हम तो आनन्दित हैं, तुमको क्या

इस जग में एक सुन्दर जीवन मिला है, मर्त्यन लोक है इससे क्या

सुख-दुख तो आने जाने हैं,पतझड़-सावन, प्रकाश-तम है हमको क्या

जब तक जीवन है, भूलकर मृत्यु के डर को जीत लें तो क्या बात है

कोई कुछ भी उपदेश देता रहे, हम तो आनन्दित हैं, तुमको क्या

लौटाकर खड़ा कर दिया शून्य पर

अभिमान

अपनी सफ़लता पर।

नशा

उपलब्धियों का।

मस्ती से जीते जीवन।

उन्माद

अपने सामने सब हेठे।

घमण्ड ने

एक दिन लौटाकर

खड़ाकर दिया

शून्य पर। 

 

 

बस बातें करने में उलझे हैं हम

किस विवशता में कौन है, कहां है, कब समझे हैं हम।

दिखता कुछ और, अर्थ कुछ और, नहीं समझे हैं हम।

मां-बेटे-से लगते हैं, जीवनगत समस्याओं में उलझे,

नहीं इनका मददगार, बस बातें करने में उलझे हैं हम।

 

मान-सम्मान की आस में

मान-सम्मान की आस में सौ-सौ ग्रंथ लिखकर हम बन-बैठे “कविगण”

स्वयं मंच-सज्जा कर, सौ-सौ बार, करवा रहे इनका नित्य-प्रति विमोचन

नेता हो या अभिनेता, ज्ञानी हो या अज्ञानी कोई फ़र्क नहीं पड़ता

छायाचित्र छप जायें, समाचारों में नाम देखने को तरसें हमरे लोचन

लज्जा:नारी का आभूषण
आज एक आप्त वाक्य मिला  ‘‘लज्जा नारी का आभूषण है।’’ वैसे एक ओर तो मुझे अच्छा लगा कि कोई एक तो आभूषण है जिस पर नारी को किसी भी व्यंग्य बाण का सामना नहीं करना पड़ता। जिस नारी के पास यह आभूषण नहीं है वह गहन आलोचना की पात्र होती है। और हाँ, इस आभूषण के साथ नीची नज़र, आँख की शर्म, घूँघट, पल्लू और न जाने कितने और आभूषण जुड़ जाते हैं। और मेरी अधिकतम जानकारी में यह भी आया है कि आधुनिक नारी अब अच्छी नहीं रही क्योंकि उसने इन आभूषणों को धारण करना बन्द कर दिया है।

यह तो हुई हास-परिहास की बात। किन्तु मुझे यह समझ नहीं आता कि लज्जा भाव की आवश्यकता नारी को ही क्यों?

लज्जा एक भाव एवं गुण है जो किसी के विनम्र स्वभाव की पहचान है। स्वनियन्त्रण, सबका आदर करना, विनम्रता आदि ही तो लज्जा के गुण हैं। कहा जाता है कि आधुनिक नारी में लज्जा भाव नहीं रह गया और यह उसके वस्त्रों से भी पता लगता है।  नारी के देह-प्रदर्शनीय वस्त्र निश्चय ही खलते हैं किन्तु जब बड़े-बड़े मंचों पर बड़े-बड़े देह प्रदर्शन करते हैं तो उसे सौन्दर्य,  कहा जाता है। जब भी ऐसी भारतीय संस्कृति, संस्कार, शील आदि की बात होती है जो परोक्ष रूप में लज्जा के साथ जोड़े जाते हैं तो केवल नारी की ही बात क्यों होती है, पुरुष की क्यों नहीं। यदि हमारे समाज में ये सारे गुण नारी के साथ-साथ पुरुषों में भी आ जायें तो सच में ही इस धरा पर स्वर्ग आ जाये यदि कहीं होता हो तो।

   

 

ज़िन्दगी बहुत झूले झुलाती है

ज़िन्दगी बहुत झूले झुलाती है

कभी आगे,कभी पीछे ले जाती है

जोश में कभी ज़्यादा उंचाई ले लें

तो सीधे धराशायी भी कर जाती है

“आपने “कुच्छछ” किया है क्या”

आज बहुत परेशान, चिन्तित हूं, दुखी हूं वह जिसे अंग्रेज़ी में कहते हैं Hurt हूं।

पूछिए क्यों ?

पूछिए , पूछिए।

जले पर नमन छिड़किए।

हमारी समस्या का आनन्द लीजिए।

ऐसा सुनते हैं कि दो-तीन या चार दिन पहले कोई हिन्दी दिवस गुज़र गया। यह भी सुनते हैं कि यह गुज़र कर हर वर्ष वापिस लौट आता है और मनाया भी जाता है। बहुत वर्ष पहले जब मै शिमला में थी तब की धुंधली-धुंधली यादें हैं इस दिन के आने और गुज़रने की। फेसबुक ने तो परेशान करके रख दिया है। जिसे देखो वही हिन्दी दिवस के कवि सम्मेलन में कविता पढ़ रहा है, कोई सम्मान ले रहा है कोई प्रतीक चिन्ह लेकर मुझे चिढ़ा रहा है, किसी की पुस्तकों का विमोचन हो रहा है, किसी पर ‘‘हार’’ चढ़ रहे हैं तो कोई सीधे-सीधे मुझे अंगूठा दिखा रहा है। यहां तक कि विदेशी धरती पर भी हिन्दी का दिन मनाया जा रहा है।

हं हं हं हं !!

ऐसे थोड़े-ई होता है।

हमारे साथ तो सदा ही बुरी रही।

इस बहाने कुछ चटपटी यादें।

बड़ी शान से पीएचडी करते रहे और बैंक में क्लर्क बन बैठे। हमसे पहले ही हमारी चर्चा हमारी फ़ाईल से बैंक में पहुंच चुकी थी। मेरी पहचान हुई ‘‘हिन्दी वाली ’’।

यह कथा 1980 से 2000 के बीच की है।

हिन्दी भाषा और साहित्य मुझे विद्यालय से ही अच्छा लगता था। मेरा उच्चारण स्पष्ट था, हिन्दी बोलना भी मुझे पसन्द था। अध्ययन के साथ मेरी शब्दावली की क्षमता भी बढ़ी और मेरी हिन्दी और भी अच्छी होती गई।

पहली घटना मेरे साथ कुछ ऐसे घटी। कुछ परिचित-अपरिचित मित्रों के साथ बैठी थी। बातचीत चल रही थी। एक युवक मेरी ओर बड़े आश्चर्य से देख रहा था। मैं कुछ सकपका रही थी। अचानक वह युवक सबकी बात बीच में रोककर मुझे सम्बोधित करते हुए बोला

“आपने “कुच्छछ” किया है क्या” ?

हम घबराकर उठ खड़े हुए, ...........30 साल तक...... इश्क-मुहब्बत तो करनी नहीं आई शादी हुई नहीं, इन्होंने हमारी कौन-सी चोरी पकड़ ली ? मैंने तो कोई अपराध, हत्या, चोरी-डकैती नहीं की।

मैं चौंककर बोली, “मैंने क्या किया है”!

वह बोला “नहीं-नहीं, मेरा मतलब आपने हिन्दी में “कुच्छ्छ“ किया है क्या ?

आह ! जान में जान आई। मैं बहुत रोब से बोली, जी हां मैंने हिन्दी में एम.ए.,एम.फ़िल की है, पी.एच.डी.कर रही हूं।

“तभ्भ्भी, आप इतनी हिन्दी मार रही हैं।“

सब खिलखिलाकर हंस पड़े,

अरे ! इसकी तो आदत ही है हिन्दी झाड़ने की। हमें तो अब आदत हो गई है।

धीरे-धीरे मैं “हिन्दीवाली” होती गई। सदैव अच्छी, शुद्ध हिन्दी बोलना मेरा पहला अपराध था।

मेरा दूसरा अपराध था कि मैंने “हिन्दीवाली” होकर भी हिन्दी के क्षेत्र में नौकरी नहीं की। जिसने हिन्दी में “कुच्छछ” किया है उसे केवल हिन्दी अध्यापक, प्राध्यापक, हिन्दी अनुवादक  अथवा हिन्दी अधिकारी ही होना चाहिए।

उसे हिन्दी का सर्वज्ञ भी होना चाहिए। हिन्दी के प्रत्येक शब्द का अर्थ ज्ञात होना चाहिए और एक अच्छा अनुवादक भी।

शब्दकोष से अंग्रेज़ी के कठिनतम शब्द ढूंढकर लाये जाते और मुझसे उनका अर्थ पूछा जाता। मैं जब यह कहती कि मुझे नहीं पता तो सामूहिक तिरस्कारपूर्ण स्वर होता था ‘‘हं, फिर आपकी पी. एच. डी. का क्या फ़ायदा’’

हमारा हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में कार्य करना, लेखन, सब भाड़ में , बस ''बेचारी ''

ऐसी स्थिति में हम एक दया का पात्र होते हैं, ''बेचारी '' । पूरे बीस वर्ष यह torcher भुगता और आज भी भोग रही हूं।

 

अपना तो वोट देना ही बेकार चला गया

अपना तो वोट देना ही बेकार चला गया।

हमारे साथ तो पता नहीं क्यों ऐसा अन्याय होता है अक्सर।

अब देखिए, मैं प्रातः काल सात बजे से टी.वी. देख रही थी। हर शहर में , हर मतदान केन्द्र पर टी. वी. के संवाददाता खड़े थे। वोट देने वालों का साक्षात्कार ले रहे थे।

 उनसे पूछ रहे थे

‘‘आपको कैसा लग रहा है वोट देकर’

‘‘आपने किस मुद्दे को लेकर वोट दिया है’’

एक बेचारे व्हील चेयर पर आये थे। उन्हें न तो सुनाई दे रहा था न ही दिखाई। किन्तु हमारी तो ड्यूटी है उनसे पूछना। सो उनके मुंह में माईक घुसा कर हम पूछ रहे थे

‘‘ आप देखिए व्हील चेयर पर वोट देने आये हैं कैसा लग रहा है आपको’’

वे हकबकाये से कभी माईक को देखें और कभी अपने आस-पास खड़े लोगों को।

एक ‘‘बड़ा व्यक्ति’’ अपने घर से पैदल ही वोट देने आ गया। जब तक हमें अच्छे से याद नहीं हो गया कि फलां व्यक्ति अपने घर से पैदल ही वोट देने आया है, संवाददाता हमें याद कराते रहे।

वे ढूंढ-ढूंढकर वृद्ध, बैसाखी वाले लोगों को, व्हील चेयर वाले मतदाताओं को ढूंढ रहे थे , सब कवर हो गये टी. वी. पर।

अन्त में वे कुछ आम लोगों के बीच भी अपना माईक लेकर आ गये।

‘‘आप सुबह-सुबह सात बजे ही यहां आ गये हैं? ’’

जी हां

तो वोट देने आये हैं

जी हां

अच्छा तो क्या सोचकर वोट देने आये हैं

जी, वोट देनी है यही सोच कर आये हैं

पर कुछ तो मुद्दे होंगे जिनको सोचकर आप वोट दे रहे हैं

जी हां, बेरोजगारी मंहगाई वगैरह , वे आखिर में हारकर बोल दिये।

बाद में ज्ञात हुआ कि वे एक बहुत बड़ी पोस्ट पर सरकारी नौकरी में हैं किन्तु उनके लिए बेरोज़गारी कैसे मुद्दा है समझ नहीं आया।

 

हमारा अन्तर्मन भी प्रसन्न हुआ। जल्दी-जल्दी तैयार हुई अच्छे से। मतदान केन्द्र जा रही हूं मत देने, वहां टी. वी. वाले खड़े होंगे, हमारा साक्षात्कार लेंगे। मुद्दे तैयार किये।

पैदल ही गये। पर वहां तो कोई न था।

मत तो देना ही था, यद्यपि मतदान में ही मत शब्द है फिर भी दे दिया। अपना तो आज वोट देना ही बेकार चला गया। हमारे साथ तो पता नहीं ऐसा अन्याय क्यों होता है अक्सर।

 

एक और कथा बताना और भी ज्यादा जरूरी है।

हम अपने परिचितों में प्रायः बात करते हैं इस बार वोट किसे। हमारे एक मित्र बोले मैं तो मोदी को ही अपना वोट दूंगा। क्यों आप राहुल को दे रही हैं क्या या फिर केजरीवाल को।

मैंने कहा , ये दोनों ही हमारे क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। किन्तु मोदी जी तो प्रधानमंत्री हैं वे विधान सभा के लिए आपके क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं क्या?

मेरी ऐसी बातों पर सब बहुत नाराज़ हो जाते हैं। मित्र बोले, फालतू में बात खींचती हो, मतलब भाजपा को वोट देगें।

मैं सिरे की ढीठ। फिर पूछ लिया चलिए अच्छी बात है भाजपा को देंगे, प्रत्याशी तो होगा कोई जिसे वोट देंगें।

अब वे उखड़ गये, इससे क्या ।

क्यों नहीं? काम तो प्रत्याशी ही करेगा, न तो भाजपा करेगी, न ही मोदी जी।

जब कुछ पता नहीं तो बोलती क्यों हो, कहकर वे चिढ़कर उठकर चले गये।

सरकार और मीडिया कहते हैं जनता जागृत हो रही है। जी हां, जनता जागृत हो रही है, जागरण करती है,  दस रूपये चढ़ाती है, प्रसाद लेती है, उन दस रूपयों में पूरा परिवार खाना खाता है और घर जाकर सो जाता है। फिर सुबह उठकर कहता है , मुझे नहीं पता क्या कहता है, और यदि कुछ कहता भी है तो मुझे क्या लेना, कहता रहे, जिसे जो कहना है।

जो मुद्दे कल थे , वे ही आज हैं और कल भी वे ही रहेंगे, कुछ हेर-फ़ेर के साथ क्योंकि हम जागरण करते हैं जागृत नहीं हो रहे।

 

 

 

मैंने चिड़िया से पूछा

मैंने चिड़िया से पूछा

क्यों यूं ही दिन भर

चहक-चहक जाती हो

कुट-कुट, किट-किट करती

दिन-भर शोर मचाती हो ।

 

पलटकर बोली

तुमको क्या ?

 

मैंने कभी पूछा तुमसे

दिन भर

तुम क्या करती रहती हो।

कभी इधर-उधर

कभी उधर-इधर

कभी ये दे-दे

कभी वो ले ले

कभी इसकी, कभी उसकी

ये सब क्यों करती रहती हो।

-

कभी मैं बोली सूरज से

कहां तुम्हारी धूप

क्यों चंदा नहीं आये आज

कभी मांगा चंदा से किसी

रोशनी का हिसाब

कहां गये टिम-टिम करते तारे

कभी पूछा मैंने पेड़ों से

पत्ते क्यों झर रहे

फूल क्यों न खिले।

कभी बोली फूलों से मैं

कहां गये वो फूल रंगीले

क्यों नहीं खिल रहे आज।

क्यों सूखी हरियाली

बादल क्यों बरसे

बिजली क्यों कड़की

कभी पूछा मैंने तुमसे

मेरा घर क्यों उजड़ा

न डाल रही, न रहा घरौंदा

कभी की शिकायत मैंने

कहाँ सोयेंगे मेरे बच्चे

कहाँ से लाऊँगी मैं दाना-पानी।

मैं खुश हूँ

तुम भी खुश रहना सीखो

मेरे जैसे बनना सीखो

इधर-उधर टाँग अड़ाना बन्द करो

अपने मतलब से मतलब रख आनन्द करो।

 

मुझको विश्व-सुन्दरी बनना है

बड़ी देर से निहार रही हूं

इस चित्र को]

और सोच रही हूं

क्या ये सास-बहू हैं

टैग ढूंढ रही हूं

कहां लिखा है

कि ये सास-बहू हैं।

क्यों सबको

सास-बहू ही दिखाई दे रही हैं।

मां-बेटी क्यों नहीं हो सकती

या दादी-पोती।

 

नाराज़ दादी अपनी पोती से

करती है इसरार

मैं भी चलूंगी साथ तेरे

मुझको भी ऐसा पहनावा ला दे

बहुत कर लिया चैका-बर्तन

मुझको भी माॅडल बनना है।

बूढ़ी हुई तो क्या

पढ़ा था मैंने अखबारों में

हर उमर में अब फैशन चलता है]

ले ले मुझसे चाबी-चैका]

मुझको

विश्व-सुन्दरी का फ़ारम भरना है।

चलना है तो चल साथ मेरे

तुझको भी सिखला दूंगी

कैसे करते कैट-वाक,

कैसे साड़ी में भी सब फबता है

दिखलाती हूं तुझको,

सिखलाती हूं तुझको

इन बालों का कैसे जूड़ा बनता है।

चल साथ मेरे

मुझको विश्व-सुन्दरी बनना है।

दे देना दो लाईक

और देना मुझको वोट

प्रथम आने का जुगाड़ करना है,

अब तो मुझको ही विश्व-सुन्दरी बनना है।

 

 

 

ज़िन्दगी के रास्ते

यह निर्विवाद सत्य है

कि ज़िन्दगी

बने-बनाये रास्तों पर नहीं चलती।

कितनी कोशिश करते हैं हम

जीवन में

सीधी राहों पर चलने की।

निश्चित करते हैं कुछ लक्ष्य

निर्धारित करते हैं राहें

पर परख नहीं पाते

जीवन की चालें

और अपनी चाहतें।

ज़िन्दगी

एक बहकी हुई

नदी-सी लगती है,

तटों से टकराती

कभी झूमती, कभी गाती।

राहें बदलती

नवीन राहें बनाती।

किन्तु

बार-बार बदलती हैं राहें

बार-बार बदलती हैं चाहतें

बस,

शायद यही अटूट सत्य है।

 

 

नदी के उस पार कच्चा रास्ता है

कच्ची राहों पर चलना

भूल रहे हैं हम,

धूप की गर्मी से

नहीं जूझ रहे हैं हम।

पैरों तले बिछते हैं 

मखमली कालीन,

छू न जाये कहीं

धरा का कोई अंश।

उड़ती मिट्टी पर

लगा दी हैं

कई बंदिशें,

सिर पर तान ली हैं,

बड़ी-बड़ी छतरियां

हवा, पानी, रोशनी से

बच कर निकलने लगे हैं हम।

पानी पर बांध लिए हैं

बड़े-बड़े बांध,

गुज़र जायेंगी गाड़ियां,

ज़रूरत पड़े तो

उड़ा लेंगे विमान,

 

पर याद नहीं रखते हम

कि ज़िन्दगी

जब उलट-पलट करती है,

एक साथ बिखरता है सब

टूटता है, चुभता है,

हवा,पानी, मिट्टी

सब एकमेक हो जाते हैं

तब समझ में आता है

यह ज़िन्दगी है एक बहाव

और नदी के उस पार

कच्चा रास्ता है।

बसन्त

आज बसन्त मुझे

कुछ उदास लगा

रंग बदलने लगे हैं।

बदलते रंगों की भी

एक सुगन्ध होती है

बदलते भावों के साथ

अन्तर्मन को

महका-महका जाती है।

 

 

भीड़ पर भीड़-तंत्र
एक लाठी के सहारे

चलते

छोटे कद के

एक आम आदमी ने

कभी बांध ली थी

सारी दुनिया

अपने पीछे

बिना पुकार के भी

उसके साथ

चले थे

लाखों -लाखों लोग

सम्मिलित थे

उसकी तपस्या में

निःस्वार्थ, निःशंक।

वह हमें दे गया

एक स्वर्णिम इतिहास।

 

आज वह न रहा

किन्तु

उसकी मूर्तियाँ

हैं  हमारे पास

लाखों-लाखों।

कुछ लोग भी हैं

उन मूर्तियों के साथ

किन्तु उसके

विचारों की भीड़

उससे छिटक कर

आज की भीड़ में

कहीं खो गई है।

दीवारों पर

अलंकृत पोस्टरों में

लटक रही है

पुस्तकों के भीतर कहीं

दब गई है।

आज

उस भीड़ पर

भीड़-तंत्र हावी हो गया है।

.

अरे हाँ !

आज उस मूर्ति पर

माल्यार्पण अवश्य करना।

 

हम श्मशान बनने लगते हैं

इंसान जब  मर जाता है,

शव कहलाता है।

जिंदा बहुत शोर करता था,

मरकर चुप हो जाता है।

किन्तु जब मर कर बोलता है,

तब प्रेत कहलाता है।

.

श्मशान में टूटती चुप्पी

बहुत भयंकर होती है।

प्रेतात्माएं होती हैं या नहीं,

मुझे नहीं पता,

किन्तु जब

जीवित और मृत

के सम्बन्ध टूटते हैं,

तब सन्नाटा भी टूटता है।

कुछ चीखें

दूर तक सुनाई देती हैं

और कुछ

भीतर ही भीतर घुटती हैं।

आग बाहर भी जलती है

और भीतर भी।

इंसान है, शव है या प्रेतात्मा,

नहीं समझ आता,

जब रात-आधी-रात

चीत्कार सुनाई देती है,

सूर्यास्त के बाद

लाशें धधकती हैं,

श्मशान से उठती लपटें,

शहरों को रौंद रही हैं,

सड़कों पर घूम रही हैं,

बेखौफ़।

हम सिलेंडर, दवाईयां,

बैड और अस्पताल का पता लिए,

उनके पीछे-पीछे घूम रहे हैं

और लौटकर पंहुच जाते हैं

फिर श्मशान घाट।

.

फिर चुपचाप

गणना करने लगते हैं, भावहीन,

आंकड़ों में उलझे,

श्मशान बनने लगते हैं।

 

सन्दर्भ तो बहुत थे

जीवन में

सन्दर्भ तो बहुत थे

बस उनको भावों से

जोड़ ही नहीं पाये।

कब, कहाँ, कौन-सा

सन्दर्भ छूट गया,

कौन-सा विफ़ल रहा,

समझ ही नहीं पाये।

ऐसा क्यों हुआ

कि प्रेम, मनुहार

अपनापन

विश्वास और आस भी

सन्दर्भ बनते चले गये

और हम जीवन-भर

न जाने कहाँ-कहाँ

उलझते-सुलझते रह गये।

 

अपनी आवाज़ अपने को सुनाती हूं मैं

मन के द्वार

खटखटाती हूं मैं।

अपनी आवाज़

अपने को सुनाती हूं मैं।

द्वार पर बैठी

अपने-आपसे

बतियाती हूं मैं।

इस एकान्त में

अपने अकेलपन को

सहलाती हूं मैं।

द्वार उन्मुक्त हों या बन्द,

कहानी कहां बदलती है जीवन की,

सहेजती हूं कुछ स्मृतियां रंगों में,

कुछ को रंग देती हूं,

आकार देती हूं,

सौन्दर्य और आभास देती हूं।

जीवन का, नवजीवन का

भास देती हूं।

 

कहते हैं कोई फ़ागुन आया

फ़ागुन आया, फ़ागुन आया, सुनते हैं, इधर कोई फ़ागुन आया
रंग-गुलाल, उमंग-रसरंग, ठिठोली-होली, सुनते हैं फ़ागुन लाया
उपवन खिले, मन-मनमीत मिले, ढोल बजे, कहीं साज सजे
आकुल-्याकुल मन को करता, कहते हैं, कोई फ़ागुन आया।

पार जरूर उतरना है

चल रे मन !

आज नैया की सैर कराउं !

पतवारों का क्या करना है।

खेवट को क्या रखना है।

बस अपने मन से तरना है।

डूबेंगें, उतरेंगे।

सीपी शंखों को ढूढेंगे।

मोती माणिक का क्या करना है।

उपर नीचे डोलेगी।

हिचकोले ले लेकर बोलेगी।

चल चल सागर के मध्य चलें।

लहरों संग संग तैर चलें।

पानी में छाया को छूलेंगे।

अपनी शक्लें ढूंढेंगे।

बस इतना ही तो करना है

पार जरूर उतरना है।

चल रे मन !

आज नैया की सैर कराउं !


यह अथाह शांत जलराशि

गगन की व्यापकता

ठहरी-ठहरी सी हवा,

निश्चल, निश्छल-सा समां

दूर कहीं घूमतीं

हल्की हल्की सी बदरिया।

तैरने लगती हूं, डूबने लगती हूं

फिर तरती हूं, दूर तक जाती हूं

फिर लौट लौट आती हूं।

इस सूनेपन में,  इक अपनापन है।

 

रेखाएं अनुभव की अनुभूत सत्‍य की

रेखाएं

कलम की, तूलिका की,

रचती हैं कुछ भाव, कोई चित्र।

किन्‍तु 

रेखाएं अनुभव की, अनुभूत सत्‍य की,

दिखती तो दरारों-सी हैं

लेकिन झांकती है

इनके भीतर से एक रोशनी

देती एक गहन जीवन-संदेश।

जिसे पाने के लिए, समझने के लिए

समर्पित करना पड़ता है

एक पूरा जीवन

या एक पूरा युग।

ऐसे हाथ जब आशीष में उठते हैं

तब भी

और जब अभिवादन में जुड़ते हैं

तब भी

नतमस्‍तक होता है मन।

चिन्ता में पड़ी हूँ मैं

सब्ज़ी वाला आया न, सुबह से द्वार खड़ी हूँ मैं

आते होंगे भोजन के लिए, चिन्ता में पड़ी हूँ मैं

स्कूटी मेरी पंक्चर खड़ी, मण्डी तक जाऊँ कैसे

काम में हाथ बंटाया करो कितनी बार लड़ी हूँ मैं

शायद यही जीवन है

इन राहों पर

खतरनाक अंधे मोड़

होते हैं

जो दिखते तो नहीं

बस अनुभव की बात होती है

कि आप जान जायें

पहचान जायें

इन अंधों मोड़ों को

नहीं जान पाते

नहीं देख पाते

नहीं समझ पाते

कि उस पार से आने वाला

जीवन लेकर आ रहा है

या मौत।

इधर ऊँचे खड़े पहाड़

कभी  छत्रछाया-से लगते हैं

और कभी दरकते-खिसकते

जीवन लीलते।

उधर गहरी खाईयां डराती हैं

मोड़ों पर।

.

फिर

बादलों के घेरे

बरसती बूंदें

अनुपम, अद्भुत,

अनुभूत सौन्दर्य में

उलझता है मन।

.

शायद यही जीवन है। 

 

हिन्दी की हम बात करें

शिक्षा से बाहर हुई, काम काज की भाषा नहीं, हम मानें या न मानें

हिन्दी की हम बात करें , बच्चे पढ़ते अंग्रेज़ी में, यह तो हम हैं जाने

विश्वगुरू बनने चले , अपने घर में मान नहीं है अपनी ही भाषा का

वैज्ञानिक भाषा को रोमन में लिखकर हम अपने को हिन्दीवाला मानें