वक्त के मरहम

कहने भर की ही बात है

कि वक्त के मरहम से

हर  जख़्म भर जाया करता है।

 

ज़िन्दगी की हर चोट की

अपनी-अपनी पीड़ा होती है

जो केवल वही समझ पाता है

जिसने चोट खाई हो।

किन्तु, चोट

जितनी गहरी हो

वक्त भी

उतना ही बेरहम हो जाता है।

और हम इंसानों की फ़ितरत !

 

कुरेद-कुरेद कर

जख़्मों को ताज़ा बनाये रखते हैं।

 

पीड़ा का अपना ही

आनन्द होता है।