वास्तविकता में नहीं जीते हम

मैं जानती हूं

मेरी सोच कुछ टेढ़ी है।

पर जैसी है

वैसा ही तो लिखूंगी।

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नारी के

इस तरह के चित्र देखकर

आप सब

नारीत्व के गुण गायेंगे,

ममता, त्याग, तपस्या

की मूर्ति बतायेंगे।

महानता की

सीढ़ी पर चढ़ायेंगे।

बच्चों को गोद में

उठाये चल रही है,

बच्चों को

कष्ट नहीं देना चाहती,

नमन है तेरे साहस को।

 

अब पीछे

भारत का मानचित्र दिखता है,

तब हम समझायेंगे

कि पूरे भारत की नारियां

ऐसी ही हुआ करती हैं।

अपना सर्वस्व खोकर

बच्चों का पालन-पोषण करती हैं।

फिर हमें याद आ जायेंगी

दुर्गा, सती-सीता, सावित्री,

पद्मिनी, लक्ष्मी बाई।

हमें नहीं याद आयेंगी

कोई महिला वैज्ञानिक, खिलाड़ी

प्रधानमंत्री, राष्ट््रपति,

अथवा कोई न्यायिक अधिकारी

पुलिस, सेना अधिकारी।

समय मिला

तो मीडिया वाले

साक्षात्कार लेकर बतायेंगे

यह नारी

न न, नारी नहीं,

मां है मां ! भारत की मां !

मेहनत-मज़दूरी करके

बच्चों को पाल रही है।

डाक्टर-इंजीनियर बनाना चाहती है।

चाहती है वे पुलिस अफ़सर बनें,

बड़े होकर मां का नाम रोशन करें,

वगैरह, वगैरह।

 

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लेकिन इस चित्र में

बस एक बात खलती है।

आंसुओं की धार

और अच्छी बहती,

गर‘ मां के साथ

लड़कियां दिखाते,

तो कविता लिखने में

और ज़्यादा आनन्द पाते।

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वास्तव में

जीवन की

वास्तविकता में नहीं जीते हम,

बस थोथी भावुकता परोसने में

टसुए बहाने में

आंसू टपकाने में,

मज़ा लेते हैं हम।

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ओहो !

एक बात तो रह ही गई,

इसके पति, बच्चों के पिता की

कोई ख़बर मिले तो बताना।