ये आंखें

ज़रा-ज़रा-सी बात पर बहक जाती हैं ये आंखें।

ज़रा-ज़रा-सी बात पर भर आती हैं ये आंखें।

मुझसे न पूछना कभी

आंखों में नमी क्यों है,

इनकी तो आदत ही हो गई है,

न जाने क्यों

हर समय तरल रहती हैं ये आंखें।

अच्छे-बुरे की समझ कहाॅं

 इन आंखों को

बिन समझे ही बरस पड़ती हैं ये आंखें।

 पता नहीं कैसी हैं ये आंखें।

दिल-दिमाग से ज़्यादा देख लेती हैं ये आंखें।

जो न समझना चाहिए

वह भी न झट-से समझ लेती हैं ये आंखें।

बहुत कोशिश करती हूॅं

झुकाकर रखूॅं इन आंखों को

न जाने कैसे खुलकर

चिहुॅंक पड़ती हैं ये आंखें।

किसी और को क्या कहूॅं,

ज़रा बचकर रहना,

आंखें तरेरकर

मुझसे ही कह देती हैं ये आंखें।

सीता की व्यथा

कौन समझ पाया है

सीता के दर्द को।

उर्मिला का दर्द

तो कवियों ने जी लिया

किन्तु सिया का दर्द

बस सिया ने ही जाना।

धरा से जन्मी

धरा में समाई सीता।

क्या नियति रही मेरी

ज़रूर सोचा करती होगी सीता

.

किसे मिला था श्राप,

और किसे मिला था वरदान,

माध्यम कौन बना,

किसके हाथों

किसकी मुक्ति तय की थी विधाता ने

और किसे बनाया था माध्यम

ज़रूर सोचा करती होगी सीता

.

क्या रावण के वध का

और कोई मार्ग नहीं मिला

विधाता को

जो उसे ही बलि बनाया।

एक महारानी की

स्वर्ण हिरण की लालसा

क्या इतना बड़ा अपराध था

जो उसके चरित्र को खा गया।

सब लक्ष्मण रेखा-उल्लंघन

की ही बात करते हैं,

सीता का  भाव किसने जाना।

लक्ष्मण रेखा के आदेश से बड़ा था

द्वार पर आये साधु का सम्मान

यह किसी ने समझा।

साधु के सम्मान की भावना

उसके जीवन का

कलंक कैसे बनकर रह गया,

ज़रूर सोचा करती होगी सीता

.

रावण कौन था, क्यों श्रापित था

क्या जानती थी सीता।

शायद नहीं जानती थी सीता।

सीता बस इतना जानती थी

कि वह

अशोक वाटिका में सुरक्षित थी

रावण की सेनानियों के बीच।

कभी अशोक वाटिका से

बचा लिया गया मुझे

मेरे राम द्वारा

तो क्या मेरा भविष्य इतना अनिश्चित होगा,

क्या कभी सोचा करती थी सीता

शायद नहीं सोचा करती थी इतना सीता।

-

क्या सोचा करती थी सीता

कि एक महापण्डित

महाज्ञानी के कारावास में रहने पर

उसे देनी होगी

अग्नि-परीक्षा अपने चरित्र की।

शायद नहीं सोचा करती थी सीता।

 

क्योंकि यह परीक्षा

केवल उसकी नहीं थी

थी उसकी भी

जिससे ज्ञान लिया था लक्ष्मण ने

मृत्यु के द्वार पर खड़े महा-महा ज्ञानी से।

विधाता ने क्यों रचा यह खेल

क्यों उसे ही माध्यम बनाया

कभी समझ पाई होगी सीता।

जाने किन जन्मों के

वरदान, श्राप और अभिशाप से

लिखी गई थी उसकी कथा

कहाॅं समझ पाई होगी सीता।

 

कथा बताती है

कि राजा ने अकाल में चलाया था हल

और पाया था एक घट

जिसमें कन्या थी

और वह थी सीता।

घट में रखकर

धरती के भीतर

कौन छोड़ गया था उसे

क्या परित्यक्त बालिका थी वह,

सोचती तो ज़रूर होगी सीता

किन्तु कभी समझ पाई होगी सीता।

.

 अग्नि में समाकर

अग्नि से निकलकर

पवित्र होकर भी

कहाॅं बन पाई

राजमहलों की राजरानी सीता।

अपना अपराध

कहाॅं समझ पाई होगी सीता।

.

लक्ष्मण के साथ

महलों से निकलकर

अयोध्या की सीमा पर छोड़ दी गई

नितान्त अकेली, विस्थापित

उदर में लिए राज-अंश

पद-विच्युत,

क्या कुछ समझ पाई होगी सीता

कहाॅं कुछ समझ पाई होगी सीता।

.

कैसे पहुॅंची होगी किसी सन्त के आश्रम

कैसे हुई होगी देखभाल

महलों से निष्कासित

राजकुमारों को वन में जन्म देकर

वनवासिनी का जीवन जीते

मैं बनी ही क्यों कभी रानी

ज़रूर सोचती होगी सीता

किन्तु कभी कुछ समझ पाई होगी सीता।

.

कितने वर्ष रही सन्तों के आश्रम में

क्या जीवन रहा होगा

क्या स्मृतियाॅं रही होंगी विगत की

शायद सब सोचती होगी सीता

क्यों हुआ मेरे ही साथ ऐसा

कहाॅं समझ पाई होगी सीता।

.

तेरह वर्ष वन में काटे

एक काटा

अशोक वाटिका में,

चाहकर भी स्मृतियों में

नहीं पाते थे

राजमहल में काटे सुखद दिन

कितने दिन थे, कितना वर्ष

कहाॅं रह पाईं होंगी

उसके मन में मधुर स्मृतियाॅं।

. 

कहते हैं

उसके पति एकपत्नीव्रता रहे,

मर्यादा पुरुषोत्तम थे वे,

किन्तु

इससे उसे क्या मिला भला जीवन में

उसके बिना भी तो

उनका जीवन निर्बाध चला

फिर वह आई ही क्यों थी उस जीवन में

ज़रूर सोचती  होगी सीता।

.

चक्रवर्ती सम्राट बनने में भी

नहीं बाधा आई उसकी अनुपस्थिति।

जहाॅं मूर्ति से

एक राजा

चक्रवर्ती राजा बन सकता था

तो आवश्यकता ही कहाॅं थी महारानी की

और क्यों थी ,

ज़रूर सोचा करती होगी सीता।

.

ज़रूर सोचा करती होगी सीता

अपने इस दुर्भाग्य पर

उसके पुत्र रामकथा तो जानते थे

किन्तु नहीं जानते थे

कथा के पीछे की कथा।

वे जानते थे

तो केवल राजा राम का प्रताप

न्याय, पितृ-भक्त, वचनों के पालक

एवं मर्यादाओं की बात।

.

वे नहीं जानते थे

किसी महारानी सीता को

चरित्र-लांछित सीता को,

अग्नि-परीक्षा देकर भी

राजमहलों से

विस्थापित हुई सीता को।

नितान्त अकेली वन में छोड़ दी गई

किसी सीता को।

इतनी बड़ी कथा को

कैसे समझा सकती थी

अपने पुत्रों को सीता

नहीं समझा सकती थी सीता।

-

अश्वमेध का अश्व जिसे

राजाओं के पास,

राज्यों में घूमना था

वाल्मीकि आश्रम कैसे पहुॅंच गया

और उसके पुत्रों ने

उस अश्व को रोककर

युद्ध क्यों किया।

क्यों विजित हुए वे

तीनों भाईयों से,

कि राम को आना पड़ा

.

जीवन के पिछले सारे अध्याय

बन्द कर चुकी थी सीता।

वह अतीत में थी

वर्तमान में

भविष्य को लेकर

आशान्वित रही होगी

वनदेवी के रूप में

जीवन व्यतीत करती हुई सीता।

और इस नवीन अध्याय की तो

कल्पना भी नहीं की होगी

समझ सकी होगी इसे सीता।

.

कैसे समझ सकती थी सीता

कि यह उसके जीवन के पटाक्षेप का

अध्याय लिखा जा रहा था

कहाॅं समझ सकती थी सीता।

जीवन की इस एक नई आंधी के बारे में

कभी सोच भी नहीं सकती थी सीता।

.

पवित्रता तो अभी भी दांव पर थी।

चाहे कारागार में रही

अथवा वनवासिनी

प्रमाण तो चहिए ही था।

कैसे प्रमाणित कर सकती थी सीता।

धरा से निकली, धरा में समा गई सीता।

.

इससे तो

अशोक वाटिका में ही रह जाती

तो अपमानित तो न होती सीता

इतना तो ज़रूर सोचती होगी सीता

मेरी  सोच

पता नहीं, शायद

मेरी ही सोच कुछ अलग है

इस तरह के चित्र

मुझे हैरान करते हैं

परेशान करते हैं।

कल्पनाओं के संसार में

मैं जी नहीं पाती

और वास्तविकता से

मुॅंह मोड़ कर नहीं जाती।

ऐसे चित्र जब

बार-बार आॅंखों के सामने आते हैं

तो मन मसोस कर रह जाते हैं।

आज कहाॅं पाई जाती है ऐसी नारी

कैसे लिख लेते हैं हम

इन चित्रों को देखकर

बिहारी-पद्मावत-सी शायरी।

मेरे मन में नहीं आते

प्यार-मुहब्बत के विचार

देखकर इन चित्रों का

विचित्र श्रृंगार।

कौन धारण करता है

आजकल ऐसे वस्त्र

और ऐसा हार-श्रृंगार

मानों किसी फ़ोटो-शूट के लिए

जा रही यह नारी,

अथवा है किसी कलाकार की

अनोखी चित्रकारी,

और उसकी ऐसी मति-मंद

अकल्पनीय सोच 

मेरे चिन्तन को,

मुझे बना देती है बेचारी।

ऐसे घट तो आजकल

संग्रहालयों में पाये जाते हैं

और जो वास्तव में कुंओं से

जल भरकर लाते हैं

उनके हाल देखकर

आंखों में आंसू जाते हैं।

 

मिलन की घड़ियाॅं

चुभती हैं

मिलन की घड़ियाॅं,

जो यूॅं ही बीत जाती हैं,

कुछ चुप्पी में,

अनबोले भावों में,

कुछ कही-अनकही

शिकायतों में,

बातों की छुअन

वादों की कसम

घुटता है मन

और मिलन की घड़ियाॅं

बीत जाती हैं।

 

फूल खिलाए उपवन में
दो फूल खिलाए उपवन में

उपवन मेरा महक गया

.

फूलों पर तितली बैठी

मन में एक उमंग उठी

.

कुछ पात झरे उपवन में

धरा खुशियों से बहक उठी

.

कुछ भाव बने इकरार के

मन मेरा बिखर गया

.

सपनों में मैं जीने लगी

अश्रुओं से सपना टूट गया

.

कोई झाॅंक न ले मेरी आंखों में

आॅंखों को मैंने मूॅंद लिया।

.

कोई प्यार के बोल बोल गया

मानों जीवन में विष घोल गया।

.

जीवन का सबसे बड़ा झूठ लगा

कोई रिश्तों में मीठा बोल गया

 

    

 

मुस्कुराते हुए फूल

किसी ने कहा

कुछ कहते हैं मुस्कुराते हुए फूल।

न,न, बहुत कुछ कहते हैं

मुस्कुराते हुए फूल।

अब क्या बताएॅं आपको

दिल छीन कर ले जाते हैं

मुस्कुराते हुए फूल।

हम तो उपवन में

यूॅं ही घूम रहे थे

हमें रोककर बहुत कुछ बोले

मुस्कुराते हुए फूल।

ज़िन्दगी का पूरा दर्शन

समझा जाते हैं

ये मुस्कुराते हुए फूल।

कहते हैं

कांटों से नहीं तुम्हारा पाला पड़ा कभी

डालियों पर ही नहीं

ज़िन्दगी की गलियों में भी

कांटें छुपे रहते हैं फूलों के बीच।

यूॅं तो कहते हैं

हॅंस-बोलकर जिया करो

फूल-फूल की महक पिया करो,

किन्तु अवसर मिलते ही

चुभा जाते हैं कांटे कितने ही फूल।

चेतावनी भी दे जाते हैं

मुस्कुराते हुए फूल।

झरते हुए फूलों की पत्तियाॅं

मुस्कुरा-मुस्कुरा कर

कहती  हैं,

देख लिया हमें

धरा पर मिट रहे हैं,

ध्यान रखना, बहुत धोखा देते हैं

मुस्कुराते हुए फूल।

 

कैसे जायें नदिया पार

ठहरी-ठहरी-सी, रुकी-रुकी-सी जल की लहरें

कश्ती को थामे बैठीं, मानों उसे रोक रही लहरें

बिन मांझी कहाॅं जायेगी, कैसे जायें नदिया पार

तरल-तरल भावों से, मानों कह रही हैं ये लहरें

अपनी राहें चुनने की बात

बादलों में घर बनाने की सोचती हूं

हवाओं में उड़ने की बात सोचती हूं

आशाओं का सामान लिए चलती हूं

अपनी राहें चुनने की बात सोचती हूं

सिल्ली बर्फ़ सी

मन में भावों की सिल्ली बर्फ़ सी

तुम्हारे नेह से पिघल रही तरल-सी

चलो आज मिल बैठें दो बात करें

नयनों से झरे आंसू रिश्तों की छुअन-सी

शब्द लड़खड़ा रहे

रात भीगी-भीगी

पत्तों पर बूंदें

सिहरी-सिहरी

चांद-तारे सुप्त-से

बादलों में रोशनी घिरी

खिड़कियों पर कोहरा

मन पर शीत का पहरा

 शब्द लड़खड़ा रहे

बातें मन में दबीं।

 

वक्त के मरहम

कहने भर की ही बात है

कि वक्त के मरहम से

हर  जख़्म भर जाया करता है।

 

ज़िन्दगी की हर चोट की

अपनी-अपनी पीड़ा होती है

जो केवल वही समझ पाता है

जिसने चोट खाई हो।

किन्तु, चोट

जितनी गहरी हो

वक्त भी

उतना ही बेरहम हो जाता है।

और हम इंसानों की फ़ितरत !

 

कुरेद-कुरेद कर

जख़्मों को ताज़ा बनाये रखते हैं।

 

पीड़ा का अपना ही

आनन्द होता है।

 

तुम्हारा मोहक रूप

तुम्हारा मोहक रूप मन को आनन्दित करता है

तुम्हारी नयनों की आभा से मन पुलकित होता है

कोमल-कांत छवि तुम्हारी, शक्ति रूपा हो तुम

तुम्हारा सुन्दर बाल-रूप मन को हर्षित करता है।

मोबाईल की माया

आॅंख मूॅंदकर सब ज्ञान मिले, और क्या चाहिए भला

बिन पढ़े-लिखे सब हाल मिले और क्या चाहिए भला

दुनिया पूरी घूम रहे, इसका, उसका, सबका पता रहे

न टिकट लगे, न आरक्षण चाहिए, और क्या चाहिए भला

अपनी हिम्मत  अपनी राहें

बाधाओं को तोड़कर राहें बनाने का मज़ा ही कुछ और है

धरा और पाषाण को भेदकर जीने का मज़ा ही कुछ और है

सिखा जाता है यह अंकुरण, सुविधाओं में तो सभी पनप लेते हैं

अपनी हिम्मत से अपनी राहें बनाने का मज़ा ही कुछ और है।

डर-डरकर ज़िन्दगी नहीं चलती

डर-डरकर ज़िन्दगी नहीं चलती यह जान ले सखी

उठ हाथ थाम, आगे बढ़, साथ छोड़ेंगे रे सखी

घन छा रहे, रात घिर आई, नदी-नीर बैठ अब

नया सोच, चल ज़िन्दगी की राहों को बदलें रे सखी

उंची उड़ान
आज चांद का अर्थ बदल गया

आज चांद रोटी से घर बन गया

उंची उड़ान लेकर चले हैं हम

आज चांद से सर गर्व से तन गया।

सड़कों पर सागर बना

 सड़कों पर सागर बना, देख रहे हम हक्के-बक्के

बूंद-बूंद को मन तरसे, घर में पानी भर-भर के

कितने घर डूब गये, राहों पर खड़े देख रहे

कैसे बढ़े ज़िन्दगी, सोच-सोचकर नयन तरस रहे।

चढ़नी पड़ती हैं सीढ़ियाॅं

कदम-दर-कदम ही चढ़नी पड़ती हैं सीढ़ियाॅं

नीचे से उपर, उपर से नीचे ले आती हैं सीढ़ियाॅं

बस धरा की फ़िसलन का ज़रा ध्यान रखिए सदा

नहीं तो उपर से सीधे नीचे ले आती हैं सीढ़ियाॅं

बरसती बूॅंदें

बरसती बूंदों को रोककर जीवन को तरल करती हूं

बादलों से बरसती नेह-धार को मन से परखती हूं

कौन जाने कब बदलती हैं धाराएं और गति इनकी

अंजुरी में बांधकर मन को सरस-सरस करती हूं।

 

शोर बहुत होगा

बात ये जाने कितनों को चुभती जायेगी

हमारी हॅंसी जब दूर तक सुनाई दे जायेगी

शोर बहुत होगा, पूछताछ होगी, जांच होगी

खुशियाॅं हमारे जीवन में कैसे समा जायेंगी

जीवन-भर का सार

सुना करते हैं  रेखाओं में भाग्य लिखा रहता है

आड़ी-तिरछी रेखाओं में हाल लिखा रहता है

चेहरे पर चेहरे लगाकर बैठे हैं देखो तो ज़रा

इन रेखाओं में जीवन-भर का सार लिखा रहता है

कुशल रहें सब, स्वस्थ रहें

कुशल रहें सब, स्वस्थ रहें सब, यही कामना करते हैं

आनी-जानी तो लगी रहेगी, हम यूं ही डरते रहते हैं

कौन है अपना, कौन पराया, कहां जान पाते हैं हम

जो सुख-दुख के हों  साथी, वे ही अपने लगने लगते हैं

रंगों में जीवन को आशा

मुक्त गगन में चिड़िया को उड़ते देखा

भोर के सूरज की सुरमई आभा को देखा

मन-मयूर कहता है चल उड़ चलें कहीं

रंगों में जीवन को आशाओं में पलते देखा

हम-तुम तो हैं मूरख जी

युग है चपर कनाती का

ज़ोर चले है लाठी का

हम-तुम तो हैं मूरख जी

घोड़ा चलता काठी का

कड़वे बोल

मीठा खाकर बोले कड़वे बोल

झूठे की कभी न खोले पोल

इधर-उधर की लगाकर बैठे

ऐसी रसना का है क्या मोल

चिड़ियाॅं रानी

गुपचुप बैठी चिड़ियाॅं रानी

चल कर लें दो बातें प्यारी

कुछ तुम बोलो, कुछ मैं बोलूं

मन की बातें कर लें सारी

मौसम के रॅंग

सहमी-सहमी धूप है, खिड़कियों से झांक रही

कुहासे को भेदकर देखो घर के भीतर आ रही

पग-पग चढ़ती, पग-पग रुकती, कहाँ चली ये

पकड़ो-पकड़ो भाग न जाये, मेरे हाथ न आ रही।

दुख-सुख तो आने-जाने हैं
मिल जाये जब मज़बूत सहारा राहें सरल हो जाती हैं

कौन है अपना, कौन पराया, ज़रा पहचान हो जाती है

दुख-सुख तो आने-जाने हैं, किसने देखा, किसने समझा

जब हाथ थाम ले कोई, राहें समतल,सरल हो जाती हैं।

तू कोमल नार मैं तेरा प्यार
हाथ जोड़ता हूँ तेरे, तेरी चप्पल टूट गई, ला मैं जुड़वा लाता हूँ

न जा पैदल प्यारी, साईकल लाया मैं, इस पर लेकर जाता हूँ

लोग न जाने क्या-क्या समझेंगे, तू कोमल नार मैं तेरा प्यार

आजा-आजा, आज तुझे मैं लाल-किला दिखलाने ले जाता हूँ

माँ की ममता
जीवन के सुखमय पल बस माँ के संग ही होते हैं

नयनों से बरसे नेह, संतति के सुखद पल होते हैं

हिलमिल-हिलमिल बस जीवन बीता जाता यूँ ही

किसने जाना, माँ की ममता में अनमोल रत्न होते हैं।