प्रणाम तुम्हें करती हूं

हे भगवान!

इतना उंचा मचान।

सारा तेरा जहान।

कैसी तेरी शान ।

हिमगिरि के शिखर पर

 बैठा तू महान।

 

कहते हैं

तू कण-कण में बसता है।

जहां रहो

वहीं तुझमें मन रमता है।

फिर क्यों

इतने उंचे शिखरों पर

धाम बनाया।

दर्शनों के लिए

धरा से गगन तक

इंसान को दौड़ाया।

 

ठिठुरता है तन।

कांपता है मन।

 

हिम गिरता है।

शीत में डरता है।

 

मन में शिवधाम सृजित करती हूं।

 

यहीं से प्रणाम तुम्हें करती हूं।