रखते हों तो आज भी योग हमारे दैनिक जीवन का, नित्यप्रति का हिस्सा नहीं बन सका है। चाहे विद्यालयों में यह एक विषय के रूप में पढ़ाया जाने लगा है किन्तु बच्चे भी इसे एक विषय के रूप में ही लेते हैं न कि दैनिक जीवन की एक अपरिहार्य क्रिया के रूप में, जीवन-शैली के रूप में अथवा चिकित्सा-पद्धति के रूप में। बड़े-बुजुर्ग पार्क में एकत्र होकर अनुलोम-विलोम आदि करते दिखाई दे जायेंगे अथवा एक-दो और क्रियाएँ , और हमारा योगा डे सम्पन्न हो जाता है।

21 जून को सड़कों पर छपी टी-शर्ट पहने, बढ़िया-सी चटाई बिछाये और बाद में कुछ खान-पानी ही योगा-डे की उपलब्धि बनकर रह जाते हैं।

हमारे प्राचीन ग्रंथों में योग का जो महत्व दर्शाया गया है एवं क्रियाएँ बताईं गईं हैं हम उनसे अभी भी बहुत-बहुत दूर हैं। आवश्यकता है प्रत्येक स्तर पर प्रयास की, अभ्यास की, सम्मान की और इसे अपने दैनिन्दन जीवन का हिस्सा बनाने की। योग को उचित रूप में जीवन का हिस्सा बनाने से निश्चित रूप से आधुनिक जीवन शैली से उत्पन्न मानसिक, शारीरिक एवं अने मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान हो पायेगा।

कहते हैं हाथ की है मैल रूपया

जब से आया बजट है भैया, अपनी हो गई ता-ता थैया

जब से सुना बजट है वैरागी होने को मन करता है भैया

मेरा पैसा मुझसे छीनें, ये कैसी सरकार है भैया

देखो-देखो टैक्स बरसते, छाता कहां से लाउं मैया

कहते हैं हाथ की है मैल रूपया, थोड़ी मुझको देना भैया

छल है, मोह-माया है, चाह नहीं, कहने की ही बातें भैया

टैक्स भरो, टैक्स भरो, सुनते-सुनते नींद हमारी टूट गई

मुट्ठी से रिसता है धन, गुल्लक मेरी टूट गई

जब से सुना बजट है भैया, मोह-माया सब छूट गई

सिक्के सारे खन-खन गिरते किसने लूटे पता नहीं

मेरी पूंजी किसने लूटी, कैसे लूटी मुझको यह तो पता नहीं

किसकी जेबें भर गईं, किसकी कट गईं, कोई न जानें भैया

इससे बेहतर योग चला लें, चल  मुफ्त की रोटी खाएं भैया

जीवन की कहानियां बुलबुलों-सी नहीं होतीं

 कहते हैं

जीवन पानी का बुलबुला है।

किन्तु कभी लगा नहीं मुझे,

कि जीवन

कोई छोटी कहानी है,

बुलबुले-सी।

सागर की गहराई से भी

उठते हैं बुलबुले।

और खौलते पानी में भी

बनते हैं बुलबुले।

जीवन में गहराई

और जलन का अनुभव

अद्भुत है,

या तो डूबते हैं,

या जल-भुनकर रह जाते हैं।

जीवन की कहानियां

बुलबुलों-सी नहीं होतीं

बड़े गहरे होते हैं उनके निशान।

वैसे ही जैसे

किसी के पद-चिन्हों पर,

सारी दुनिया

चलना चाहती है।

और किसी के पद-चिन्ह

पानी के बुलबुले से

हवाओं में उड़ जाते हैं,

अनदेखे, अनजाने,

अनपहचाने।

 

चिडि़या मुस्कुराई

चिडि़या के उजड़े

घोंसले को देखकर

मेरा मन द्रवित हुआ

पूछा मैंने चिडि़या से

रोज़ तिनके चुनती हो

रोज़ नया घर बनाती हो

आंधी के एक झोंके से

घरौंदा तुम्‍हारा उजड़ जाता है

तिनका-तिनका बिखर जाता है

कभी वर्षा, कभी धूप

कभी पतझड़

कभी इंसान की करतूत।

कहां से इतना साहस पाती हो,  

न जाने कहां

दूर-दूर से भोजन लाती हो

नन्‍हें -नन्‍हें बच्‍चों को बचाती हो

उड़ना सिखलाती हो

और अनायास एक दिन

वे सच में ही उड़ जाते हैं

तुम्‍हारा दिल नहीं दुखता।

  • *    *    *

चिडि़या !!

मुंह में तिनका दबाये

एक पल के लिए

मेरी ओर देखा

मुस्‍कुराई

और उड़ गई

अपना घरौंदा

पुन: संवारने के लिए।

समझाती है ज़िन्दगी

 कदम-दर-कदम यूँ ही आगे बढ़ती है ज़िन्दगी

कौन आगे, कौन पीछे, नहीं देखती है ज़िन्दगी।

बालपन क्या जाने, क्या पीठ पर, क्या हाथ में

अकेले-दुकेले, समय पर आप ही समझाती है ज़िन्दगी।

कामधेनु कुर्सी बनी

 

समुद्र मंथन से मिली सुरभि, मनोकामनाएं पूरी थी करती,

राजाओं, ऋषियों की स्पर्धा बनी, मान दिलाया थी करती,

गायों को अब कौन पूछता, अब कुर्सी की बात करो यारो,

कामधेनु कुर्सी बनी, इसके चैपायों की पूजा दुनिया करती।

हाथ पर रखें लौ को

रोशनी के लिए दीप प्रज्वलित करते हैं

फिर दीप तले अंधेरे की बात करते हैं

तो हिम्मत करें, हाथ पर रखें लौ को

जो जग से तम मिटाने की बात करते है

बालपन की स्मृतियाँ

५०-५५ वर्ष पुरानी स्‍म़ृतियां मानस-पटल पर उभर कर आ गईं।

उसे चोरी कहते ही नहीं जो पकड़ी जाये। हम तो इतने होशियार थे कि कभी चोरी पकड़ी ही नहीं गई।

सस्‍ते का युग था। बाज़ार से छोटा-मोटा सामान हम बहनें ही लाया करती थीं। एक से पांच रूपये तक में न जाने कितना सामान आ जाता था। दस-बीस पैसे तो अक्‍सर मैं छुपा ही लिया करती थी। अब छुपायें तो छुपायें कहां। प्रवेश द्वार के बाद बरामदा था और उसमें पुस्‍तकों की अलमारियां थीं, वहां मैंने एक पुस्‍तक उपर के खाने में निर्धारित कर ली थी जिसके उपर मैं वह पैसे रख देती थी, और स्‍कूल जाते समय चुपके निकाल लेती थी। आप सोचेंगे, उन पांच-दस पैसों का क्‍या करते होंगे, दस पैसे के बीस गोलगप्‍पे आते थे और पांच पैसे का चूरण, गोलियां, अथवा दो-तीन नाशपाती, खट्टा (गलगल) आदि।

स्‍कूल तो पैदल ही आते-जाते थे, एक घंटे का रास्‍ता था। अब घर से स्‍कूल तो कोई पहुंचने से रहा। वह युग पी.टी.एम. वाला युग भी नहीं था कि कोई सच-झूठ का पता लगा पाता।  स्‍कूल से फूलों के पौधे बहुत चुराया करती थी। घर के बाहर बड़ा सा मैदान था, उसमें क्‍यारियां बनाकर लगाते थे। मां पूछती थी कहां से लाये, कह देते थे स्‍कूल से माली  से ले लिए। और राह-भर में पेड़ों से तोड़-तोड़कर अलूचे, पलम, कैंथ खुरमानी तो बहुत खाये हैं, उस खट्टे-मीठे स्‍वाद का तो कहना ही क्‍या।

आज नहीं सोच पाते कि उस समय जो किया वह सही था अथवा गलत, किन्‍तु जो था यही सत्‍य था, आज प्रकट कर अच्‍छा लगा।

 

आह! डाकिया!

आह! डाकिया!

खबरें संसार भर की।

डाक तरह-तरह की।

छोटी बात तो

पोस्टकार्ड भेजते थे,

औरों के अन्तर्देशीय पत्रों को

झांक-झांककर देखते थे।

और बन्द लिफ़ाफ़े को

चोरी से पढ़ने के लिए

थूक लगाकर

गीला कर खोलते थे।

जब चोरी की चिट्ठी आनी हो

तो द्वार पर खड़े होकर

चुपचाप डाकिए के हाथ से

पत्र ले लिया करते थे,

इससे पहले कि वह

दरार से चिट्ठी घर में फ़ेंके।

फ़टा पोस्टकार्ड

काली लकीर

किसी अनहोनी से डराते थे

और तार की बात से तो

सब कांपते थे।

सालों-साल सम्हालते थे

संजोते थे स्मृतियों को

अंगुलियों से छूकर

सरासराते थे पत्र

अपनों की लिखावट

आंखों को तरल कर जाती थी

होठों पर मुस्कान खिल आती थी

और चेहरा गुलाल हो जाया करता था

इस सबको छुपाने के लिए

किसी पुस्तक के पन्नों में

गुम हो जाया करते थे।

 

 

रोज़ पढ़ती  हूं भूल जाती  हूं

जीवन के सिखाये गये पाठ
बार बार दोहराती हूं।

रोज़ याद करती  हूं, पर भूल जाती  हूं ।

पुस्तकें पढ़कर नहीं चलता जीवन,
यह जानकर भी
वही पाठ बार-बार दोहराती हूं ।
सब कहते हैं, पढ़ ले, पढ़ ले,
जीवन में कुछ आगे बढ़ ले ।
पर मेरी बात

कोई क्यों नहीं समझ पाता।
कुछ पन्ने, कुछ हिसाब-बेहिसाब
कभी समझ ही नहीं पाती  हूं,

लिख-लिखकर दोहराती हूं ।

कभी स्याही चुक जाती है ,

कभी कलम छूट जाती है,
अपने को बार-बार समझाती हूं ।

फिर भी,

रोज़ याद करती हूं ,भूल जाती  हूं ।
ज़्यादा गहराईयों से

डर लगता है मुझे
इसलिए कितने ही पन्ने
अधपढ़े छोड़ आगे बढ़ जाती हूं ।
कोई तो समझे मेरी बात ।
कहते हैं,

तकिये के नीचे रख दो किताब,
जिसे याद करना हो बेहिसाब,
पर ऐसा करके भी देख लिया मैंने
सपनों में भी पढ़कर देख लिया मैंने,

बस, इसी तरह जीती चली जाती हूं ।

.
रोज़ पढ़ती  हूं भूल जाती  हूं ।

 

दीवारें एक नाम है पूरे जीवन का

दीवारें

एक नाम है

पूरे जीवन का ।

हमारे साथ

जीती हैं पूरा जीवन।

सुख-दुख, अपना-पराया

हंसी-खुशी या आंसू,

सब सहेजती रहती हैं

ये दीवारें।

सब सुनती हैं,

देखती हैं, सहती हैं,

पर कहती नहीं किसी से।

कुछ अर्थहीन रेखाएं

अंगुलियों से उकेरती हूं

इन दीवारों पर।

पर दीवारें

समझती हैं मेरे भाव,

मिट्टी दरकने लगती है।

कभी गीली तो कभी सूखी।

दरकती मिट्टी के साथ

कुछ आकृतियां

रूप लेने लगती हैं।

समझाती हैं मुझे,

सहलाती हैं मेरा सर,

बहते आंसुओं को सोख लेती हैं।

कभी कुछ निशान रह जाते हैं,

लोग समझते हैं,

कोई कलाकृति है मेरी।

 

कशमकश में बीतता है जीवन

सुख-दुख तो जीवन की बाती है

कभी जलती, कभी बुझती जाती है

यूँ ही कशमकश में बीतता है जीवन

मन की भटकन कहाँ सम्हल पाती है।

 

आप स्वयं ही समझदार हैं

निधि के माता-पिता सुनिश्चित थे कि इस बार तो रिश्ता हो ही जायेगा। लड़की कम पढ़ी-लिखी हो, नौकरी न करती हो तो रिश्ता नहीं मिलता। ज़्यादा शिक्षित हो,  अच्छी नौकरी करती हो तो रिश्ता नहीं मिलता।

निधि सोचती कैसी विडम्बना है यह कि उसकी बहन ज़्यादा नहीं पढ़ पाई, नौकरी में उसकी रूचि नहीं थी तो उसकी जहां भी बात चलती थी यही उत्तर मिलता कि आपकी लड़की की योग्यता हमारे लड़के के बराबर नहीं है। अथवा हमें तो नौकरी करने वाली पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए। आजकल की लड़कियां तो बहुत आगे चल रही हैं आपको भी अपनी लड़की को कुछ तो आधुनिक बनाना चाहिए था।

और निधि , उच्च शिक्षा प्राप्त, एक कम्पनी में बड़ी अधिकारी। जहां भी बात करते, पहले ही अस्पष्ट मना हो जाती क्योंकि वह उस लड़के से ज़्यादा पढ़ी और उंचे पद पर अवस्थित दिखती।

निधि समझ नहीं पाती कि विवाह एक व्यक्तित्व, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता से भी उपर है क्या। किन्तु माता-पिता तो सामाजिक-पारिवारिक दायित्व में बंधे थे। वैसे भी समाज लड़की की विवाह योग्य आयु ही देखता है उसकी योग्यता, शिक्षा आदि कुछ नहीं देखता और माता-पिता पर तो दबाव रहता ही है।

इस बार जहां बात चल रही थी, परिवार आधुनिक, सुशिक्षित एवं खुले विचारों के लगते थे। बड़ा परिवार था। परिवार में कोई व्यवसाय में था, कोई सरकारी नौकरी में तो कोई किसी अच्छी कम्पनी में। परिवार की लड़कियां भी उच्च शिक्षा प्राप्त एवं आत्मनिर्भर थीं।  बात भी उनकी ही ओर से उठी थी और सिरे चढ़ती प्रतीत हो रही थी।

आज परिवार मिलने एवं बात करने के लिए आया। युवक, माता-पिता, दो बहनें, एक भाई-भाभी। स्वागत सत्कार के बीच बात होती रही। दोनों ही पक्ष हां की स्थिति में थे।

अनायास ही युवक के पिता बोले कि बाकी सब ठीक है, हमारी कोई मांग भी नहीं है, घर भरा पूरा है कि सात पीढ़ियां बैठकर खा सकती हैं। बस हमारी एक ही शर्त है।

हमारे घर की बहुएं नौकरी नहीं करतीं । सब हक्के बक्के रह गये। एक-दूसरे का मुंह देखते रह गये। निधि के पिता ही बोले कि आप तो पहले से ही जानते हैं कि निधि एक अच्छी कम्पनी में उच्च पदाधिकारी है, इतना वेतन है, जानते हुए ही आपने बात की थी तो अब आप क्यों आपत्ति कर रहे हैं। वह तो  नौकरी करना चाहती है।

कुछ अजीब से एवं तिरस्कारपूर्ण स्वर में उत्तर आया , जी हां, विवाह से पहले तो यह सब चलता है किन्तु विवाह के बाद लड़की दस घंटे नौकरी करेगी तो घर-बार क्या सम्हालेगी। और वेतन की बात क्या है, हमारे पास तो इतना है कि सात पीढ़ियां बैठकर खायें।

अचानक निधि उठ खड़ी हुई और बोली कि जब आपके पास इतना है कि सात पीढ़ियां बैठकर खायें तो आपके परिवार के लड़के क्यों काम कर रहे हैं, वे भी बैठकर क्यों नहीं खाते। वे दस-दस, बारह-बारह घंटे घर से बाहर क्यों काम करते हैं। क्या घर के प्रति उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं।

उसके बाद क्या हुआ होगा और क्या होता आया है मुझे बताने की आवश्यकता नहीं, आप स्वयं ही समझदार हैं।

रोशनियां अब उधार की बात हो गई हैं

रोशनियां

अब उधार की बात हो गई हैं।

कौन किसकी छीन रहा

यह तहकीकात की बात हो गई है।

गगन पर हो

या हो धरा पर

किसने किसका रूप लिया

यह पहचानने की बात हो गई है।

प्रकाश और तम के बीच

जैसे एक

प्रतियोगिता की बात हो गई है।

कौन किस पर कर रहा अधिकार

यह समझने-समझाने की बात हो गई है।

कौन लघु और कौन गुरू

नज़र-नज़र की बात हो गई है।

कौन जीता, कौन हारा

यह विवाद की बात हो गई है।

कौन पहले आया, कौन बाद में

किसने किसको हटाया

यह तकरार की बात हो गई है।

अब आप से क्या छुपाना

अपनी हद से बाहर की बात हो गई है।

अपनी-अपनी कोशिश

हमने जब भी

उठकर

खड़े होने की कोशिश की

तुमने हमें

मिट्टी मे मिला देना चाहा।

लेकिन

तुम यह बात भूल गये

कि मिट्टी में मिल जाने पर ही

एक छोटा-सा बीज

विशाल वृक्ष का रूप

धारण कर लेता है।

 

अब कांटों की बारी है

फूलों की बहुत खेती कर ली

अब कांटों की बारी है।

पत्‍ता–पत्‍ता बिखर गया

कांटों की सुन्‍दर मोहक क्‍यारी है।

न जाने कितने बीज बोये थे

रंग-बिरंगे फूलों के।

सपनों में देखा करती थी

महके महके गुलशन के रंगों के।

मिट्टी महकी, बरसात हुई

तब भी, धरा न जाने कैसे सूख गई।

नहीं जानती, क्‍योंकर

फूलों के बीजों से कांटे निकले

परख –परख कर जीवन बीता

कैसे जानूं कहां-कहां मुझसे भूल हुई। 

दोष नहीं किसी को दे सकती

अब इन्‍हें सहेजकर बैठी हूं।

वैसे भी जबसे कांटों को अपनाया

सहज भाव से जीवन में

फूलों का अनुभव दे गये

रस भर गये जीवन में।

 

बस जीवन बीता जाता है

 

सब जीवन बीता जाता है ।

कुछ सुख के कुछ दुख के

पल आते हैं, जाते हैं,

कभी धूप, कभी झड़़ी ।

कभी होती है घनघोर घटा,

तब भी जीवन बीता जाता है ।

कभी आस में, कभी विश्‍वास में,

कभी घात में, कभी आघात में,

बस जीवन बीता जाता है ।

हंसते-हंसते आंसू आते,

रोते-रोते खिल-खिल करते ।

चढ़़ी धूप में पानी गिरता,

घनघोर घटाएं मन आतप करतीं ।

फिर भी जीवन बीता जाता है ।

नित नये रंगों से जीवन-चित्र संवरता

बस यूं ही जीवन बीता जाता है ।

 

आज का रावण

 

हमारे शास्त्रों में, ग्रंथों में जो कथाएं सिद्ध हैं, आम जन तक पहुंचते-पहुंचते बहुत बदल जाती हैं। सत्य-असत्य से अलग हो जाती हैं। हमारी अधिकांश कथाओं के आधार और परिणाम वरदान और श्राप पर आधारित हैं।

प्राचीन ग्रंथों एवं रामायण में वर्णित कथानक के अनुसार रावण एक परम शिव भक्त, उद्भट राजनीतिज्ञ, महापराक्रमी योद्धा, अत्यन्त बलशाली, शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता, प्रकाण्ड विद्वान पंडित एवं महाज्ञानी था। रावण के शासन काल में लंका का वैभव अपने चरम पर था इसलिये उसकी लंकानगरी को सोने की लंका कहा जाता है।

हिन्दू ज्योतिषशास्त्र में रावण संहिता को एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक माना जाता है और इसकी रचना रावण ने की थी।

   रावण ने राम के लिए उस पुल के लिए यज्ञ किया, जिसे पारकर राम की सेना लंका पहुंच सकती थी, यह जानते हुए भी रावण ने राम के निमन्त्रण को स्वीकार किया और अपना कर्म किया।

 

 रावण अपने समय का सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है और रामायण के अनुसार जब रावण मृत्यु शय्या पर था तब राम ने लक्ष्मण को रावण से शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया था और रावण ने यहां भी अपना कर्म किया था।

   निःसंदेह हमारी धार्मिकता, आस्था, विश्वास, चरित्र आदि विविध गुणों के कारण राम का चरित्र सर्वोपरि है। रावण रामायण का एक केंद्रीय प्रतिचरित्र है। रावण लंका का राजा था। रामकथा में रावण ऐसा पात्र है, जो राम के उज्ज्वल चरित्र को उभारने का काम करता है।

रावण राक्षस कुल का था, अतः उसकी वृत्ति भी राक्षसी ही थी। यही स्थिति शूर्पनखा की भी थी। उसने प्रेम निवेदन किया, विवाह-प्रस्ताव किया जिसे   राम एवं लक्ष्मण ने अस्वीकार किया। इस अस्वीकार का कारण सीता को मानते हुए शूर्पनखा ने सीता को हानि पहुंचाने का प्रयास किया, इस कारण लक्ष्मण ने शूर्पनखा को आहत किया, उसकी नाक काट दी।

रावण ने घटना को जानकर अपनी बहन का प्रतिशोध लेने के लिए सीता का अपहरण किया, किन्तु उसे किसी भी तरह की कोई हानि नहीं पहुंचाई। रावण अपनी पराजय भी जानता था किन्तु फिर भी उसने बहन के सम्मान के लिए अपने हठ को नहीं छोड़ा।

   समय के साथ एवं साहित्येतिहास में कुछ प्रतीक रूढ़ हो जाते हैं, और फिर वे ही उसकी अर्थाभिव्यक्ति बन कर रह जाते हैं। बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में यह कथा रूढ़ हुई और रावण के गुणों पर उसका  कृत्य हावी हुआ। किसी भी समाज के उत्थान के लिए इससे अच्छी बात कोई नहीं कि अच्छाई का प्रचार हो, हमारे भीतर उसका समावेश हो, और हम उस परम्परा को आगे बढ़ाएं। राम-कथा हमें यही सिखाती है। किन्तु गुण-अवगुण दोनों में एक संतुलन बना रहे, यह हमारा कर्तव्य है।

बात करते हैं आज के रावण की।

आज के दुराचारियों अथवा कहें दुष्कर्मियों को रावण कह कर सम्बोधित किया जा रहा है। वर्तमान समाज के अपराधियों को, महिलाओं पर अत्याचार करने वाले युवकों को रावण कहने का औचित्य। क्या सत्य में ही दोनों के अपराध समान हैं । यदि अपराध समान हैं तो परिणाम क्यों नहीं समान हैं?

किन्तु आज कहां है रावण ?

आज रावण नहीं है। यदि रावण है तो राम भी होने चाहिए। किन्तु राम भी तो नहीं है।

 

आज वे उच्छृंखल युवक हैं जो निडर भाव से अपराधों में लिप्त हैं। वे जानते हैं वे अपने हर अपकृत्य से बच निकलेंगे। समाज एवं परम्पराओं के भय से पीड़ित अपनी व्यथा प्रकट नहीं करेगा, और यदि कर भी देगा तब भी परिवार से तो संरक्षण मिलेगा ही, अपने दांव-पेंच से कानून से भी बच निकलेंगे।

रावण शब्द का प्रयोग बुराई के प्रतीक के रूप में किया जाता है। उस युग में तो राम थे, रावण रूपी बुराई का अन्त करने के लिए। आज हम उस रावण का पुतला जलाने के लिए तो तैयार बैठे रहते हैं वर्ष भर। आज हमने बुराई का प्रतीक रावण तो बना लिया किन्तु उसके समापन के लिए राम कौन-कौन बनेगा?

 

   यदि हम रावण शब्द का प्रयोग बुराई के प्रतीक के रूप में करते हैं तो इस बुराई को दूर करने के उपाय अथवा साधन भी सोचने चाहिए। बेरोजगारी, अशिक्षा, पिछड़ापन, रूढ़ियों के रावण विशाल हैं। लड़कियों में डर का रावण और युवकों में छूट का रावण हावी है।

जिस दिन हम इससे विपरीत मानसिकता का विकास करने में सफल हो गये, उस दिन हम रावण की बात करना छोड़ देंगे। अर्थात् किसी के भी मन में अपराध का इतना बड़ा डर हो कि वह इस राह पर कदम ही न बढ़ा पाये और जिसके प्रति अपराध होते हैं वे इतने निडर हों कि अपराधी वृत्ति का व्यक्ति आंख उठाकर देख भी न पाये।

यदि फिर भी अपराध हों,  तो हम जिस प्रकार आज राम को स्मरण कर अच्छाई की बात करते हैं, वैसे ही सत्य का समर्थन करने का साहस करें और जैसे आज रावण को एक दुराचारी के रूप में स्मरण करते हैं वैसे ही अपराधी के प्रति व्यवहार करें, तब सम्भव है कोई परिवर्तन दिखाई दे, और आज का रावण लुप्त हो।

 

प्रेम की एक नवीन धारा

हां, प्रेम सच्चा रहे,

 

हां , प्रेम सच्चा रहे,

हर मुस्कुराहट में

हर आहट में

रूदन में या स्मित में

प्रेम की धारा बही

मन की शुष्क भूमि पर

प्रेम-रस की

एक नवीन छाया पड़ी।

पल-पल मानांे बोलता है

हर पल नवरस घोलता है

एक संगीत गूंजता है

हास की वाणी बोलता है

दूरियां सिमटने लगीं

आहटें मिटने लगीं

सबका मन

प्रेम की बोली बोलता है

दिन-रात का भान न रहा

दिन में भी

चंदा चांदनी बिखेरने लगा

टिमटिमाने लगे तारे

रवि रात में भी घाम देने लगा

इन पलों का एहसास

शब्दातीत होने लगा

बस इतना ही

हां, प्रेम सच्चा रहे

हां, प्रेम सच्चा लगे

 

तिरंगे का  एहसास

जब हम दोनों

साथ खड़े होते हैं

तब

तिरंगे का

एहसास होता है।

केसरिया

सफ़ेद और हरा

मानों

साथ-साथ चलते हैं

बाहों में बाहें डाले।

चलो, यूँ ही

आगे बढ़ते हैं

अपने इस मैत्री-भाव को

अमर करते हैं।

 

छोड़ी हमने मोह-माया

नहीं करने हमें

किसी के सपने साकार।

न देखें हमारी आयु छोटी

न समझे कोई हमारे भाव।

मां कहती

पढ़ ले, पढ़ ले।

काम  कर ले ।

पिता कहते

बढ़ ले बढ़ ले।

सब लगाये बैठे

बड़ी-बड़ी आस।

ले लिया हमने

इस दुनिया से सन्यास।

छोड़ी हमने मोह-माया

हो गई हमारी कृश-काया।

हिमालय पर हम जायेंगे।

वहीं पर धूनी रमायेंगे।

आश्रम वहीं बनायेंगे।

आसन वहीं जमायेंगे।

चेले-चपाटे बनायेंगे।

सेवा खूब करायेंगे।

खीर-पूरी खाएंगें।

लौटकर घर न आयेंगे।

नाम हमारा अमर होगा,

धाम हमारा अमर होगा,

ज्ञान हमारा अमर होगा।

कहां किस आस में

सूर्य की परिक्रमा के साथ साथ ही परिक्रमा करता है सूर्यमुखी

अक्सर सोचती हूं रात्रि को कहां किस आस में रहता है सूर्यमुखी

सम्भव है सिसकता हो रात भर कहां चला जाता है मेरा हमसफ़र

शायद इसीलिए प्रात में अश्रुओं से नम सुप्त मिलता है सूर्यमुखी

ऐसा अक्सर होता है
ऐसा अक्सर होता है जब हम रोते हैं जग हंसता है

ऐसा अक्सर होता है हम हंसते हैं जग ताने कसता है

न हमारी हंसी देख सकते हो न दुख में साथ होते हो

दुनिया की बातों में आकर मन यूँ ही फ़ँसता है।