श्रम की धरा पर पांव धरते हैं

श्रम की धरा पर पांव धरते हैं

न इन राहों से डरते हैं

दिन-भर मेहनत कर

रात चैन की नींद लेते हैं

कहीं भी कुछ नया

या अटपटा नहीं लगता

यूं ही

जीवन की राहों पर चलते हैं

न बड़े सपनों में जीते हैं

न आहें भरते हैं।

न किसी भ्रम में रहते हैं

न आशाओं का

अनचाहा जाल बुनते हैं।

पर इधर कुछ लोग आने लगे हैं

हमें औरत होने का एहसास

कराने लगे हैं

कुछ अनजाने-से

अनचाहे सपने दिखाने लगे हैं

हमें हमारी मेहनत की

कीमत बताने लगे हैं

दया, दुख, पीड़ा जताने लगे हैं

महल-बावड़ियों के

सपने दिखाने लगे हैं

हमें हमारी औकात बताने लगे हैं

कुछ नारे, कुछ दावे, कुछ वादे

सिखाने लगे हैं



मिलें आपसे तो

मेरी ओर से कहना

एक बार धरा पर पांव रखकर देखो

काम को छोटा या बड़ा न देखकर

बस मेहनत से काम करके देखो

ईमान की रोटी तोड़ना

फिर रात की नींद लेकर देखो