हर घड़ी सुख बाँटती है ज़िंदगी

शून्य से सौ तक निरंतर दौड़ती है ज़िंदगी !

और आगे क्या , यही बस खोजती है ज़िंदगी !

चाह में कुछ और मिलने की सभी क्यों जी रहे –

 देखिये तो हर घड़ी सुख बाँटती है ज़िंदगी !

बाल-मजदूरी का एक श्रेष्ठि रूप

समाज, सरकार, समाजसेवी संस्थाएं बहुत चिन्तन-मनन करती हैं इस बाल-मजदूरी को रोकने के लिए। शिक्षा, रोटी की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं इनके लिए। ढाबों, होटलों, बस-अड्डों, रेलवे-स्टेशन, घरों एवं ऐसे ही अनेक स्थानों पर कार्य करते छोटे-छोटे बच्चों को देखा जा सकता है। वे किसके बच्चे हैं, क्यों कार्य कर रहे हैं, वे किन अभावों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं हम में से कोई नहीं जानता। लेकिन वे भीख नहीं मांगते, मेहनत करते हैं। शायद कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को इस तरह के कामों में नहीं डालना चाहते होंगे जब तक कि सामाजिक-आर्थिक विवशता न हो। सम्भव है कुछ बच्चे किसी गिरोह के शिकार बन कर ऐसे कार्य करते हों।

किन्तु जब ऐसे बाल-मजदूरों को उनके काम से हटा दिया जाता है तब वे कैसे जीवन-यापन करते हैं, नहीं पता। क्या उनका पुर्नवास होता है, क्या वे शिक्षा प्राप्त करने लगते हैं, क्या उन्हें भरपेट भोजन मिलने लगता है, नहीं पता। हां, इतना तो हम जानते ही हैं कि जिन पुनर्वास संस्थानों में उन्हें रखा जाता है वहां भी उनसे काम ही लिया जाता है। अनाथालयों में भी इनका शोषण ही होता है।

यह बाल-मजदूरी का वह रूप है जिस पर खूब चर्चाएं, गोष्ठियां होती हैं, चिन्तन होता है और लिखा-पढ़ा जाता है।

किन्तु बाल-मजदूरी का एक श्रेष्ठि रूप भी है जिस पर कभी कोई बात, चर्चा, विरोध नहीं होता।

जो बच्चे फिल्मों, धारावाहिकों, विज्ञापनों, टी.वी. कार्यक्रमों, विभिन्न प्रतियोगिताओं में दिनों, महीनों, सालों काम करते हैं क्या वह केवल कला है, अथवा बाल-मज़दूरी का दूसरा रूप ?यहां की चमक-दमक, प्रलोभन, नाम, प्रचार, आकर्षण में बांधते हैं, विशेषकर निर्धन परिवारों को। इन बाल- प्रतियोगिताओं में निर्धन परिवारों से आये बच्चों की बेचारगी का खूब प्रदर्शन और प्रचार होता है, टी.आर.पी. बढ़ती है। उनकी आर्थिक मदद का भी प्रचार होता है, बढ़िया खरीदारी करवाई जाती है, उनके घर की बदलती आर्थिक स्थिति का भी प्रदर्शन होता है।

 

लाखों में एक बच्चा तो आगे निकल जाता है किन्तु जो पिछड़ जाते हैं उनका क्या होता है, कौन जाने। बहुत पहले इन कार्यक्रमों में पराजित बच्चों की आत्महत्या के समाचार भी पढ़ने में आये थे। इन कार्यक्रमों में विजित बच्चों को इतना महिमा-मण्डित किया जाता है कि कोई भी आकर्षित हो जाये और पराजित बच्चे इतना निरादर अनुभव करते हैं कि वे और उनका परिवार इस तरह रोते-बिलखते हैं मानों कोई बड़ा हादसा हो गया हो। इस चकाचैंध से निकले बच्चे क्या लौटकर अपने सामान्य मध्यवर्गीय जीवन से जुड़ पाते हैं अथवा बिखर कर रह जाते हैं। दिन -प्रति-दिन यह कार्यक्रम, प्रतियोगिताएं न रहकर, कला का मंच न रहकर, केवल धन ही नहीं विलासिता का रूप ले चुके हैं।

अहंकार द्वेष ईर्ष्या

तीनों शब्द अहंकार ,द्वेष ,ईर्ष्या बोलने में हम साथ साथ बोल लेते हैं किन्तु सभी भिन्नार्थक हैं।

अहंकार मानव अपने आप पर करता है। जब मनुष्य को अपने गुणों, स्थिति, धन-सम्पत्ति अथवा योग्यता अर्थात व्यक्तिगत उपलब्धियों पर अभिमान होने लगता है और  वह दूसरे को अपने से हीन मानने लगता है तब वह अहंकार की स्थिति में जाता है।

ईर्ष्या प्रतियोगिता की अगली सीढ़ी है। जब हम प्रतियोगिता में किसी से आगे नहीं बढ़ सकते, तब उससे ईर्ष्या करने लगते हैं

ईर्ष्या तब होती है जब हम अपने आप को दूसरों से हीन समझने लगते हैं तभी तो किसी की प्रगति, उपलब्धि, धन-सम्पत्ति, योग्यता आदि की जब अकारण ही आलोचना करने लगते हैं, उसकी योग्यताओं में कमियां ढूंढने लगते हैं तब वह ईर्ष्या की स्थिति बन जाती है।

द्वेष ईर्ष्या की अगली सीढ़ी है। ईर्ष्या में वैर-भाव, हानि पंहुचाने का भाव नहीं रहता, जबकि द्वेष-भाव की स्थिति में मनुष्य सामने वाले से आगे बढ़ने के लिए कोई भी तरीका अपनाने का प्रयास करता है, उसका बुरा चाहने लगता है। फिर वह उसका रास्ता काटना हो, उसके रास्ते में रोड़े अटकाना हो अथवा स्वयं गलत रास्ते पर चलकर उससे आगे बढ़ना।

प्रतियोगिता का भाव मानव मन में बने रहना आवश्यक है तभी वह प्रगति कर सकता है। किन्तु कब वह अंहकार, ईर्ष्या, द्वेष में परिवर्तित हो जाता है वह मानव स्वयं भी नहीं जानता।

  

तल से अतल तक

तल से अतल तक

धरा से गगन तक

विस्तार है मेरा

काल के गाल में

टूटते हैं

बिखरते हैं

अकेलेपन से जूझते हैं

फिर संवरते हैं।

बस

इसी आस में

जीवन संवरते हैं !!!!!

 

आस नहीं छोड़ी मैंने

प्रकृति के नियमों को

हम बदल नहीं सकते।

जीवन का आवागमन

तो जारी है।

मुझको जाना है,

नव-अंकुरण को आना है।

आस नहीं छोड़ी मैंने।

विश्वास नहीं छोड़ा मैंने।

धरा का आसरा लेकर,

आकाश ताकता हूं।

अपनी जड़ों को

फिर से आजमाता हूं।

अंकुरण तो होना ही है,

बनना और मिटना

नियम प्रकृति का,

मुझको भी जाना है।

न उदास हो,

नव-अंकुरण फूटेंगे,

यह क्रम जारी रहेगा,

 

कयामत के दिन चार होते हैं

 

कहीं से सुन लिया है

कयामत के दिन चार होते हैं,

और ज़िन्दगी भी

चार ही दिन की होती है।

तो क्या कयामत और ज़िन्दगी

एक ही बात है?

नहीं, नहीं,

मैं ऐसे डरने वाली नहीं।

लेकिन

कंधा देने वाले भी तो

चार ही होते हैं

और दो-दूनी भी

चार ही होते हैं।

और हां,

बातें करने वाले भी

चार ही लोग होते हैं,

एक है न कहावत

‘‘चार लोग क्या कहेंगे’’।

वैसे मुझे अक्सर

अपनी ही समझ नहीं आती।।

बात कयामत की करने लगी थी

और दो-दूनी चार के

पहाड़े पढ़ने लगी।

ऐसे थोड़े ही होता है।

चलो, कोई बात नहीं।

फिर कयामत की ही बात करते हैं।

सुना है, कोई

कोरोना आया है,

आयातित,

कहर बनकर ढाया है।

पूरी दुनिया को हिलाया है

भारत पर भी उसकी गहन छाया है।

कहते हैं,

उसके साथ

छुपन-छुपाई खेल लो चार दिन,

भाग जायेगा।

तुम अपने घर में बन्द रहो

मैं अपने घर में।

ढूंढ-ढूंढ थक जायेगा,

और अन्त में थककर मर जायेगा।

तब मिलकर करेंगे ज़िन्दगी

और कयामत की बात,

चार दिन की ही तो बात है,

तो क्या हुआ, बहुत हैं

ये भी बीत जायेंगे।

 

माफ़ करना आप मुझे

मित्रो,

चाहकर भी आज मैं

कोई मधुर गीत ला न सकी।

माफ़ करना आप मुझे

देशप्रेम, एकता, सौहार्द पर

कोई नई रचना बना न सकी।

-

मेरी कलम ने मुझे  दे दिया धोखा,

अकेली पड़ गई मैं,

सुनिए मेरी व्यथा।

-

भाईचारे, देशप्रेम, आज़ादी

और अपनेपन की बात सोचकर,

छुआ कागज़ को मेरी कलम ने,

पर यह कैसा हादसा हो गया

स्याही खून बन गई,

सन गया कागज़,

मैं अवाक् ! देखती रह गई।

-

प्रेम, साम्प्रदायिक सौहार्द

और एकता की बात सोचते ही,

मेरी कलम बन्दूक की गोली बनी

हाथ से फिसली

बन्दूकों, गनों, तोपों और

मिसाईलों के नाम

कागज़ों को रंगने लगे।

आदमी मरने लगा।

मैं विवश ! कुछ न कर सकी।

-

धार्मिक एकता के नाम पर

कागज़ पर उभर आये

मन्दिर, मस्जिद और गुरुद्वारे।

न पूजा थी न अर्चना।

अरदास थी न नमाज़ थी।

दीवारें भरभराती थीं

चेहरे मिट्टी से सने।

और इन सबके बीच उभरी एक चर्च

और सब गड़बड़ा गया।

-

हार मत ! एक कोशिश और कर।

मेरे मन ने कहा।

साहस जुटाए  फिर कलम उठाई।

नया कागज़ लाईए नई जगह बैठी।

सोचने लगी

नैतिकता, बंधुत्व, सच्चाई

और ईमानदारी की बातें।

 

पर क्या जानती थी

कलमए जिसे मैं अपना मानती थी,

मुझे देगी दगा फिर।

मैं काव्य रचना चाहती थी,

वह गणना करने लगी।

हज़ारों नहीं, लाखों नहीं

अरबों-खरबों के सौदे पटाने लगी।

इसी में उसको, अपनी जीत नज़र आने लगी।

-

हारकर मैंने भारत-माता को पुकारा।

-

नमन किया,

और भारत-माता के सम्मान में

लिखने के लिए बस एक गीत

अपने कागज़-कलम को नये सिरे से संवारा।

-

पर, भूल गई थी मैं,

कि भारत तो कब का इंडिया हो गया

और माता का सम्मान तो कब का खो गया।

कलम की नोक तीखे नाखून हो गई।

विवस्त्र करते अंग-अंग,

दैत्य-सी चीखती कलम,

कागज़ पर घिसटने लगी,

मानों कोई नवयौवना सरेआम लुटती,

कागज़ उसके वस्त्र का-सा

तार-तार हो गया।

आज की माता का यही सत्कार हो गया।

-

किस्सा रोज़ का था।

कहां तक रोती या चीखती

किससे शिकायत करती।

धरती बंजर हो गई।

मैं लिख न सकी।

कलम की स्याही चुक गई।

कलम की नोक मुड़ गई ! !

-

मित्रो ! चाहकर भी आज मै

कोई मधुर गीत ल न सकी

माफ़ करना आप मुझे

देशप्रेम, एकता, सौहार्द पर

कोईए नई रचना बना न सकी!!

 

 

आतंक मन के भीतर पसरा है

शांत है मेरा शहर फिर भी देखो डरे हुए हैं हम

न चोरी न डाका फिर भी ताले जड़े हुए हैं हम

बाहर है सन्नाटा, आतंक मन के भीतर पसरा है

बेवजह डर डर कर जीना सीखकर बड़े हुए हैं हम

कृष्ण की पुकार

न कर वन्‍दन मेंरा

न कर चन्‍दन मेरा

अपने भीतर खोज

देख क्रंदन मेरा।

हर युग में

हर मानव के भीतर जन्‍मा हूं।

न महाभारत रचा

न गीता पढ़ी मैंने

सब तेरे ही भीतर हैं

तू ही रचता है।

ग्‍वाल-बाल, गैया-मैया, रास-रचैया

तेरी अभिलाषाएं

नाम मेरे मढ़ता है।

बस राह दिखाई थी मैंने  

न आयुध बांटे

न चक्रव्‍यूह रचे मैंने

लाक्षाग्रह, चीर-वीर,

भीष्‍म-प्रतिज्ञाएं

सब तू ही करता है

और अपराध छुपाने को अपना

नाम मेरा रटता है।

पर इस धोखे में मत रहना

तेरी यह चतुराई

कभी तुझे बचा पायेगी।

कुरूक्षेत्र अभी लाशों से पटा पड़ा है

देख ज़रा जाकर

तू भी वहीं कहीं पड़ा है।

 

कौन है राजा, कौन है रंक

जीत हार की बात न करना

गाड़ी यहां अड़ी हुई है।

कितने आगे कितने पीछे,

किसकी आगे, किसकी पीछे,

जांच अभी चली हुई है।

दोपहिए पर बैठे पांच,

चौपहिए में दस-दस बैठें,

फिर दौड़ रहे बाजी लेकर,

कानून तोड़ना हक है मेरा

देखें, किसकी दाल यहां गली हुई है।

गली-गली में शोर मचा है

मार-काट यहां मची हुई है।

कौन है राजा, कौन है रंक

जांच अभी चली हुई है।

राजा कहता मैं हूं रंक,

रंक पूछ रहा तो मैं हूं कौन

बात-बात में ठनी हुई है।

सड़कों पर सैलाब उमड़ता

कौन सही है कौन नहीं है,

आज यहां हैं कल वहां थे,

क्यों सोचे हम,

हमको क्या पड़ी हुई है।

कल हम थे, कल भी होंगे,

यही समझकर

अपनी जेब भरी हुई है।

 

अभी तो चल रही दाल-रोटी

जिस दिन अटकेगी

उस दिन हम देखेंगे

कहां-कहां गड़बड़ी हुई है।

अभी क्या जल्दी पड़ी हुई है।

 

स्वप्न हों साकार

तुम बरसो, मैं थाम लूं मेह की रफ्तार

न कहीं सूखा हो न धरती बहे धार धार

नदी, कूप, सर,निर्झर सब हों अमृतमय

शस्यश्यामला धरा पर स्वप्न  हों साकार

राम से मैंने कहा

राम से मैंने कहा, लौटकर न आना कभी इस धरा पर किसी रूप में।

सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान, उर्मिला नहीं मिलेंगें किसी रूप में।

किसने अपकर्म किया, किसे दण्ड मिला, कुछ तो था जो सालता है,

वही पुरानी लीक पीट रहे, सोच-समझ पर भारी धर्मान्धता हर रूप में

सोचने का वक्त ही कहां मिला

ज़िन्दगी की खरीदारी में मोल-भाव कभी कर न पाई

तराजू लेकर बैठी रही खरीद-फरोख्त कभी कर न पाई

कहां लाभ, कहां हानि, सोचने का वक्त ही कहां मिला

इसी उधेड़बुन में उलझी जिन्दगी कभी सम्हल न पाई

अब हर पत्थर के भीतर एक आग है।

मैंने तो सिर्फ कहा था "शब्द"

पता नहीं कब

वह शब्द नहीं रहे

चेतावनी हो गये।

मैंने तो सिर्फ कहा था "पत्थर"

तुम पता नहीं क्यों तुम

उसे अहिल्या समझ बैठे।

मैंने तो सिर्फ कहा था "नाम"

और तुम

अपने आप ही राम बन बैठे।

और मैंने तो सिर्फ कहा था

"अन्त"

पता नहीं कैसे

तुम उसे मौत समझ बैठे।

और यहीं से

ज़िन्दगी की नई शुरूआत हुई।

मौत, जो हुई नहीं

समझ ली गई।

पत्थर, जो अहिल्या नहीं

छू लिया गया।

और तुम राम नहीं।

और पत्थर भी अहिल्या नहीं।

जो शताब्दियों से

सड़क के किनारे पड़ा हो

किसी राम की प्रतीक्षा में

कि वह आयेगा

और उसे अपने चरणों से  छूकर

प्राणदान दे जायेगा।

किन्तु पत्थर

जो अहिल्या नहीं

छू लिया गया

और तुम राम नहीं।

जब तक तुम्हें

सही स्थिति का पता लगता

मौत ज़िन्दगी हो गई

और पत्थर आग।

वैसे भी

अब तब मौमस बहुत बदल चुका है।

जब तक तुम्हें

सही स्थिति का पता लगता

मौत ज़िन्दगी हो गई

और पत्थर आग।

एक पत्थर से

दूसरे पत्थर तक

होती हुई यह आग।

अब हर पत्थर के भीतर एक आग है।

जिसे तुम देख नहीं सकते।

आज दबी है

कल चिंगारी हो जायेगी।

अहिल्या तो पता नहीं

कब की मर चुकी है

और तुम

अब भी ठहरे हो

संसार से वन्दित होने के लिए।

सुनो ! चेतावनी देती हूं !

सड़क के किनारे पड़े

किसी पत्थर को, यूं ही

छूने की कोशिश मत करना।

पता नहीं

कब सब आग हो जाये

तुम समझ भी न सको

सब आग हो जाये,एकाएक।।।।

चिड़-चिड़ करती गौरैया

चिड़-चिड़ करती गौरैया

उड़-उड़ फिरती गौरैया

दाना चुगती, कुछ फैलाती

झट से उड़ जाती गौरैया

जीवन क्या होता है

जीवन में अमृत चाहिए

तो पहले विष पीना पड़ता है।

जीवन में सुख पाना है

तो दुख की सीढ़ी पर भी

चढ़ना पड़ता है।

धूप खिलेगी

तो कल

घटाएँ भी घिर आयेंगी

रिमझिम-रिमझिम बरसातों में

बिजली भी चमकेगी

कब आयेगी आँधी,

कब तूफ़ान से उजड़ेगा सब

नहीं पता।

जीवन में चंदा-सूरज हैं

तो ग्रहण भी तो लगता है

पूनम की रातें होती हैं

अमावस का

अंधियारा भी छाता है।

किसने जाना, किसने समझा

जीवन क्या होता है।

 

यही ठीक रहेगाः नहीं

 

एक अजीब सी दुविधा में थी वह। दो वर्ष का परिचय प्रगाढ़ सम्बन्ध में बदल चुका था। दोनो एक दूसरे को पसन्द भी करते थे  और दोनों ही परिवारों में विवाह हेतु भी स्वीकृति मिल चुकी थी। एक शालीन सम्बन्ध था दोनों के बीच।

रचना कविता-कहानियां लिखती, पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी एक अच्छी पहचान लिए हुए थी, तीन पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी थीं और उसका नाम इस क्षेत्र में बड़े सम्मान से लिया जाता था। उसकी अपनी एक अलग पहचान थी और नाम था।

रमन एक बड़ी कम्पनी में उच्चाधिकारी, दोनों ही अपने -अपने कार्य के प्रति आश्वस्त और परस्पर एक-दूसरे के काम का सम्मान भी करते थे।

बात आगे बढ़ी और एक दिन रचना और रमन अपने भावी जीवन की उड़ान की बात करने लगे। रमन ने हंस कर कहा अब दो महीने बाद तो तुम रचना वर्मा नहीं रचना माहेश्वरी के नाम से जानी जाओगी।

रचना एकदम चैंककर बोली, “ क्यों , मेरा नाम क्यों बदलेगा “?

“अरे मैं नाम की नहीं उपनाम की बात कर रहा हूं। विवाहोपरान्त लड़की को अपना उपनाम तो पति का ही रखना पड़ता है, इतना भी नहीं जानती तुम“?

“हां जानती हूं किन्तु किस कानून में लिखा है कि अवश्य ही बदलना पड़ता है।“

“अरे ये तो हमारी परम्पराएं हैं, हमारी संस्कृति है।“

“तुम कब से इतने पारम्परिक और सांस्कृतिक हो गये रमन? और जो मेरी अपनी पहचान है, अपने नाम की पहचान है, इतने वर्षों से मैंने बनाई है उसका क्या“?

“क्या तुम नहीं जानती कि विवाहोपरान्त तो लड़की की पहचान पति से होती है उसके नाम और उपनाम से होती है, विवाहोपरान्त तो तुम्हारी पहचान श्रीमती रमन माहेश्वरी ही होगी या चलो रचना माहेश्वरी, रचना वर्मा को तो तुम्हें भूलना होगा।“

“नहीं , रमन मैं ऐसा नहीं कर सकती, मैं अपने नाम, अपनी पहचान के साथ ही तुम्हारी जीवन-संगिनी बनना चाहती हूं न कि अपना नाम अपनी पहचान खोकर। निश्चित रूप से मेरी पहचान तुम्हारी पत्नी के रूप में तो होगी ही, किन्तु क्या तुम्हारे लिए मेरी व्यक्तिगत पहचान कोई अर्थ नहीं रखती, उसे कैसे खो सकती हूं मैं।“

“रमन का स्पष्ट उत्तर था, अगर मुझसे शादी करनी है तो तुम्हें अब मेरी पहचान, मेरे नाम को ही अपना बनाना होगा, तुम्हारे व्यक्तिगत नाम को मेरे नाम से ही जाना जायेगा, अन्यथा नहीं। “

रचना ने कहा, “हां यही ठीक रहेगाः नहीं“ !!!!!

कहां गये वे नेता -वेत्ता

कहां गये वे नेता -वेत्ता

चूल्हे बांटा करते थे।

किसी मंच से हमारी रोटी

अपने हित में सेंका करते थे।

बड़े-बड़े बोल बोलकर

नोटों की गिनती करते थे।

झूठी आस दिलाकर

वोटों की गिनती करते थे।

उन गैसों को ढूंढ रहे हम

किसी आधार से निकले थे,

कोई सब्सिडी, कोई पैसा

चीख-चीख कर हमको

मंचों से बतलाया करते थे।

वे गैस कहां जल रहे

जो हमारे नाम से लूटे थे।

बात करें हैं गांव-गांव की

पर शहरों में ही जाया करते थे।

 

आग कहीं भीतर जलती है

चूल्हे में जलता है दिल

अब हमको भरमाने को

कला, संस्कृति, परम्परा,

मां की बातें करते हैं।

सबको चाहे नया-नया,

मेरे नाम पर लीपा-पोती।

पंचतारा में भोजन करते

मुझको कहते चूल्हे में जा।

यह जिजीविषा की विवशता है

यह जिजीविषा की विवशता है

या त्याग-तपस्या, ज्ञान की सीढ़ी

जीवन से विरक्तता है

अथवा जीवित रहने के लिए

दुर्भाग्य की सीढ़ी।

ज्ञान-ध्यान, धर्म, साधना संस्कृति,

साधना का मार्ग है

अथवा ढकोसलों, अज्ञान, अंधविश्‍वासों को
व्यापती एक पाखंड की पीढ़ी।

या एकाकी जीवन की

विडम्बानाओं को झेलते

भिक्षा-वृत्ति के दंश से आहत

एक निरूपाय पीढ़ी।

लाखों-करोड़ों की मूर्तियां बनाने की जगह

इनके लिए एक रैन-बसेरा बनवा दें

हर मन्दिर के किसी कोने में

इनके लिए भी एक आसन लगवा दें।

कोई न कोई काम तो यह भी कर ही देंगे

वहां कोई काम इनको भी दिलवा दें,

इस आयु में एक सम्मानजनक जीवन जी लें

बस इतनी सी एक आस दिलवा दें।

जीना है तो बुझी राख में भी आग दबाकर रखनी पड़ती है

मन के गह्वर में एक ज्वाला जलाकर रखनी पड़ती है

आंसुओं को सोखकर विचारधारा बनाकर रखनी पड़ती है

ज़्यादा सहनशीलता, कहते हैं निर्बलता का प्रतीक होती है

जीना है तो, बुझी राख में भी आग दबाकर रखनी पड़ती है

घबराना मत

सूरत पर तो जाना मत

मौसम-सी बदले है अब

लाल-पीले रहते हरदम

चश्मा उतरे घबराना मत

कहने की ही बातें हैं

छल-कपट से दुनिया चलती, छल-कपट करते हैं लोग

कहने की ही बातें हैं कि यहाँ सब हैं सीधे-सादे लोग

बस कहने की बातें हैं, सच बोलो, सन्मार्ग अपनाओ

झूठ पालते, हेरी-फ़ेरी करते, वे ही कहलाते अच्छे लोग

शब्द  भावहीन होते हैं

कुछ भावों के

शब्द नहीं होते

और कुछ शब्द

भावहीन होते हैं

तरसता है मन।