किस युग में जी रहे हो तुम

मेरा रूप तुमने रचा,

सौन्दर्य, श्रृंगार

सब तुमने ही तो दिया।

मेरा सम्पूर्ण व्यक्तित्व

मेरे गुण, या मेरी चमत्कारिता

सब तुम्हारी ही तो देन है।

मुझे तो ठीक से स्मरण भी नहीं

किस युग में, कब-कब

अवतरित हुआ था मैं।

क्यों आया था मैं।

क्या रचा था मैंने इतिहास।

कौन सी कथा, कौन सा युद्ध

और कौन सी लीला।

हां, इतना अवश्य स्मरण है

कि मैंने रचा था एक युग

किन्‍तु समाप्त भी किया था एक युग।

तब से अब तक

हज़ारों-लाखों वर्ष बीत गये।

चकित हूं, यह देखकर

कि तुम अभी भी

उसी युग में जी रहे हो।

वही कल्पनाएं, कपोल-कथाएं

वही माटी, वही बाल-गोपाल

राधा और गोपियां, यशोदा और माखन,

लीला और रास-लीलाएं।

सोचा कभी तुमने

मैंने जब भी

पुन:-पुन: अवतार लिया है

एक नये रूप में, एक नये भाव में

एक नये अर्थ में लिया है।

काल के साथ बदला हूं मैं।

हर बार नये रूप में, नये भाव में

या तुम्हारे शब्दों में कहूं तो

युगानुरूप

नये अवतार में ढाला है मैंने

अपने-आपको।

किन्तु, तुम

आज भी, वहीं के वहीं खड़े हो।

तो इतना जान लो

कि तुम

मेरी आराधना तो करते हो

किन्तु मेरे साथ नहीं हो।