अजब-सी भटकन है

फ़िरकी की तरह

घूमती है ज़िन्दगी।

कभी इधर, कभी उधर।

दुनियादारी में उलझी

कभी सुलझी, कभी न सुलझी।

अपनी-सी न लगती

जैसे उधारी किसी की।

अजब-सी भटकन है

कामनाओं का पर्वत है

उम्र पूछती है नाम।

अक्सर मन करता है

चादर ले

सिर ढक और लम्बी तान।

किन्तु

उन सलवटों का क्या करुं

जिन्हें वर्षों से छुपाती आ रही हूँ,

उन धागों का क्या करुँ

जिन्हें दुनिया-भर में तानती आ रही हूँ।

.

यार ! छोड़ अब ये ढकोसले।

बस, अपनी छान।

चादर ले

सिर ढक और लम्बी तान।

 

सूरज को रोककर मैंने पूछा

सूरज को रोककर

मैंने पूछा

चलोगे मेरे साथ ?

-

हँस दिया सूरज

मैं तो चलता ही चलता हूँ।

तुम अपनी बोलो

चलोगे मेरे साथ ?

-

कभी रुका नहीं

कभी थका नहीं।

तुम अपनी बोलो

चलोगे मेरे साथ ?

-

दिन-रात घूमता हूँ

सबके हाल पूछता हूँ।

तुम अपनी बोलो

चलोगे मेरे साथ ?

-

रंगीनियों को सहेजता हूँ।

रंगों को बिखेरता हूँ।

तुम अपनी बोलो

चलोगे मेरे साथ ?

-

चँदा-तारे मेरे साथी

कौन तुम्हारे साथ ?

तुम अपनी बोलो

चलोगे मेरे साथ ?

-

बादल-वर्षा, आंधी-तूफ़ान

ग्रीष्म-शिशिर सब मेरे साथी।

तुम अपनी बोलो

चलोगे मेरे साथ ?

-

विस्तार गगन का

किसने नापा।

तुम अपनी बोलो

चलोगे मेरे साथ ?

 

 

 


 

सन्दर्भ तो बहुत थे

जीवन में

सन्दर्भ तो बहुत थे

बस उनको भावों से

जोड़ ही नहीं पाये।

कब, कहाँ, कौन-सा

सन्दर्भ छूट गया,

कौन-सा विफ़ल रहा,

समझ ही नहीं पाये।

ऐसा क्यों हुआ

कि प्रेम, मनुहार

अपनापन

विश्वास और आस भी

सन्दर्भ बनते चले गये

और हम जीवन-भर

न जाने कहाँ-कहाँ

उलझते-सुलझते रह गये।

 

झूला झुलाये जिन्‍दगी

कहीं झूला झुलाये जिन्‍दगी

कभी उपर तो कभी नीचे

लेकर आये जिन्‍दगी

रस्सियों पर झूलती

दूर से तो दिखती है

आनन्‍द देती जिन्‍दगी

बैठना कभी झूले पर

आकाश और  धरा

एक साथ दिखा देती है जिन्‍दगी

कभी हाथ छूटा, कभी तार टूटी

तो दिन में ही

तारे दिखा देती है जिन्‍दगी

सम्‍हलकर बैठना जरा

कभी-कभी सीधे

उपर भी ले जाती है जिन्‍दगी

 

 

दिल आजमाने में लगे हैं

अब गुब्बारों में दिल सजाने लगे हैं

उनकी कीमत हम लगाने लगे हैं

पांच-सात रूपये में ले जाईये मनचाहे

फुलाईये, फोड़िए

या यूं ही समय बिताने  में लगे हैं

मायूसे दिल की ओर तो कोई देखता ही नहीं

सोने चांदी के भाव अब लगाने लगे हैं

दिल कहां, दिलदार कहां अब

बातें करते बहुत

पर असल ज़िन्दगी में टांके लगाने लगे हैं

कुछ तुम दीजिए, कुछ हमसे लीजिए

पर फोड़ना इस दिल को

काटना इसे

असलियत निकल आयेगी

खून बहेगा, आस आहें भरेंगी

बस रोंआ-रोंआ बिखरेगा

सरकार ने प्लास्टिक बन्द कर दिया है

बस इतनी सी बात हम बताने में लगे हैं

समझ आया हो कुछ,  तो ठीक

नहीं तो हम

कहीं और दिल आजमाने में लगे हैं।

 

 

झूठ का ज़माना है

एक अर्थहीन रचना

सजन रे झूठ मत बोलो

कौन बोला, कौन बोला

-

सजन रे झूठ मत बोलो

कौन बोला, कौन बोला

-

झूठ का ज़माना है

सच को क्यों आजमाना है

इधर की उधर कर

उधर की इधर कर

बस ऐसे ही नाम कमाना है

सच में अड़ंगे हैं

इधर-उधर हो रहे दंगे हैं

झूठ से आवृत्त करो

मन की हरमन करो,

नैनों की है बात यहां

टिम-टिम देखो करते

यहां-वहां अटके

टेढ़े -टेढ़े भटके

किसी से नैन-मटक्के

कहीं देख न ले सजन

बिगड़ा ये ज़माना है

किसे –किसे बताना है

कैसे किसी को समझाना है

छोड़ो ये ढकोसले

क्‍यों किसी को आजमाना है

-

झूठ बोलो, झूठ बोलो

कौन बोला, कौन बोला

 

 

 

 

समझ लो  क्या होते हैं कुकुरमुत्ते

बस कहने की बात है

बस मुहावरा भर है

कि उगते हैं कुकुरमुत्ते-से।

चले गये वे दिन

जब यहां वहां

जहां-तहां

दिखाई देते थे कुकुरमुत्ते।

लेकिन

अब नहीं दिखाई देते

कुकुरमुत्ते

जंगली नहीं रह गये

अब कुकुरमुत्ते

कीमत हो गई है इनकी

बिकते और खरीदे जाते हैं

वातानुकूलित भवनों में उगते हैं

भाव रखते हैं

ताव रखते हैं

किसी की ज़िन्दगी जीने का

हिसाब रखते हैं

घर-घर  होते हैं कुकुरमुत्ते।

कहने को हैं

सब्जी-भर

समझ सको तो

समझ लो

अब क्या होते हैं कुकुरमुत्ते।

अपना मान करना सीख

आधुनिकता के द्वार पर खड़ी नारी

कहने को आकाश छू रही है

पाताल नाप रही है

पुरुषों के साथ

कंधे से कंधा मिलाकर

चलने की शान मार रही है

घर-बाहर दोनों मोर्चों पर

जीतती नज़र आ रही है।

अपने अधिकारों की बात करती

कहीं भी कमतर

नज़र न आ रही है।

किन्तु यहां

क्यों मौन साध रही है?

न मोम की गुड़िया है,

न लाचार, अपंग।

फिर क्यों इस मोर्चे पर

हर बार

पराजित-सी हार रही है।

.

पाखण्डों और परम्पराओं में

भेद करना सीख।

अपने हित में

अपने लिए बात करना सीख।

रूढ़ियों और रीतियों में

पहचान करना सीख।

अपनी कोमल-कान्त छवि से

बाहर निकल

गलत-सही में भेद करना सीख।

आवाज़ उठा

अपने लिए निर्णय लेना सीख।

सिर उठा,

आंख तरेर, आंख दिखा

आंख से आंख मिला

न डर।

तर्क कर, वितर्क कर

दो की चार कर

अपनी राहें आप नाप

हो निडर।

अपने कंधे पर अपना हाथ रख

अपने हाथ में अपना हाथ ले

न डर

सब बदल गये, सब बदल गया

तू भी बदल

अपना मान करना सीख

अपना मान रखना सीख।

 

कर्म कर और फल की चिन्ता कर

कहते हैं,

कहते क्या हैं

सुना है मैंने,

न-न

पता नहीं

कितनी पुस्तकों में

पढ़ा और गुना है मैंने।

बहुत समय पहले

कोई आये थे

और कह गये

कर्म किये जा

फल की चिन्ता मत कर।

पता नहीं

उन्होंने ऐसा क्यों कहा

मैं आज तक

समझ नहीं पाई।

अब आम का पेड़ बोयेंगे

तो आम तो देखने पड़ेंगे।

वैसे भी

किसी और ने भी तो कहा है

कि बोया पेड़ बबूल का

तो आम कहां से पाये।

 

सब बस कहने की ही बाते हैं

 

जो फल की चिन्ता नहीं करते

वे कर्म की भी चिन्ता नहीं करते

 

ज़माना बदल गया है

युग नया है

मुफ्तखोरी की आदत न डाल

कर्म कर और फल

के लिए खाद-पानी डाल

पेड़ पर चढ़

पर डाल न काट।

उपर बैठकर न देख

जमीनी सच्चाईओं पर उतर

कर्म कर पर फल न पाकर

हार न मान।

बस कर्म कर और

फल की चिन्ता कर।

 

मेरी समझ कुछ नहीं आता

मां,

मास्टर जी कहते हैं

धरती गोल घूमती।

चंदा-तारे सब घूमते

सूरज कैसे आता-जाता

बहुत कुछ बतलाते।

मेरी समझ नहीं कुछ आता

फिर हम क्यों नहीं गिरते।

पेड़-पौधे खड़े-खड़े

हम पर क्यों नहीं गिरते।

चंदा लटका आसमान में

कभी दिखता

कभी खो जाता।

कैसे कहां चला जाता है

पता नहीं क्या-क्या समझाते।

इतने सारे तारे

घूम-घूमकर

मेरे बस्ते में क्यों नहीं आ जाते।

कभी सूरज दिखता

कभी चंदा

कभी दोनों कहीं खो जाते।

मेरी समझ कुछ नहीं आता

मास्टर जी

न जाने क्या-क्या बतलाते।

 

सलाह की कोई कीमत नहीं होती

मेरे पिता कहा करते थे

सलाह की

कोई कीमत नहीं होती

लेकिन इसका यह मतलब नहीं

कि यूं ही मुफ़्त में बांटते फ़िरो।

कभी-कभी मुफ़्त में

दी गई सलाह की

बड़ी कीमत

हाथ-पैरों, हड्डियों को

चुकानी पड़ती है,

ध्यान रहे।

.

और मेरे पिता

यह भी कहा करते थे

कि सलाह की

कोई कीमत नहीं होती

जो दे,

बस चुपचाप ले लिया करो,

और जोड़ते रहो

मन की तिजोरी में।

बिना कीमत की सलाह

कभी-कभी

बड़ी कीमती होती है।

लेकिन

यह भी कहा करते थे

कि जब तक

मिली सलाह की

कीमत समझ आती है

उसकी

एक्सपायरी डेट

निकल चुकी होती है।

-

और हंस देते थे

इसे मेरी

कीमती सलाह समझना।

 

 

उड़ती चिड़िया के पर न गिनूं मैं

आप अब तक मेरी कविताएँ पढ़कर जान ही चुके होंगे कि मेरी विपरीत बुद्धि है। एक चित्र आया कावय रचना के लिए। आपको इस चित्र में किसके दर्शन हुए? मेरे सभी मित्रों को, किसी को विरहिणी नायिका दिखी, किसी को राधा, किसी को मीरा, किसी को बाट जोहती प्रेमिका आदि-आदि-इत्यादि। किन्तु मुझे जैसा यह चित्र प्रतीत हुआ, रचना आपके सामने है।

************-******************

फ़ोटू हो गई हो

मेरे सैयां

तो ये ताम-झाम हटवा दे।

इक कुर्सी-मेज़ ला दे।

उड़ती चिड़िया के पर न गिनूं मैं

फ़्रिज से

थोड़ा शीतल जल पिलवा दे।

कब तक नुमाईश करेगा मेरी,

आप आधुनिक बन बैठा है

मुझको भी नयी ड्रैस सिलवा दे।

अब खाना-वाना

न बनता मुझसे

स्वीगी से मंगवा दे।

 

 

नेह के मोती

अपने मन से,

अपने भाव से,

अपने वचनों से,

मज़बूत बांधी थी डोरी,

पिरोये थे

नेह के मोती,

रिश्तों की आस,

भावों का सागर,

अथाह विश्वास।

-

किन्तु

समय की धार

बहुत तीखी होती है।

-

अकेले

मेरे हाथ में नहीं थी

यह डोर।

हाथों-हाथ

घिसती रही

रगड़ खाती रही

गांठें पड़ती रहीं

और बिखरते रहे मोती।

और जब माला टूटती है

मोती बिखरते हैं

तो कुछ मोती तो

खो ही जाते हैं

कितना भी सम्हाल लें

बस यादें रह जाती हैं।

 

 

 

मेरे मित्र

उपर वाला

बहुत रिश्ते बांधकर देता है

लेकिन कहता है

कुछ तो अपने लिए

आप भी मेहनत कर

इसलिए जिन्दगी में

दोस्त आप ही ढूंढने पड़ते हैं

लेकिन कभी-कभी उपरवाला भी

दया दिखाता है

और एक अच्छा दोस्त झोली में

डालकर चला जाता है

लेकिन उसे समझना

और पहचानना आप ही पड़ता है।

.

कब क्या कह बैठती हूं

और क्या कहना चाहती हूं

अपने-आप ही समझ नहीं पाती

शब्द खिसकते है

कुछ अर्थ बनते हैं

भाव संवरते हैं

और कभी-कभी लापरवाही

अर्थ को अनर्थ बना देती है

.

सब कहते हैं मुझे

कम बोला कर, कम बोला कर

.

पर न जाने कितने दिन रह गये हैं

जीवन के बोलने के लिए

.

मन करता है

जी भर कर बोलूं

बस बोलती रहूं,  बस बोलती रहूं

.

लेकिन ज्यादा बोलने की आदत

बहुत बार कुछ का कुछ

कहला देती है

जो मेरा अभिप्राय नहीं होता

लेकिन

जब मैं आप ही नहीं समझ पाती

तो किसी और को

कैसे समझा सकती हूं

.

किन्तु सोचती हूं

मेरे मित्र

मेरे भाव को समझेंगे

.

हास-परिहास को समझेंगे

न कि

शब्दों का बुरा मानेंगे

उलझन को सुलझा देंगे

कान खींचोंगे मेरे

आंख तरेरेंगे

न कोई

लकीर बनने दोगे अनबन की।

.

कई बार यूं ही

खिंची लकीर भी

गहरी होती चली जाती है

फिर दरार बनती है

उस पर दीवार चिनती है

इतना होने से पहले ही

सुलझा लेने चाहिए

बेमतलब मामले

तुम मेरे कान खींचो

और मै तुम्हारे

 

 

 

शब्द नहीं, भाव चाहिए

शब्द नहीं, भाव चाहिए
अपनों को अपनों से
प्यार चाहिए
उंची वाणी चाहे बोलिए
पर मन में एक संताप चाहिए
क्रोध कीजिए, नाराज़गी जताईये
पर मन में भरपूर विश्वास चाहिए
कौन किसका, कब कहां
दिखाने की नहीं
जताने की नहीं
समय आने पर 
अपनाने की बात है। 
न मांगने से मिलेगा
न चाहने से मिलेगा,
सच्चे मन से 
भावों का आदान-प्रदान चाहिए
आदर-सत्कार तो कहने की बात है
शब्द नहीं, भाव चाहिए,
अपने-पराये का भेद भूलकर 
बस एक भाव चाहिए। 

 

मेहनत की ज़िन्दगी है

प्रेम का प्रतीक है

हाथ में मेरे

न देख मेरा चेहरा

न पूछ मेरी आस।

भीख नहीं मांगती

दया नहीं मांगती

मेहनत की ज़िन्दगी है

छोटी है तो क्या

मुझ पर न दया दिखा।

मुझसे ज्यादा जानते हो तुम

जीवन के भाव को।

न कर बात यूं ही

इधर-उधर की

लेना हो तो ले

मंदिर में चढ़ा

किसी के बालों में लगा

कल को मसलकर

सड़कों पर गिरा

मुझको क्या

लेना हो तो ले

नहीं तो आगे बढ़ 

 

घाट-घाट का पानी

शहर में

चूहे बिल्लियों को सुला रहे हैं

कानों में लोरी सुना रहे हैं।

उधर जंगल में गीदड़ दहाड़ रहे हैं।

शेर-चीते पिंजरों में बन्द

हमारा मन बहला रहे हैं।

पढ़ाते थे हमें

शेर-बकरी

कभी एक घाट पानी नहीं पीते,

पर आज

एक ही मंच पर

सब अपनी-अपनी बीन बजा रहे हैं।

यह भी पता नहीं लगता

कब कौन सो जायेगा]

और कौन लोरी सुनाएगा।

अब जहां देखो

दोस्ती के नाम पर

नये -नये नज़ारे दिखा रहे हैं।

कल तक जो खोदते थे कुंए

आज साथ--साथ

घाट-घाट का

पानी पीते नज़र आ रहे हैं।

बच कर चलना ऐसी मित्रता से

इधर बातों ही बातों में

हमारे भी कान काटे जा रहे हैं।

 

सुविधानुसार रीतियों का पालन कर रहे हैं

पढ़ा है ग्रंथों में मैंने

कृष्ण ने

गोकुलवासियों की रक्षा के लिए

अतिवृष्टि से उनकी सुरक्षा के लिए

गोवर्धन को

एक अंगुली पर उठाकर

प्रलय से बचाया था।

किसे, क्यों हराया था,

नहीं सोचेंगे हम।

विचारणीय यह

कि गोवर्धन-पूजा

प्रतीक थी

प्रकृति की सुरक्षा की,

अन्न-जल-प्राणी के महत्व की,

पर्यावरण की रक्षा की।

.

आज पर्वत दरक रहे हैं,

चिन्ता नहीं करते हम।

लेकिन

गोबर के पर्वत को

56 अन्नकूट का भोग लगाकर

प्रसन्न कर रहे हैं।

पशु-पक्षी भूख से मर रहे हैं।

अति-वृष्टि, अल्प-वृष्टि रुकती नहीं।

नदियां प्रदूषण का भंडार बन रही हैं।

संरक्षण नहीं कर पाते हम

बस सुविधानुसार

रीतियों का पालन कर रहे हैं।

 

 

शायद यही जीवन है

इन राहों पर

खतरनाक अंधे मोड़

होते हैं

जो दिखते तो नहीं

बस अनुभव की बात होती है

कि आप जान जायें

पहचान जायें

इन अंधों मोड़ों को

नहीं जान पाते

नहीं देख पाते

नहीं समझ पाते

कि उस पार से आने वाला

जीवन लेकर आ रहा है

या मौत।

इधर ऊँचे खड़े पहाड़

कभी  छत्रछाया-से लगते हैं

और कभी दरकते-खिसकते

जीवन लीलते।

उधर गहरी खाईयां डराती हैं

मोड़ों पर।

.

फिर

बादलों के घेरे

बरसती बूंदें

अनुपम, अद्भुत,

अनुभूत सौन्दर्य में

उलझता है मन।

.

शायद यही जीवन है। 

 

कुछ अच्छा लिखने की चाह

कुछ अच्छा लिखने की चाह में

हर बार कलम उठाती हूं

किन्तु आज तक नहीं समझ पाई

शब्द कैसे बदल जाते हैं

किन आकारों में ढल जाते हैं

प्रेम लिखती हूं

हादसे बन जाते हैं।

मानवता लिखती हूँ

मौत दिखती है।

काली स्याही लाल रंग में

बदल जाती है।

.

कलम को शब्द देती हूँ

भाईचारा, देशप्रेम,

साम्प्रदायिक सौहार्द

न जाने कैसे बन्दूकों, गनों

तोपों के चित्र बन जाते हैं।

-

कलम को समझाती हूं

चल आज धार्मिक सद्भाव की बात करें

किन्तु वह फिर

अलग-अलग आकार और

सूरतें गढ़ने लगती है,

शब्दों को आकारों में

बदलने लगती है।

.

हार नहीं मानती मैं,

कलम को फिर पकड़ती हूँ।

सच्चाई, नैतिकता,

ईमानदारी के विचार

मन में लाती हूँ।

किन्तु न जाने कहां से

कलम अरबों-खरबों के गणित में

उलझा जाती है।

.

हारकर मैंने कहा

चल भारत-माता के सम्मान में

गीत लिखें।

कलम हँसने लगी,

चिल्लाने लगी,

चीत्कार करने लगी।

कलम की नोक

तीखे नाखून-सी लगी।

कागज़

किसी वस्त्र का-सा

तार-तार होने लगा

मन शर्मसार होने लगा।

मान-सम्मान बुझने लगा।

.

हार गई मैं

किस्सा रोज़ का था।

कहां तक रोती या चीखती

किससे शिकायत करती।

धरती बंजर हो गई।

मैं लिख न सकी।

कलम की स्याही चुक गई।

कलम की नोक मुड़ गई ,

कुछ अच्छा लिखने की चाह मर गई।

 

आह! डाकिया!

आह! डाकिया!

खबरें संसार भर की।

डाक तरह-तरह की।

छोटी बात तो

पोस्टकार्ड भेजते थे,

औरों के अन्तर्देशीय पत्रों को

झांक-झांककर देखते थे।

और बन्द लिफ़ाफ़े को

चोरी से पढ़ने के लिए

थूक लगाकर

गीला कर खोलते थे।

जब चोरी की चिट्ठी आनी हो

तो द्वार पर खड़े होकर

चुपचाप डाकिए के हाथ से

पत्र ले लिया करते थे,

इससे पहले कि वह

दरार से चिट्ठी घर में फ़ेंके।

फ़टा पोस्टकार्ड

काली लकीर

किसी अनहोनी से डराते थे

और तार की बात से तो

सब कांपते थे।

सालों-साल सम्हालते थे

संजोते थे स्मृतियों को

अंगुलियों से छूकर

सरासराते थे पत्र

अपनों की लिखावट

आंखों को तरल कर जाती थी

होठों पर मुस्कान खिल आती थी

और चेहरा गुलाल हो जाया करता था

इस सबको छुपाने के लिए

किसी पुस्तक के पन्नों में

गुम हो जाया करते थे।

 

 

ज़िन्दगी भी सिंकती है

रोटियों के साथ

ज़िन्दगी भी सिंकती है।

कौन जाने

जब रोटियां जलती हैं

तब जिन्दगी के घाव

और कौन-कौन-सी

पीड़ाएं रिसती हैं।

पता नहीं

रोज़ कितनी रोटियां सिंकती हैं

कितनी की भूख लगती है

और कितनी भूख मिटती है।

इस एक रोटी के लिए

दिन-भर

कितनी मेहनत करनी पड़ती है

तब जाकर कहीं बाहर आग जलती है

और भीतर की आग

सुलगती हुई आग

न कभी बुझती है

कभी भड़कती है।

 

 

मौन पर दो क्षणिकाएं

मौन को शब्द दूं

शब्द को अर्थ

और अर्थ को अभिव्यक्ति

न जाने राहों में

कब, कौन

समझदार मिल जाये।

*-*-*-*

मौन को

मौन ही रखना।

किन्तु

मौन न बने

कभी डर का पर्याय।

चाहे

न तोड़ना मौन को

किन्तु

मौन की अभिव्यक्ति को

सार्थक बनाये रखना।

 

 

सपनों में जीने लगते हैं

लक्ष्य जितना सरल दिखता है

राहें

उतनी ही कठिन होने लगती हैं।

 

हमें आदत-सी हो जाती है

सब कुछ को

बस यूं ही ले लेने की

अभ्यास और प्रयास

की आदत छोड़ बैठते हैं

सपनों में जीने लगते हैं

लगता है

बस

हाथ बढ़ाएंगे

और चांद पकड़ लेंगे

अपने में खोये

ग्रहण और अमावस को

समझ नहीं पाते हम

सपनों में जीते

चांद को ही दोष देते हैं

सही राह नहीं पकड़ पाते हम।

-

लक्ष्य कठिन हो तो

राहें

आप ही सरल हो जाती हैं

क्योंकि तब हम समझ पाते हैं

चांद की दूरियां

और ग्रहण-अमावस का भाव

जीवन में।

 

 

छोटा-सा जीवन है हंस ले मना

छोटा-सा जीवन है हंस ले मना     

जीवन में

बार-बार अवसर नहीं मिलते,

धूप ज्यादा हो

तो सदैव बादल नहीं घिरते,

चांद कभी कहीं नहीं जाता

बस हमारी ही समझ का फेर है

कभी पूर्णिमा

कभी ईद और कभी अमावस

की बात करते हैं

निभा सको तो निभा लो

हर मौसम को जीवन में

यूं जीने के अवसर

बार-बार नहीं मिलते

रूठने-मनाने का

सिला तो जीवन-भर चला रहता है

अपनों को मनाने के

अवसर बार -बार नहीं मिलते

कहते हैं छोटा-सा जीवन है

हंस ले मना,

यूं अकारण

खुश रहने के अवसर

बार-बार नहीं मिलते

 

 

 

गरीबी हटाओ देश बढ़ाओ

पिछले बहत्तर साल से

देश में

योजनाओं की भरमार है

धन अपार है।

मन्दिर-मस्जिद की लड़ाई में

धन की भरमार है।

चुनावों में अरबों-खरबों लुट गये

वादों की, इरादों की ,

किस्से-कहानियों की दरकार है।

खेलों के मैदान पर

अरबों-खरबों का

खिलवाड़ है।

रोज़ पढ़ती हूं अखबार

देर-देर तक सुनती हूं समाचार।

गरीबी हटेगी, गरीबी हटेगी

सुनते-सुनते सालों निकल गये।

सुना है देश

विकासशील से विकसित देश

बनने जा रहा है।

किन्तु अब भी

गरीब और गरीबी के नाम पर

खूब बिकते हैं वादे।

वातानूकूलित भवनों में

बन्द बोतलों का पानी पीकर

काजू-मूंगफ़ली टूंगकर

गरीबी की बात करते हैं।

किसकी गरीबी,

किसके लिए योजनाएं

और किसे घर

आज तक पता नहीं लग पाया।

किसके खुले खाते

और किसे मिली सहायता

आज तक कोई बता नहीं पाया।

फिर  वे

अपनी गरीबी का प्रचार करते हैं।

हम उनकी फ़कीरी से प्रभावित

बस उनकी ही बात करते हैं।

और इस चित्र को देखकर

आहें भरते हैं।

क्योंकि न वे कुछ करते हैं।

और न हम कुछ करते हैं।

 

 

कूड़े-कचरे में बचपन बिखरा है

आंखें बोलती हैं

कहां पढ़ पाते हैं हम

कुछ किस्से  खोलती हैं

कहां समझ पाते हैं हम

किसी की मानवता जागी

किसी की ममता उठ बैठी

पल भर के लिए

मन हुआ द्रवित

भूख से बिलखते बच्चे

बेसहारा अनाथ

चल आज इनको रोटी डालें

दो कपड़े पुराने साथ।

फिर भूल गये हम

इनका कोई सपना होगा

या इनका कोई अपना होगा,

कहां रहे, क्या कह रहे

क्यों ऐसे हाल में है

हमारी एक पीढ़ी

कूड़े-कचरे में बचपन बिखरा है

किस पर डालें दोष

किस पर जड़ दें आरोप

इस चर्चा में दिन बीत गया !!

 

सांझ हुई

अपनी आंखों के सपने जागे

मित्रों की महफ़िल जमी

कुछ गीत बजे, कुछ जाम भरे

सौ-सौ पकवान सजे

जूठन से पंडाल भरा

अनायास मन भर आया

दया-भाव मन पर छाया

उन आंखों का सपना भागा आया

जूठन के ढेर बनाये

उन आंखों में सपने जगाये

भर-भर उनको खूब खिलाये

एक सुन्दर-सा चित्र बनाया

फे़सबुक पर खूब सजाया

चर्चा का माहौल बनाया

अगले चुनाव में खड़े हो रहे हम

आप सबको अभी से करते हैं नमन

दुराशा

जब भी मैंने

चलने की कोशिश की

मुझे

खड़े होने लायक

जगह दे दी गई।

जब मैंने खड़ा होना चाहा

मुझे बिठा दिया गया।

और ज्यों ही मैंने

बैठने का प्रयास किया

मुझे नींद की गोली दे दी गई।

 

चलने से लेकर नींद तक।

लेकिन मुझे फिर लौटना है

नींद से लेकर चलने तक।

जैसे ही

गोली का खुमार टूटता है

मैं

फिर

 चलने की कोशिश

करने लगती हूं।

 

 

मन चंचल करती तन्हाईयां

जीवन की धार में

कुछ चमकते पल हैं

कुछ झिलमिलाती रोशनियां

कुछ अवलम्ब हैं

तो कुछ

एकाकीपन की झलकियां

स्मृतियों को संजोये

मन लेता अंगड़ाईयां

मन को विह्वल करती

बहती हैं पुरवाईयां

कुछ ठिठके-ठिठके से पल हैं

कुछ मन चंचल करती तन्हाईयां

 

 

 

पार जरूर उतरना है

चल रे मन !

आज नैया की सैर कराउं !

पतवारों का क्या करना है।

खेवट को क्या रखना है।

बस अपने मन से तरना है।

डूबेंगें, उतरेंगे।

सीपी शंखों को ढूढेंगे।

मोती माणिक का क्या करना है।

उपर नीचे डोलेगी।

हिचकोले ले लेकर बोलेगी।

चल चल सागर के मध्य चलें।

लहरों संग संग तैर चलें।

पानी में छाया को छूलेंगे।

अपनी शक्लें ढूंढेंगे।

बस इतना ही तो करना है

पार जरूर उतरना है।

चल रे मन !

आज नैया की सैर कराउं !


यह अथाह शांत जलराशि

गगन की व्यापकता

ठहरी-ठहरी सी हवा,

निश्चल, निश्छल-सा समां

दूर कहीं घूमतीं

हल्की हल्की सी बदरिया।

तैरने लगती हूं, डूबने लगती हूं

फिर तरती हूं, दूर तक जाती हूं

फिर लौट लौट आती हूं।

इस सूनेपन में,  इक अपनापन है।