एक आदमी मरा

एक आदमी मरा।

अक्सर एक आदमी मरता है।

जब तक वह जिंदा  था

वह बहुत कुछ था।

उसके बार में बहुत सारे लोग

बहुत-सी बातें जानते थे।

वह समझदार, उत्तरदायी

प्यारा इंसान था।

उसके फूल-से कोमल दो बच्चे थे।

या फिर वह शराबी, आवारा बदमाश था।

पत्नी को पीटता था।

उसकी कमाई पर ऐश करता था।

बच्चे पैदा करता था।

पर बच्चों के दायित्व के नाम पर

उन्हें हरामी के पिल्ले कहता था।

वह आदमी एक औरत का पति था।

वह औरत रोज़ उसके लिए रोटी बनाती थीं,

उसका बिस्तर बिछाती थी,

और बिछ जाती थी।

उस आदमी के मरने पर

पांच सौ आदमी

उसकी लाश के आस-पास एकत्र थे।

वे सब थे, जो उसके बारे में

कुछ भी जानते थे।

वे सब भी थे

जो उसके बारे में तो नहीं जानते थे

किन्तु उसकी पत्नी और बच्चों के बारे

में कुछ जानते थे।

कुछ ऐसे भी थे जो कुछ भी नहीं जानते थे

लेकिन फिर भी वहां थे।

उन पांच सौ   लोगों में

एक भी ऐसा आदमी नहीं था,

जिसे उसके मरने का

अफ़सोस न हो रहा हो।

लेकिन अफ़सोस का कारण

कोई नहीं बता पा रहा था।

अब उसकी लाश ले जाने का

समय आ गया था।

पांच सौ आदमी छंटने लगे थे।

श्‍मशान घाट तक पहुंचते-पहुंचते

बस कुछ ही लोग बचे थे।

लाश   जल रही थी,भीड़ छंट रही थी ।

एक आदमी मरा। एक औरत बची।

 

पता नहीं वह कैसी औरत थी।

अच्छी थी या बुरी

गुणी थी या कुलच्छनी।  

पर एक औरत बची।

एक आदमी से

पहचानी जाने वाली औरत।

अच्छे या बुरे आदमी की एक औरत।

दो अच्छे बच्चों की

या फिर हरामी पिल्लों की मां।

अभी तक उस औरत के पास

एक आदमी का नाम था।

वह कौन था, क्या था,

अच्छा था या बुरा,

इससे किसी को क्या लेना।

बस हर औरत के पीछे

एक अदद आदमी का नाम होने से ही

कोई भी औरत

एक औेरत हो जाती है।

और आदमी के मरते ही

औरत औरत न रहकर

पता नहीं क्या-क्या बन जाती है।

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अब उस औरत को

एक नया आदमी मिला।

क्या फर्क पड़ता है कि वह

चालीस साल का है

अथवा चार साल का।

आदमी तो आदमी ही होता है।

 

उस दिन  हज़ार से भी ज़्यादा

आदमी एकत्र थे।

एक चार साल के आदमी को

पगड़ी पहना दी गई।

सत्ता दी गई उस आदमी की

जो मरा था।

अब वह उस मरे हुए आदमी का

उत्तरााधिकारी था ,

और उस औरत का भी।

उस नये आदमी की सत्ता की सुरक्षा के लिए

औरत का रंगीन दुपट्टा

और कांच की चूड़ियां उतार दी गईं।

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एक आदमी मरा।

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नहीं ! एक औरत मरी।