मौत की दस्तक

कितनी

सरल-सहज लगती थी ज़िन्दगी।

खुली हवाओं में सांस लेते,

जैसी भी मिली है

जी रहे थे ज़िन्दगी।

कभी ठहरी-सी,

कभी मदमाती, हंसाती,

छूकर, मस्ती में बहती,

कभी रुलाती,

हवाओं संग

लहराती, गाती, मुस्काती।

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पर इधर

सांसें थमने लगी हैं।

हवाओं की

कीमत लगने लगी है।

आज हवाओं ने

सांसों की कीमत बताई है।

जिन्दगी पर

पहरा बैठा दिया है हवाओं ने।

मौत की दस्तक सुनाने लगी हैं।

रुकती हैं सांसें, बिंधती हैं सांसें,

कीमत मांगती हैं सांसें।

अपनों की सांसें  चलाने के लिए

हवाओं से जूझ रहे हैं अपने।

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शायद हम ही

बदलती हवाओं का रुख

पहचान नहीं पाये,

इसीलिए हवाएं

आज

हमारी परीक्षा ले रही हैं।