सपना देखने में क्या जाता है

कोई भी उड़ान

इतनी सरल नहीं होती

जितनी दिखती है।

 

बड़ा आकर्षित करता है

आकाश को चीरता यान।

रंगों में उलझता।

 

दोनों बाहें फैलाये

आकाश को

हाथों से छू लेने की

एक नाकाम कोशिश,

अक्सर

मायूस तो करती है,

लेकिन आकाश में

चमकता चांद !

कुछ सपने दिखाता है

पुकारता है

साहस देता है,

चांद पर

घर बसाने का सपना

दिखाता है,

जानती हूं , कठिन है

असम्भव-प्रायः

किन्तु सपना देखने में क्या जाता है।

 

मन तो बहकेगा ही

कभी बादलों के बीच से झांकता है चांद।

न जाने किस आस में

तारे उसके आगे-पीछे घूम रहे,

तब रूप बदलने लगा ये चांद।

कुछ रंगीनियां बरसती हैं गगन से]

धरा का मन शोख हो उठा ।

तिरती पल्लवों पर लाज की बूंदे

झुकते हैं और धरा को चूमते हैं।

धरा शर्माई-सी,

 आनन्द में

पक्षियों के कलरव से गूंजता है गगन।

 

अब मन  तो  बहकेगा  ही

अब  आप  ही   बताईये

क्या करें।

 

कभी-कभी वजह-बेवजह क्रोध करना भी ज़रूरी है

विनम्रता से दुनिया अब नहीं चलती, असहिष्णुता भी ज़रूरी है।

समझौतों से बात अब नहीं बनती, अस्त्र उठाना भी ज़रूरी है।

ऐसा अब होता है जब हम रोते हैं जग हंसता है ताने कसता है

सरलता छोड़, कभी-कभी वजह-बेवजह क्रोध करना भी ज़रूरी है

मौन को मुखर कीजिए

बस अब बहुत हो चुका,

अब मौन को मुखर कीजिए

कुछ तो बोलिए

न मुंह बन्द कीजिए।

संकेतों की भाषा

कोई समझता नहीं

बोलकर ही भाव दीजिए।

खामोशियां घुटती हैं कहीं

ज़रा ज़ोर से बोलकर

आवाज़ दीजिए।

जो मन न भाए

उसका

खुलकर विरोध कीजिए।

यह सोचकर

कि बुरा लगेगा किसी को

अपना मन मत उदास कीजिए।

बुरे को बुरा कहकर

स्पष्ट भाव दीजिए,

और यही सुनने की

हिम्मत भी

अपने अन्दर पैदा कीजिए।

चुप्पी को सब समझते हैं कमज़ोरी

चिल्लाकर जवाब दीजिए।

कलम की नोक तीखी कीजिए

शब्दों को आवाज़ कीजिए।

मौन को मुखर कीजिए।

जब बजता था डमरू

कहलाते शिव भोले-भाले थे 
पर गरल उन्होंने पिया था
नरमुण्डों की माला पहने,
विषधर उनके आभूषण थे 
भूत-प्रेत-पिशाच संगी-साथी
त्रिशूल हाथ में लिया था
त्रिनेत्र खोल जब बजता था डमरू 
तीनों लोकों के दुष्टों का 
संहार उन्होंने किया था
चन्द्र विराज जटा पर,
भागीरथी को जटा में रोक
विश्व को गंगामयी किया था। 
भांग-धतूरा सेवन करते
भभूत लगाये रहते थे।
जग से क्‍या लेना-देना
सुदूर पर्वत पर रहते थे।
 *     *     *     *
अद्भुत थे तुम शिव
नहीं जानती 
कितनी कथाएं सत्य हैं
और कितनी कपोल-कल्पित 
किन्तु जो भी हैं बांधती हैं मुझे। 
*      *     *     *     *
तुम्हारी कथाओं से
बस 
तुम्हारा त्रिनेत्र, डमरू 
और त्रिशूल चाहिए मुझे
शेष मैं देख लूंगी ।

2008 में नयना देवी मन्दिर में हुआ हादसा

नैना देवी में हादसा हुआ। श्रावण मेला था। समाचारों की विश्वसनीयता के अनुसार वहां लगभग बीस हज़ार लोग उपस्थित थे। पहाड़ी स्थान। उबड़-खाबड़, टेढ़े-मेढ़े संकरे रास्ते। सावन का महीना। मूसलाधार बारिष। ऐसी परिस्थितियों में एक हादसा  हुआ। क्यों हुआ कोई नहीं जानता। कभी जांच समिति की रिपोर्ट आयेगी तब भी किसी को पता नहीं लगेगा।

  किन्तु जैसा कि कहा गया कि शायद कोई अफवाह फैली कि पत्थर खिसक रहे हैं अथवा रेलिंग टूटी। यह भी कहा गया कि कुछ लोगों ने रेंलिंग से मन्दिर की छत पर चढ़ने का प्रयास किया तब यह हादसा हुआ।

 किन्तु कारण कोई भी रहा हो, हादसा तो हो ही गया। वैसे भी ऐसी परिस्थ्तिियों मंे हादसों की सम्भावनाएं बनी ही रहती हैं। किन्तु ऐसी ही परिस्थितियों में आम आदमी की क्या भूमिका हो सकती है अथवा होनी चाहिए। जैसा कि कहा गया वहां बीस हज़ार दर्शनार्थी थे। उनके अतिरिक्त स्थानीय निवासी, पंडित-पुजारी; मार्ग में दुकानें-घर एवं भंडारों आदि में भी सैंकड़ों लोग रहे होंगे। बीस हज़ार में से लगभग एक सौ पचास लोग कुचल कर मारे गये और लगभग दो सौ लोग घायल हुए। अर्थात्  उसके बाद भी वहां सुरक्षित बच गये लगभग बीस हज़ार लोग थे। किन्तु जैसा कि ऐसी परिस्थितियों में सदैव होता आया है उन हताहत लोगों की व्यवस्था के लिए पुलिस नहीं आई, सरकार ने कुछ नहीं किया, व्यवस्था नहीं थी, चिकित्सा सुविधाएं नहीं थीं, सहायता नहीं मिली, जो भी हुआ बहुत देर से हुआ, पर्याप्त नहीं हुआ, यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ; आदि -इत्यादि शिकायतें समाचार चैनलों, समाचार-पत्रों एवं लोगों ने की।

 किन्तु प्रश्न यह है कि हादसा क्यों हुआ और हादसे के बाद की परिस्थितियों के लिए कौन उत्तरदायी है ?

निश्चित रूप से इस हादसे के लिए वहां उपस्थित बीस हज़ार लोग ही उत्तरदायी हैं। यह कोई प्राकृतिक हादसा नहीं था, उन्हीं बीस हज़ार लोगों द्वारा उत्पे्ररित हादसा था यह। लोग मंदिरों में दर्शनों के लिए भक्ति-भाव के साथ जाते हैं। सत्य, ईमानदारी, प्रेम, सेवाभाव का पाठ पढ़ते हैं। ढेर सारे मंत्र, सूक्तियां, चालीसे, श्लोक कंठस्थ होते हैं। किन्तु ऐसी ही परिस्थितियों में सब भूल जाते हैं। ऐसे अवसरों पर सब जल्दी में रहते हैं। कोई भी कतार में, व्यवस्था में बना रहना नहीं चाहता। कतार तोड़कर, पैसे देकर, गलत रास्तों से हम लोग आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। जहां दो हज़ार का स्थान है वहां हम बीस हज़ार या दो लाख एकत्र हो जाते हैं फिर कहते हैं हादसा हो गया। सरकार की गलती है, पुलिस नहीं थी, व्यवस्था नहीं थी। सड़कें ठीक नहीं थीं। अब सरकार को चाहिए कि नैना देवी जैसे पहाड़ी रास्तों पर राजपथ का निर्माण करवाये। किन्तु इस चर्चा से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जो  150 लोग मारे गये और दो सौ घायल हुए उन्हें किसने मारा और किसके कारण ये लोग घायल हुए? निश्चय ही वहां उपस्थित बीस हज़ार लोग ही इन सबकी मौत के अपराधी हैं। उपरान्त हादसे के सब लोग एक-दूसरे को रौंदकर घर की ओर जान बचाकर भाग चले। किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा कि उन्होंने किसके सिर अथवा पीठ पर  पैर रखकर अपनी जान बचाई है। सम्भव है अपने ही माता-पिता, भाई-बहन अथवा किसी अन्य परिचित को रौंदकर ही वे अपने घर सुरक्षित पहुंचे हों। जो गिर गये उन्हें किसी ने नहीं उठाया क्योंकि यह तो सरकार का, पुलिस का, स्वयंसेवकों का कार्य है आम आदमी का नहीं, हमारा-आपका नहीं। हम-आप जो वहां बीस हज़ार की भीड़ के रूप में उपस्थित थे किसी की जान बचाने का, घायल को उठाने का, मरे को मरघट पंहुचाने का हमारा दायित्व नहीं है। हम भीड़ बनकर किसी की जान तो ले सकते हेैं किन्तु किसी की जान नहीं बचा सकते। आग लगा सकते हैं, गाड़ियां जला सकते हैं, हत्या कर सकते हैं,  बलात्कार ओैर लूट-पाट कर सकते हैं किन्तु उन व्यवस्थाओं एवं प्रबन्धनों में हाथ नहीं बंटा सकते जहां होम करते हाथ जलते हों। जहां कोई उपलब्धि नहीं हैं वहां कुछ क्यों किया जाये।

  भंडारों में लाखों रुपये व्यय करके, देसी घी की रोटियां तो खिला सकते हैं, करोड़ों रुपयों की मूर्तियां-छत्र, सिंहासन दान कर सकते हैं किन्तु ऐसे भीड़ वाले स्थानों पर होने वाली आकस्मिक दुर्घटनाओं से निपटने के लिए आपदा-प्रबन्धन में अपना योगदान देने में हम कतरा जाते हैं। धर्म के नाम पर दान मांगने वाले प्रायः आपका द्वार खटखटाते होंगे, मंदिरों के निर्माण के लिए, भगवती जागरण, जगराता, भंडारा, राम-लीला के लिए रसीदें काट कर पैसा मांगने में युवा से लेकर वृद्धों तक को कभी कोई संकोच नहीं होता, किन्तु किसी अस्पताल के निर्माण के लिए, शिक्षा-संस्थानों हेतु, भीड़-भीड़ वाले स्थानों पर आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था हेतु एक आम आदमी का तो क्या किसी बड़ी से बड़ी धार्मिक संस्था को  भी कभी अपना महत्त योगदान प्रदान करते कभी नहीं देखा गया। किसी भी मन्दिर की सीढ़ियां चढ़ते जाईये और उस सीढ़ी पर किसी की स्मृति में बनवाने वाले का तथा जिसके नाम पर सीढ़ी बनवाई गई है, का नाम पढ़ते जाईये। ऐसे ही कितने नाम आपको द्वारों, पंखों, मार्गों आदि पर उकेरित भी मिल जायेंगे। किन्तु मैंने आज तक किसी अस्पताल अथवा विद्यालय में इस तरह के दानी का नाम नहीं देखा।

हम भीड़ बनकर तमाशा बना कते हैं, तमाशा देख सकते हैं, तमाशे में किसी को झुलसता देखकर आंखें मूंद लेते हैं क्योंकि यह तो सरकार का काम है।

  

दिल चीज़ क्या है

आज किसी ने पूछा

‘‘दिल चीज़ क्या है’’?

-

अब क्या-क्या बताएँ आपको

बड़़ी बुरी चीज़ है ये दिल।

-

हाय!!

कहीं सनम दिल दे बैठे

कहीं टूट गया दिल

किसी पर दिल आ गया,

किसी को देखकर

धड़कने रुक जाती हैं

तो कहीं तेज़ हो जाती हैं

कहीं लग जाता है किसी का दिल

टूट जाता है, फ़ट जाता है

बिखर-बिखर जाता है

तो कोई बेदिल हो जाता है सनम।

पागल, दीवाना है दिल

मचलता, बहकता है दिल

रिश्तों का बन्धन है

इंसानियत का मन्दिर है

ये दिल।

कहीं हो जाते हैं

दिल के हज़ार टुकड़े

और किसी -किसी का

दिल ही खो ही जाता है।

कभी हो जाती है

दिलों की अदला-बदली।

 फिर भी ज़िन्दा हैं जनाब!

ग़जब !

और कुछ भी हो

धड़कता बहुत है यह दिल।

इसलिए

अपनी धड़कनों का ध्यान रखना।

वैसे तो सुना है

मिनट-भर में

72 बार

धड़कता है यह दिल।

लेकिन

ज़रा-सी ऊँच-नीच होने पर

लाखों लेकर जाता है

यह दिल।

इसलिए

ज़रा सम्हलकर रहिए

इधर-उधर मत भटकने दीजिए

अपने दिल को।

 

खत लिखने से डरते थे।

मन ही मन

उनसे प्यार बहुत करते थे

पर खत लिखने से डरते थे।

कच्ची पैंसिल, फटा लिफ़ाफ़ा

आटे की लेई,

कापी का आखिरी पन्ना।

फिर सुन लिया

लोग लिफ़ाफ़ा देखकर

मजमून भांप लिया करते हैं।

उनसे प्यार बहुत करते थे

पर इस कारण

खत लिखने से डरते थे।

अब हमें

मजमून का अर्थ तो पता नहीं था

लेकिन

मजमून से

कुछ मजनूं की-सी ध्वनि

प्रतिध्वनित होती थी।

कुछ लैला-मजनूं की-सी।

और कभी-कभी जूं की-सी।

और
इन सबसे हम डरते थे ।
उनसे प्यार बहुत करते थे

पर इस कारण

खत लिखने से डरते थे।

मौन पर दो क्षणिकाएं

मौन को शब्द दूं

शब्द को अर्थ

और अर्थ को अभिव्यक्ति

न जाने राहों में

कब, कौन

समझदार मिल जाये।

*-*-*-*

मौन को

मौन ही रखना।

किन्तु

मौन न बने

कभी डर का पर्याय।

चाहे

न तोड़ना मौन को

किन्तु

मौन की अभिव्यक्ति को

सार्थक बनाये रखना।

 

 

अपने आप को खोजती हूं

अपने आप को खोजती हूं

अपनी ही प्रतिच्छाया में।

यह एकान्त मेरा है

और मैं भी

बस अपनी हूं

कोई नहीं है

मेरे और मेरे स्व के बीच।

यह अगाध जलराशि

मेरे भीतर भी है

जिसकी तरंगे मेरा जीवन हैं

जिसकी हलचल मेरी प्रेरणा है

जिसकी भंवर मेरा संघर्ष है

और मैं हूं और

और है मेरी प्रतिच्छाया

मेरी प्रेरणा

सी मेरी भावनाएं

अपने ही साथ बांटती हूं

चांदनी को तारे खिल-खिल हंस रहे

चांद से छिटककर चांदनी धरा पर है चली आई                      

पगली-सी डोलती, देखो कहां कहां है घूम आई

देख-देखकर चांदनी को तारे खिल-खिल हंस रहे

रवि की आहट से डर,फिर चांद के पास लौट आई

मन हर्षाए बादल
 बिन मौसम आज आये बादल

कड़क-कड़क यूँ डराये बादल

पानी बरस-बरस मन भिगाये

शाम सुहानी, मन हर्षाए बादल

दीवारें एक नाम है पूरे जीवन का

दीवारें

एक नाम है

पूरे जीवन का ।

हमारे साथ

जीती हैं पूरा जीवन।

सुख-दुख, अपना-पराया

हंसी-खुशी या आंसू,

सब सहेजती रहती हैं

ये दीवारें।

सब सुनती हैं,

देखती हैं, सहती हैं,

पर कहती नहीं किसी से।

कुछ अर्थहीन रेखाएं

अंगुलियों से उकेरती हूं

इन दीवारों पर।

पर दीवारें

समझती हैं मेरे भाव,

मिट्टी दरकने लगती है।

कभी गीली तो कभी सूखी।

दरकती मिट्टी के साथ

कुछ आकृतियां

रूप लेने लगती हैं।

समझाती हैं मुझे,

सहलाती हैं मेरा सर,

बहते आंसुओं को सोख लेती हैं।

कभी कुछ निशान रह जाते हैं,

लोग समझते हैं,

कोई कलाकृति है मेरी।

 

सफ़लता के लिए संघर्ष क्यों ज़रूरी

सफ़लता के लिए प्रथम लक्ष्य का चयन चाहिए, उपरान्त मार्ग का नियमन, परिश्रम और  प्रयास की अनवरत सीढ़ी चाहिए। फिर यदि उपलब्धि न हो तो संघर्ष तो जीवन स्वयं देता है।

कुछ बातें हम कभी नहीं भूलते। जब हम बच्चे तब बड़े आत्मविश्वास से कहते थे कि परिश्रम से, संघर्ष से, प्रयास से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है तब मेरे पिता एवं एक अन्य घनिष्ठ सम्बन्धी मेरी बात पर हँसकर रह जाते थे, किन्तु हतोत्साहित नहीं करते थे। तो हम लोग समझ नहीं पाते थे कि वे हमारी बात का समर्थन कर रहे हैं अथवा हमें जीवन का सत्य समझाना चाहते हैं। उस समय मैं भाग्य को बिल्कुल नहीं मानती थी। मेरा कहना था कि यदि हमने ठान लिया है तो जो हम चाहते हैं मिलेगा ही।

किन्तु जीवन ने, काल ने परिश्रम, प्रयास एवं लक्ष्यों के संधान के उपरान्त भी गहन संघर्ष दिया और उपलब्धियों के रास्ते कंटक भरे रहे, और मैं पूर्णतया भाग्यवादी हो गई। संघर्ष कितना भी कर लें, प्रयास, परिश्रम कितना भी कर लें किन्तु मिलना वही है जो भाग्य का लेखा है, ऐसा मैं अपने जीवन के अनुभव से कह सकती हूँ।

एक बात जो मुझे कभी नहीं भूलती, वह यह कि मेरे पिता कहा करते थे कि यदि आपके भाग्य में भोजन लिखा है तो आपके पास कुछ नहीं है तो भी कोई आपको छत्तीस पकवान की थाली दे जायेगा।

और यदि आपके भाग्य में भोजन नहीं लिखा है तो आप दिल से अपने लिए छत्तीस पकवान बनाकर थाली सजाते हैं, गिर जायेगी, इसलिए बेटा मेहनत मत छोड़ना, जीवन में संघर्ष में लगे रहना किन्तु बहुत आस मत लगाकर रखना।

  

बिना बड़े सपनों के जीता हूं

कंधों पर तुम्‍हारे भी

बोझ है मेरे भी।

तुम्‍हारा बोझ  

तुम्‍हारे कल के लिए है

एक डर के साथ ।

मेरा बोझ मेरे आज के लिए है

निडर।

तुम अपनों के, सपनों के

बोझ के तले जी रहे हो।

मैं नि:शंक।

डर का घेरा बुना है

तुम्‍हारे चारों ओर 

इस बोझ को सही से

न उठा पाये तो

कल क्‍या होगा।

कल, आज और कल

मैं नहीं जानता।

बस केवल

आज के लिए जीता हूं

अपनों के लिए जीता हूं।

नहीं जानता कौन ठीक है

कौन नहीं।

पर बिना बड़े सपनों के जीता हूं

इसलिए रोज़

आराम की नींद सोता हूं

नहीं छूटता अतीत

मैं बागवानी तो नहीं जानती।

किन्तु सुना है

कि कुछ पौधे

सीधे नहीं लगते,

उनकी पौध लगाई जाती है।

नर्सरी से उखाड़कर

समूहों में लाये जाते हैं,

और बिखेरकर,

क्यारियों में

रोप दिये जाते हैं।

अपनी मिट्टी,

अपनी जड़ों से उखड़कर,

कुछ सम्हल जाते हैं,

कुछ मर जाते हैं,

और कुछ अधूरे-से

ज़िन्दगी की

लड़ाई लड़ते नज़र आते हैं।

-

हम,

जहां अपने अतीत से,

विगत से,

भागने का प्रयास करते हैं,

ऐसा ही होता है हमारे साथ।

 

 

किस शती में जी रहे हैं हम

एक छात्रा के साथ हुई मेरी बातचीत, आपके समक्ष शब्दशः प्रस्तुत

******************-****************-***

जैसा कि आप जानते हैं मैं एक विद्यालय में कार्यरत हूं। एक छात्रा 12 वीं का प्रमाणपत्र लेने के लिए आई तो मैंने देखा] उसकी फ़ाईल में पासपोर्ट है। मैंने उत्सुकतावश पूछा, उच्च शिक्षा के लिए कहां जा रही हा,े और कौन से क्षेत्र में।

उसका उत्तर थाः चीन, एम. बी. बी. एस, एम. डी और एक और डिग्री बताई उसने, कि दस वर्ष की शैक्षणिक अवधि है। मैं चकित।

चीन? क्यों कोई और देश नहीं मिला, क्योंकि इससे पूर्व मैं नहीं जानती थी कि उच्च शिक्षा के लिए हमारे देश के विद्यार्थी चीन को भी चुन रहे हैं।

चीन ही क्यों? उसका सरल सा उत्तर था कि वहां पढ़ाई बहुत सस्ती है, विश्व के प्रत्येक देश से सस्ती। मात्र तीस लाख में पूरा कोर्स होगा।

मात्र तीस लाख उसने ऐसे कहा जैसे हम बचपन में तीन पैसे फीस दिया करते थे। अच्छा मात्र तीस लाख?

भारत में इसकी फीस कितनी है ?

उसने अर्द्धसरकारी एवं निजी संस्थानों की जो फीस बताई वह सुनकर अभी भी मेरी नींद उड़ी हुई है। उसका कथन था कि पंजाब में साधारण से मैडिकल कालेज की फीस भी लगभग डेढ़ करोड़ तक चली जाती है। मुझे लगा मैं ही अभी अट्ठाहरवीं शताब्दी की प्राणी हूं।

वह स्वयं भी कही आहत थी। उसने आगे जानकारी दी।

दो बहनें। एक का विवाह पिछले ही वर्ष हुआ जो कि आई टी सी में कार्यरत थी, किन्तु ससुराल वालों के कहने पर विवाह-पूर्व ही नौकरी छोड़ दी। किन्तु यह वादा किया कि विवाह के बाद उसी शहर में कोई और नौकरी करना चाहे तो कर लेगी। किन्तु जब उसका बैंक में चयन हो गया तो उसे नौकरी की अनुमति नहीं दी जा रही कि घर में किस बात की कमी है जो नौकरी करनी है। इतना उसके विवाह पर खर्च हुआ फिर भी खुश नहीं हैं।

कितना ?

60 लाख।

तो तुम्हारी शादी के लिए भी है?

हां है।

और तुम डाक्टर बन कर लौटी और तुम्हें भी काम नहीं करने दिया गया तो?

वह निरूत्तर थी।

मैंने उससे खुलकर एक प्रश्न किया कि जब तुम्हारी जाति में इतना दहेज लिया जाता है, तो बाहर विवाह क्यों नहीं हो सकते।

नहीं परिवार के सम्मान की बात है। जाति से बाहर विवाह नहीं कर सकते। प्रेम&विवाह भी नहीं , समाज में परिवार का मान नहीं रहता। परिवार बहिष्कृत हो जाते हैं।

सब आओ साथ-साथ खेलेंगे

सब आओ साथ-साथ खेलेंगे

छप-छपा-छप, छप-छपा-छप,

दौड़ूं मैं।

आजा पानी, आजा पानी

भीगूं मैं।

पेड़ों पर पंछी बैठे,

भीग रहे।

वो देखो,

बिल्लो माई दुबकी बैठी।

फुदक-फुदककर,

फुदक-फुदककर,

गिलहरी घूम रही।

मैं देखो छाता लाई हूं,

सब आओ मेरे संग,

साथ-साथ खेलेंगे।

बिल्लो रानी तुमको दूध मिलेगा,

गिलहरी तुम खाना अखरोट।

चिड़िया को दाना दूंगी,

तोता खायेगा अमरूद।

मैं खा लूंगी रोटी।

फिर तुम सब अपने घर जाना।

मैं अपने घर जाउंगी,

कल तुम से मिलने फिर आउंगी।

 

नेताजी का आसन

नेताजी ने कुर्सी त्याग दी

और भूमि पर आसन बिछाकर बैठ गये।

हमने पूछा, ऐसा क्यों किया आपने।

वैसे तो हमें पता है,

कि आपकी औकात ज़मीन की ही है,

किन्तु

कुर्सी त्यागना तो बहुत महानता की बात है,

कैसे किया आपने यह साहस।

नेताजी मुस्कुराये, बोले,

क्या तुम्हें भी बताना पड़ेगा,

कि कुर्सी की चार टांगे होती हैं

और इंसान की दो।

कोई भी, कभी भी पकड़कर

कोई-सी भी टांग खींच देता था।

अब हम भूमि पर, आसन जमाकर

पालथी मारकर बैठ गये हैं,

कोई  दिखाये हमारी टांग खींचकर।

समझदारी की बात यह

कि कुर्सी के पीछे

तो लोग भागते-छीनते दिखाई देते हैं,

कभी आपने देखा है किसी को

आसन छीनते।

अब गांधी जी भी तो

भूमि पर आसन जमाकर ही बैठते थे,

कोई चला उनकी राह पर

आज तक मांगा उनका आसन किसी ने क्या।

नहीं न !

अब मैं नेताजी को क्या समझाती,

गांधी जी का आसन तो उनके साथ ही चला गया।

और नेताजी आपका आसन ,

आधुनिक भारतीय राजनीति का आसन है,

आप पालथी मारे यूं ही बैठे रह जायेंगे,

और जनता कब आपके नीचे से

आपका आसन खींचकर चलती बनेगी,

आपको पता भी नहीं चलेगा।

 

प्यार की तलाश करना

हरा-हराकर सिखाया है ज़िन्दगी ने आगे बढ़ना

फूलों ने सिखाया है पतझड़ से मुहब्बत करना

कलम जब साथ नहीं देती, तब अन्तर्मन बोलता है

नफ़रतें तो हम बोते हैं, बस प्यार की तलाश करना

कैसे जीते-जी अमर होते है

सरकार से सीखो कुछ, पांच साल कैसे सोते हैं

सरकार से सीखो कुछ, झूठे वादे कैसे होते हैं

हमारी ज़िन्दगी कोई पांच साला सरकार नहीं है

फिर भी सरकार से सीखो कैसे जीते-जी अमर होते है।

ठहरी ठहरी सी लगती है ज़िन्दगी

अब तो

ठहरी-ठहरी-सी

लगती है ज़िन्दगी।

दीवारों के भीतर

सिमटी-सिमटी-सी

लगती है ज़िन्दगी।

द्वार पर पहरे लगे हैं,

मन पर गहरे लगे हैं,

न कोई चोट है कहीं,

न घाव रिसता है,

रक्त के थक्के जमने लगे हैं।

भाव सिमटने लगे हैं,

अभिव्यक्ति के रूप

बदलने लगे हैं।

इच्छाओं पर ताले लगने लगे हैं।

सत्य से मन डरने लगा है,

झूठ के ध्वज फ़हराने लगे हैं।

न करना शिकायत किसी की

न बताना कभी मन के भेद,

लोग बस

तमाशा बनाने में लगे हैं।

न ग्रहण है न अमावस्या,

तब भी जीवन में

अंधेरे गहराने लगे हैं।

जीतने वालों को न पूछता कोई

हारने वालों के नाम

सुर्खियों में चमकने लगे हैं।

अनजाने डर और खौफ़ में जीते

अपने भी अब

पराये-से लगने लगे हैं।

सम्बन्धों की डोर

विशाल वृक्षों की जड़ों से जब मिट्टी दरकने लगती है

जिन्दगी की सांसें भी तब कुछ यूं ही रिसने लगती हैं

विशाल वृक्षों की छाया तले ही पनपने हैं छोटे पेड़ पौधे,

बड़ों की छत्रछाया के बिना सम्बन्धों की डोर टूटने लगती है