सपने

अजीब सी होती हैं

ये रातें भी।

कभी जागते बीतती हैं

तो कभी सोते।

कभी सपने आते हैं

तो कभी

सपने डराकर

जगा जाते हैं।

कहते हैं

सिरहाने पानी ढककर

रख दें

तो बुरे सपने नहीं आते।

पर सपनों को

पानी नहीं दिखता।

उन्हें

आना है

तो ही जाते हैं।

कभी सोते-सोते

जगा जाते हैं

कभी पूरी-पूरी रात जगाकर

प्रात होते ही

सुला जाते हैं।

 

एक और अलग-सी बात

दिन हो या रात

अंधेरे में आंखें

बन्द हो ही जाती हैं।

और मुश्किल यह

कि जो देखना होता है

फिर भी देख ही लिया जाता है

क्योंकि

देखते तो हम

मन की आंखों से हैं

अंधेरे और रोशनी

दिन और रात को इससे क्या।