टांके लगा नहीं रही हूं काट रही हूं

अपनी उलझनों को सिलते-सिलते

निहारती हूं अपना जीवन।

मिट्टी लिपा चूल्हा,

इस लोटे, गागर, थाली

गिलास-सा,

किसी पुरातन युग के

संग्रहालय की वस्तुएं हों मानों

हम सब।

और मैं वही पचास वर्ष पुरानी

आेढ़नी लिये,

बैठी रहती हूं

तुम्हारे आदेश की प्रतीक्षा में।

कभी भी आ सकते हो तुम।

चांद से उतरते हुए,

देश-विदेश घूमकर लौटे,

पंचतारा सुविधाएं भोगकर,

अपने सुशिक्षित,

देशी-विदेशी मित्रों के साथ।

मेरे माध्यम से

भारतीय संस्कृति-परम्पराओं का प्रदर्शन करने।

कैसा होता था हमारा देश।

कैसे रहते थे हम लोग,

किसी प्राचीन युग में।

कैसे हमारे देश की नारी

आज भी निभा रही है वही परम्परा,

सिर पर आेढ़नी लिये।

सिलती है अपने भीतर के टांके

जो दिखते नहीं किसी को।

 

लेकिन, ध्यान से देखो ज़रा।

आज टांके लगा नहीं रही हूं,

काट रही हूं।