दौड़ बनकर रह गई है जिन्दगी

शून्य से शतक तक की दौड़ बनकर रह गई है जिन्दगी

इससे आगे और क्या इस सोच में बह रही है जिन्दगी

औरऔर  मिलने की चाह में डर डर कर जीते हैं हम

एक से निन्यानवे तक भी आनन्द ले, कह रही है जिन्दगी

आप स्वयं ही समझदार हैं

निधि के माता-पिता सुनिश्चित थे कि इस बार तो रिश्ता हो ही जायेगा। लड़की कम पढ़ी-लिखी हो, नौकरी न करती हो तो रिश्ता नहीं मिलता। ज़्यादा शिक्षित हो,  अच्छी नौकरी करती हो तो रिश्ता नहीं मिलता।

निधि सोचती कैसी विडम्बना है यह कि उसकी बहन ज़्यादा नहीं पढ़ पाई, नौकरी में उसकी रूचि नहीं थी तो उसकी जहां भी बात चलती थी यही उत्तर मिलता कि आपकी लड़की की योग्यता हमारे लड़के के बराबर नहीं है। अथवा हमें तो नौकरी करने वाली पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए। आजकल की लड़कियां तो बहुत आगे चल रही हैं आपको भी अपनी लड़की को कुछ तो आधुनिक बनाना चाहिए था।

और निधि , उच्च शिक्षा प्राप्त, एक कम्पनी में बड़ी अधिकारी। जहां भी बात करते, पहले ही अस्पष्ट मना हो जाती क्योंकि वह उस लड़के से ज़्यादा पढ़ी और उंचे पद पर अवस्थित दिखती।

निधि समझ नहीं पाती कि विवाह एक व्यक्तित्व, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता से भी उपर है क्या। किन्तु माता-पिता तो सामाजिक-पारिवारिक दायित्व में बंधे थे। वैसे भी समाज लड़की की विवाह योग्य आयु ही देखता है उसकी योग्यता, शिक्षा आदि कुछ नहीं देखता और माता-पिता पर तो दबाव रहता ही है।

इस बार जहां बात चल रही थी, परिवार आधुनिक, सुशिक्षित एवं खुले विचारों के लगते थे। बड़ा परिवार था। परिवार में कोई व्यवसाय में था, कोई सरकारी नौकरी में तो कोई किसी अच्छी कम्पनी में। परिवार की लड़कियां भी उच्च शिक्षा प्राप्त एवं आत्मनिर्भर थीं।  बात भी उनकी ही ओर से उठी थी और सिरे चढ़ती प्रतीत हो रही थी।

आज परिवार मिलने एवं बात करने के लिए आया। युवक, माता-पिता, दो बहनें, एक भाई-भाभी। स्वागत सत्कार के बीच बात होती रही। दोनों ही पक्ष हां की स्थिति में थे।

अनायास ही युवक के पिता बोले कि बाकी सब ठीक है, हमारी कोई मांग भी नहीं है, घर भरा पूरा है कि सात पीढ़ियां बैठकर खा सकती हैं। बस हमारी एक ही शर्त है।

हमारे घर की बहुएं नौकरी नहीं करतीं । सब हक्के बक्के रह गये। एक-दूसरे का मुंह देखते रह गये। निधि के पिता ही बोले कि आप तो पहले से ही जानते हैं कि निधि एक अच्छी कम्पनी में उच्च पदाधिकारी है, इतना वेतन है, जानते हुए ही आपने बात की थी तो अब आप क्यों आपत्ति कर रहे हैं। वह तो  नौकरी करना चाहती है।

कुछ अजीब से एवं तिरस्कारपूर्ण स्वर में उत्तर आया , जी हां, विवाह से पहले तो यह सब चलता है किन्तु विवाह के बाद लड़की दस घंटे नौकरी करेगी तो घर-बार क्या सम्हालेगी। और वेतन की बात क्या है, हमारे पास तो इतना है कि सात पीढ़ियां बैठकर खायें।

अचानक निधि उठ खड़ी हुई और बोली कि जब आपके पास इतना है कि सात पीढ़ियां बैठकर खायें तो आपके परिवार के लड़के क्यों काम कर रहे हैं, वे भी बैठकर क्यों नहीं खाते। वे दस-दस, बारह-बारह घंटे घर से बाहर क्यों काम करते हैं। क्या घर के प्रति उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं।

उसके बाद क्या हुआ होगा और क्या होता आया है मुझे बताने की आवश्यकता नहीं, आप स्वयं ही समझदार हैं।

ख़ुद में कमियाँ निकालते रहना

मेरा अपना मन है।

बताने की बात तो नहीं,

फिर भी मैंने सोचा

आपको बता दूं

कि मेरा अपना मन है।

आपको अच्छा लगे

या बुरा,

आज,

मैंने आपको बताना

ज़रूरी समझा कि

मेरा अपना मन है।

 

यह बताना

इसलिए भी ज़रूरी समझा

कि मैं जैसी भी हूॅं,

अच्छी या बुरी,

अपने लिए हूॅं

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

यह बताना

इसलिए भी

ज़रूरी हो गया था

कि मेरा अपना मन है,

कि मैं अपनी कमियाॅं

जानती हूॅं

नहीं जानना चाहती आपसे

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

जैसी भी हूॅं, जो भी हूॅं

अपने जैसी हूॅं,

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

चाहती हू

किसी की कमियाॅं न देखूॅं

बस अपनी कमियाॅं निकालती रहूॅं

क्योंकि मेरा अपना मन है।

 

काश ! ऐसा हो जाये

सोचती हूं,

पर पहले ही बता दूं

कि जो मैं सोचती हूं

वह आपकी दृष्टि में

ठीक नहीं होगा,

किन्तु अपनी सोच को

रोक तो नहीं सकती,

और मेरी सोच पर

आप रोक लगा नहीं सकते,

और आपको बिना बताये

मैं रह भी नहीं सकती।

कितना अच्छा हो

कि संविधान में

नियम बन जाये

कि एक वेशभूषा

एक रंग और एक ही ढंग

जैसे विद्यालयों में बच्चों की

यूनिफ़ार्म।

फिर हाथ सामने जोड़ें

माथा टेकें

अथवा आकाश को पुकारें

कहीं कुछ अलग-सा

महसूस नहीं होगा,

चाहे तुम मुझे धूप से बचाओ

या मैं तुम्हें

वर्षा में भीगने के लिए खींच लूं

कोई गलत अर्थ नहीं निकालेगा,

कोई थोथी भावुकता नहीं परोसेगा

और शायद न ही कोई

आरोप जड़ेगा।

चलो,

आज बाज़ार चलकर

एक-सा पहनावा बनवा लें।

चलोगे क्या ??????

 

ब्लाकिंग ब्लाकिंग

अब क्या लिखें आज मन की बात। लिखने में संकोच भी होता है और लिखे बिना रहा भी नहीं जा सकता। अब हर किसी से तो अपने मन की पीड़ा बांटी नहीं जा सकती। कुछ ही तो मित्र हैं जिनसे मन की बात कह लेती हूं।

तो लीजिए कल फिर एक दुर्घटना घट गई एक मंच पर मेरे साथ। बहुत-बहुत ध्यान रखती  हूं प्रतिक्रियाएं लिखते समय, किन्तु इस बार एक अन्य रूप में मेरी प्रतिक्रिया मुझे धोखा दे गई।

 हुआ यूं कि एक कवि महोदय की रचना मुझे बहुत पसन्द आई। हम प्रंशसा में प्रायः  लिख देते हैं: ‘‘बहुत अच्छी रचना’’, ‘‘सुन्दर रचना’’, आदि-आदि। मैं लिख गई ‘‘ बहुत सुन्दर, बहुत खूबसूरत’’ ^^रचना** शब्द कापी-पेस्ट में छूट गया।

मेरा ध्यान नहीं गया कि कवि महोदय ने अपनी कविता के साथ अपना सुन्दर-सा चित्र भी लगाया था।

लीजिए हो गई हमसे गलती से मिस्टेक। कवि महोदय की प्रसन्नता का पारावार नहीं, पहले मैत्री संदेश आया, हमने देखा कि उनके 123 मित्र हमारी भी सूची में हैं, कविताएं तो उनकी हम पसन्द करते ही थे। हमने सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी।

बस !! लगा संदेश बाक्स घनघनाने, आने लगे चित्र पर चित्र, कविताओं पर कविताएं, प्रशंसा के अम्बार, रात दस बजे मैसेंजर बजने लगा। मेरी वाॅल से मेरी ही फ़ोटो उठा-उठाकर मेरे संदेश बाक्स में आने लगीं। समझाया, लिखा, कहा पर कोई प्रभाव नहीं।

वेसे तो हम ऐसे मित्रों को  Block कर देते हैं किन्तु इस बार एक नया उपाय सूझा।

हमने अपना आधार कार्ड भेज दिया,

अब हम Blocked  हैं।

  

कुछ छूट गया जीवन में

गांव तक कौन सी राह जाती है कभी देखी नहीं मैंने

वह तरूवर, कुंआ, बाग-बगीचे, पनघट, देखे नहीं मैंने

पीपल की छाया, चौपालों का जमघट, नानी-दादी के किस्से

लगता है कुछ छूट गया जीवन में, जो पाया नहीं मैंने

जब टिकट किसी का कटता है

सुनते हैं कोई एक भाग्य-विधाता सबके लेखे लिखता है

अलग-अलग नामों से, धर्मों से सबके दिल में बसता है

फिर न जाने क्यों झगड़े होते, जग में इतने लफड़े होते

रह जाता है सब यहीं, जब टिकट किसी का कटता है

नदिया की धार के सँग

चल आज नदिया की धार के सँग तन मन सँवारकर देखें

राहों में आते कंकड़- पत्थरों से घर आँगन सँवारकर देखें

कभी गहराती, कभी धीमी, कभी भागती, कभी बिखरती

चल आज नदिया की लय पर अपना जीवन सँवारकर देखें।

 

बेभाव अपनापन बांटते हैं

किसी को

अपना बना सकें तो क्या बात है।

जब रह रह कर

 मन उदास होता है,

तब बिना वजह

 खिलखिला सकें तो क्या बात है।

चलो आज

उड़ती चिड़िया के पंख गिने,

जो काम कोई न कर सकता

वही आज कर लें

 तो क्या बात है।

किसी की

प्यास बुझा सकें तो क्या बात है।

चलो,

आज बेभाव अपनापन बांटते हैं,

किसी अपने को

 सच में

 अपना बना सकें तो क्या बात है।

 

 

इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे

नीली चादर तान कर अम्बर देर तक सोया पाया गया

चंदा-तारे निर्भीक घूमते रहे,प्रकाश-तम कहीं आया-गया

प्रात हुई, भागे चंदा-तारे,रवि ने आहट की,तब उठ बैठा,

इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे, देखो तो, फिर मुस्काता पाया गया

वादों की फुलवारी

यादों का झुरमुट, वादों की फुलवारी

जीवन की बगिया , मुस्कानों की क्यारी

सुधि लेते रहना मेरी पल-पल, हर पल

मैं तुझ पर, तू मुझ पर हर पल बलिहारी

आँख मूंद सपनों में जीने लगती हूँ

खिड़की से सूनी राहों को तकती हूँ

उन राहों पर मन ही मन चलती हूँ

भटकन है, ठहराव है, झंझावात हैं

आँख मूंद सपनों में जीने लगती हूँ।

अपनेपन को समझो

रिश्तों में जब बिखराव लगे तो अपनी सीमाएं समझो

किसी और की गलती से पहले अपनी गलती परखो

इससे पहले कि डोरी हाथ से छूटती, टूटती दिखे

कुछ झुक जाओ, कुछ मना लो, अपनेपन को समझो

रिश्तों को तो बचाना है

समय ने दूरियां खड़ी कर दी हैं, न जाने कैसा ये ज़माना है

मिलना-जुलना बन्द हुआ, मोबाईल,वाट्स-एप का ज़माना है

अपनी-अपनी व्यस्तताओं में डूबे,कुछ तो समय निकालो यारो

कभी मेरे घर आओ,कभी मुझे बुलाओ,रिश्तों को तो बचाना है

मेरे देश को रावणों की ज़रूरत है

मेरे देश को रावणों की ज़रूरत है।

चौराहे पर रीता, बैठक में मीता

दफ्तर में नीता, मन्दिर में गीता

वन वन सीता,

कहती है

रावण आओ, मुझे बचाओ

अपहरण कर लो मेरा

अशोक वाटिका बनवाओ।

 

ऋषि मुनियों की, विद्वानों की

बलशाली बाहुबलियों की

पितृभक्तों-मातृभक्तों की

सत्यवादी, मर्यादावादी, वचनबद्धों की

अगणित गाथाएं हैं।

वेद-ज्ञाता, जन-जन के हितकारी

धर्मों के नायक और गायक

भीष्म प्रतिज्ञाधारी, राजाज्ञा के अनुचारी

धर्मों के गायक और नायक

वचनों से भारी।

कर्म बड़े हैं, धर्म बड़े हैं

नियम बड़े हैं, कर्म बड़े हैं।

नाक काट लो, देह बांट लो

संदेह करो और त्याग करो।

वस्त्र उतार लो, वस्त्र चढ़ा दो।

श्रापित कर दो, शिला बना दो।

मुक्ति दिला दो। परीक्षा ले लो।

कथा बना लो।चरित्र गिरा दो।

 

देवी बना दो, पूजा कर लो

विसर्जित कर दो।

हरम सजा लो, भोग लगा लो।

नाच नचा लो, दुकान सजा लो।

भाव लगा लो। बेचो-बेचो और खरीदो।

बलात् बिठा लो, बलात् भगा लो।

मूर्ख बहुत था रावण।

जीत चुका था जीवन ,हार चुकी थी मौत।

विश्व-विजेता, ज्ञानी-ध्यानी

ऋद्धि-सिद्धि का स्वामी।

 

न चेहरा देखा, न स्पर्श किया।

पत्नी बना लूं, हरम सजा लूं

दासी बना लूं

बिना स्वीकृति कैसे छू लूं

सोचा करता था रावण।

मूर्ख बहुत था रावण।

 

सुरक्षा दी, सुविधाएं दी

इच्छा पूछी, विनम्र बना था रावण।

दूर दूर रहता था रावण।

मूर्ख बहुत था रावण।

 

धर्म-विरोधी, काण्ड-विरोधी

निर्मम, निर्दयी, हत्यारा,

असुर बुद्धि था रावण।

पर औरत को औरत माना

मूर्ख बहुत था रावण।

 

अपमान हुआ था एक बहन का

था लगाया दांव पर सिहांसन।

राजा था, बलशाली था

पर याचक बन बैठा था रावण

मूर्ख बहुत था रावण।

दैवीय सौन्दर्य

रंगों की शोखियों से

मन चंचल हुआ।

रक्त वर्ण संग

बासन्तिका,

मानों हवा में लहरें

किलोल कर रहीं।

आंखें अपलक

निहारतीं।

काश!

यहीं,

इसी सौन्दर्य में

ठहर जाये सब।

कहते हैं

क्षणभंगुर है जीवन।

स्वीकार है

यह क्षणभंगुर जीवन,

इस दैवीय सौन्दर्य के साथ।

जीवन यूं ही चलता है

पीतल की एक गगरी होती

मुस्कानों की नगरी होती

सुबह शाम की बात यह होती

जल-जीवन की बात यह होती

जीवन यूं ही चलता है

कुछ रूकता है, कुछ बहता है

धूप-छांव सब सहता है।

छोड़ो राहें मेरी

मां देखती राह,

मुझको पानी लेकर

जल्दी घर जाना है

न कर तू चिन्ता मेरी

जीवन यूं ही चलता है

सहज-सहज सब लगता है।

कभी हंसता है, कभी सहता है।

न कर तू चिन्ता मेरी।

सहज-सहज सब लगता है।

 

भ्रष्टाचार पर चर्चा
जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं और  दूसरे की ओर अंगुली उठाते हैं तो चार अंगुलियाँ स्वयंमेव ही अपनी ओर उठती हैं जिन्हें हम स्वयं ही नहीं देखते। यह पुरानी कहावत है।

वास्तव में हम सब भ्रष्टाचारी हैं। बात बस इतनी है कि जिसकी जितनी औकात है उतना वह भ्रष्टाचार कर लेता है। किसी की औकात 100 रुपये की है तो किसी की 100 करोड़ की। किन्तु 100 रुपये वाला स्वयं को ईमानदार कहता है। हम मंहगाई की बात करते हैं किन्तु सुविधाभेागी हो गये हैं। बिना कष्ट उठाये धन से हर कार्य करवा लेना चाहते हैं। हमें दूसरे का भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार लगता है और  अपना आवश्यकता, विवशता।

यदि हम अपनी ओर उठने वाली चार अंगुलियों के प्रश्न और  उत्तर दे सकें तो शायद हम भ्रष्टाचार के विरूद्ध अपना योगदान दे सकते हैं:

पहली अंगुली मुझसे पूछती है: क्या मैं विश्वास से कह सकती हूँ कि मैं भ्रष्टाचारी नहीं हूँ ।

दूसरी अंगुली कहती है: अगर मैं भ्रष्टाचारी नहीं हूं तो क्या भ्रष्टाचार का विरोध करती हूँ ?

तीसरी अंगुली कहती है: कि अगर मैं भ्रष्टाचारी नहीं हूं किन्तु भ्रष्टाचार का विरोध नहीं करती तो मैं उनसे भी बड़े भ्रष्टाचारी हूँ ।

और  अंत में  चौथी अंगुली कहती है: अगर मैं भी भ्रष्टाचारी हूं तो सामने की अंगुली को भी अपनी ओर मोड़ लेना चाहिए और  मुक्का बनाकर अपने पर वार करना चाहिए। दूसरों को दोष देने और   सुधारने से पहले पहला कदम अपने प्रति उठाना होगा।

  

असमंजस में रहते हैं हम

कितनी बार,

हम समझ ही नहीं पाते,

कि परम्पराओं में जी रहे हैं,

या रूढ़ियों में।

.

दादी की परम्पराएं,

मां के लिए रूढ़ियां थीं,

और मां की परम्पराएं

मुझे रूढ़ियां लगती हैं।

.

हमारी पिछली पीढ़ियां

विरासत में हमें दे जाती हैं,

न जाने कितने अमूल्य विचार,

परम्पराएं, संस्कृति और व्यवहार,

कुछ पुराने यादगार पल।

इस धरोहर को

कभी हम सम्हाल पाते हैं,

और कभी नहीं।

कभी सार्थक लगती हैं,

तो कभी अर्थहीन।

गठरियां बांधकर

रख देते हैं

किसी बन्द कमरे में,

कभी ज़रूरत पड़ी तो देखेंगे,

और भूल जाते हैं।

.

ऐसे ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी

सौंपी जाती है विरासत,

किसी की समझ आती है

किसी की नहीं।

किन्तु यह परम्परा

कभी टूटती नहीं,

चाहे गठरियों

या बन्द कमरों में ही रहें,

इतना ही बहुत है।

 

वास्तविकता से परे

किसका संधान तू करने चली

फूलों से तेरी कमान सजी

पर्वतों पर तू दूर खड़ी

अकेली ही अकेली

किस युद्ध में तू तनी

कौन-सा अभ्यास है

क्या यह प्रयास है

इस तरह तू क्यों है सजी

वास्तविकता से परे

तेरी यह रूप सज्जा

पल्लू उड़ रहा, सम्हाल

बाजूबंद, करघनी, गजरा

मांगटीका लगाकर यूँ कैसे खड़ी

धीरज से कमान तान

आगे-पीछे  देख-परख

सम्हल कर रख कदम

आगे खाई है सामने पहाड़

अब गिरी, अब गिरी, तब गिरी

या तो वेश बदल या लौट चल।

 

रेखाएं बोलती हैं

घर की सारी

खिड़कियां-दरवाज़े

बन्द रखने पर भी

न जाने कहां से

धूल आ पसरती है

भीतर तक।

जाने-अनजाने

हाथ लग जाते हैं।

शीशों पर अंगुलियां घुमाती हूं,

रेखाएं खींचती हूं।

गर्द बोलने लगती है,

आकृतियों में, शब्दों में।

गर्द उड़ने लगती है

आकृतियां और शब्द

बदलने लगते हैं।

एक साफ़ कपड़े से

अच्छे से साफ़ करती हूं,

किन्तु जहां-तहां

कुछ लकीरें छूट जाती हैं

और फिर आकृतियां बनने लगती हैं,

शब्द घेरने लगते हैं मुझे।

अरे!

डरना क्या!

इसी बात पर मुस्कुरा देने में क्या लगता है।

 
 

मन में सुबोल वरण कर

तर्पण कर,

मन अर्पण कर,

कर समर्पण।

भाव रख, मान रख,

प्रण कर, नमन कर,

सबके हित में नाम कर।

अंजुरि में जल की धार

लेकर सत्य की राह चुन।

मन-मुटाव छांटकर

वैर-भाव तिरोहित कर।

अपनों को स्मरण कर,

उनके गुणों का मनन कर।

राहों की तलाश कर

जल-से तरल भाव कर।

कष्टों का हरण कर,

मन में सुबोल वरण कर।

खुले हैं वातायन

इन गगनचुम्‍बी भवनों में भी

भाव रहते हैं

कुछ सागर से गहरे

कुछ आकाश को छूते

परस्‍पर सधे रहते हैं।

यहां भी उन्‍मुक्‍त हैं द्वार,

खुले हैं वातायन, घूमती हैं हवाएं

यहां भी गूंजती हैं किलकारियां ,

हंसता है सावन

बादल उमड़ते-घुमड़ते हैं

हां, यह हो सकता है

कुछ कम या ज्‍़यादा होता हो,

पर समय की मांग है यह सब

कितनी भी अवहेलना कर लें

किन्‍तु हम मन ही मन

यही चाहते हैं

फिर भी

पता नहीं क्‍यों हम

बस यूं ही डरे-डरे रहते हैं।