​​​​​​​ससम्मान बात करनी पड़ती है

पता नहीं वह धोबी कहां है

जिस पर यह मुहावरा बना था

घर का न घाट का।

वैसे इस मुहावरे में

दो जीव भी हुआ करते थे।

जब से समझ आई है

यही सुना है

कि धोबी के गधे हुआ करते थे

जिन पर वे

अपनी गठरियां ठोते थे।

किन्तु मुहावरे से

गर्दभ जी तो गायब हैं

हमारी जिह्वा पर

श्वान महोदय रह गये।

 

और आगे सुनिये मेरा दर्शन।

धोबी के दर्शन तो

कभी-कभार

अब भी हो जाते हैं

किन्तु गर्दभ और श्वान

दोनों ही

अपने-अपने

अलग दल बनाकर

उंचाईयां छू रहे हैं।

इसीलिए जी का प्रयोग किया है

ससम्मान बात करनी पड़ती है।