ये चिड़िया क्या स्कूल नहीं जाती

मां मुझको बतलाना

ये चिड़िया

क्या स्कूल नहीं जाती ?

सारा दिन  बैठी&बैठी,

दाना खाती, पानी पीती,

चीं-चीं करती शोर मचाती।

क्या इसकी टीचर

इसको नहीं डराती।

इसकी मम्मी कहां जाती ,

होमवर्क नहीं करवाती।

सारा दिन गाना गाती,

जब देखो तब उड़ती फिरती।

कब पढ़ती है,

कब लिखती है,

कब करती है पाठ याद

इसको क्यों नहीं कुछ भी कहती।

 

साथ समय के चलना होगा

तुमको क्यों ईर्ष्या होती है मैंने भी आई-फोन लिया है
साथ समय के चलना होगा इतना मैंने समझ लिया है।
चिट्ठियां-विट्ठियां पीछे छूटीं, इतना ज्ञान मिला है मुझको,
-मेल, फेसबुक, ट्विटर सब कुछ मैंने खोल लिया है।

छोड़ दो अब मुफ्त की बात

क्या तुम्हारी शिक्षा

क्या आयु

कितनी आय

कौन-सी नौकरी

कौन-सा आरक्षण

और इस सबका क्या आधार ?

अनुत्तरित हैं सब प्रश्न।

यह कौन सी आग है

जो अपने-आप को ही जला रही है।

कैसे भूल सकते हैं हम

तिनका-तिनका जोड़कर

बनता है एक घरौंदा।

शताब्दियों से लूटे जाते रहे हम

आततायियों से।

जाने कहां से आते थे

और देश लूटकर चले जाते थे,

अपनों से ही युद्धों में

झोंक दिये जाते थे हम।

कैसे निकले उस सबसे बाहर

फिर शताब्दियां लग गईं,

कैसे भूल सकते हैं हम।

और आज !

अपना ही परिश्रम,

अपनी ही सम्पत्ति

अपना ही घर फूंक रहे हैं हम।

अपने ही भीतर

आततायियों को पाल रहे हैं हम।

किसके झांसे में आ गये हैं हम।

न शिक्षा चाहिए

न विकास, न उद्यम।

खैरात में मिले, नाम बाप के मिले

एक नौकरी सरकारी

धन मिले, घर मिले,

अपना घर फूंककर मिले,

मरे की मिले

या जिंदा दफ़न कर दें तो मिले

लाश पर मिले, श्मशान में मिले

कफ़न बेचकर मिले

बस मुफ्त की मिले

बस जो भी मिले, मुफ्त ही मिले

अपने-आपको परखना

कभी-कभी अच्छा लगता है,

अपने-आप से बतियाना,

अपने-आपको समझना-समझाना।

डांटना-फ़टकारना।

अपनी निगाहों से

अपने-आपको परखना।

अपने दिये गये उत्तर पर

प्रश्न तलाशना।

अपने आस-पास घूम रहे

प्रश्नों के उत्तर तलाशना।

मुर्झाए पौधों में

कलियों को तलाशना।

बिखरे कांच में

जानबूझकर अंगुली घुमाना।

उफ़नते दूध को

गैस पर गिरते देखना।

और

धार-धार बहते पानी को

एक अंगुली से

रोकने की कोशिश करना।

पर मूर्ख बहुत था रावण

कहते हैं दुराचारी था, अहंकारी था, पर मूर्ख बहुत था रावण

बहन के मान के लिए उसने दांव पर लगाया था सिंहासन

जानता था जीत नहीं पाउंगा, पर बहन का मान रखना था उसे

अपने ही कपटी थे, जानकर भी,  दांव पर लगाया था सिंहासन

तूफान (मन के अंदर और बाहर) एक बोध कथा

तूफ़ान कभी अकेले नहीं आते। आंधी-तूफ़ान संयुक्त शब्द ही अपने-आप में पूर्ण अभिव्यक्ति माना जाता है। वैसे बात तो एक ही है। आंधी हो या तूफ़ान, बाहर हो अथवा अन्तर्मन में, बहुत कुछ उजाड़ जाता है, जो कभी दिखता है कभी नहीं। अभी कुछ दिन पूर्व ताउते एवं यास तूफ़ान ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया।  हम दूर बैठे केवल बात ही कर सकते हैं। जिनके घर उजड़ गये, व्यवसाय डूब गये, उन पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन तूफ़ानों का प्रभाव रह जाता है। ये बाहरी तूफ़ान कितने गहरे तक प्रभावित करते हैं मन को, जीवन-शैली को, सामाजिक-पारिवारिक रहन-सहन को, शब्दों में समझाया नहीं जा सकता।

कोरोना भी तो किसी तूफ़ान से कम नहीं। हां, इसकी गति मन  और प्रकृति के तूफ़ान से अलग है। दिखता नहीं किन्तु उजाड़ रहा है। एक के बाद एक लहर, सम्हलने का समय ही नहीं मिल रहा। पूरे-पूरे परिवार, नौकरियां, व्यवसाय इस तूफ़ान ने लील लिए, और कोई आवाज़ तक नहीं हुई। किस राह से किस घर में और किस देह में प्रवेश कर जायेगा, कोई नहीं जानता।  किस दरार से, किस द्वार से हमारे घर के भीतर प्रवेश कर गई पता ही नहीं लगा। पांचों सदस्य एक साथ प्रभावित हुए। एक माह बाद भी अभी सम्हल नहीं पाये। कोविड उपरान्त अनेक समस्याएं हो रही हैं और हो सकती हैं।  यह और भी भयंकर इसलिए कि अपनों की अपनों से पहचान ही मिटा रहा है। पड़ोसियों ने हमारे घर की ओर देखना बन्द कर दिया, मानों कहीं हवा से उनके घर में प्रवेश न कर जाये। हम बीस दिन घर में पूरी तरह बन्द रहे। कोई किसी की सहायता नहीं कर सकता अथवा करता, एक अव्यक्त भय ने घेर लिया है।

पिछले लगभग एक महीने में यहां पंचकूला में तीन-चार बार भयंकर तूफ़ान आया। हमारे दो सुन्दर फूलों के गमले गिर कर टूट गये। कोई दिन नहीं जाता जब मैं उन गमलों और फूलों को याद नहीं करती। फिर सोचती हूं, मैं दो गमलों के लिए इतनी परेशान हूं, जिनका पूरा जीवन ही उजड़ गया इन तूफ़ानों में, उनका क्या हाल हुआ होगा।

शायद मैं अपनी अभिव्यक्ति में उलझ रही हूं। एक ओर प्राकृतिक तूफ़ान की बात है और दूसरी ओर मन के अथवा आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक स्तर पर आने वाले तूफ़ानों की।

एक विचारों का, चिन्तन का झंझावात ऐसा भी होता है जो शब्दरहित होता है, न उसकी अभिव्यक्ति होती है, न अभिप्राय, न अर्थ। जिसके भीतर उमड़ता है बस वही जानता है।

एक बोध कथा है कि तूफ़ान आने पर घास ने विशाल वृक्षों से कहा कि झुक जाओ, नहीं तो नष्ट हो जाओगे। वृक्ष नहीं मानें और आकाश की ओर सिर उठाये खड़़े रहे। तूफ़ान बीत जाने के बाद वृक्ष धराशायी थे किन्तु झुकी हुई घास मुस्कुरा रही थी। किन्तु कथा का दूसरा पक्ष जो बोध कथा में कभी पढ़ाया ही नहीं गया, वह यह कि झुकी हुई घास सदैव पैरों तले रौंदी जाती रही और वृ़क्ष अपनी जड़ों से फिर उठ खड़े हुए आकाश की ओर।

किन्तु यह तो बोध कथाएं हैं। वास्तविक जीवन में ऐसा कहां होता है। जब तूफ़ान आते हैं तो निर्बल को पहले दबोचते हैं। किन्तु उसकी चर्चा नहीं होती। चर्चा होती है शेयर बाज़ार में तूफ़ान। राजनीति में तूफ़ान। जब हम समाचार सुनना चाहते हैं और तरह-तरह के तूफ़ानो से चिन्तित वास्तविकता जानना चाहते हैं तब वहां उन तूफ़ानों पर चर्चा चल रही होती है जो आये ही नहीं। और हम घंटों मूर्ख बने उसे ही सुनने लग जाते हैं, वास्तविकता से बहुत दूर उन्हें ही सत्य मान बैठते हैं।

  

गूगल गुरू घंटाल

 

कम्प्यूटर जी गुरू हो गये, गूगल गुरू घंटाल

छात्र हो गये हाई टैक, गुरू बैठै हाल-बेहाल

नमन करें या क्लिक करें, समझ से बाहर बात

स्मार्ट बोर्ड, टैबलैट,पी सी, ई पुस्तक में उलझे

अपना ज्ञान भूलकर, घूम रहे, ले कंधे बेताल

आॅन-लाईन शिक्षा बनी यहाँ जी का जंजाल

लैपटाॅप खरीदे नये-नये, मोबाईल एंड््रायड्

गूगल बिन ज्ञान अधूरा यह ले अब तू जान

गुरुओं ने लिंक दिये, नैट ने ले लिए प्राण

रोज़-रोज़ चार्ज कराओ, बिल ने ले ली जान

 

यादें बिखर जाती हैं

पन्ने खुल जाते हैं

शब्द मिट जाते हैं

फूल झर जाते हैं

सुगंध उड़ जाती है

यादें बिखर जाती हैं

लुटे भाव रह जाते हैं

जब चाहिए वरदान तब शीश नवाएं

जब-जब चाहिए वरदान तब तब करते पूजा का विधान

दुर्गा, चण्डी, गौरी सबके आगे शीश नवाएं करते सम्मान

पर्व बीते, भूले अब सब, उठ गई चौकी, चल अब चौके में

तुलसी जी कह गये,नारी ताड़न की अधिकारी यह ले मान।।

शक्ल हमारी अच्छी है

शक्ल हमारी अच्छी है, बस अपनी नज़र बदल लो तुम।

अक्ल हमारी अच्छी है, बस अपनी समझ बदल लो तुम।

जानते हो, पर न जाने क्यों न मानते हो, हम अच्छे हैं,

मित्रता हमारी अच्छी है, बस अपनी अकड़ बदल लो तुम।

 

घाट-घाट का पानी

शहर में

चूहे बिल्लियों को सुला रहे हैं

कानों में लोरी सुना रहे हैं।

उधर जंगल में गीदड़ दहाड़ रहे हैं।

शेर-चीते पिंजरों में बन्द

हमारा मन बहला रहे हैं।

पढ़ाते थे हमें

शेर-बकरी

कभी एक घाट पानी नहीं पीते,

पर आज

एक ही मंच पर

सब अपनी-अपनी बीन बजा रहे हैं।

यह भी पता नहीं लगता

कब कौन सो जायेगा]

और कौन लोरी सुनाएगा।

अब जहां देखो

दोस्ती के नाम पर

नये -नये नज़ारे दिखा रहे हैं।

कल तक जो खोदते थे कुंए

आज साथ--साथ

घाट-घाट का

पानी पीते नज़र आ रहे हैं।

बच कर चलना ऐसी मित्रता से

इधर बातों ही बातों में

हमारे भी कान काटे जा रहे हैं।

 

प्रकृति का सौन्दर्य

फूलों पर मंडराती तितली को मदमाते देखा

भंवरे को फूलों से गुपचुप पराग चुराते देखा

सूरज की गुनगुनी धूप, चंदा से चांदनी आई

हमने गिरगिट को कभी न रंग बदलते देखा

 

एहसास

किसी के भूलने के

एहसास की वह तीखी गंध,

उतरती चली जाती है,

गहरी, कहीं,अंदर ही अंदर,

और कचोटता रहता है मन,

कि वह भूल

सचमुच ही एक भूल थी,

या केवल एक अदा।

फिर

उस एक एहसास के साथ

जुड़ जाती हैं,

न जाने, कितनी

पुरानी यादें भी,

जो सभी मिलकर,

मन-मस्तिष्क पर ,

बुन जाती हैं,

नासमझी का

एक मोटा ताना-बाना,

जो गलत और ठीक को

समझने नहीं देता।

ये सब एहसास मिलकर

मन पर,

उदासी का,

एक पर्दा डाल जाते हैं,

जो आक्रोश, झुंझलाहट

और निरुत्साह की हवा लगते ही

नम हो उठता है ,

और यह नमी,

न चाहते हुए भी

आंखों में उतर आती है।

न जाने क्या है ये सब,

पर लोग, अक्सर इसे

भावुकता का नाम दे जाते हैं।

 

 

 

 

आज का रावण

 

हमारे शास्त्रों में, ग्रंथों में जो कथाएं सिद्ध हैं, आम जन तक पहुंचते-पहुंचते बहुत बदल जाती हैं। सत्य-असत्य से अलग हो जाती हैं। हमारी अधिकांश कथाओं के आधार और परिणाम वरदान और श्राप पर आधारित हैं।

प्राचीन ग्रंथों एवं रामायण में वर्णित कथानक के अनुसार रावण एक परम शिव भक्त, उद्भट राजनीतिज्ञ, महापराक्रमी योद्धा, अत्यन्त बलशाली, शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता, प्रकाण्ड विद्वान पंडित एवं महाज्ञानी था। रावण के शासन काल में लंका का वैभव अपने चरम पर था इसलिये उसकी लंकानगरी को सोने की लंका कहा जाता है।

हिन्दू ज्योतिषशास्त्र में रावण संहिता को एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक माना जाता है और इसकी रचना रावण ने की थी।

   रावण ने राम के लिए उस पुल के लिए यज्ञ किया, जिसे पारकर राम की सेना लंका पहुंच सकती थी, यह जानते हुए भी रावण ने राम के निमन्त्रण को स्वीकार किया और अपना कर्म किया।

 

 रावण अपने समय का सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है और रामायण के अनुसार जब रावण मृत्यु शय्या पर था तब राम ने लक्ष्मण को रावण से शिक्षा ग्रहण करने का आदेश दिया था और रावण ने यहां भी अपना कर्म किया था।

   निःसंदेह हमारी धार्मिकता, आस्था, विश्वास, चरित्र आदि विविध गुणों के कारण राम का चरित्र सर्वोपरि है। रावण रामायण का एक केंद्रीय प्रतिचरित्र है। रावण लंका का राजा था। रामकथा में रावण ऐसा पात्र है, जो राम के उज्ज्वल चरित्र को उभारने का काम करता है।

रावण राक्षस कुल का था, अतः उसकी वृत्ति भी राक्षसी ही थी। यही स्थिति शूर्पनखा की भी थी। उसने प्रेम निवेदन किया, विवाह-प्रस्ताव किया जिसे   राम एवं लक्ष्मण ने अस्वीकार किया। इस अस्वीकार का कारण सीता को मानते हुए शूर्पनखा ने सीता को हानि पहुंचाने का प्रयास किया, इस कारण लक्ष्मण ने शूर्पनखा को आहत किया, उसकी नाक काट दी।

रावण ने घटना को जानकर अपनी बहन का प्रतिशोध लेने के लिए सीता का अपहरण किया, किन्तु उसे किसी भी तरह की कोई हानि नहीं पहुंचाई। रावण अपनी पराजय भी जानता था किन्तु फिर भी उसने बहन के सम्मान के लिए अपने हठ को नहीं छोड़ा।

   समय के साथ एवं साहित्येतिहास में कुछ प्रतीक रूढ़ हो जाते हैं, और फिर वे ही उसकी अर्थाभिव्यक्ति बन कर रह जाते हैं। बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में यह कथा रूढ़ हुई और रावण के गुणों पर उसका  कृत्य हावी हुआ। किसी भी समाज के उत्थान के लिए इससे अच्छी बात कोई नहीं कि अच्छाई का प्रचार हो, हमारे भीतर उसका समावेश हो, और हम उस परम्परा को आगे बढ़ाएं। राम-कथा हमें यही सिखाती है। किन्तु गुण-अवगुण दोनों में एक संतुलन बना रहे, यह हमारा कर्तव्य है।

बात करते हैं आज के रावण की।

आज के दुराचारियों अथवा कहें दुष्कर्मियों को रावण कह कर सम्बोधित किया जा रहा है। वर्तमान समाज के अपराधियों को, महिलाओं पर अत्याचार करने वाले युवकों को रावण कहने का औचित्य। क्या सत्य में ही दोनों के अपराध समान हैं । यदि अपराध समान हैं तो परिणाम क्यों नहीं समान हैं?

किन्तु आज कहां है रावण ?

आज रावण नहीं है। यदि रावण है तो राम भी होने चाहिए। किन्तु राम भी तो नहीं है।

 

आज वे उच्छृंखल युवक हैं जो निडर भाव से अपराधों में लिप्त हैं। वे जानते हैं वे अपने हर अपकृत्य से बच निकलेंगे। समाज एवं परम्पराओं के भय से पीड़ित अपनी व्यथा प्रकट नहीं करेगा, और यदि कर भी देगा तब भी परिवार से तो संरक्षण मिलेगा ही, अपने दांव-पेंच से कानून से भी बच निकलेंगे।

रावण शब्द का प्रयोग बुराई के प्रतीक के रूप में किया जाता है। उस युग में तो राम थे, रावण रूपी बुराई का अन्त करने के लिए। आज हम उस रावण का पुतला जलाने के लिए तो तैयार बैठे रहते हैं वर्ष भर। आज हमने बुराई का प्रतीक रावण तो बना लिया किन्तु उसके समापन के लिए राम कौन-कौन बनेगा?

 

   यदि हम रावण शब्द का प्रयोग बुराई के प्रतीक के रूप में करते हैं तो इस बुराई को दूर करने के उपाय अथवा साधन भी सोचने चाहिए। बेरोजगारी, अशिक्षा, पिछड़ापन, रूढ़ियों के रावण विशाल हैं। लड़कियों में डर का रावण और युवकों में छूट का रावण हावी है।

जिस दिन हम इससे विपरीत मानसिकता का विकास करने में सफल हो गये, उस दिन हम रावण की बात करना छोड़ देंगे। अर्थात् किसी के भी मन में अपराध का इतना बड़ा डर हो कि वह इस राह पर कदम ही न बढ़ा पाये और जिसके प्रति अपराध होते हैं वे इतने निडर हों कि अपराधी वृत्ति का व्यक्ति आंख उठाकर देख भी न पाये।

यदि फिर भी अपराध हों,  तो हम जिस प्रकार आज राम को स्मरण कर अच्छाई की बात करते हैं, वैसे ही सत्य का समर्थन करने का साहस करें और जैसे आज रावण को एक दुराचारी के रूप में स्मरण करते हैं वैसे ही अपराधी के प्रति व्यवहार करें, तब सम्भव है कोई परिवर्तन दिखाई दे, और आज का रावण लुप्त हो।

 

मैं भी तो

यहां

हर आदमी की ज़ुबान

एक धारदार छुरी है

जब चाहे, जहां चाहे,

छीलने लगती है

कभी कुरेदने तो कभी काटने।

देखने में तुम्हें लगेगी

एकदम अपनी सी।

विनम्र, झुकती, लचीली

तुम्हारे पक्ष में।

लेकिन तुम देर से समझ पाते हो

कि सांप की गति भी

कुछ इसी तरह की होती है।

उसकी फुंकार भी

आकर्षित करती है तुम्हें

किसी मौके पर।

उसका रंग रूप, उसका नृत्य _

बीन की धुन पर उसका झूमना

तुम्हें मोहने लगता है।

तुम उसे दूध पिलाने लगते हो

तो कभी देवता समझ कर

उसकी पूजा करते हो।

यह जानते हुए भी

कि मौका मिलते ही

वह तुम्हें काट डालेगा।

और  तुम भी

सांप पाल लेते हो

अपनी पिटारी में।

रंगों की दुनिया बड़ी निराली है

सुनते हैं इन्द्रधनुष के सप्त रंगों में श्वेताभा रहती है,

कैसे कह दूं इन रंगीनियों के पीछे कोई आस रहती हैं

रंगों की दुनिया बड़ी निराली है कौन कहां समझ पाया,

रंगों क भी भाव होते हैं, इतनी समझ हमें कहां आ पाती है।

कितना खोया है मैंने

डायरी लिखते समय
मुझसे
अक्सर 
बीचबीच में
एकाध पन्ना
कोरा छूट जाया करता है
और कभी शब्द टूट जाते हैं
बिखरे से, अधूरे।
पता नहीं
कितना खोया है मैंने
और कितना छुपाना चाहा है
अपनेआप से ही
अनकहाअनलिखा छोड़कर।

अबला- सबला की बातें अब छोड़ क्‍यों नहीं देते

शूर्पनखा, सती-सीता-सावित्री, देवी, भवानी की बातें अब हम छोड़ क्यों नहीं देते

कभी आरोप, कभी स्तुति, कभी उपहास, अपने भावों को नया मोड़ क्यों नहीं देते

बातें करते अधिकारों  की, मानों बेडि़यों में जकड़ी कोई जन्‍मों की अपराधी हो

त्‍याग, तपस्‍या , बलिदान समर्पण अबला- सबला की बातें अब छोड़ क्‍यों नहीं देते

तुम तो चांद से ही जलने लगीं

तुम्हें चांद क्या कह दिया मैंने, तुम तो चांद से ही जलने लगीं

सीढ़ियां तानकर गगन से चांद को उतारने की बात करने लगीं

अरे, चांद का तो हर रात आवागमन रहता है टिकता नहीं कभी

हमारे जीवन में बस पूर्णिमा है,इस बात को क्यों न समझने लगीं

सच बोलने की आदत है बुरी

सच बोलने की आदत है बुरी

इसीलिए

सभी लोग रहने लगे हैं किनारे

पीठ पर वार करना मुझे भाता नहीं

चुप रहना मुझे आता नहीं

भाती नहीं मुझे झूठी मिठास

मन मसोस कर मैं जीती नहीं

खरी-खरी कहने से मैं रूकती नहीं

इसीलिए

सभी लोग रहने लगे हैं किनारे

-

हालात क्‍या बदले,

वक्‍त ने क्‍या चोट दी,

सब लोग रहने लगे हैं किनारे

काश !

कोई तो हमारी डूबती कश्‍ती में

सवार होता संग हमारे

कहीं तो हम नाव खेते

किसी के सहारे।

-

किन्‍तु हालात यूं बदले

न पता लगा, कब टूटे किनारे

सब लोग जो बैठे थे किनारे

डूबते-उतरते वे अब ढूंढने लगे सहारे

तैर कर निकल आये हम तो किनारे

उसी कश्‍ती को थाम ,

अब वे भी ढूंढने में लगे हैं किनारे

 

जब तक चिल्लाओ  न, कोई सुनता नहीं

अब शांत रहने से यहां कुछ मिलता नहीं

जब तक चिल्लाओ  न, कोई सुनता नहीं

सब गूंगे-बहरे-अंधे अजनबी हो गये हैं यहां

दो की चार न सुनाओ जब तक, काम बनता नहीं

कच्चे धागों से हैं जीवन के रिश्ते

हर दिन रक्षा बन्धन का-सा हो जीवन में

हर पल सुरक्षा का एहसास हो जीवन में

कच्चे धागों से बंधे हैं जीवन के सब रिश्ते

इन धागों में विश्वास का एहसास हो जीवन में

 

तितली को तितली मिली

तितली को तितली मिली,

मुस्कुराहट खिली।

कुछ गीत गुनगुनाएं,

कुछ हंसे, कुछ मुस्कुराएं,

कहीं फूल खिले,

कहीं शाम हंसाए,

रोशनी की चमक,

रंगों की दमक,

हवाओं की लहक,

फूलों की महक,

मन को रिझाए।

सुन्दर है,

सुहानी है ज़िन्दगी।

बस यूं ही खुशनुमा

बितानी है ज़िन्दगी।