नदिया की धार-सी टेढ़ी-मेढ़ी बहती है ज़िन्दगी

जीवन का आनन्द है कुछ लाड़ में, कुछ तकरार में

अपनों से कभी न कोई गिला, न जीत में न हार में

नदिया की धार-सी टेढ़ी-मेढ़ी बहती है ज़िन्दगी

रूठेंगे अगर कभी तो मना ही लेंगे हम प्यार से

वसुधैव कुटुम्बकम्

एक आस हो, विश्वास हो, बस अपनेपन का भास हो

न दूरियां हो, न संदेह की दीवार, रिश्तों में उजास हो

जीवन जीने का सलीका ही हम शायद भूलने लगे हैं

नि:स्वार्थ, वसुधैव कुटुम्बकम् का एक तो प्रयास हो

किसके हाथ में डोर है

नगर नगर में शोर है यहां गली-गली में चोर है

मुंह ढककर बैठे हैं सारे, देखो अन्याय यह घोर है

समझौते की बात हुई, कोई किसी का नाम न ले

धरने पर बैठै हैं सारे, ढूंढों किसके हाथ में डोर है

वरदान और श्राप

किसी युग में

वरदान और श्राप

साथ-साथ चलते थे।

वरदान की आशा में

भक्ति

और कठोर तपस्या करते थे

किन्तु सदैव

कोई भूल

कोई  चूक

ले डूबती थी

सब अच्छे कर्मों को

और वरदान से पहले

श्राप आ जाता था।

और कभी-कभी

इतनी बड़ी गठरी होती थी

भूल-चूक की

कि वरदान तक

बात पहुँच ही नहीं पाती थी

मानों कोई भारी

बैरीकेड लगा हो।

श्राप से वरदान टूटता था

और वरदान से श्राप,

काल की सीमा

अन्तहीन हुआ करती थी।

और एक खतरा

यह भी रहता था

कि पता नहीं कब वरदान

श्राप में परिवर्तित हो जाये

और श्राप वरदान में

और दोनों का घालमेल

समझ ही न आये।

-

बस

इसी डर से

मैं वरदान माँगने का

साहस ही नहीं करती

पता नहीं

भूल-चूक की

कितनी बड़ी गठरी खुल जाये

या श्राप की लम्बी सूची।

-

जो मिला है

उसमें जिये जा

मज़े की नींद लिए जा।

 

प्यार का संदेश

कक्षा 4 का विद्यार्थी सहज, छोटा-सा, मात्र 7-8 वर्ष का। स्कूल से अनायास उसके माता-पिता को फोन जाता है, तत्काल स्कूल पहुंचने का। दोनों घबराये कहीं बच्चे के साथ कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई।

गेट से ही उन्हें लगा कोई गम्भीर घटना घटी है, प्रधानाचार्या के कार्यालय तक पहुंचते-पहुंचते पता नहीं कितने चेहरे क्या-क्या कह रहे थे। वहीं पर सहज खड़ा था रूंआसा-सा, उसकी दो-तीन अध्यापिकाएं पूरे गुस्से में।

सहज असमंसज-भाव में सबके चेहरे देख रहा था कि वह यहां क्यों खड़ा है और क्या हुआ है। उसे तो यही पता था कि प्रधानाचार्या के कमरे में तो बच्चों को पुरस्कार देने के लिए ही बुलाया जाता है।

“ देखिए , आपके आठ साल के बच्चे के हाल! क्या सिखाते हैं आप अपने बच्चे को। आज ही यह हाल है तो बड़ा होकर क्या करेगा? ऐेसे बच्चों को हम स्कूल में नहीं रख सकते।’’

लेकिन मैडम हुआ क्या’’

“ ये लीजिए, आपके होनहार बेटे ने अपनी क्लास की एक लड़की को ये प्यार का संदेश दिया। पढ़िए आप ही। और पूछिए इससे।’’

माता-पिता के हाथ में अपने बेटे सहज के हाथ की लिखी एक छोट-सी पर्ची थी जिस पर लिखा था ‘‘आई लव यू आभा’’।

‘‘आपने बात की क्या इससे।’’

“ जी, नहीं बात क्या करनी, दिखाई नहीं दे रहा कि आपके बच्चे की कैसी सोच है? “

माता-पिता हतप्रभ। कभी एक-दूसरे का चेहरा देखें तो कभी सहज का, जो उत्सुक-सा सबको देख रहा था।

‘‘पूछना चाहिए था आपको, इतनी-सी बात को इतना बड़ा बना देने से पहले। हम तो डर ही गये थे।’’

‘‘लीजिए, आपके सामने मैं ही पूछती हूं ।’’

‘‘सहज, तुम आभा से प्यार करते हो’’

यैस, मम्मी।

क्यों?

मम्मी, आभा बहुत अच्छी है, हर समय हंसती रहती है, अपना लंच भी मुझे देती है, हम साथ ही बैठते हैं, और आप और मैडम भी तो कहते हैं लव आॅल। आप मुझे कितनी बार कहती हैं लव यू बेटू। पापा भी कहते हैं। मेरी मैडम भी कहती है, आई लव यू आॅल।

स्कूल में और आप भी तो यही कहते हैं सबसे प्यार करो, आप मेरा बैग देखो, मैंने तो बहुत से दोस्तों के लिए भी लिख कर रखा है लव यू।

मम्मी मैंने कुछ गलत कर दिया क्या?

सब निरूत्‍तर थे ।

 

मैं नहीं जानती कि उसके बाद सहज के साथ क्या हुआ, किन्तु इतना जानती हूं कि जब तक कोई नया गाॅसिप नहीं आ गया, दिनों तक स्कूल में इसी घटना की चर्चा रही कि आजकल इतने छोटे बच्चों के ये हाल हैं तो बड़े होकर क्या करेंगे।

धन्यवाद देते रहना हमें Keep Thanking
आकाश को थाम कर खड़े हैं नहीं तो न जाने कब का गिर गया होता

पग हैं धरा पर अड़ाये, नहीं तो न जाने कब का भूकम्प आ गया होता

धन्यवाद देते रहना हमें, बहुत ध्यान रखते हैं हम आप सबका सदैव ही

पानी पीते हैं, नहा-धो लेते हैं नहीं तो न जाने कब का सुनामी आ गया होता।

 

आदरणीय गणेश जी,सादर प्रणाम !

आपसे मन की बात कहना चाहती हूं। वैसे तो बहुत से भगवान हैं, शायद 33 करोड़, या उससे भी अधिक, किन्तु आजकल गणेश-चतुर्थी की धूम है, आप घर-घर पधारे हैं, इसलिए अपने मन की दुविधा आपके ही साथ बांटना चाहती हूं।

हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों से भगवानों की महिमा बहुत बढ़ गई है। आप भी उनमें से एक हैं।

मेरे न्यूनतम् ज्ञान के अनुसार  1893 के पहले गणपति उत्सव केवल घरों तक ही सीमित था  श्री बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में अंग्रेजों के विरूद्ध भारतीयों को  स्वाधीनता संग्राम से जोड़ने के लिए महाराष्ट्र में इस उत्सव को माध्यम बनाया था। इस कथा से मुझे यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि आपने और  आपके उत्सव ने भी हमें स्वाधीन करवाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आपके एक उत्सव ने देश को स्वाधीनता की राह प्रदान की थी। नमन करती हूं आपको।  

एक अन्य कथा के अनुसार आपने सिंधु नामक दानव का वध करने के लिए मयूर को अपने वाहन के रूप में चुना था और  छ: भुजाओं वाला अवतार धारण किया था। इसी कारण गणपति बप्पा मोरया अगले  बरस तू जल्दी आ का जयकारा लगाया जाता है।

उस काल में आपके एक स्वरूप ने ही कितने बड़े कार्य कर दिये,  वर्तमान में भारत को स्‍वाधीन करने में अपना महत्‍त योगदान दिया, अब तो हर वर्ष आप लाखों-लाखों की संख्या में अवतरित होते हैं, आपको नहीं लगता कि अभी भी इस देश में आपके कुछ ऐसे रूपों की आवश्यकता है जो कुछ सकारात्मक परिवर्तन लेकर आयें।  देश भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जाति-पाति, घूसखोरी, छल-कपट, और न जाने कितनी ऐसी समस्‍याओं से जूझ रहा है जो देश को प्रगति के पथ पर बढ़ने से रोक रही हैं। जब आप हर वर्ष आते हैं, इन समस्याओं की ओर आपका ध्यान नहीं जाता ? दस दिन तक वेद-व्यास के  महाभारत की तरह कथा तो पूरी सुन लेते हैं फिर विसर्जित होकर चले जाते हैं।

यह मान्यता भी है कि वेद व्यास जी ने महाभारत की कथा भगवान गणेश जी को गणेश चतुर्थी से लेकर अनन्त चतुर्थी तक लगातार 10 दिन तक सुनाई थी। जब वेद व्यास जी ने कथा पूरी कर अपनी आंखें खोली तो उन्‍होंने देखा कि लगातार 10 दिन से कथा यानी ज्ञान की बातें सुनते-सुनते गणेश जी का तापमान बहुत ही अधिक बढा गया है, अत: उन्होंने आपको  कुंड में डुबकी लगवाई, जिससे आपके शरीर का तापमान कम हुआ।

इसलिए मान्‍यता ये है कि गणेश स्‍थापना के बाद से अगले 10 दिनों तक भगवान गणपति लोगों की इच्‍छाऐं सुन-सुनकर इतना गर्म हो जाते हैं, कि चतुर्दशी को बहते जल, तालाब या समुद्र में विसर्जित करके उन्‍हें फिर से शीतल यानी ठण्‍डा किया जाता है।

आपके नाम से जब कोई गोबर गणेश अथवा मिट्टी का माधो कहकर व्यंग्य करता है तो मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। फिर अब तो आपके नाम से धर्म के नाम से कितना जल-प्रदूषण फैलाया जा रहा है, देख ही रहें होंगे आप !!

ओहो ! भूल हो गई गणेश जी। क्षमा !!

जब हमारा ही ध्यान नहीं है तो आपका ध्यान कैसे जायेगा। आह्वान  तो हमें करना होगा न अपने भीतर से, अपने भाव से, अपनी क्षमता से, तभी तो आपको ज्ञात होगा कि करना क्या है। और यह तो आप समझा नहीं सकते, हमें स्वयं ही समझना होगा।

किसी परिवर्तन के लिए दस दिन कम नहीं होते।

काश ! अगले वर्ष आपके आगमन एवं विसर्जन के बीच हम यह सब समझ सकें और एक सकारात्मक परिवर्तन की ओर अग्रसर हो सकें।

प्रणाम्

जब तक जीवन है मस्ती से जिये जाते हैं

कितना अद्भुत है यह गंगा में पाप धोने, डुबकी लगाने जाते हैं।

कितना अद्भुत है यह मृत्योपरान्त वहीं राख बनकर बह जाते हैं।

कितने सत्कर्म किये, कितने दुष्कर्म, कहां कर पाता गणना कोई।

पाप-पुण्य की चिन्ता छोड़, जब तक जीवन है, मस्ती से जिये जाते हैं।

जीवन की कहानियां बुलबुलों-सी नहीं होतीं

 कहते हैं

जीवन पानी का बुलबुला है।

किन्तु कभी लगा नहीं मुझे,

कि जीवन

कोई छोटी कहानी है,

बुलबुले-सी।

सागर की गहराई से भी

उठते हैं बुलबुले।

और खौलते पानी में भी

बनते हैं बुलबुले।

जीवन में गहराई

और जलन का अनुभव

अद्भुत है,

या तो डूबते हैं,

या जल-भुनकर रह जाते हैं।

जीवन की कहानियां

बुलबुलों-सी नहीं होतीं

बड़े गहरे होते हैं उनके निशान।

वैसे ही जैसे

किसी के पद-चिन्हों पर,

सारी दुनिया

चलना चाहती है।

और किसी के पद-चिन्ह

पानी के बुलबुले से

हवाओं में उड़ जाते हैं,

अनदेखे, अनजाने,

अनपहचाने।

 

श्वेत हंसों का जोड़ा

अपनी छाया से मोहित मन-मग्न हुआ हंसों का जोड़ा

चंदा-तारों को देखा तो कुछ शरमाया हंसों का जोड़ा

इस मिलन की रात को देख चंदा-तारे भी मग्न हुए

नभ-जल की नीलिमा में खो गया श्वेत हंसों का जोड़ा

   

 

एक फूल झरा

एक फूल झरा।

सबने देखा

रोज़ झरता था एक फूल

देखने के लिए ही

झरता थी फूल।

सबने देखा
और चले गये।

 

 

औरत

अपने आस-पास

नित नये-नये रंगों को,

घिरते-बिखरते अंघेरों को

देखते-देखते,

अक्सर मेरी मुट्ठियां

भिंच जाया करती हैं

पर कैसी विडम्बना है यह

कि मैं चुपचाप

सिर झुकाकर

उन कसी मुट्ठियों से

आटा गूंथने लग जाती हूं

और इसे ही

अपनी सफ़लता मान लेती हूं।

आँख मूंद सपनों में जीने लगती हूँ

खिड़की से सूनी राहों को तकती हूँ

उन राहों पर मन ही मन चलती हूँ

भटकन है, ठहराव है, झंझावात हैं

आँख मूंद सपनों में जीने लगती हूँ।

एक मधुर संदेश

प्रतिदिन प्रात में सूर्य का आगमन एक मधुर संदेश देता है

तोड़े न कभी क्रम अपना, मार्ग सुगम नहीं दिखाई देता है

कभी बदली, आंधी, कभी ग्रहण भी नहीं रोक पाते राहों को

मंज़िल कभी दूर नहीं होती, बस लगे रहो, यही संदेश देता है

विचलित करती है यह बात

मां को जब भी लाड़ आता है

तो कहती है

तू तो मेरा कमाउ पूत है।

 

पिता के हाथ में जब

अपनी मेहनत की कमाई रखती हूं

तो एक बार तो शर्म और संकोच से

उनकी आंखें डबडबा जाती हैं

फिर सिर पर हाथ फेरकर

दुलारते हुए कहते हैं

मुझे बड़ा नाज़ है

अपने इस होनहार बेटे पर।

 

किन्तु

मुझे विचलित करती है यह बात

कि मेरे माता पिता को जब भी

मुझ पर गर्व होता है

तो वे मुझे

बेटा कहकर सम्बोधित क्यों करते हैं

बेटी मानकर गर्व क्यों नहीं कर पाते।

साक्षरता अभियान से लौटती औरतें

लौट रहीं थीं

वे अपने दड़बों में

सिर से पैर तक औरतें।

उनकी मांग में

लाल घना सिंदूर था

एक बड़ी सी

शुद्ध सोने की टिकुली

माथे पर टीका।

बाल गुंथे हुए लाल परांदे में।

नाक में नथनी। कान में झुमके।

गले में हार मालाएं।

कलाईयों पर रंग बिरंगी चूड़ियां।

पैरों में पायल, बिछुए।

और कई कुछ।

कहीं कुछ छूटा नहीं

जो यह न बता सके

कि वे सब, औरतें हैं बस औरतें।

 

इन सबके उपर

एक लम्बी सी ओढ़नी

जिसमें पीठ पर बंधे

दो एक बच्चे

और एक घूंघट

उनके अस्तित्व को नकारता।

 

इन सबके बीच

मुट्ठी के किसी कोने में

एक प्रमाणपत्र भी था

“अ” से “ज्ञ” तक

जिससे बच्चे खेल रहे थे।

कोई हमें क्यों रोक रहा
आँख बन्द कर सोने में मज़ा आने लगता है।

बन्द आँख से झांकने में मज़ा आने लगता है।

पकी-पकाई मिलती रहे, मुँह में ग्रास आता रहे

कोई हमें क्यों रोक रहा, यही खलने लगता है

बनती रहती हैं गांठें बूंद-बूंद

कहां है अपना वश !
कब के रूके
कहां बह निकलेगें
पता नहीं।
चोट कहीं खाई थी,
जख्म कहीं था,
और किसी और के आगे
बिखर गये।

सबने अपना अपना 
अर्थ निकाल लिया।
अब 
क्या समझाएं
किस-किसको 
क्या-क्या बताएं।
तह-दर-तह
बूंद-बूंद
बनती रहती हैं गांठें
काल की गति में
कुछ उलझी, कुछ सुलझी
और कुछ रिसती

बस यूं ही कह बैठी,
जानती हूं वैसे 
तुम्हारी समझ से बाहर है
यह भावुकता !!!

दाना डाला जाल बिछाया

नदी किनारे बैठे बैठे मन में आया चल डूब मरें

फिर देखा मीन बड़ी बड़ी, सोचा मस्ती खूब करें

दाना डाला, जाल बिछाया, सारे हथकंडे अपनाये

पकड़ी तो नकली निकली, आप न ऐसी भूल करें

सौन्दर्य निरख मन हरषा

 पलभर में धूप निकलती, कभी बादल बरसें कण-कण।

धरा देखो महक रही, कलियां फूल बनीं, बहक रहा मन।

पल्लव झूम रहे, पंछी डाली-डाली घूम रहे, मन हरषा,

सौन्दर्य निरख, मन भी बहका, सब कहें इसे पागलपन।a

 

परीलोक से आई है

चित्रलिखित सी प्रतीक्षारत ठहरी हो मुस्काई-सी
नभ की लाली मुख पर कुमकुम सी है छाई-सी
दीपों की आभा में आलोकित, घूंघट की ओट में
नयनाभिराम रूप लिए परीलोक से आई है सकुचाई-सी

बालपन-सा था कभी

बालपन-सा था कभी निर्दोष मन

अब देखो साधता है हर दोष मन

कहां खो गई वो सादगी वो भोलापन

ढू्ंढता है दूसरों में हर खोट मन

मन उदास-उदास क्यों है

हवाएं बहक रहीं

मौसम सुहाना है

सावन में पंछी कूक रहे

वृक्षों पर

डाली-डाली

पल्लव झूम रहे

कहीं रिमझिम-रिमझिम

तो कहीं फुहारें

मन सरस-सरस

कोयल कूके

पिया-पिया

मैं निहार रही सूनी राहें

कब लौटोगे पिया

और तुम पूछ रहे

मन उदास-उदास क्यों है ?