जिजीविषा के लिए

 

 

रंगों की रंगीनियों में बसी है जि़न्दगी।

डगर कठिन है,

पर जिजीविषा के लिए

प्रतिदिन, यूं ही

सफ़र पर निकलती है जिन्‍दगी।

आज के निकले कब लौटेंगे,

यूं ही एकाकीपन का एहसास

देती रहती है जिन्दगी।

मृगमरीचिका है जल,

सूने घट पूछते हैं

कब बदलेगी जिन्दगी।

सुना है शहरों में, बड़े-बडे़ भवनों में

ताल-तलैया हैं,

घर-घर है जल की नदियां।

देखा नहीं कभी, कैसे मान ले मन ,

दादी-नानी की परी-कथाओं-सी

लगती हैं ये बातें।

यहां तो,

रेत के दानों-सी बिखरी-बिखरी

रहती है जिन्दगी।

 

मत विश्वास कर परछाईयों पर

कौन  कहता है दर्पण सदैव सच बताता है

हम जो देखना चाहें अक्सर वही दिखाता है

मत विश्वास कर इन परछाईयों-अक्सों पर

बायें को दायां और दायें को बायां बताता है

मेहनत की ज़िन्दगी है

प्रेम का प्रतीक है

हाथ में मेरे

न देख मेरा चेहरा

न पूछ मेरी आस।

भीख नहीं मांगती

दया नहीं मांगती

मेहनत की ज़िन्दगी है

छोटी है तो क्या

मुझ पर न दया दिखा।

मुझसे ज्यादा जानते हो तुम

जीवन के भाव को।

न कर बात यूं ही

इधर-उधर की

लेना हो तो ले

मंदिर में चढ़ा

किसी के बालों में लगा

कल को मसलकर

सड़कों पर गिरा

मुझको क्या

लेना हो तो ले

नहीं तो आगे बढ़ 

 

घन-घन-घन घनघोर घटाएं

घन-घन-घन घनघोर घटाएं,
लहर-लहर लहरातीं।

कुछ बूंदें बहकीं,

बरस-बरस कर,
मन सरस-सरस कर,
हुलस-हुलस कर,
हर्षित कर
लौट-लौटकर आतीं।

बूंदों का  सागर बिखरा ।

कड़क-कड़क, दमक-दमक,
चपल-चंचला दामिनी दमकाती।
मन आशंकित।
देखो, झांक-झांककर,
कभी रंग बदलतीं,

कभी संग बदलतीं।
इधर-उधर घूम-घूमकर
मारूत संग
धरा-गगन पर छा जातीं।

रवि  ने  मौका ताना,

सतरंगी आकाश बुना ।
निरख-निरख कर
कण-कण को
नेह-नीर से दुलराती।

ठिठकी-ठिठकी-सी शीत-लहर

फ़र्र-फ़र्र करती दौड़ गई।

सर्र-सर्र-सर्र कुछ पत्ते झरते

डाली पर नव-संदेश खिले

रंगों से धरती महक उठी।

पेड़ों के झुरमुट में बैठी चिड़िया

की किलकारी से नभ गूंज उठा

मानों बोली, उठ देख ज़रा

कौन आया ! बसन्त आया!!!


 

चूड़ियां: रूढ़ि या परम्परा

आज मैंने अपने हाथों की 

सारी चूड़ियों उतार दी हैं

और उतार कर सहेज नहीं ली हैं

तोड़ दी हैं

और  टुकड़े टुकड़े करके

उनका कण-कण

नाली में बहा दिया हैं।

इसे

कोई बचकानी हरकत न समझ लेना।

वास्तव में मैं डर गई थी।

चूड़ियों की खनक से,

उनकी मधुर आवाज़ से,

और उस आवाज़ के प्रति

तुम्हारे आकर्षण से।

और साथ ही चूड़ियों से जुड़े

शताब्दियों से बन रहे

अनेक मुहावरों और कहावतों से।

मैंने सुना है

चूड़ियों वाले हाथ कमज़ोर हुआ करते हैं।

निर्बलता का प्रतीक हैं ये।

और अबला तो मेरा पर्यायवाची

पहले से ही है।

फिर चूड़ी के कलाई में आते ही

सौर्न्दय और प्रदर्शन प्रमुख हो जाता है

और कर्म उपेक्षित।

 

और सबसे बड़ा खतरा यह

कि पता नहीं

कब, कौन, कहां,

परिचित-अपरिचित

अपना या पराया

दोस्त या दुश्मन

दुनिया के किसी

जाने या अनजाने कोने में

मर जाये

और तुम सब मिलकर

मेरी चूड़ियां तोड़ने लगो।

फ़िलहाल

मैंने इस खतरे को टाल दिया है।

जानती हूं

कि तुम जब यह सब जानेगे

तो बड़ा बुरा मानोगे।                       

क्योंकि, बड़ी मधुर लगती है

तुम्हें मेरी चूड़ियों की खनक।

तुम्हारे प्रेम और सौन्दर्य गीतों की

प्रेरणा स्त्रोत हैं ये।

फुलका बेलते समय

चूड़ियों से ध्वनित होते स्वर

तुम्हारे लिए अमर संगीत हैं

और तुम

मोहित हो इस सब पर।

पर मैं यह भी जानती हूं

कि इस सबके पीछे

तुम्हारा वह आदिम पुरूष है

जो स्वयं तो पहुंच जाना चाहता है

चांद के चांद पर।

पर मेरे लिए चाहता है

कि मैं,

रसोईघर में,

चकले बेलने की ताल पर,

तुम्हारे लिए,

संगीत के स्वर सर्जित करती रहूं,

तुम्हारी प्रतीक्षा में,

तुम्हारी प्रशंसा के

दो बोल मात्र सुनने के लिए।

पर मैं तुम्हें बता दूं

कि तुम्हारे भीतर का वह आदिम पुरूष

जीवित है अभी तो हो,

किन्तु,

मेरे भीतर की वह आदिम स्त्री

कब की मर चुकी है।

अब तो कुछ बोलना सीख

आग दिल में जलाकर रख

अच्छे बुरे का भाव परख कर रख।

न सुन किसी की बात को

अपने मन से जाँच-परख कर रख।

कब समझ पायेंगें हम!!

किसी और के घर में लगी

आग की चिंगारी

जब हवा लेती है

तो हमारे घर भी जलाकर जाती है।

तब

दिलों के भाव जलते हैं

अपनों के अरमान झुलसते हैं

पहचान मिटती है,

जिन्दगियां बिखरती हैं

धरा बिलखती है।

गगन सवाल पूछता है।

इसीलिए कहती हूँ

न मौन रह

अब तो कुछ बोलना सीख।

अपने हाथ आग में डालना सीख

आग परख। हाथ जला।

कुछ साहस कर, अपने मन से चल।

 

 

सब साथ चलें बात बने

भवन ढह गये, खंडहर देखो अभी भी खड़ा है।

लड़खड़ाते कदमों से कौन पर्वत तक चढ़ा है।

जीवन यूं चलता है, सब साथ चलें, बात बने,

कठिन समय सहायक बनें, इंसान वही बड़ा है।

क्रोध कोई विकार नहीं

अनैतिकता, अन्याय, अनाचार पर क्या क्रोध नहीं आता, जो बोलते नहीं

केवल विनम्रता, दया, विलाप से यह दुनिया चलती नहीं, क्यों सोचते नहीं

नवरसों में क्रोध कोई विकार नहीं मन की सहज सरल अभिव्यक्ति है

एक सुखद परिवर्तन के लिए खुलकर बोलिए, अपने आप को रोकिए नहीं

कहां किस आस में

सूर्य की परिक्रमा के साथ साथ ही परिक्रमा करता है सूर्यमुखी

अक्सर सोचती हूं रात्रि को कहां किस आस में रहता है सूर्यमुखी

सम्भव है सिसकता हो रात भर कहां चला जाता है मेरा हमसफ़र

शायद इसीलिए प्रात में अश्रुओं से नम सुप्त मिलता है सूर्यमुखी

शक्ल हमारी अच्छी है

शक्ल हमारी अच्छी है, बस अपनी नज़र बदल लो तुम।

अक्ल हमारी अच्छी है, बस अपनी समझ बदल लो तुम।

जानते हो, पर न जाने क्यों न मानते हो, हम अच्छे हैं,

मित्रता हमारी अच्छी है, बस अपनी अकड़ बदल लो तुम।

 

मन में एक जंगल है

मन में एक जंगल है

विचारों का, भावों का।

एक झंझावात की तरह आते हैं

अन्तर्मन को झिंझोड़ते हैं,

तहस-नहस करते हैं

और हवा के झोंके के साथ

अचानक

कहीं दूर उड़ जाते हैं।

कभी शब्द दे पाती हूं

और कभी नहीं।

लिखे शब्द पिघलने लगते हैं

आसमानी बादलों की तरह।

कहीं दूर उड़ जाते हैं

पक्षी की तरह।

हर बार एक कही-अनकही

आधी-अधूरी कहानी रह जाती है।

शुद्ध जल से आचमन कर ले मेरे मन

जल की धार सी बह रही है ज़िन्दगी

नित नई आस जगा रही है ज़िन्दगी

शुद्ध जल से आचमन कर ले मेरे मन

काल के गाल में समा रही है ज़िन्दगी

पूजने के लिए बस एक इंसान चाहिए

न भगवान चाहिए न शैतान चाहिए

पूजने के लिए बस एक इंसान चाहिए

क्या करेगा किसी के गुण दोष देखकर

मान मिले तो मन से प्रतिदान चाहिए

ज़िन्दगी कहीं सस्ती तो नहीं

बहुत कही जाती है एक बात

कि जब

रिश्तों में गांठें पड़ती हैं,

नहीं आसान होता

उन्हें खोलना, सुलझाना।

कुछ न कुछ निशान तो

छोड़ ही जाती हैं।

 

लेकिन सच कहूं

मुझे अक्सर लगता है,

जीवन में

कुछ बातों में

गांठ बांधना भी

ज़रूरी होता है।

 

टूटी डोर को भी

हम यूं ही नहीं जाने देते

गांठे मार-मारकर

सम्हालते हैं,

जब तक सम्हल सके।

 

ज़िन्दगी कहीं

उससे सस्ती तो नहीं,

फिर क्यों नहीं कोशिश करते,

यहां भी कभी-कभार,

या बार-बार।

 

ककहरा जान लेने से ज़िन्दगियां नहीं बदल जातीं

इस चित्र को देखकर सोचा था,

 

आज मैं भी

कोई अच्छी-सी रचना रचूंगी।

मां-बेटी की बात करूंगी।

लड़कियों की शिक्षा,

प्रगति को लेकर बड़ी-बड़ी

बात करूंगी।

पर क्या करूं अपनी इस सोच का,

अपनी इस नज़र का,

मुझे न तो मां दिखाई दी इस चित्र में,

किसी बेटी के लिए आधुनिकता-शिक्षा के

सपने बुनती हुई ,

और न बेटी एवरेस्ट पर चढ़ती हुई।

मुझे दिखाई दे रही है,

एक तख्ती परे सरकती हुई,

कुछ गुम हुए, धुंधलाते अक्षरों के साथ,

और एक छोटी-सी बालिका।

यहां कहां बेटी पढ़ाने की बात है।

कहां कुछ सिखाने की बात है।

नहीं है कोई सपना।

नहीं है कोई आस।

जीवन की दोहरी चालों में उलझे,

तख्ती, चाक और लिखावट

तो बस दिखावे की बात है।

एक ओर  तो पढ़ ले,पढ़ ले,

का राग गा रहे हैं,

दूसरी ओर

इस छोटी सी बालिका को

सजा-धजाकर बिठा रहे हैं।

कोई मां नहीं बुनती

ऐसे हवाई सपने

अपनी बेटियों के लिए।

जानती है गहरे से,

ककहरा जान लेने से

ज़िन्दगियां नहीं बदल जातीं,

भाव और परम्पराएं नहीं उलट जातीं।

.

आज ही देख रही है ,

उसमें अपना प्रतिरूप।

.

सच कड़वा होता है

किन्तु यही सच है।

 

और हम हार लिए खड़े हैं

पाप का घड़ा

अब फूटता

 नहीं।

जब भराव होता है

तब रिसाव होता है

बनते हैं बुत

कुर्सियों पर जमते हैं।

परत दर परत

सोने चांदी के वर्क

समाज, परिवार,धर्म, राजनीति

सब कहीं जमाव होता है।

 

फिर भराव होता है

फिर रिसाव होता है

फिर बनते हैं बुत

 

और हम हार लिए खड़े हैं.........

 

 

बेवजह जागने की आदत नहीं हमारी

झूठ, छल-कपट, मिथ्या-आचरण, भ्रष्टाचार में जीते हैं हम किसी को क्या

बेवजह जागने की आदत नहीं हमारी, जो भी हो रहा, होता रहे हमें क्या

आराम से खाते-पीते हैं, मज़े से जीते हैं, दुनिया लड़-मर रही, मरती रहे

लहर है तो, सत्य, अहिंसा, प्रेम पर लिखने को जी चाहता है तुम्हें क्या

बालपन की स्मृतियाँ

५०-५५ वर्ष पुरानी स्‍म़ृतियां मानस-पटल पर उभर कर आ गईं।

उसे चोरी कहते ही नहीं जो पकड़ी जाये। हम तो इतने होशियार थे कि कभी चोरी पकड़ी ही नहीं गई।

सस्‍ते का युग था। बाज़ार से छोटा-मोटा सामान हम बहनें ही लाया करती थीं। एक से पांच रूपये तक में न जाने कितना सामान आ जाता था। दस-बीस पैसे तो अक्‍सर मैं छुपा ही लिया करती थी। अब छुपायें तो छुपायें कहां। प्रवेश द्वार के बाद बरामदा था और उसमें पुस्‍तकों की अलमारियां थीं, वहां मैंने एक पुस्‍तक उपर के खाने में निर्धारित कर ली थी जिसके उपर मैं वह पैसे रख देती थी, और स्‍कूल जाते समय चुपके निकाल लेती थी। आप सोचेंगे, उन पांच-दस पैसों का क्‍या करते होंगे, दस पैसे के बीस गोलगप्‍पे आते थे और पांच पैसे का चूरण, गोलियां, अथवा दो-तीन नाशपाती, खट्टा (गलगल) आदि।

स्‍कूल तो पैदल ही आते-जाते थे, एक घंटे का रास्‍ता था। अब घर से स्‍कूल तो कोई पहुंचने से रहा। वह युग पी.टी.एम. वाला युग भी नहीं था कि कोई सच-झूठ का पता लगा पाता।  स्‍कूल से फूलों के पौधे बहुत चुराया करती थी। घर के बाहर बड़ा सा मैदान था, उसमें क्‍यारियां बनाकर लगाते थे। मां पूछती थी कहां से लाये, कह देते थे स्‍कूल से माली  से ले लिए। और राह-भर में पेड़ों से तोड़-तोड़कर अलूचे, पलम, कैंथ खुरमानी तो बहुत खाये हैं, उस खट्टे-मीठे स्‍वाद का तो कहना ही क्‍या।

आज नहीं सोच पाते कि उस समय जो किया वह सही था अथवा गलत, किन्‍तु जो था यही सत्‍य था, आज प्रकट कर अच्‍छा लगा।

 

दिल आजमाने में लगे हैं

अब गुब्बारों में दिल सजाने लगे हैं

उनकी कीमत हम लगाने लगे हैं

पांच-सात रूपये में ले जाईये मनचाहे

फुलाईये, फोड़िए

या यूं ही समय बिताने  में लगे हैं

मायूसे दिल की ओर तो कोई देखता ही नहीं

सोने चांदी के भाव अब लगाने लगे हैं

दिल कहां, दिलदार कहां अब

बातें करते बहुत

पर असल ज़िन्दगी में टांके लगाने लगे हैं

कुछ तुम दीजिए, कुछ हमसे लीजिए

पर फोड़ना इस दिल को

काटना इसे

असलियत निकल आयेगी

खून बहेगा, आस आहें भरेंगी

बस रोंआ-रोंआ बिखरेगा

सरकार ने प्लास्टिक बन्द कर दिया है

बस इतनी सी बात हम बताने में लगे हैं

समझ आया हो कुछ,  तो ठीक

नहीं तो हम

कहीं और दिल आजमाने में लगे हैं।

 

 

प्रकृति का सौन्दर्य निरख

सांसें

जब रुकती हैं,

मन भीगता है,

कहीं दर्द होता है,

अकेलापन सालता है।

तब प्रकृति

अपने अनुपम रूप में

बुलाती है

समझाती है,

खिलते हैं फूल,

तितलियां पंख फैलाती हैं,

चिड़िया चहकती है,

डालियां

झुक-झुक मन मदमाती हैं।

सब कहती हैं

समय बदलता है।

धूप है तो बरसात भी।

आंधी है तो पतझड़ भी।

सूखा है तो ताल भी।

मन मत हो उदास

प्रकृति का सौन्दर्य निरख।

आनन्द में रह।

 

अरे अपने भीतर जांच

शब्दों की क्या बात करें, ये मन बड़ा वाचाल है

इधर-उधर भटकता रहता, न अपना पूछे हाल है

तांक-झांक की आदत बुरी, अरे अपने भीतर जांच

है सबका हाल यही, तभी तो सब यहां बेहाल हैं

 

जरा सी रोशनी के लिए

जरा सी रोशनी के लिए

सूरज धरा पर उतारने में लगे हैं

जरा सी रोशनी के लिए

दीप से घर जलाने में लगे हैं

ज़रा-सी रोशनी के लिए

हाथ पर लौ रखकर घुमाने में लगे हैं

ज़रा-सी रोशनी के लिए

चांद-तारों को बहकाने में लगे हैं

ज़रा-सी रोशनी के लिए

आज की नहीं

कल की बात करने में लगे हैं

ज़रा -सी रोशनी के लिए

यूं ही शोर मचाने में लगे हैं।

.

यार ! छोड़ न !!

ट्यूब लाईट जला ले,

या फिर

सी एफ़ एल लगवा ले।।।

 

पत्थरों में भगवान ढूंढते हैं

इंसान बनते नहीं,

पत्थर गढ़ते हैं,

भाव संवरते नहीं

पूजा करते हैं,

इंसानियत निभाते नहीं

निर्माण की बात करते हैं।

सिर ढकने को

छत दे सकते नहीं

आकाश छूती

मूर्तियों की बात करते हैं।

पत्थरों में भगवान

ढूंढते हैं

अपने भीतर की इंसानियत

को मारते हैं।

*  *  *  *

अपने भीतर

एक विध्वंस करके देख।

कुछ पुराना तोड़

कुछ नया बनाकर देख।

इंसानियत को

इंसानियत से जोड़कर देख।

पतझड़ में सावन की आस कर।

बादलों में

सतरंगी आभा की तलाश कर।

झड़ते पत्तों में

नवीन पंखुरियों की आस देख।

कुछ आप बदल

कुछ दूसरों से आस देख।

बस एक बार

अपने भीतर की कुण्ठाओं,

वर्जनाओं, मृत मान्यताओं को

तोड़ दे

समय की पुकार सुन

अपने को बदलने का साहस गुन।