अपना जीवन है
अपनी इच्छाओं पर जीने का साहस रख

कोई क्या कहता है इससे न मतलब रख

घुट-घुटकर जीना भी कोई जीना है यारो

अपना जीवन है, औरों के आरोप ताक पर रख

अनिच्छाओं को रोक मत
अनिच्छाओं को रोक मत प्रदर्शित कर

कोई रूठता है तो रूठने दे, तू मत डर

कब तक औरों की खुशियों को ढोते रहेंगे

जो मन न भाये उससे अपने को दूर रख

जीवन की भाग-दौड़ में

जीवन की भाग-दौड़ में कौन हमराही, हमसफ़र कौन

कौन मिला, कौन छूट गया, हमें यहाँ बतलाएगा कौन

आपा-धापी, इसकी-उसकी, उठा-पटक लगी हुई है

कौन है अपना, कौन पराया, ये हमें समझायेगा कौन

भटकन है
दर्द बहुत है पर क्यों बतलाएँ तुमको

प्रश्न बहुत हैं पर कौन सुलझाए उनको

बात करते हैं तब उलाहने ही मिलते हैं

भटकन है पर कोई न राह दिखाए हमको

मन के सच्चे
कानों के तो कच्चे हैं

लेकिन मन के सच्चे हैं

जो सुनते हैं कह देते हैं

मन में कुछ न रखे हैं।

तुमसे ही करते हैं तुम्हारी शिकायत

क्षणिक आवेश में कुछ भी कह देते हैं

शब्द तुम्हारे लौटते नहीं, सह लेते हैं

तुमसे ही करते हैं तुम्हारी शिकायत

इस मूर्खता को आप क्या कहते हैं

भाव

हाइकु

=======

मन में आस

कैसे करें विश्वास

चेहरे बोलें

-

मन में भाव

आशा और निराशा

आँखें बरसें।

-

मन तरसे

कैसे कहें किसी से

कौन अपना

-

 

हम धीरे-धीरे मरने लगते हैं We just Start Dying Slowly

जब हम अपने मन से

जीना छोड़ देते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम

अपने मन की सुनना

बन्द कर देते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम अपने नासूर

कुरेद कर

दूसरों के जख़्म भरने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम अपने आंसुओं को

आंखों में सोखकर

दूसरों की मुस्कुराहट पर

खिलखिलाकर हँसते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम अपने सपनों को

भ्रम समझकर

दूसरों के सपने संजोने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम अपने सत्कर्मों को भूलकर

दूसरों के अपराधों का

गुणगान करने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम सवालों से घिरे

उत्तर देने से बचने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम सच्चाईयों से

टकराने की हिम्मत खो बैठते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

जब हम

औरों के झूठ का पुलिंदा लिए

उसे सत्य बनाने के लिए

घूमने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम कांटों में

सुगन्ध ढूंढने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम

दुनियादारी की कोशिश में

परायों को अपना समझने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम

विरोध की ताकत खो बैठते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम औरों के अपराध के लिए

अपने-आपको दोषी मानने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हमारी आँखें

दूसरों की आँखों से

देखने लगती हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हमारे कान

केवल वही सुनने लगते हैं

जो तुम सुनाना चाहते हो

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम केवल

इसलिए खुश रहने लगते हैं

कि कोई रुष्ट न हो जाये

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हमारी तर्कशक्ति

क्षीण होने लगती है

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हमारी विरोध की क्षमता

मरने लगती है

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम

नीम-करेले के रस को

शहद समझकर पीने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम

सपने देखने से डरने लगते हैं

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

जब हम

अकारण ही

हँसते- हँसते रोने लगते हैं

और हँसते-हँसते रोने

तब हम

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

-

हम बस यूँ ही

धीरे-धीरे मरने लगते हैं।

 

 

आज मौसम मिला

आज मौसम मिला।

मैंने पूछा

आजकल

ये क्या रंग दिखा रहे हो।

कौन से कैलेण्डर पर

अपना रूप बना रहे हो।

अप्रैल में अक्तूबर,

और मई में

अगस्त के दर्शन

करवा रहे हो।

मौसम

मासूमियत से बोला

आजकल

इंसानों की बस्ती में

ज़्यादा रहने लगा था।

माह और तारीखों पर

ध्यान नहीं लगा था।

उनके मन को पढ़ता था

और वैसे ही मौसम रचने लगा था।

अपने और परायों में

भेद समझने में लगा था।

कौन किसका कब हुआ

यह परखने में लगा था।

कब कैसे पल्टी मारी जाती है,

किसे क्यों

साथ लेकर चलना है

और किसे पटखनी मारी जानी है

बस यही समझने में लगा था।

गर्मी, सर्दी, बरसात

तो आते-जाते रहते हैं

मैं तो तुम्हारे भीतर के

पल-पल बदलते मौसम को

समझने में लगा था।

.

इतनी जल्दी घबरा गये।

तुमसे ही तो सीख रहा हूँ।

पल में तोला,पल में माशा

इधर पंसेरी उधर तमाशा।

अभी तो शुरुआत है प्यारे

आगे-आगे देखिए होता है क्या!!!

 

और जब टूटती है तन्द्रा

चलती हुई घड़ी

जब अचानक ठहर-जी जाती है,

लगता है

जीवन ही ठहर गया।

सूईयाँ अटकी-सी,

सहमी-सी,

कण-कण

खिसकने का प्रयास करती हैं,

अनमनी-सी,

किन्तु फिर वहीं आकर रुक जाती हैं।

हमारी लापरवाही, आलस्य

और काल के महत्व की उपेक्षा,

कभी-कभी भारी पड़ने लगती है

जब हम भूल जाते हैं

कि घड़ी ठहरी हुई,

चुपचाप, उपेक्षित,

हमें निरन्तर देख रही है।

और हम उनींदे-से,

उसकी चुप्पी से प्रभावित

उसके ठहरे समय को ही

सच मान लेते हैं।

और जब टूटती है तन्द्रा

तब तक न जाने कितना कुछ

छूट जाता है

बहुत कुछ बोलती है घड़ी

बस हम सुनना ही नहीं चाहते

इतना बोलने लगे हैं

कि किसी की क्या

अपनी ही आवाज़ से

उकता गये हैं ।

 

 

 

 

 

 

आंसुओं का क्या

भीग जाने दो आज

चेहरे को आंसुओं से,

भीतर जमी गर्द

धुल जायेगी।

नहीं चाहती मैं

कोई

उस गर्द को

छूने की कोशिश करे,

कोई पढ़े

उसके धुंधले हो चुके शब्द।

नहीं चाहती मैं

कोई कहानियां लिखे।

आंसुओं का क्या

वे तो

सुख-दुख दोनों में

बहते हैं

कौन समझता है

उनका अर्थ यहां।

 

शाम

हाइकु

शाम सुहानी

चंद्रमा की चांदनी

मन बहका

-

शाम सुहानी

पुष्प महक उठे

रंग बिखरे

-

किससे कहूं

रंगीन हुआ मन

शाम सुहानी

-

शाम की बात

सूरज डूब रहा

मन में तारे

 

शरद

हाइकु

शरद ऋतु

मीठी मीठी बयार

मन मुदित

-

कण बरसें

शरद की चांदनी

मन हुलसे

-

शरद ऋतु

चंदा की चांदनी

मन हुलसा

-

ओस के कण

पत्तों पर बहकते

भाव बिखरे

 

नहीं करूंगी इंतज़ार

मैं नहीं करूंगी

इंतज़ार तेरा कयामत तक।

.

कयामत की बात

नहीं करती मैं।

कयामत होने का

इंतज़ार नहीं करती मैं।

यह ज़िन्दगी

बड़ी हसीन है।

इसलिए

बात करती हूं

ज़िन्दगी की।

सपनों की।

अपनों की।

पल-पल की

खुशियों की।

मिलन की आस में

जीती हूं,

इंतज़ार की घड़ियों में

कोई आनन्द

नहीं मिलता है मुझे।

.

आना है तो आ,

नहीं तो

जहां जाना है वहां जा।

मैं नहीं करूंगी

इंतज़ार तेरा कयामत तक।


 

जीवन संघर्ष  का दूसरा नाम है

कहते हैं

जीवन संघर्ष  का

दूसरा नाम है।

किन्तु जीवन

बस

संघर्ष ही बना रहे

कभी समर या

संग्राम बनने दें।

कहने को तो

पर्यायवाची शब्द हैं

किन्तु जब

जीवन में उतरते हैं

तब

सबका अर्थ बदल जाता है

इसलिए सावधान रहें।

 

हे सागर, रास्ता दो मुझे

हे सागर, रास्ता दो मुझे

कहा था सतयुग में राम ने।

सागर की राह से

एक युद्ध की भूमिका थी।

कारण कोई भी रहा हो

युद्ध सुनिश्चित था।

किन्तु फिर भी

सागर का 

एक प्रयास

शायद

युद्ध को रोकने का,

और इसी कारण

मना कर दिया था

राम को राह देने के लिए,

राम की शक्ति को

जानते हुए भी।

शायद वह भी चाहता था

कि युद्ध न हो।

 

युद्ध राम-रावण का हो

अथवा कौरवों-पाण्डवों का

विनाश तो होता ही है

जिसे युगों-युगों तक

भोगती हैं

अगली पीढ़ियां।

 

युद्ध कोई भी हो,

अपनों से

या परायों से

एक बार तो

रोकने की कोशिश

करनी ही चाहिए।

 

स्मृतियां सदैव मधुर नहीं होतीं
आओगे जब तुम साजना

द्वार पर खड़ी नहीं मिलूंगी मैं

घर-बाहर संवारती नहीं दिखूंगी मैं।

भाव मिट जाते हैं

इच्छाएं मर जाती हैं

सब अधूरा-सा लगता है

जब तुम वादे नहीं निभाते,

कहकर भी नहीं आते।

मन उखड़ा-उखड़ा-सा रहता है।

प्रतीक्षा के पल

सदैव मोहक नहीं होते,

स्मृतियां सदैव मधुर नहीं होतीं।

समय के साथ

स्मृतियां धुल जाती हैं

नेह-भाव पर

धूल जम जाती है।

ज़िन्दगी ठहर-सी जाती है।

इस ठहरी हुई ज़िन्दगी में ही

अपने लिए फूल चुनती हूं।

नहीं कोई आस रखती किसी से,

अपने लिए जीती हूं

अपने लिए हंसती हूं।

  

अपनेपन की कामना
रेशम की डोरी

कोमल भावों से बंधी

बन्धन नहीं होती,

प्रतिदान की

लालसा भी नहीं होती।

बस होती है तो

एक चाह, एक आशा

अपनेपन की कामना

नेह की धारा।

बस, जुड़े रहें

मन से मन के तार,

दुख-सुख की धार

बहती रहे,

अपनेपन का एहसास

बना रहे।

लेन-देन की न कोई बात हो

न आस हो

बस

रिश्तों का एहसास हो।

 

बिखरती है ज़िन्दगी

अपनों के बीच

निकलती है ज़िन्दगी,

न जाने कैसे-कैसे

बिखरती है ज़िन्दगी।

बहुत बार रोता है मन

कहने को कहता है मन।

किससे कहें

कैसे कहें

कौन समझेगा यहां

अपनों के बीच

जब बीतती है ज़िन्दगी।

शब्दों को शब्द नहीं दे पाते

आंखों से आंसू नहीं बहते

किसी को समझा नहीं पाते।

लेकिन

जीवन के कुछ

अनमोल संयोग भी होते हैं

जब बिन बोले ही

मन की बातों को

कुछ गैर समझ लेते हैं

सान्त्वना के वे पल

जीवन को

मधुर-मधुर भाव दे जाते हैं।

अपनों से बढ़कर

अपनापन दे जाते हैं।

 

अनचाही दस्तक

श्रवण-शक्ति

तो ठीक है मेरी

किन्तु नहीं सुनती मैं

अनचाही दस्तक।

खड़काते रहो तुम

मेरे मन को

जितना चाहे,

नहीं सुनना मुझे

यदि किसी को,

तो नहीं सुनना।

अपने मन से

जीने की

मेरी कोशिश को

तुम्हारी अनचाही दस्तक

तोड़ नहीं सकती।

 

अगर तुम न होते

अगर तुम न होते

तो दिन में रात होती।

अगर तुम न होते

तो बिन बादल बरसात होती।

अगर तुम न होते

तो सुबह सांझ-सी,

और सांझ

सुबह-सी होती।

अगर तुम न होते

तो कहां

मन में गुलाब खिलते

कहां कांटों की चुभन होती।

अगर तुम न होते

तो मेरे जीवन में

कहां किसी की परछाईं न होती।

अगर तुम न होते

तो ज़िन्दगी

कितनी निराश होती।

अगर तुम न होते

तो भावों की कहां बाढ़ होती।

अगर तुम न होते

तो मन में कहां

नदी-सी तरलता

और पहाड़-सी गरिमा होती।

अगर तुम न होते

तो ज़िन्दगी में

इन्द्रधनुषी रंग न होते ।

अगर तुम न होते

कहां लरजती ओस की बूंदें

कहां चमकती चंदा की चांदनी

और कहां

सुन्दरता की चर्चा होती।

.

अगर तुम न होते

-

ओ मेरे सूरज, मेरे भानु

मेरे दिवाकर, मेरे भास्कर

 मेरे दिनेश, मेरे रवि

मेरे अरुण

-

अगर तुम न होते।

अगर तुम न होते ।

अगर तुम न होते ।

 

रिश्ते ऑनलाइन या ऑफलाइन

क्या ऑनलाइन रिश्ते ऑफलाइन रिश्तों पर हावी हो रहे हैं

----------.----------

मेरी दृष्टि में ऑनलाइन रिश्ते ऑफलाइन रिश्तों पर हावी नहीं हो रहे हैंए दोनों का आज हमारे जीवन में अपना.अपना महत्व है। हर रिश्ते को साधकर रखना हमें आना चाहिएए फिर वह ऑनलाइन हो अथवा ऑफलाइन ।

वास्तव में ऑनलाइन रिश्तों ने हमारे जीवन को एक नई दिशा दी है जो कहीं भी ऑफलाइन रिश्तों पर हावी नहीं है।

अब वास्तविकता देखें तो ऑफलाइन रिश्ते रिश्तों में बंधे होते हैंए कुछ समस्याएंए कुछ विवशताएंए कुछ औपचारिकताएं, कुछ गांठें। यहां हर रिश्ते की सीमाएं हैंए बन्धन हैंए लेनदारीए देनदारी हैए आयु.वर्ग के अनुसार मान.सम्मान हैए जो बहुत बार इच्छा न होते हुए भीए मन न होते हुए भी निभानी पड़ती हैं। और कुछ स्वार्थ भी हैं। यहां हर रिश्ते की अपनी मर्यादा हैए जिसे हमें निभाना ही पड़ता है। ऐसा बहुत कम होता है कि ये रिश्ते बंधे रिश्तों से हटकर मैत्री.भाव बनते हों।

जीवन में कोई तो एक समय आता है जब हमारे पास अपने नहीं रहते, एक अकेलापन, नैराश्य घेर लेता है। और जो हैं, कितने भी अपने हों, हम उनसे मन की बात नहीं बांट पाते। यह सब मानते हैं कि हम मित्रों से जो बात कह सकते हैं बहुत बार बिल्कुल अपनों से भी शेयर नहीं कर पाते। ऐसा ही रिश्ता कभी-कभी कहीं दूर बैठे अनजाने रिश्तों में मिल जाता है। और वह मिलता है ऑनलाईन रिश्ते में।

किन्तु ऑनलाइन रिश्तों में कोई किसी भी प्रकार का बन्धन नहीं है। एक नयापन प्रतीत होता हैए एक सुलझापनए जहां मित्रता में आयुए वर्ग का बन्धन नहीं होता। बहुत बार हम समस्याओं से घिरे जो बात अपनों से नहीं कर पातेए इस रिश्ते में बात करके सुलझा लेते हैं। एक डर नहीं होता कि मेरी कही बात सार्वजनिक हो जायेगी।

हांए इतना अवश्य है कि रिश्ते चाहे ऑनलाइन हों अथवा ऑफलाइनए सीमाएं दोनों में हैंए अतिक्रमण दोनों में ही नहीं होना चाहिए।

  

जीवन का गणित

बालपन से ही

हमें सिखा दी जाती हैं

जीवन जीने के लिए

अलग-अलग तरह की

जाने कितनी गणनाएं,

जिनका हल

किसी भी गणित में

नहीं मिलता।

.

लेकिन ज़िन्दगी की

अपनी गणनाएं होती हैं

जो अक्सर हमें

समझ ही नहीं आतीं।

यहां चलने वाला

जमा-घटाव, गुणा-भाग

और जाने कितने फ़ार्मूले

समझ से बाहर रहते हैं।

.

ज़िन्दगी

हमारे जीवन में

कब क्या जमा कर देगी

और कब क्या घटा देगी,

हम सोच ही नहीं सकते।

.

क्या ऐसा हो सकता है

कि गणित के

विषय को

हम जीवन से ही निकाल दें,

यदि सम्भव हो

तो ज़रूर बताना मुझे।

 

फिर वही कहानी

कछुए से मिलना

अच्छा लगा मुझे।

धूप सेंकता

आराम से बैठा

कभी जल में

कभी थल में।

कभी पत्थर-सा दिखता

तो कभी सशरीर।

मैंने बात करनी चाही

किन्तु उसने मुँह फ़ेर लिया।

फिर अचानक पलटकर बोला

जानता हूँ

वही सैंकड़ों वर्ष पुरानी

कहानी लेकर आये होंगे

खरगोश सो गया था

और कछुआ जीत गया था।

पता नहीं किसने गढ़ी

यह कथा।

मुझे तो कुछ स्मरण नहीं,

और न ही मेरे पूर्वजों ने

मुझे कोई ऐसी कथा सुनाई थी

न अपनी ऐसी जीत की

कोई गुण-गाथा गाई थी।

नया तो कुछ लिखते नहीं

उसी का पिष्ट-पेषण करने में

लगे रहते हो।

कब तक बच्चों को

खरगोश-कछुए,

शेर-बकरी और बन्दर मामा की

अर्थहीन कहानियाँ

सुनाकर बहलाते रहोगे,

कब तक

मेरी चाल का उपहास

बनाते रहोगे।

अरे,

साहस से

अपने बारे में लिखो,

अपने रिश्तों को उकेरो

अपनी अंधी दौड़ को लिखो,

आरोप-प्रत्यारोप,

बदलते समाज को लिखो।

यूँ तो अपनी

हज़ारों साल पुरानी संस्कृति का

लेखा-जोखा लिखते फ़िरते हो

किन्तु

जब काम की बात आती है

तो मुँह फ़ेरे घूमते हो।

 

और कितना सच कहूं

सच कहूं तो

अब सच बोलने का मन नहीं करता।

सच कहूं तो

अब मन किसी काम में नहीं लगता।

सच कहूं तो

अब कुछ भी यहां अच्छा नहीं लगता।

सच कहूं तो

अब कुछ लिखने में मन नहीं लगता।

सच कहूं तो

अब विश्वास लायक कोई नहीं दिखता।

सच कहूं तो

अब रफ्फू सीने का मन नहीं करता।

सच कहूं तो

अब रिश्ते सुलझाने का मन नहीं करता।

सच कहूं तो

अब अपनों से ही बात करने का मन नहीं करता।

सच कहूं तो

अब हंसने या रोने का भी मन नहीं करता।

सच कहूं तो

अब सपनों में जीने का मन नहीं करता।

सच कहूं तो

अब तुमसे भी बात करने का मन नहीं करता।

 

 

अकेलापन
अच्छा लगता है.

अकेलापन।

समय देता है

कुछ सोचने के लिए

अपने-आपसे बोलने के लिए।

गुनगुनी धूप

सहला जाती है मन।

खिड़कियों से झांकती रोशनी

कुछ कह जाती है।

रात का उनींदापन

और अलसाई-सी सुबह,

कड़वी-मीठी चाय के साथ

दिन-भर के लिए

मधुर-मधुर भाव दे जाती है।

 

जागरण का आंखों देखा हाल

चलिए,

आज आपको

मेरे परिचित के घर हुए

जागरण का

आंखों देखा हाल सुनाती हूं।

मैं मूढ़

मुझे देर से समझ आया

कि वह जागरण ही था।

भारी भीड़ थी,

कनातें सजी थीं,

दरियां बिछी थीं।

लोगों की आवाजाही लगी थी।

चाय, ठण्डाई का

दौर चल रहा था।

पीछे भोजन का पंडाल

सज रहा था।

लोग आनन्द ले रहे थे

लेकिन मां की प्रतीक्षा कर रहे थे।

इतने में ही एक ट्रक में 

चार लोग आये

बक्सों में कुछ मूर्तियां लाये।

पहले कुछ टूटे-फ़ूटे

फ़ट्टे सजाये।

फिर मूर्तियों को जोड़ा।

आभूषण पहनाये, तिलक लगाये,

भक्त भाव-विभोर

मां के चरणों में नत नज़र आये।

जय-जयकारों से पण्डाल गूंज उठा।

फ़िल्मी धुनों के भक्ति गीतों पर

लोग झूमने लगे।

गायकों की टोली

गीत गा रही थी

भक्तगण झूम-झूमकर

भोजन का आनन्द उठा रहे थे।

भोजन सिमटने लगा

भीड़ छंटने लगी।

भक्त तन्द्रा में जाने लगे।

गायकों का स्वर डूबने लगा।

प्रात होने लगी

कनात लेने वाले

दरियां उठाने वाले

और मूर्तियां लाने वालों की

भीड़ रह गई।

पण्डित जी ने भोग लगाया।

मैंने भी प्रसाद खाया।

ट्रक चले गये

और जगराता सम्पन्न हुआ।

जय मां ।

 

ज़िन्दगी के साथ एक और तकरार

अक्सर मन करता है

ज़िन्दगी

तुझसे शिकायत करुं।

न  जाने कहां-कहां से

सवाल उठा लाती है

और मेरे जीने में

अवरोध बनाने लगती है।

जब शिकायत करती हूं

तो कहती है

बस

सवाल एक छोटा-सा था।

लेकिन,

तुम्हारा एक छोटा-सा सवाल

मेरे पूरे जीवन को

झिंझोड़कर रख देता है।

उत्तर तो बहुत होते हैं

मेरे पास,

लेकिन देने से कतराती हूं,

क्योंकि

तर्क-वितर्क

कभी ख़त्म नहीं होते,

और मैं

आराम से जीना चाहती हूं।

बस इतना समझ ले

ज़िन्दगी

तुझसे

हारी नहीं हूं मैं

इतनी भी बेचारी नहीं हूं मैं।

 

 

चींटियों के पंख

सुना है

चींटियों की

मौत आती है

तो पर निकल आते हैं।

.

किन्तु चिड़िया के

पर नहीं निकलते

तब मौत आती है।

.

कभी-कभी

इंसान के भी

पर निकल आते हैं

अदृश्य।

उसे आप ही नहीं पता होता

कि वह कब

आसमान में उड़ रहा है

और कब धराशायी हो जाता है।

क्योंकि

उसकी दृष्टि

अपने से ज़्यादा

औरों के

पर गिनने पर रहती है।

 

जीवन के पल

जीवन के

कितने पल हैं

कोई न जाने।

कर्म कैसे-कैसे किये

कितने अच्छे

कितने बुरे

कौन बतलाए।

समय बीत जाता है

न समझ में आता है

कौन समझाये।

सोच हमारी ऐसी

अब आपको

क्या-क्या बतलाएं।

न थे, न हैं, न रहेंगे,

जानते हैं

तब भी मन

चिन्तन करता है हरपल,

पहले क्या थे,

अब क्या हैं,

कल क्या होंगे,

सोच-सोच मन घबराये।

जो बीत गया

कुछ चुभता है

कुछ रुचता है।

जो है,

उसकी चलाचल

रहती है।

आने वाले को

कोई न जाने

बस कुछ सपने

कुछ अपने

कुछ तेरे, कुछ मेरे

बिन जाने, बिन समझे

जीवन

यूं ही बीता जाये।