मौसम के रूप समझ न  आयें

कोहरा है या बादलों का घेरा, हम बनते पागल।

कब रिमझिम, कब खिलती धूप, हम बनते पागल।

मौसम हरदम नये-नये रंग दिखाता, हमें भरमाता,

मौसम के रूप समझ न  आयें, हम बनते पागल।

सच्चाई से भाग रहे

मुख देखें बात करें।

सुख देखें बात करें।

सच्चाई से भाग रहे,

धन देखें बात करें।

किसे अपना समझें किसे पराया

किसे अपना समझें किसे पराया 

मन के द्वार पर पहरे लगाकर बैठे हैं आज।

कोई भाव पढ़ न ले, गांठ बांध कर बैठे हैं आज।

किसे अपना समझें, किसे पराया, समझ नहीं,

अपनों को ही पराया समझ कर बैठे हैं आज।

कहानी टूटे-बिखरे रिश्तों की

कुछ यादें,

कुछ बातें चुभती हैं

शीशे की किरचों-सी।

रिसता है रक्त, धीरे-धीरे।

दाग छोड़ जाता है।

सुना है मैंने

खुरच कर नमक डालने से

खुल जाते हैं ऐसे घाव।

किरचें छिटक जाती हैं।

अलग-से दिखाई देने लगती हैं।

घाव की मरहम-पट्टी को भूलकर,

हम अक्सर उन किरचों को

समेटने की कोशिश करते हैं।

कि अरे !

इस छोटे-से टुकड़े ने

इतने गहरे घाव कर दिये थे,

इतना बहा था रक्त

इतना सहा था दर्द।

और फिर अनजाने में

फिर चुभ जाती हैं वे किरचें।

और यह कहानी

जीवन भर दोहराते रहते हैं हम।

शायद यह कहानी

किरचों की नहीं,

टूटे-बिखरे रिश्तों की है ,

या फिर किरचों की

या फिर टूटे-बिखरे रिश्तों की ।।।।

 

मज़बूरी से बड़ी होती है जिद्द

सुना है मैंने,

रेत पर घरौंदे नहीं बनते।

धंसते हैं पैर,

कदम नहीं उठते।

.

वैसे ऐसा भी नहीं

कि नामुमकिन हो यह।

सीखते-सीखते

सब सीख जाता है इंसान,

‘गर मज़बूरी हो

या जिद्द।

.

मज़बूरी से बड़ी होती है जिद्द,

और जब जिद्द हो,

तो रेत क्या

और पानी क्या,

घरौंदे भी बनते हैं ,

पैर भी चलते हैं,

और ऐसे ही कारवां भी बनते हैं।

 

 

बेनाम वीरों को नमन करूं

किस-किस का नाम लूं

किसी-किस को छोड़ दूं

कहां तक गिनूं,

किसे न नमन करूं

सैंकड़ों नहीं लाखों हैं वे

देश के लिए मर मिटे

इन बेनाम वीरों को

क्‍यों न नमन करूं।

कोई घर बैठे कर्म कर रहा था

तो कोई राहों में अड़ा था

किसी के हाथ में बन्‍दूक थी

तो कोई सबके आगे

प्रेरणा-स्रोत बन खड़ा था।

कोई कलम का सिपाही था

तो कोई राजनीति में पड़ा था।

कुछ को नाम मिला

और कुछ बेनाम ही

मर मिटे थे

सालों-साल कारागृह में पड़े रहे,  

लाखों-लाखों की एक भीड़ थी

एक ध्‍वज के मान में

देश की शान में

मर मिटी थी

इसी बेनाम को नमन करूं

इसी बेनाम को स्‍मरण करूं। 

 

आने वाला कल

अपने आज से परेशान हैं हम।

क्या उपलब्धियां हैं

हमारे पास अपने आज की,

जिन पर

गर्वोन्नत हो सकें हम।

और कहें

बदलेगा आने वाला कल।

.

कैसे बदलेगा

आने वाला कल,

.

डरे-डरे-से जीते हैं।

सच बोलने से कतराते हैं।

अन्याय का

विरोध करने से डरते हैं।

भ्रमजाल में जीते हैं -

आने वाला कल अच्छा होगा !

सही-गलत की

पहचान खो बैठे हैं हम,

बनी-बनाई लीक पर

चलने लगे हैं हम।

राहों को परखते नहीं।

बरसात में घर से निकलते नहीं।

बादलों को दोष देते हैं।

सूरज पर आरोप लगाते हैं,

चांद को घटते-बढ़ते देख

नाराज़ होते हैं।

और इस तरह

वास्तविकता से भागने का रास्ता

ढूंढ लेते हैं।

-

तो

कैसे बदलेगा आने वाला कल ?

क्योंकि

आज ही की तो

प्रतिच्छाया होता है

आने वाला कल।

 

बूंद-बूंद से घट भरता था

जिन ढूंढा तिन पाईया

गहरे पानी पैठ,

बात पुरानी हो गई।

आंख में अब

पानी कहां रहा।

मन की सीप फूट गई।

दिल-सागर-नदिया

उथले-उथले हो गये।

तलछट में क्या ढूंढ रहे।

बूंद-बूंद से घट भरता था।

जब सीपी पर गिरती थी,

तब माणिक-मोती ढलता था।

अब ये कैसा मन है

या तो सब वीराना

सूखा-सूखा-सा रहता है,

और जब मन में

कुछ फंसता है,

तो अतिवृष्टि

सब साथ बहा ले जाती है,

कुछ भी तो नहीं बचता है।

 

 

कभी कुछ नहीं बदलता

एक वर्ष

और गया मेरे जीवन से।

.

अथवा

यह कहना शायद

ज़्यादा अच्छा लगेगा,

कि

एक वर्ष

और मिला जीने के लिए।

.

जीवन एक रेखा है,

जिस पर हम

बढ़ते हैं,

चलते तो आगे हैं,

पर पता नहीं क्यों,

पीछे मुड़कर

देखने लगते हैं।

.

समस्याओं,

उलझनों से जूझते,

बीत रहा था 2020

जैसे रोज़, हर रोज़

प्रतीक्षा करते थे

एक नये वर्ष की,

खटखटाएगा द्वार।

भीतर आकर

सहलायेगा माथा।

न निराश हो,

आ गया हूं अब मैं

सब बदल दूंगा।

.

पर मुझे अक्सर लगता है,

कभी कुछ नहीं बदलता।

कुछ हेर-फ़ेर के साथ

ज़िन्दगी, दोहराती है,

बस हमारी समझ का फ़ेर है।

 

स्वर्गिक सौन्दर्य रूप

रूईं के फ़ाहे गिरते थे  हम हाथों से सहलाते थे।

वो हाड़ कंपाती सर्दी में बर्फ़ की कुल्फ़ी खाते थे।

रंग-बिरंगी दुनिया श्वेत चादर में छिप जाती थी,

स्वर्गिक सौन्दर्य-रूप, मन आनन्दित कर जाते थे।

इसे राजनीति कहते हैं

आजकल हम

एक अंगुली से

एक मशीन पर

टीका करते हैं,

किसी की

कुर्सी खिसक जाती है,

किसी की टिक जाती है।

कभी सरकारें गिर जाती हैं,

कभी खड़ी हो जाती हैं।

हम हतप्रभ से

देखते रह जाते हैं,

हमने तो किसी और को

टीका किया था,

अभिषेक

किसी और का चल रहा है।

 

क्यों न कहे

आंखें देखती हैं,

कान सुनते हैं,

दिल जलता है,

माथा तपता है,

सब चुपचाप चलता है।

.

किन्तु यह जिह्वा

सह नहीं पाती,

सब कह बैठती है।

 

नहीं छूटता अतीत

मैं बागवानी तो नहीं जानती।

किन्तु सुना है

कि कुछ पौधे

सीधे नहीं लगते,

उनकी पौध लगाई जाती है।

नर्सरी से उखाड़कर

समूहों में लाये जाते हैं,

और बिखेरकर,

क्यारियों में

रोप दिये जाते हैं।

अपनी मिट्टी,

अपनी जड़ों से उखड़कर,

कुछ सम्हल जाते हैं,

कुछ मर जाते हैं,

और कुछ अधूरे-से

ज़िन्दगी की

लड़ाई लड़ते नज़र आते हैं।

-

हम,

जहां अपने अतीत से,

विगत से,

भागने का प्रयास करते हैं,

ऐसा ही होता है हमारे साथ।

 

 

छोटी छोटी खुशियों से खुश रहती है ज़िन्दगी

 

बस हम समझ ही नहीं पाते

कितनी ही छोटी छोटी खुशियां

हर समय

हमारे आस पास

मंडराती रहती हैं

हमारा द्वार खटखटाती हैं

हंसाती हैं रूलाती हैं

जीवन में रस बस जाती हैं

पर हम उन्हें बांध नहीं पाते।

आैर इधर

एक आदत सी हो गई है

एक नाराज़गी पसरी रहती है

हमारे चारों ओर

छोटी छोटी बातों पर खिन्न होता है मन

रूठते हैं, बिसूरते हैं, बहकते हैं।

उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से उजली क्यों

उसकी रिंग टोन मेरी रिंग टोन से नई क्यों।

गर्मी में गर्मी क्यों और   शीत ऋतु में ठंडक क्यों

पानी क्यों बरसा

मिट्टी क्यों महकी, रेत क्यों सूखी

बिल्ली क्यों भागी, कौआ क्यों बोला

ये मंहगाई

गोभी क्यों मंहगी, आलू क्यों सस्ता

खुशियों को पहचानते नहीं

नाराज़गी के कारण ढूंढते हैं।

चिड़चिड़ाते हैं, बड़बड़ाते हैं

अन्त में मुंह ढककर सो जाते हैं ।

और अगली सुबह

फिर वही राग अलापते हैं।

दीप तले अंधेरे की बात करते हैं

सूरज तो सबका है,

सबके अंधेरे दूर करता है।

किन्तु उसकी रोशनी से

अपना मन कहां भरमाता है ।

-

अपनी रोशनी के लिए,

अपने गुरूर से

अपना दीप प्रज्वलित करते है।

और अंधेरा मिटाने की बात करते हैं।

-

फिर  भी अक्सर

न जाने क्यों

दीप तले अंधेरे की बात करते हैं।

-

तो हिम्मत करें,

हाथ पर रखें लौ को

तब जग से

तम मिटाने की बात करते हैं।

 

 

लौट-लौटकर जीती हूं जीवन

चेहरे की रेखाओं को

नहीं गिनती मैं,

मन के दर्पण में

भाव परखती हूं।

आयु से

अपनी कामनाओं को

नहीं नापती मैं,

अधूरी छूटी कामनाओं को

पूरा करने के लिए

दर्पण में

राह तलाशती हूं मैं।

अपनी वह छाया

परखती हूं,

जिसके सपने देखे थे।

कितने सच्चे थे

कितने अपने थे,

कितने छूट गये

कितने मिट गये

दोहराती हूं मैं।

चेहरे की रेखाओं को

नहीं गिनती मैं,

अपनी आयु से

नहीं डरती मैं।

लौट-लौटकर

जीती हूं जीवन।

जीवन-रस पीती हूं।

क्योंकि

मैं रेखाएं नहीं गिनती,

मैं मरने से नहीं डरती।

 

 

मंजी दे जा मेरे भाई

भाई मेरे

मंजी दे जा।

बड़े काम की है यह मंजी।

 -

सर्दी के मौसम में,

प्रात होते ही

यह मंजी

धूप में जगह बना लेती है।

सारा दिन

धीरे-धीरे खिसकती रहती है

सूरज के साथ-साथ।

यहीं से

हमारे दिन की शुरूआत होती है,

और यहीं शाम ढलती है।

पूरा परिवार समा जाता है

इस मंजी पर।

कोई पायताने, कोई मुहाने,

कोई बाण पर, कोई तान पर,

कोई नवार पर,

एक-दूसरे की जगह छीनते।

बतंगड़बाजी करते ]

निकलता है पूरा दिन

इसी मंजी पर।

सुबह का नाश्ता

दोपहर की रोटी,

दिन की झपकी,

शाम की चाय,

स्वेटर की बुनाई,

रजाईयों की तरपाई,

कुछ बातचीत, कुछ चुगलाई,

पापड़-बड़ियों की बनाई,

मटर की छिलकाई,

साग की छंटाई,

बच्चों की पढ़ाई,

आस-पड़ोस की सुनवाई।

सब इसी मंजी पर।

-

भाई मेरे, मंजी दे जा।

दे जा मंजी मेरे भाई।

 

गगन

गगन

बादलों के आंचल में

चांद को समेटकर

छुपा-छुपाई खेलता रहा।

और हम

घबराये,

बौखलाये-से

ढूंढ रहे।

 

गगन 1

गगन के आंचल में

चांद खेलता।

बिखेरता चांदनी,

जीवन हमारा

दमकता।

 

नदी के उस पार कच्चा रास्ता है

कच्ची राहों पर चलना

भूल रहे हैं हम,

धूप की गर्मी से

नहीं जूझ रहे हैं हम।

पैरों तले बिछते हैं 

मखमली कालीन,

छू न जाये कहीं

धरा का कोई अंश।

उड़ती मिट्टी पर

लगा दी हैं

कई बंदिशें,

सिर पर तान ली हैं,

बड़ी-बड़ी छतरियां

हवा, पानी, रोशनी से

बच कर निकलने लगे हैं हम।

पानी पर बांध लिए हैं

बड़े-बड़े बांध,

गुज़र जायेंगी गाड़ियां,

ज़रूरत पड़े तो

उड़ा लेंगे विमान,

 

पर याद नहीं रखते हम

कि ज़िन्दगी

जब उलट-पलट करती है,

एक साथ बिखरता है सब

टूटता है, चुभता है,

हवा,पानी, मिट्टी

सब एकमेक हो जाते हैं

तब समझ में आता है

यह ज़िन्दगी है एक बहाव

और नदी के उस पार

कच्चा रास्ता है।

अब शब्दों के अर्थ व्यर्थ हो गये हैं

शब्दकोष में अब शब्दों के अर्थ

व्यर्थ हो गये हैं।

हर शब्द 

एक नई अभिव्यक्ति लेकर आया है।

जब कोई कहना है अब चारों ओर शांति है

तो मन डरता है

कोई उपद्रव हुआ होगा, कोई दंगा या मारपीट।

और जब समाचार गूंजता है

पुलिस गश्त कर रही है, स्थिति नियन्त्रण में है

तो स्पष्ट जान जाते हैं हम

कि बाहर कर्फ्यू है, कुछ घर जले हैं

कुछ लोग मरे हैं, सड़कों पर  घायल पड़े हैं।

शायद, सेना का फ्लैग मार्च हुआ होगा

और हमें अब अपने आपको

घर में बन्द करना होगा ।

अहिंसा के उद्घोष से

घटित हिंसा का बोध होता है।

26 जनवरी, 15 अगस्त जैसे दिन

और बुद्ध, नानक, कबीर, गांधी, महावीर के नाम पर

मात्र एक अवकाश का एहसास होता है

न कि किसी की स्मृति, ज्ञान, शिक्षा, बलिदान का।

धर्म-जाति, धर्मनिरप्रेक्षता, असाम्प्रदायिकता,

सद्भाव, मानवता, समानता, मिलन-समारोह

जैसे शब्द डराते हैं अब।

वहीं, आरोपी, अपराधी, लुटेरे,

स्कैम, घोटाले जैसे शब्द

अब बेमानी हो गये हैं

जो हमें न डराते हैं, और न ही झिंझोड़ते हैं।

“वन्दे मातरम्” अथवा “भारत माता की जय”

के उद्घोष से हमारे भीतर

देश-भक्ति की लहर नहीं दौड़ती

अपितु अपने आस-पास

किसी दल का एहसास खटकता है

और प्राचीन भारतीय योग पद्धति के नाम पर

हमारा मन गर्वोन्नत नहीं होता

अपितु एक अर्धनग्न पुरूष गेरूआ कपड़ा ओढ़े

घनी दाढ़ी और बालों के साथ

कूदता-फांदता दिखाई देता है

जिसने कभी महिला वस्त्र धारण कर

पलायन किया था।

कोई मुझे “बहनजी” पुकारता है

तो मायावती होने का एहसास होता है

और “पप्पू” का अर्थ तो आप जानते ही हैं।

 

कुछ ज़्यादा तो नहीं हो गया।

कहीं आप उब तो नहीं गये

चलो आज यहीं समाप्त करती हूं

बदले अर्थों वाले शब्दकोष के कुछ नये शब्द लेकर

फिर कभी आउंगी

अभी आप इन्हें तो आत्मसात कर लें

और अन्त में, मैं अब

बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार और

सम्मान शब्‍दों   के

नये अर्थों की खोज करने जा रही हूं।

ज्ञात होते ही आपसे फिर मिलूंगी

या फिर उनमें जा मिलूंगी

फिर कहां मिलूंगी ।।।।।।।

 

कभी गोल हुआ करता था पैसा

कभी गोल हुआ करता था पैसा

इसलिए कहा जाता था

टिकता नहीं किसी के पास।

पता नहीं

कब लुढ़क जाये,

और हाथ ही न आये।

फिर खन-खन भी करता था पैसा।

भरी और भारी रहती थीं

जेबें और पोटलियां।

बचपन में हम

पैसों का ढेर देखा करते थे,

और अलग-अलग पैसों की

ढेरियां बनाया करते थे।

घर से एक पैसा मिलता था

स्कूल जाते समय।

जिस दिन पांच या दस पैसे मिलते थे,

हमारे अंदाज़ शाही हुआ करते थे।

लेकिन अब कहां रह गये वे दिन,

जब पैसों से आदमी

शाह हुआ करता था।

अब तो कागज़ से सरक कर

एक कार्ड में पसर कर

रह गया है पैसा।

वह आनन्द कहां

जो रेज़गारी गिनने में आता था।

तुम क्या समझोगे बाबू!!!

 

 

वास्तविकता में नहीं जीते हम

मैं जानती हूं

मेरी सोच कुछ टेढ़ी है।

पर जैसी है

वैसा ही तो लिखूंगी।

* *  *  * 

नारी के

इस तरह के चित्र देखकर

आप सब

नारीत्व के गुण गायेंगे,

ममता, त्याग, तपस्या

की मूर्ति बतायेंगे।

महानता की

सीढ़ी पर चढ़ायेंगे।

बच्चों को गोद में

उठाये चल रही है,

बच्चों को

कष्ट नहीं देना चाहती,

नमन है तेरे साहस को।

 

अब पीछे

भारत का मानचित्र दिखता है,

तब हम समझायेंगे

कि पूरे भारत की नारियां

ऐसी ही हुआ करती हैं।

अपना सर्वस्व खोकर

बच्चों का पालन-पोषण करती हैं।

फिर हमें याद आ जायेंगी

दुर्गा, सती-सीता, सावित्री,

पद्मिनी, लक्ष्मी बाई।

हमें नहीं याद आयेंगी

कोई महिला वैज्ञानिक, खिलाड़ी

प्रधानमंत्री, राष्ट््रपति,

अथवा कोई न्यायिक अधिकारी

पुलिस, सेना अधिकारी।

समय मिला

तो मीडिया वाले

साक्षात्कार लेकर बतायेंगे

यह नारी

न न, नारी नहीं,

मां है मां ! भारत की मां !

मेहनत-मज़दूरी करके

बच्चों को पाल रही है।

डाक्टर-इंजीनियर बनाना चाहती है।

चाहती है वे पुलिस अफ़सर बनें,

बड़े होकर मां का नाम रोशन करें,

वगैरह, वगैरह।

 

* *  *  * 

लेकिन इस चित्र में

बस एक बात खलती है।

आंसुओं की धार

और अच्छी बहती,

गर‘ मां के साथ

लड़कियां दिखाते,

तो कविता लिखने में

और ज़्यादा आनन्द पाते।

* *  *  * 

वास्तव में

जीवन की

वास्तविकता में नहीं जीते हम,

बस थोथी भावुकता परोसने में

टसुए बहाने में

आंसू टपकाने में,

मज़ा लेते हैं हम।

* *  *  * 

ओहो !

एक बात तो रह ही गई,

इसके पति, बच्चों के पिता की

कोई ख़बर मिले तो बताना।

 

आज का रावण

 

हमारे शास्त्रों में, ग्रंथों में जो कथाएं सिद्ध हैं, आम जन तक पहुंचते-पहुंचते बहुत बदल जाती हैं। सत्य-असत्य से अलग हो जाती हैं। हमारी अधिकांश कथाओं के आधार और परिणाम वरदान और श्राप पर आधारित हैं।

प्राचीन ग्रंथों एवं रामायण में वर्णित कथानक के अनुसार रावण एक परम शिव भक्त, उद्भट राजनीतिज्ञ, महापराक्रमी योद्धा, अत्यन्त बलशाली, शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता, प्रकाण्ड विद्वान पंडित एवं महाज्ञानी था। रावण के शासन काल में लंका का वैभव अपने चरम पर था इसलिये उसकी लंकानगरी को सोने की लंका कहा जाता है।

हिन्दू ज्योतिषशास्त्र में रावण संहिता को एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक माना जाता है और इसकी रचना रावण ने की थी।

   रावण ने राम के लिए उस पुल के लिए यज्ञ किया, जिसे पारकर राम की सेना लंका पहुंच सकती थी, यह जानते हुए भी रावण ने राम के निमन्त्रण को स्वीकार किया और अपना कर्म किया।

 

 रावण अपने समय का सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है और रामायण के अनुसार जब रावण मृत्यु शय्या पर था तब राम ने लक्ष्मण को रावण से शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया था और रावण ने यहां भी अपना कर्म किया था।

   निःसंदेह हमारी धार्मिकता, आस्था, विश्वास, चरित्र आदि विविध गुणों के कारण राम का चरित्र सर्वोपरि है। रावण रामायण का एक केंद्रीय प्रतिचरित्र है। रावण लंका का राजा था। रामकथा में रावण ऐसा पात्र है, जो राम के उज्ज्वल चरित्र को उभारने का काम करता है।

रावण राक्षस कुल का था, अतः उसकी वृत्ति भी राक्षसी ही थी। यही स्थिति शूर्पनखा की भी थी। उसने प्रेम निवेदन किया, विवाह-प्रस्ताव किया जिसे   राम एवं लक्ष्मण ने अस्वीकार किया। इस अस्वीकार का कारण सीता को मानते हुए शूर्पनखा ने सीता को हानि पहुंचाने का प्रयास किया, इस कारण लक्ष्मण ने शूर्पनखा को आहत किया, उसकी नाक काट दी।

रावण ने घटना को जानकर अपनी बहन का प्रतिशोध लेने के लिए सीता का अपहरण किया, किन्तु उसे किसी भी तरह की कोई हानि नहीं पहुंचाई। रावण अपनी पराजय भी जानता था किन्तु फिर भी उसने बहन के सम्मान के लिए अपने हठ को नहीं छोड़ा।

   समय के साथ एवं साहित्येतिहास में कुछ प्रतीक रूढ़ हो जाते हैं, और फिर वे ही उसकी अर्थाभिव्यक्ति बन कर रह जाते हैं। बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में यह कथा रूढ़ हुई और रावण के गुणों पर उसका  कृत्य हावी हुआ। किसी भी समाज के उत्थान के लिए इससे अच्छी बात कोई नहीं कि अच्छाई का प्रचार हो, हमारे भीतर उसका समावेश हो, और हम उस परम्परा को आगे बढ़ाएं। राम-कथा हमें यही सिखाती है। किन्तु गुण-अवगुण दोनों में एक संतुलन बना रहे, यह हमारा कर्तव्य है।

बात करते हैं आज के रावण की।

आज के दुराचारियों अथवा कहें दुष्कर्मियों को रावण कह कर सम्बोधित किया जा रहा है। वर्तमान समाज के अपराधियों को, महिलाओं पर अत्याचार करने वाले युवकों को रावण कहने का औचित्य। क्या सत्य में ही दोनों के अपराध समान हैं । यदि अपराध समान हैं तो परिणाम क्यों नहीं समान हैं?

किन्तु आज कहां है रावण ?

आज रावण नहीं है। यदि रावण है तो राम भी होने चाहिए। किन्तु राम भी तो नहीं है।

 

आज वे उच्छृंखल युवक हैं जो निडर भाव से अपराधों में लिप्त हैं। वे जानते हैं वे अपने हर अपकृत्य से बच निकलेंगे। समाज एवं परम्पराओं के भय से पीड़ित अपनी व्यथा प्रकट नहीं करेगा, और यदि कर भी देगा तब भी परिवार से तो संरक्षण मिलेगा ही, अपने दांव-पेंच से कानून से भी बच निकलेंगे।

रावण शब्द का प्रयोग बुराई के प्रतीक के रूप में किया जाता है। उस युग में तो राम थे, रावण रूपी बुराई का अन्त करने के लिए। आज हम उस रावण का पुतला जलाने के लिए तो तैयार बैठे रहते हैं वर्ष भर। आज हमने बुराई का प्रतीक रावण तो बना लिया किन्तु उसके समापन के लिए राम कौन-कौन बनेगा?

 

   यदि हम रावण शब्द का प्रयोग बुराई के प्रतीक के रूप में करते हैं तो इस बुराई को दूर करने के उपाय अथवा साधन भी सोचने चाहिए। बेरोजगारी, अशिक्षा, पिछड़ापन, रूढ़ियों के रावण विशाल हैं। लड़कियों में डर का रावण और युवकों में छूट का रावण हावी है।

जिस दिन हम इससे विपरीत मानसिकता का विकास करने में सफल हो गये, उस दिन हम रावण की बात करना छोड़ देंगे। अर्थात् किसी के भी मन में अपराध का इतना बड़ा डर हो कि वह इस राह पर कदम ही न बढ़ा पाये और जिसके प्रति अपराध होते हैं वे इतने निडर हों कि अपराधी वृत्ति का व्यक्ति आंख उठाकर देख भी न पाये।

यदि फिर भी अपराध हों,  तो हम जिस प्रकार आज राम को स्मरण कर अच्छाई की बात करते हैं, वैसे ही सत्य का समर्थन करने का साहस करें और जैसे आज रावण को एक दुराचारी के रूप में स्मरण करते हैं वैसे ही अपराधी के प्रति व्यवहार करें, तब सम्भव है कोई परिवर्तन दिखाई दे, और आज का रावण लुप्त हो।

 

प्रणाम तुम्हें करती हूं

हे भगवान!

इतना उंचा मचान।

सारा तेरा जहान।

कैसी तेरी शान ।

हिमगिरि के शिखर पर

 बैठा तू महान।

 

कहते हैं

तू कण-कण में बसता है।

जहां रहो

वहीं तुझमें मन रमता है।

फिर क्यों

इतने उंचे शिखरों पर

धाम बनाया।

दर्शनों के लिए

धरा से गगन तक

इंसान को दौड़ाया।

 

ठिठुरता है तन।

कांपता है मन।

 

हिम गिरता है।

शीत में डरता है।

 

मन में शिवधाम सृजित करती हूं।

 

यहीं से प्रणाम तुम्हें करती हूं।

 

जीवन अंधेरे और रोशनियों के बीच

अंधेरे को चीरती

ये झिलमिलाती रोशनियां,

अनायास,

उड़ती हैं

आकाश की ओर।

एक चमक और आकर्षण के साथ,

कुछ नये ध्वन्यात्मक स्वर बिखेरतीं,

फिर लौट आती हैं धरा पर,

धीरे-धीरे सिमटती हैं,

एक चमक के साथ,

कभी-कभी

धमाकेदार आवाज़ के साथ,

फिर अंधेरे में घिर जाती हैं।

 

जीवन जब

अंधेरे और रोशनियों में उलझता है,

तब चमक भी होती है,

चिंगारियां भी,

कुछ मधुर ध्वनियां भी

और धमाके भी,

आकाश और धरा के बीच

जीवन ऐसे ही चलता है।

 

कौन है अपना कौन पराया कैसे जानें हम

अधिकार भी व्यापार हो गये हैं

तंग गलियों में हथियार हो गये हैं।

किसको मारें किसको काटें

कौन जलेगा, कहां मरेगा

अब क्या जानें हम।

अंधेरी राहों में भटक रहे हैं

अपने ही चेहरों से अनजाने हम।

दिन की भटकन छूट गई

रातें भीतर बिखर गईं

कौन है अपना कौन पराया

कैसे जानें हम।

अनजानी राहों पर

किसके पीछे

क्यों निकल पड़े हैं

 

इतना भी न जाने हम।

अपना ही घर फूंक रहे हैं,

राख में मोती ढूंढ रहे हैं,

श्मशानों में न घर बनते

इतना कब जानेंगे हम।

 

आत्मस्वीकृति

कौन कहता है

कि हमें ईमानदारी से जीना नहीं आता

अभी तो जीना सीखा है हमने।

 

दुकानदार जब सब्जी तोलता है

तो दो चार मटर, एक दो टमाटर

और कुछ छोटी मोटी

हरी पत्तियां तो चखी ही जा सकती हैं।

वैसे भी तो वह ज्यादा भाव बताकर

हमें लूट ही रहा था।

राशन की दुकान पर

और कुछ नहीं तो

चीनी तो मीठी ही है।

 

फिर फल वाले का यह कर्त्तव्य है

कि जब तक हम

फलों को जांचे परखें, मोल भाव करें

वह साथ आये बच्चे को

दो चार दाने अंगूर के तो दे।

और फल चखकर ही तो पता लगेगा

कि सामान लेने लायक है या नहीं

और बाज़ार से मंहगा है।

 

किसे फ़ुर्सत है देखने की

कि सिग्रेट जलाती समय

दुकानदार की माचिस ने

जेब में जगह बना ली है।

और अगर बर्तनों की दुकान पर

एक दो चम्मच या गिलास

टोकरी में गिर गये हैं

तो इन छोटी छोटी चीज़ों में

क्या रखा है

इन्हें महत्व मत दो

इन छोटी छोटी वारदातों को

चोरी नहीं ज़रूरत कहते हैं

ये तो ऐसे ही चलता है।

 

कौन परवाह करता है

कि दफ्तर के कितने पैन, कागज़ और रजिस्टर

घर की शोभा बढ़ा रहे हैं

बच्चे उनसे तितलियां बना रहे हैं

हवाई जहाज़ उड़ा रहे हैं

और उन कागज़ों पर

काले चोर की तस्वीर बनाकर

तुम्हें ही डरा रहे हैं।

लेकिन तुम क्यों डरते हो  ?

कौन पहचानता है इस तस्वीर को

क्योंकि हम सभी का चेहरा

किसी न किसी कोण से

इस तस्वीर के पीछे छिपा है

यह और बात है कि

मुझे तुम्हारा और तुम्हें मेरा दिखा है।

इसलिए बेहतर है दोस्त

हाथ मिला लें

और इस चित्र को

बच्चे की हरकत कह कर जला दें।

 

क्लोज़िंग डे

हर छ: महीने बाद

वर्ष में दो बार आने वाला

क्लोज़िंग डे

जब पिछले सब खाते

बन्द करने होते हैं

और शुरू करना होता है

फिर से नया हिसाब किताब।

मिलान करना होता है हर प्रविष्टि का,

अनेक तरह के समायोजन

और एक निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति।

मैंने कितनी ही बार चाहा

कि अपनी ज़िन्दगी के हर दिन को

बैंक का क्लोज़िंग डे बना दूं।

ज़िन्दगी भी तो बैंक का एक खाता ही है

पर फर्क बस इतना है कि

बैंक और बैंक के खाते

कभी तो लाभ में भी रहते हैं

ब्याज दर ब्याज कमाते हैं।

पर मेरी ज़िन्दगी तो बस

घाटे का एक उधार खाता बन कर रह गई है।

 

रोज़ शाम को

जब ज़िन्दगी की किताबों का

मिलान करने बैठती हूं

तो पाती हूं

कि यहां तो कुछ भी समायोजित नहीं होता।

कहीं कोई प्रविष्टि ही गायब है

तो कहीं एक के उपर एक

इतनी बार लिखा गया है कई कुछ

कि अपठनीय हो गया है सब।

फिर कहीं पृष्ट ही गायब हैं

और कहीं पर्चियां बिना हस्ताक्षर।

सब नियम विरूद्ध।

और कहीं दूर पीछे छूटते लक्ष्य।

कितना धोखा धड़ी भरा खाता है यह

कि सब नामे ही नामे है

जमा कुछ भी नहीं।

फिर खाता बन्द कर देने पर भी

उधार चुकता नहीं होता

उनका नवीनीकरण हो जाता है।

पिछला सब शेष है

और नया शुरू हो जाता है।

पिछले लक्ष्य अधूरे

नये लक्ष्यों का खौफ़।

एक एक कर खिसकते दिन।

दिन दिन से जुड़कर बनते साल।

उधार ही उधार।

कैसे चुकता होगा सब।

विचार ही विचार।

यह दिनों और सालों का हिसाब।

और उन पर लगता ब्याज।

इतिहास सदा ही लम्बा होता है

और वर्तमान छोटा।

इतिहास स्थिर होता है

और वर्तमान गतिशील।

सफ़र जारी है

उस दिन की ओर 

जिस दिन

अपनी ज़िन्दगी के खातों में

कोई समायोजित प्रविष्टि,

कोई मिलान प्रविष्टि

करने में सफ़लता मिलेगी।

वही दिन

मेरी जिन्दगी का

ओपनिंग  डे होगा

पर क्या कोई ऐसा भी दिन होगा ?

 

भेदभावकारी योजनाएं

(पंजाब नैशनल बैंक में एक योजना है “बहुलाभकारी”

बैंक में लिखा था “बहू लाभकारी”

इस मात्रा भेद ने मुझे इस रचना के लिए प्रेरित किया)

 

प्रबन्धक महोदय हैरान थे।

माथे पर

परेशानी के निशान थे।

बैंक के बाहर शहर भर की सासें जमा थीं

और मज़े की बात यह

कि इन सासों की नेता

प्रबन्धक महोदय की अपनी अम्मां थीं।

 

उनके हाथों में

बड़ी बड़ी तख्तियां थीं

नारे थे और फब्तियां थीं :

“प्रबन्धक महोदय को हटाओ

नहीं तो सासलाभकारी योजना चलाओ।

ये बैंक में परिवारवाद फैला रहे हैं

पत्नियों के नाम से

न जाने कितना कमा रहे हैं।

और हम सासों को

सड़क का रास्ता दिखा रहे हैं।

 

वे नये नये प्रबन्धक बने थे।

शादी भी नयी नयी थी।

अपनी पत्नी और माता के संग

इस शहर में आकर

अभी अभी बसे थे

फिर सास बहू में खूब पटती थी,

प्रबन्धक महोदय की जिन्दगी

बढ़िया चलती थी।

 

पर यह आज क्या हो गया?

अपनी अम्मां को देख

प्रबन्धक महोदय घबराये।

केबिन से उठकर बाहर आये।

और अम्मां से बोले

“क्या हो गया है तुम्हें अम्मां

ये तख्तियां लिए जुलूस में खड़ी हो।

क्यों मुझे नौकरी से निकलवाने पर तुली हो।

घर जाओ, खाओ पकाओ

सास बहू मौज उड़ाओ।

 

अम्मां ने दो आंसू टपकाए

और भरे गले से बोलीं

“बेटा, दुनिया कहती थी

शादी के बाद

बेटे बहुओं के होकर रह जाते हैं

पर मैं न मानती थी।

पर आज मैंने

अपनी आंखों से देख ली तुम्हारी करतूत।

बहू के आते ही

हो गये तुम कपूत।

सुन लो,

मैं इन सासों की नेता हूं।

और हम सासों की भीड़

यहां से हटानी है

तो इस बोर्ड पर लिख दो

कि तुम्हें

सासलाभकारी योजना चलानी है।“

 

यह सुन प्रबन्धक महोदय बोले,

“सुन ओ सासों की नेता,

जो कहता है तेरा बेटा,

ये योजनाएं तो उपर वाले बनाते हैं

इसमें हम प्रबन्धक कुछ नहीं कर पाते हैं।“

 

“झूठ बोलते हो तुम,

“परबन्धक “ अपनी बहू के”

सासों की नेता बोलीं

“शादी के बाद इधर आये हो

तभी तो ये बोर्ड लगवाए हो।

पुराने दफ्तर में तो

ये योजनाएं न थीं

वहां तो कोई तख्तियां जड़ीं न थीं।“

 

“ओ सासों की नेता

मैं पहले क्षेत्रीय कार्यालय में काम था करता।

किसी योजना में हाथ नहीं होता मेरा

किसने तुम्हें भड़का दिया

मैं सच्चा सुपूत हूं तेरा।“

प्रबन्धक महोदय बोले

“किसी भी योजना में

धन लगा दो, ओ सासो !

बैंक सबको

 

बिना भेद भाव

समान दर से है ब्याज है देता।

इस सासलाभकारी योजना की याद

तुम्हें क्यों आई ?

मेरे बैंक की

कौन सी योजना तुम्हें नहीं भाई ?

 

सासों की सामूहिक आवाज़ आई,

“यदि बैंक भेद भाव नहीं करता

तो यह बहू लाभकारी योजना क्यों चलाई?

तभी तो हमें

सासलाभकारी योजना की याद आई।

यदि सासों की भीड़ यहां से हटानी है

तो इस तख्ती पर लिख दो

कि तुम्हें

सास लाभकारी योजना चलानी है।

और यदि

सास लाभकारी योजना न चलाओ,

तो अपनी यह

बहू लाभकारी योजना हटाओ,

और सास बहू के लिए

कोई एक सी योजना चलाओ।“