आत्मस्वीकृति

कौन कहता है

कि हमें ईमानदारी से जीना नहीं आता

अभी तो जीना सीखा है हमने।

 

दुकानदार जब सब्जी तोलता है

तो दो चार मटर, एक दो टमाटर

और कुछ छोटी मोटी

हरी पत्तियां तो चखी ही जा सकती हैं।

वैसे भी तो वह ज्यादा भाव बताकर

हमें लूट ही रहा था।

राशन की दुकान पर

और कुछ नहीं तो

चीनी तो मीठी ही है।

 

फिर फल वाले का यह कर्त्तव्य है

कि जब तक हम

फलों को जांचे परखें, मोल भाव करें

वह साथ आये बच्चे को

दो चार दाने अंगूर के तो दे।

और फल चखकर ही तो पता लगेगा

कि सामान लेने लायक है या नहीं

और बाज़ार से मंहगा है।

 

किसे फ़ुर्सत है देखने की

कि सिग्रेट जलाती समय

दुकानदार की माचिस ने

जेब में जगह बना ली है।

और अगर बर्तनों की दुकान पर

एक दो चम्मच या गिलास

टोकरी में गिर गये हैं

तो इन छोटी छोटी चीज़ों में

क्या रखा है

इन्हें महत्व मत दो

इन छोटी छोटी वारदातों को

चोरी नहीं ज़रूरत कहते हैं

ये तो ऐसे ही चलता है।

 

कौन परवाह करता है

कि दफ्तर के कितने पैन, कागज़ और रजिस्टर

घर की शोभा बढ़ा रहे हैं

बच्चे उनसे तितलियां बना रहे हैं

हवाई जहाज़ उड़ा रहे हैं

और उन कागज़ों पर

काले चोर की तस्वीर बनाकर

तुम्हें ही डरा रहे हैं।

लेकिन तुम क्यों डरते हो  ?

कौन पहचानता है इस तस्वीर को

क्योंकि हम सभी का चेहरा

किसी न किसी कोण से

इस तस्वीर के पीछे छिपा है

यह और बात है कि

मुझे तुम्हारा और तुम्हें मेरा दिखा है।

इसलिए बेहतर है दोस्त

हाथ मिला लें

और इस चित्र को

बच्चे की हरकत कह कर जला दें।

 

क्लोज़िंग डे

हर छ: महीने बाद

वर्ष में दो बार आने वाला

क्लोज़िंग डे

जब पिछले सब खाते

बन्द करने होते हैं

और शुरू करना होता है

फिर से नया हिसाब किताब।

मिलान करना होता है हर प्रविष्टि का,

अनेक तरह के समायोजन

और एक निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति।

मैंने कितनी ही बार चाहा

कि अपनी ज़िन्दगी के हर दिन को

बैंक का क्लोज़िंग डे बना दूं।

ज़िन्दगी भी तो बैंक का एक खाता ही है

पर फर्क बस इतना है कि

बैंक और बैंक के खाते

कभी तो लाभ में भी रहते हैं

ब्याज दर ब्याज कमाते हैं।

पर मेरी ज़िन्दगी तो बस

घाटे का एक उधार खाता बन कर रह गई है।

 

रोज़ शाम को

जब ज़िन्दगी की किताबों का

मिलान करने बैठती हूं

तो पाती हूं

कि यहां तो कुछ भी समायोजित नहीं होता।

कहीं कोई प्रविष्टि ही गायब है

तो कहीं एक के उपर एक

इतनी बार लिखा गया है कई कुछ

कि अपठनीय हो गया है सब।

फिर कहीं पृष्ट ही गायब हैं

और कहीं पर्चियां बिना हस्ताक्षर।

सब नियम विरूद्ध।

और कहीं दूर पीछे छूटते लक्ष्य।

कितना धोखा धड़ी भरा खाता है यह

कि सब नामे ही नामे है

जमा कुछ भी नहीं।

फिर खाता बन्द कर देने पर भी

उधार चुकता नहीं होता

उनका नवीनीकरण हो जाता है।

पिछला सब शेष है

और नया शुरू हो जाता है।

पिछले लक्ष्य अधूरे

नये लक्ष्यों का खौफ़।

एक एक कर खिसकते दिन।

दिन दिन से जुड़कर बनते साल।

उधार ही उधार।

कैसे चुकता होगा सब।

विचार ही विचार।

यह दिनों और सालों का हिसाब।

और उन पर लगता ब्याज।

इतिहास सदा ही लम्बा होता है

और वर्तमान छोटा।

इतिहास स्थिर होता है

और वर्तमान गतिशील।

सफ़र जारी है

उस दिन की ओर 

जिस दिन

अपनी ज़िन्दगी के खातों में

कोई समायोजित प्रविष्टि,

कोई मिलान प्रविष्टि

करने में सफ़लता मिलेगी।

वही दिन

मेरी जिन्दगी का

ओपनिंग  डे होगा

पर क्या कोई ऐसा भी दिन होगा ?

 

भेदभावकारी योजनाएं

(पंजाब नैशनल बैंक में एक योजना है “बहुलाभकारी”

बैंक में लिखा था “बहू लाभकारी”

इस मात्रा भेद ने मुझे इस रचना के लिए प्रेरित किया)

 

प्रबन्धक महोदय हैरान थे।

माथे पर

परेशानी के निशान थे।

बैंक के बाहर शहर भर की सासें जमा थीं

और मज़े की बात यह

कि इन सासों की नेता

प्रबन्धक महोदय की अपनी अम्मां थीं।

 

उनके हाथों में

बड़ी बड़ी तख्तियां थीं

नारे थे और फब्तियां थीं :

“प्रबन्धक महोदय को हटाओ

नहीं तो सासलाभकारी योजना चलाओ।

ये बैंक में परिवारवाद फैला रहे हैं

पत्नियों के नाम से

न जाने कितना कमा रहे हैं।

और हम सासों को

सड़क का रास्ता दिखा रहे हैं।

 

वे नये नये प्रबन्धक बने थे।

शादी भी नयी नयी थी।

अपनी पत्नी और माता के संग

इस शहर में आकर

अभी अभी बसे थे

फिर सास बहू में खूब पटती थी,

प्रबन्धक महोदय की जिन्दगी

बढ़िया चलती थी।

 

पर यह आज क्या हो गया?

अपनी अम्मां को देख

प्रबन्धक महोदय घबराये।

केबिन से उठकर बाहर आये।

और अम्मां से बोले

“क्या हो गया है तुम्हें अम्मां

ये तख्तियां लिए जुलूस में खड़ी हो।

क्यों मुझे नौकरी से निकलवाने पर तुली हो।

घर जाओ, खाओ पकाओ

सास बहू मौज उड़ाओ।

 

अम्मां ने दो आंसू टपकाए

और भरे गले से बोलीं

“बेटा, दुनिया कहती थी

शादी के बाद

बेटे बहुओं के होकर रह जाते हैं

पर मैं न मानती थी।

पर आज मैंने

अपनी आंखों से देख ली तुम्हारी करतूत।

बहू के आते ही

हो गये तुम कपूत।

सुन लो,

मैं इन सासों की नेता हूं।

और हम सासों की भीड़

यहां से हटानी है

तो इस बोर्ड पर लिख दो

कि तुम्हें

सासलाभकारी योजना चलानी है।“

 

यह सुन प्रबन्धक महोदय बोले,

“सुन ओ सासों की नेता,

जो कहता है तेरा बेटा,

ये योजनाएं तो उपर वाले बनाते हैं

इसमें हम प्रबन्धक कुछ नहीं कर पाते हैं।“

 

“झूठ बोलते हो तुम,

“परबन्धक “ अपनी बहू के”

सासों की नेता बोलीं

“शादी के बाद इधर आये हो

तभी तो ये बोर्ड लगवाए हो।

पुराने दफ्तर में तो

ये योजनाएं न थीं

वहां तो कोई तख्तियां जड़ीं न थीं।“

 

“ओ सासों की नेता

मैं पहले क्षेत्रीय कार्यालय में काम था करता।

किसी योजना में हाथ नहीं होता मेरा

किसने तुम्हें भड़का दिया

मैं सच्चा सुपूत हूं तेरा।“

प्रबन्धक महोदय बोले

“किसी भी योजना में

धन लगा दो, ओ सासो !

बैंक सबको

 

बिना भेद भाव

समान दर से है ब्याज है देता।

इस सासलाभकारी योजना की याद

तुम्हें क्यों आई ?

मेरे बैंक की

कौन सी योजना तुम्हें नहीं भाई ?

 

सासों की सामूहिक आवाज़ आई,

“यदि बैंक भेद भाव नहीं करता

तो यह बहू लाभकारी योजना क्यों चलाई?

तभी तो हमें

सासलाभकारी योजना की याद आई।

यदि सासों की भीड़ यहां से हटानी है

तो इस तख्ती पर लिख दो

कि तुम्हें

सास लाभकारी योजना चलानी है।

और यदि

सास लाभकारी योजना न चलाओ,

तो अपनी यह

बहू लाभकारी योजना हटाओ,

और सास बहू के लिए

कोई एक सी योजना चलाओ।“

 

कौन है राजा, कौन है रंक

जीत हार की बात न करना

गाड़ी यहां अड़ी हुई है।

कितने आगे कितने पीछे,

किसकी आगे, किसकी पीछे,

जांच अभी चली हुई है।

दोपहिए पर बैठे पांच,

चौपहिए में दस-दस बैठें,

फिर दौड़ रहे बाजी लेकर,

कानून तोड़ना हक है मेरा

देखें, किसकी दाल यहां गली हुई है।

गली-गली में शोर मचा है

मार-काट यहां मची हुई है।

कौन है राजा, कौन है रंक

जांच अभी चली हुई है।

राजा कहता मैं हूं रंक,

रंक पूछ रहा तो मैं हूं कौन

बात-बात में ठनी हुई है।

सड़कों पर सैलाब उमड़ता

कौन सही है कौन नहीं है,

आज यहां हैं कल वहां थे,

क्यों सोचे हम,

हमको क्या पड़ी हुई है।

कल हम थे, कल भी होंगे,

यही समझकर

अपनी जेब भरी हुई है।

 

अभी तो चल रही दाल-रोटी

जिस दिन अटकेगी

उस दिन हम देखेंगे

कहां-कहां गड़बड़ी हुई है।

अभी क्या जल्दी पड़ी हुई है।

 

ओ बादल अब तो बरस ले

तेरे बिना

जीवन की आस नहीं,

तेरे बिना जीव का भास नहीं,

न जाने क्यों

अक्सर रूठ जाया करते हैं।

बुलाने पर भी

नहीं सूरत दिखाया करते हैं।

जानते हो,

मौसम बड़ा बेरहम है,

बस झलक दिखाकर

अक्सर मुंह मोड़कर

चले जाया करते हैं।

न चिन्ता न जताया करते हैं।

 

ओ बादल!

अब तो बरस ले,

हर बार,

ग्रीष्म में यूं ही सताया करते हैं।

मेरे मन की चांदनी

सुना है मैंने

शरद पूर्णिमा के

चांद की चांदनी से

खीर दिव्य हो जाती है।

तभी तो मैं सोचता था

तुम्हें चांद कह देने से

तुम्हारी सुन्दरता

क्यों द्विगुणित हो जाती है,

मेरे मन की चांदनी

खिल-खिल जाती है।

चंदा की किरणें

धरा पर जब

रज-कण बरसाती हैं,

रूप निखरता है तुम्हारा,

मोतियों-सा दमकता है,

मानों चांदनी की दमक

तुम्हारे चेहरे पर

देदीप्यमान हो जाती है।

कभी-कभी सोचता हूं,

तुम्हारा रूप चमकता है

चांद की चांदनी से,

या चांद

तुम्हारे रूप से रूप चुराकर

चांदनी बिखेरता है।

 

पुरानी कथाओं से सीख नहीं लेते

 

पता नहीं

कब हम इन

कथा-कहानियों से

बाहर निकलेंगे।

पता नहीं

कब हम वर्तमान की

कड़वी सच्चाईयों से

अपना नाता जोड़ेंगे।

पुरानी कथा-कहानियों को

चबा-चबाकर,

चबा-चबाकर खाते हैं,

और आज की समस्याओं से

नाता तोड़ जाते हैं।

प्रभु से प्रेम की धार बहाईये,

किन्तु उनके मोह के साथ

मानवता का नाता भी जोड़िए।

पुस्तकों में दबी,

कहानियों को ढूंढ लेते हैं,

क्यों उनके बल पर

जाति और गरीबी की

बात उठाते हैं।

राम हों या कृष्ण

सबको  पूजिए,

पर उनके नाम से आज

बेमतलब की बातें मत जोड़िए।

उनकी कहानियों से

सीख नहीं लेते,

किसी के लिए कुछ

नया नहीं सोचते,

बस, चबा-चबाकर,

चबा-चबाकर,

आज की समस्याओं से

मुंह मोड़ जाते हैं।

झूठे मुखौटे मत चढ़ा

झूठे मुखौटे मत चढ़ा।

असली चेहरा दुनिया को दिखा।

मन के आक्रोश पर आवरण मत रख।

जो मन में है

उसे निडर भाव से प्रकट कर।

यहां डर से काम नहीं चलता।

वैसे भी हंसी चेहरे,

और चेहरे पर हंसी,

लोग ज़्यादा नहीं सह पाते।

 

इससे पहले

कि कोई उतारे तुम्हारा मुखौटा,

अपनी वास्तविकता में जीओ,

अपनी अच्छाईयों-बुराईयों को

समभाव से समझकर

जीवन का रस पीओे।

 

तब विचार अच्छे बनते हैं

बीमारी एक बड़ी है आई

साफ़ सफ़ाई रखना भाई

कूड़ा-करकट न फै़लाना

सुंदर-सुंदर पौधे लाना

बगिया अपनी खूब खिलाना

 

हाथों को साफ़ है रखना

बार-बार है धोना

मुंह, नाक, आंख न छूना

घर में रहना सुन लो ताई

 

मुंह को रखना ढककर तुम

हाथों की दूरी है रखनी

दूर से सबसे बात है करनी

 

प्लास्टिक का उपयोग न करना

घर में बैठकर रोज़ है पढ़ना

 

जब साफ़-सफ़ाई रखते हैं

तब विचार अच्छे बनते हैं

स्वच्छ अभियान  बढ़ायेंगें

देश का नाम चमकाएंगें।

 

कहां है तबाही कौन सी आपदा

कहां है आपदा,

कहां हुई तबाही,

कोई विपदा नहीं कहीं।

 

कुछ मर गये,

कुछ भूखे रह गये।

किसी को चिकित्सा नहीं  मिल पाई।

आग लगी या

भवन ढहा,

कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा।

करोड़ों-अरबों में

अब किस-किस को देखेंगे?

घर-घर जाकर

किस-किसको पूछेंगे।

आसमान से तो

कह नहीं कर सकते,

बरसना मत।

सूरज को तो रोक नहीं सकते,

ज़्यादा चमकना मत।

सड़कों पर सागर है,

सागर में उफ़ान,

घरों में तैरती मछलियां देखीं आज,

और नदियों में बहते घर

तो कहां है विपदा,

कहां है तबाही,

कौन सी आपदा।

बड़े-बड़े शहरों में

छोटी-छोटी बातें

तो होती रहती हैं सैटोरीना।

ज़्यादा मत सोचा कर।

 

 

बेटी दिवस पर एक रचना

 

बेटियों के बस्तों में

किताबों के साथ

रख दी जाती हैं कुछ सतर्कताएं,

कुछ वर्जनाएं,

कुछ आदेश, और कुछ संदेश।

डर, चिन्ता, असुरक्षा की भावना,

जिन्हें

पैदा होते ही पिला देते हैं

हम उन्हें

घुट्टी की तरह।

बस यहीं नहीं रूकते हम।

और बोझा भरते हैं हम,

परम्पराओं, रीति-रिवाज़

संस्कार, मान्यताओं,

सहनशीलता और चुप्पी का।

 

इनके बोझ तले

दब जाती हैं

उनकी पुस्तकें।

कक्षाएं थम जाती हैं।

हम चाहते हैं

बेटियां आगे बढ़ें,

बेटियां खूब पढें,   

बेबाक, बिन्दास।

पर हमारा नज़र रहती है

हर समय

बेटी की नज़र पर।

 

जैसे ही कोई घटना

घटती है हमारे आस-पास,

हम बेटियों का बस्ता

और भारी कर देते हैं,

और भारी कर देते हैं।

कब दब जाती हैं,

उस भार के नीचे,

सांस घुटती है उनकी,

कराहती हैं,

बिलखती हैं

आज़ादी के लिए

पर हम समझ ही नहीं पाते

उनका कष्ट,

इस अनचाहे बोझ तले,

 कंधे झुक जाते हैं उनके,

और हम कहते हैं,

देखो, कितनी विनम्र

परम्परावदी है यह।

कोयल और कौए दोनों की वाणी मीठी होती है

बड़ी मौसमी,

बड़ी मूडी होती है कोयल।

अपनी कूक सुनाने के लिए

एक मौसम की प्रतीक्षा में

छिपकर बैठी रहती है।

पत्तों के झुरमुट में,

डालियों के बीच।

दूर से आवाज़ देती है

आम के मौसम की प्रतीक्षा में,

बैठी रहती है, लालची सी।

कौन से गीत गाती है

मुझे आज तक समझ नहीं आये।

 

मुझे तो आनन्द देती है

कौए की कां कां भी।

आवाज़ लगाकर,

कितने अपनेपन से,

अधिकार से आ बैठता है

मुंडेर पर।

बिना किसी नाटक के

आराम से बैठकर

जो मिल जाये

खाकर चल देता है।

हर मौसम में

एक-सा भाव रखता है।

 

बस कुछ धारणाएं

बनाकर बैठ जाते हैं हम,

नहीं तो, बेचारे पंछी

तो सभी मधुर बोलते हैं,

मौसम की आहट तो

हमारे मन की है

फिर वह बसन्त हो

अथवा पतझड़।

 

अब घड़ी से नहीं चलती ज़िन्दगी

 

अक्सर लगता है,

कुछ

निठ्ठलापन आ गया है।

वे ही सारे काम

जो खेल-खेल में

हो जाया करते थे,

पल भर में,

अब, दिनों-दिन

बहकने लगे हैं।

सुबह कब आती है,

शाम कब ढल जाती है,

आभास चला गया है।

अंधेरे -उजाले

एक-से लगने लगे हैं।

घर बंधन तो नहीं लगता,

किन्तु बंधे से रहते हैं,

फिर भी वे सारे काम,

जो खेल-खेल में

हो जाया करते थे,

अब, दिनों तक

टहलने लगे हैं।

समय बहुत है,

शायद यही एहसास

समय के महत्व को

समझने से रोकता है।

घड़ी के घंटों से

नहीं बंधे हैं अब।

न विलम्ब की चिन्ता,

न लम्बित कार्यों की।

मैं नहीं तो

कोई और कर लेगा,

मुझे चिन्ता नहीं।

खेल-खेल में

क्या समय का महत्व

घटने लगा है।

कहीं एक तकलीफ़ तो है,

बस शब्द नहीं हैं।

घड़ियां बन्द पड़ी हैं,

अब घड़ी से नहीं चलती ज़िन्दगी,

पर पता नहीं

समय कैसे कटने लगा है।

तुम्हारा अंहकार हावी रहा मेरे वादों पर

जीवन में सारे काम

सदा

जल्दबाज़ी से नहीं होते।

कभी-कभी

प्रतीक्षा के दो पल

बड़े लाभकारी होते हैं।

बिगड़ी को बना देते हैं

ठहरी हुई

ज़िन्दगियों को संवार देते हैं।

समझाया था तुम्हें

पर तुम्हारा

अंहकार हावी रहा

मेरे वादों पर।

मैंने कब इंकार किया था

कि नहीं दूंगी साथ तुम्हारा

जीवन की राहों में।

हाथ थामना ही ज़रूरी नहीं होता

एक विश्वास की झलक भी

अक्सर राहें उन्मुक्त कर जाती है।

किन्तु

तुम्हारा अंहकार हावी रहा,

मेरे वादों पर।

अब न सुनाओ मुझे

कि मैं अकेले ही चलता रहा।

ये चयन तुम्हारा था।

कानून तोड़ना हक है मेरा

जीत हार की बात न करना

गाड़ी यहां अड़ी हुई है।

कितने आगे कितने पीछे,

किसकी आगे, किसकी पीछे,

जांच अभी चली हुई है।

दोपहिए पर बैठे पांच,

चौपहिए में दस-दस बैठें,

फिर दौड़ रहे बाजी लेकर,

कानून तोड़ना हक है मेरा

देखें, किसकी दाल यहां गली हुई है।

गली-गली में शोर मचा है

मार-काट यहां मची हुई है।

कौन है राजा, कौन है रंक

जांच अभी चली हुई है।

राजा कहता मैं हूं रंक,

रंक पूछ रहा तो मैं हूं कौन

बात-बात में ठनी हुई है।

सड़कों पर सैलाब उमड़ता

कौन सही है कौन नहीं है,

आज यहां हैं कल वहां थे,

क्यों सोचे हम,

हमको क्या पड़ी हुई है।

कल हम थे, कल भी होंगे,

यही समझकर

अपनी जेब भरी हुई है।


 

अभी तो चल रही दाल-रोटी

जिस दिन अटकेगी

उस दिन हम देखेंगे

कहां-कहां गड़बड़ी हुई है।

अभी क्या जल्दी पड़ी हुई है।

कौन पापी कौन भक्त कोई निष्कर्ष नहीं

कुछ कथाएं

जिस रूप में हमें

समझाई जाती हैं

उतना ही समझ पाते हैं हम।

ये कथाएं, हमारे भीतर

रस-बस गई हैं,

बस उतना ही

मान जाते हैं हम।

प्रश्न नहीं करते,

विवाद में नहीं पड़ते,

बस स्वीकार कर लेते हैं,

और सहज भाव से

इस परम्परा को आगे बढ़ाते हैं।

कौन पापी, कौन भक्त

कोई निष्कर्ष नहीं निकाल पाते हैं हम।

अनगिन चरित्र और कथाओं में

उलझे पड़े रहते हैं हम।

विशेष पर्वों पर उनकी

महानता या दुष्कर्मों को

स्मरण करते हैं हम।

सत्य-असत्य को

कहां समझ पाये हम।

सत्य और कपोल-कल्पना के बीच,

कहीं पूजा-आराधना से,

कहीं दहन से, कहीं सज्जा से,

कहीं शक्ति का आह्वान,

तो कहीं राम का नाम,

उलझे मस्तिष्क को

शांत कर लेते हैं हम।

और जयकारा लगाते हुए

भीड़ का हिस्सा बनकर

आनन्द से प्रसाद खाते हैं हम।

दैवीय सौन्दर्य

रंगों की शोखियों से

मन चंचल हुआ।

रक्त वर्ण संग

बासन्तिका,

मानों हवा में लहरें

किलोल कर रहीं।

आंखें अपलक

निहारतीं।

काश!

यहीं,

इसी सौन्दर्य में

ठहर जाये सब।

कहते हैं

क्षणभंगुर है जीवन।

स्वीकार है

यह क्षणभंगुर जीवन,

इस दैवीय सौन्दर्य के साथ।

नेह की चांदनी

स्मृतियों से निकलकर

सच बनने लगी हो।

मन में एक उमंग

भरने लगी हो।

गगन के चांद सी

आभा लेकर आई

जीवन में तुम्हारी मुस्कान,

तुम भाने लगी हो।

अतीत की

धुंधलाती तस्वीरें

रंगों में ढलने लगी हैं।

भूले प्रेम की तरंगे

स्वर-लहरियों में

गुनगुनाने लगी हैं।

नेह की चांदनी

भिगोने लगी है,

धरा-गगन

एक होने लगे हैं।

रंगों के भेद

मिटने लगे हैं।

गहराती रोशनियों में

आशाएं दमकने लगी हैं।

 

मन में विषधर पाले

विषधर तो है !

लेकिन देखना होगा,

विष कहां है?

आजकल लोग

परिपक्व हो गये हैं,

विष निकाल लिया जाता है,

और इंसान के मुख में

संग्रहीत होता है।

तुम यह समझकर

नाग को मारना,

कुचलना चाहते हो,

कि यही है विषधर

जो तुम्हें काट सकता है।

अब न तो

नाग पकड़ने वाले रह गये,

कि नाग का नृत्य दिखाएंगे,

न नाग पंचमी पर

दुग्ध-दहीं से अभिषेक करने वाले।

मन में विषधर पाले

ढूंढ लो चाहे कितने,

मिल जायेंगे चाहने वाले।

हवाओं के रंग नहीं होते

हवाओं के रंग नहीं होते,

हवाओं में रंग होते हैं।

भाव होते हैं,

कभी गर्म , कभी सर्द

तो कभी नम होते हैं।

फूलों संग

हवाएं महकती हैं,

मन को दुलारती, सहलाती हैं।

खुली हवाएं

जीना सिखलाती हैं।

कभी हवाओं के संग

बह-बह जाते हैं भाव,

आकांक्षाएं बहकती हैं,

मन उदास हो तो

सर पर हाथ फेर जाती हैं,

आंसुओं को सोखकर

मुस्कान बना जाती हैं।

चेहरे को छूकर

शर्मा कर बिखर-बिखर जाती हैं।

कानों में सन-सन गूंजती

न जाने कितने संदेश दे जाती हैं।

कभी शरारती-सी,

लटें बिखेरती,

कभी उलझाकर चली जाती हैं।

मन की तरह

बदलते हैं हवाओं के रूख,

कभी-कभी

अपना प्रचण्ड रूप भी दिखलाती हैं।

सुना है,

हवाओं के रूख को

अपने हित में मोड़ना भी एक कला है,

कैसे, यही नहीं समझ पाती हूं।

कुछ पाने के लिए सर टकराने पड़ते हैं

जीवन में

आगे बढ़ने के लिए

खतरे तो उठाने पड़ते हैं।

लीक से हटकर

चलते-चलते

अक्सर झटके भी

खाने पड़ते हैं।

हिमालय की चोटी छूने में

खतरा भी है,

जोखिम भी,

और शायद संकट भी।

जीवन में कुछ पाने के लिए

तीनों से सर

टकराने पड़ते हैं।

रोज़ की ही कहानी है

जब जब कोई घटना घटती है,

हमारी क्रोधाग्नि जगती है।

हमारी कलम

एक नये विषय को पाकर

लिखने के लिए

उतावली होने लगती है।

समाचारों से हम

रचनाएं रचाते हैं।

आंसू शब्द तो सम्मानजनक है,

लिखना चाहिए

टसुए बहाते हैं।

दर्द बिखेरते हैं।

आधी-अधूरी जानकारियों को

राजनीतिज्ञों की तरह

भुनाते हैं।

वे ही चुने शब्द

वे ही मुहावरे

देवी-देवताओं का आख्यान

नारी की महानता का गुणगान।

नारी की बेचारगी,

या फिर

उसकी शक्तियों का आख्यान।

 

पूछती हूं आप सबसे,

कभी अपने आस-पास देखा है,

एक नज़र,

कितना करते हैं हम नारी का सम्मान।

कितना दिया है उसे खुला आसमान।

उसकी वाणी की धार को तराशते हैं,

उसकी आन-बान-शान को संवारते हैं,

या फिर

ऐसे किस्सों से बाहर निकलने के बाद

कुछ अच्छे उपहासात्मक

चुटकुले लिख डालते हैं।

आपसे क्या कहूं,

मैं भी शायद

यहीं कहीं खड़ी हूं।

काजल पोत रहे अंधे

अंधे के हाथ बटेर लगना,

अंधों में काना राजा, 

आंख के अंधे नाम नयनसुख,

सुने थे कुछ ऐसे ही मुहावरे।

पर आज ज्ञात हुआ

यहां तो

काजल पोत रहे अंधे।

बड़ी असमंजस की स्थिति बन आई है।

क्यों काजल पोत रहे अंधे।

किसके चेहरे पर हाथ

साफ़ कर रहे ये बंदे।

काजल लगवाने के लिए

उजले मुख लेकर

कौन घूम रहे बंदे।

अंधे तो पहले ही हैं

और कालिमा लेकर

अब कर रहे कौन ये धंधे।

 

कालिमा लग जाने के बाद

कौन बतलायेगा,

कौन समझायेगा,

कैसे लगी, किसने लगाई।

किसके लगी, कहां से आई।

काजल की है, या कोयले की,

या कर्मोa की,

करेगा कौन निर्णय।

कहीं ऐसा तो नहीं

जो पोत रहे काजल,

सब हैं आंख से चंगे,

और हम ही बन रहे अंधे।

 

क्योंकि हम देखने से डरने लगे हैं।

समझने से कतराने लगे हैं।

सच बोलने से हटने लगे हैं।

अधिकार की बात करने से बचने लगे हैं।

किसी का साथ देने से कटने लगे हैं।

और

गांधी के तीन बन्दर बनने में लगे हैं ।

न देखो, न सुनो, न बोलो।

‘‘बुरा’’ तो गांधी जी के साथ ही चला गया।

 

लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति में

राजनीति में,

अक्सर

लोग बात करते हैं,

किसी के

पदचिन्हों पर चलने की।

किसी के विचारों का

अनुसरण करने की।

किसी को

अपनी प्रेरणा बनाने की।

एक सादगी, सीधापन,

सरलता और ईमानदारी!

क्यों रास नहीं आई हमें।

क्यों पूरे वर्ष

याद नहीं आती हमें

उस व्यक्तित्व की,

नाम भूल गये,

काम भूल गये,

उनका हम बलिदान भूल गये।

क्या इतना बदल गये हम!

शायद 2 अक्तूबर को

गांधी जी की

जयन्ती न होती

तो हमें

लाल बहादुर शास्त्री

याद ही न आते।

 

भीड़-तन्त्र

आज दो किस्से हुए।

एक भीड़-तन्त्र स्वतन्त्र हुआ।

मीनारों पर चढ़ा आदमी

आज मस्त हुआ।

28 वर्ष में घुटनों पर चलता बच्चा

युवा हो जाता है,

अपने निर्णय आप लेने वाला।

लेकिन उस भीड़-तन्त्र को

कैसे समझें हम

जो 28 वर्ष पहले दोषी करार दी गई थी।

और आज पता लगा

कितनी निर्दोष थी वह।

हम हतप्रभ से

अभी समझने की कोशिश कर ही रहे थे,

कि ज्ञात हुआ

किसी खेत में

एक मीनार और तोड़ दी

किसी भीड़-तन्त्र ने।

जो एक लाश बनकर लौटी

और आधी रात को जला दी गई।

किसी और भीड़-तन्त्र से बचने के लिए।

28 वर्ष और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

यह जानने के लिए

कि अपराधी कौन था,

भीड़-तन्त्र तो आते-जाते रहते हैं,

परिणाम कहां दे पाते हैं।

दूध की तरह उफ़नते हैं ,

और बह जाते हैं।

लेकिन  कभी-कभी

रौंद भी दिये जाते हैं।

 

रंगों में बहकता है

यह अनुपम सौन्दर्य

आकर्षित करता है,

एक लम्बी उड़ान के लिए।

रंगों में बहकता है

किसी के प्यार के लिए।

इन्द्रधनुष-सा रूप लेता है

सौन्दर्य के आख्यान के लिए।

तरू की विशालता

संवरती है बहार के लिए।

दूर-दूर तम फैला शून्य

समझाता है एक संवाद के लिए।

परिदृश्य से झांकती रोशनी

विश्वास देती है एक आस के लिए।

अपने आकर्षण से बाहर निकल

अपने आकर्षण से बाहर निकल।

देख ज़रा

प्रतिच्छाया धुंधलाने लगी है।

रंगों से आभा जाने लगी है।

नृत्य की गति सहमी हुई है

घुंघरूओं की थाप बहरी हुई है।

गति विश्रृंखलित हुई है।

मुद्रा तेरी थकी हुई है।

वन-कानन में खड़ी हुई है।

पीछे मुड़कर देख।

सच्चाईयों से मुंह न मोड़।

भेड़िए बहके हुए हैं।

चेहरों पर आवरण पहने हुए हैं।

पहचान कहीं खो गई है।

सम्हलकर कदम रख।

अपनी हिम्मत को परख।

सौन्दर्य में ही न उलझ।

झूठी प्रशंसाओं से निकल।

सामने वाले की सोच को परख।

तब अपनी मुद्रा में आ।

अस्त्र उठा या

नृत्य से दिल बहला।

 

रोशनी की परछाईयां भी राह दिखा जाती हैं

अजीब है इंसान का मन।

कभी गहरे सागर पार उतरता है।

कभी

आकाश की उंचाईयों को

नापता है।

 

ज़िन्दगी में अक्सर

रोशनी की परछाईयां भी

राह दिखा जाती हैं।

ज़रूरी नहीं

कि सीधे-सीधे

किरणों से टकराओ।

फिर सूरज डूबता है,

या चांद चमकता है,

कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

ज़िन्दगी में,

कोई एक पल

तो ऐसा होता है,

जब सागर-तल

और गगन की उंचाईयों का

अन्तर मिट जाता है।

 

बस!

उस पल को पकड़ना,

और मुट्ठी में बांधना ही

ज़रा कठिन होता है।

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कविता  सूद 1.10.2020

चित्र आधारित रचना

यह अनुपम सौन्दर्य

आकर्षित करता है,

एक लम्बी उड़ान के लिए।

रंगों में बहकता है

किसी के प्यार के लिए।

इन्द्रधनुष-सा रूप लेता है

सौन्दर्य के आख्यान के लिए।

तरू की विशालता

संवरती है बहार के लिए।

दूर-दूर तम फैला शून्य

समझाता है एक संवाद के लिए।

परिदृश्य से झांकती रोशनी

विश्वास देती है एक आस के लिए।

 

कामधेनु कुर्सी बनी

 

समुद्र मंथन से मिली सुरभि, मनोकामनाएं पूरी थी करती,

राजाओं, ऋषियों की स्पर्धा बनी, मान दिलाया थी करती,

गायों को अब कौन पूछता, अब कुर्सी की बात करो यारो,

कामधेनु कुर्सी बनी, इसके चैपायों की पूजा दुनिया करती।

इंसान को न धिक्कारो यारो

 

आत्माओं का गुणगान करके इंसान को न धिक्कारो यारो

इंसानियत की नीयत और गुणों में पूरा विश्वास करो यारो

यह जीवन है, अच्छा-बुरा, ,खरा-खोटा तो चला रहेगा

अपनों को अपना लो, फिर जीवन सुगम है, समझो यारो।