कुहासे में उलझी जि़न्दगी

कभी-कभी

छोटी-छोटी रोशनी भी

मन आलोकित कर जाती है।

कुहासे में उलझी जि़न्दगी

एक बेहिसाब पटरी पर

दौड़ती चली जाती है।

राहों में आती हैं

कितनी ही रोशनियां

कितने ठहराव

कुछ नये, कुछ पुराने,

जाने-अनजाने पड़ाव

कभी कोई अनायास बन्द कर देता है

और कभी उन्मुक्तु हो जाते हैं सब द्वार

बस मन आश्‍वस्‍त है

कि जो भी हो

देर-सवेर

अपने ठिकाने पहुंच ही जाती है।