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अपने बारे में क्या लिखूं। डा. रघुवीर सहाय के शब्दों में ‘‘बहुत बोलने वाली, बहुत खाने वाली, बहुत सोने वाली’’ किन्तु मेरी रचनाएं
बहुत बोलने वालीं, बहुत बोलने वालीं,
बहुत बोलने वालीं

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रिश्तेः कुछ अपने कुछ सपने

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कविताएं मुझे अपने-आप से जोड़ती हैं, आनन्द देती हैं, आत्म-सन्तोष प्रदान करती हैं। मेरे भीतर के अनभिव्यक्त को अभिव्यक्त करने में मुझे समर्थ करती हैं,
मुझे जिजीविषा प्रदान करती हैं।

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  • अपनी हिम्मत से जीते हैं
    अपनी हिम्मत से जीते हैं

    बस एक दृढ़ निश्चय हो तो राहें उन्मुक्त हो ही जाती हैं लक्ष्य पर दृष्टि हो तो बाधाएं स्वयं ही हट...

  • झूठ के आवरण चढ़े हैं
    झूठ के आवरण चढ़े हैं

    चेहरों पर चेहरे चढ़े हैं असली तो नीचे गढ़े हैं कैसे जानें हम किसी को झूठ के आवरण चढ़े...

  • डगर कठिन है
    डगर कठिन है

    बहती धार सी देखो लगती है जिन्दगी। पहाड़ों पर बहार सी लगती है जिन्दगी। किन्तु डगर कठिन है...

  • समय जब कटता नहीं
    समय जब कटता नहीं

    काम है नहीं कोई इसलिए इधर की उधर उधर की इधर करने में लगे हैं हम आजकल । अपना नहीं,...

  • दिन-रात
    दिन-रात

    दिन-रात जीवन के आवागमन का भाव बताता है। दिन-रात जीवन के दुख-सुख का हाल बताता...

  • तितली बोली
    तितली बोली

    तितली उड़ती चुप-चुप, भंवरा करता भुन-भुन भंवरे से बोली तितली, ज़रा मेरी बात तो सुन तू काला, मैं...

  • सीधी राहों की तलाश में जीवन
    सीधी राहों की तलाश में जीवन

    अपने दायरे आप खींच न तकलीफ़ों से आंखें मींच . हाथों की लकीरें अजब-सी आड़ी-तिरछी...

  • कदम रखना सम्भल कर
    कदम रखना सम्भल कर

    इन राहों पर कदम रखना सम्भल कर, फ़िसलन है बहुत मन को कौन समझाये इधर-उधर तांक-झांक करे है...

  • अकारण क्यों हारें
    अकारण क्यों हारें

    राहों में आते हैं कंकड़-पत्थर, मार ठोकर कर किनारे। न डर किसी से, बोल दे सबको, मेरी मर्ज़ी, हटो...

  • जिन्दगी किसी धार से कम नहीं
    जिन्दगी किसी धार से कम नहीं

    जिन्दगी यूँ भी किसी धार से कम नहीं ये कटार, छुरी तलवार क्या करेंगे। कांटों भरी रही हैं...

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