आसमान में छेद

 पता नहीं कौन शायर कह गया

आसमां में छेद क्यों नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछाला होता यारो ।

पता नहीं किस युग का था वह शायर।

उछालकर देखा था क्या उसने कभी पत्थर।

 

बड़ा काम तो हम ज़िन्दगी में

कभी कर नहीं पाये

सोचा, चलो आज कुछ नया करते हैं

उस शायर की इच्छा पूरी करते हैं।

एक क्यों,

तबीयत से कई पत्थर उछालते हैं,

आसमान में एक नहीं

अनेक छेद करते हैं।

पर शायद

युग बदल गया था

या हमें

पत्थर उछालने का

तरीका पता नहीं था

हमने तो अभी बस

एक ही पत्थर उठाया था

उछालने की नौबत भी नहीं आई थी

सैंकड़ों पत्थर लौट आये हमारे पास।

लगता है

उस शायर का शेर

सबने पसन्द कर लिया है

और हमारी तरह

सभी पत्थर उछालने में लगे हैं

और हम तो

अपना ही सिर फोड़ने में लगे हैं।